Aarti Sangrah
आरती चन्द्र प्रभु जी जिनवानी
म्हारा चन्द्र प्रभु जी की सुन्दर मूरत,
म्हारे मन भाई जी ॥ टेक
सावन सुदि दशमी तिथि आई,
प्रगटे त्रिभुवन राईजी ॥
अलवर प्रांत में नगर तिजारा,
दरशे देहरे मांही जी ॥
सीता सती ने तुमको ध्याया,
अग्नि में कमल रचायाजी ॥
मैना सती ने तुमको ध्याया,
पति का कुष्ट मिटाया जी ॥
जिनमें भूत प्रेत नित आते,
उनका साथ छुड़ाया जी ॥
सोमा सती ने तुमको ध्याया,
नाग का हार बनाया जी ॥
मानतुंग मुनि तुमको ध्याया,
तालों को तोड भगाया जी ॥
जो भी दुखिया दर पर आया
उसका कष्ट मिटाया जी ॥
अंजन चोर ने तुमको ध्याया,
शस्त्रों से अधर उठाया जी ॥
सेठ सुदर्शन तुमको ध्याया,
सूली का सिंहासन बनाया जी ॥
समवशरण में जो कोई आया,
उसको पार लगाया जी ॥
रत्न जड़ित सिंहासन सोहे,
ता में अधर विराजे जी ॥
तीन छत्र शीष पर सोहें,
चौंसठ चंवर ढुरावें जी ॥
ठाड़ो सेवक अर्ज करै छै,
जनम मरण मिटाओ जी ॥
भक्त तुम्हारे तुमको ध्यावैं
बेड़ा पार लगाओ जी ॥