Bhajan Sangrah

Bhajan Sangrah

44.जीवन है दिपक की ज्योत

जीवन का रहस्य
जीवन है दिपक की ज्योत, कब बुझ जाए रे ।
घटना दुर्घटना कब क्या घट जाए रे ।
मन्दिर में न गया कभी, प्रभु भजन न किया कभी,
बीते यू ही वर्ष कई- २, णमोकार को जपा नही,
स्वाध्याय को किया नहीं,
मुक्ति की मंजिल तू कैसे पाए रे जीवन है.. ॥१॥
गुरुओं से ये दूर रहा, कषायों से भरपूर रहा,
अभिमान में चूर रहा- २, यह मन कितना मैला है,
तन मिट्टी का चोला है
, मिट्टी का यह चोला कब मिट जाए रे जीवन ॥२॥
अस्थिर जग की माया है, मिटने वाली काया है,
सुख दुःख इसकी छाया है-२, क्यों इसमें भरमाया
कहाँ-कहाँ से लाया है,
तेरी ये माया, तेरे साथ न जाए रे-जीवन है.. ३ ॥
ठाट पडा रह जाएगा, कोई काम न आएगा,
कोई साथ न जाएगा-२, क्यों तू मद में फूल रहा,
क्यों अपने को भूल रहा,
आतम का यह पंछी, कब उड़ जाए रे जीवन.. ॥ ४ ।।
बीच गली में छोड़ेंगे, धन के पीछे दौड़ेगें,
अपने से ना जोड़ेगे - २,रिश्ते-नाते तोड़ेगें,
जग की ये लीला, तू जान न पाए रे जीवन...॥५॥
अंत में होगी चला-चली, रोकेगी न रामकली,
मुरझाएगी हृदय कली-२ ले जाएगा काल बली,
सुनी होगी सभी गली,
कर्मों का फंदा, तू काट न पाये रे-जीवन है ॥६॥