Bhajan Sangrah

Bhajan Sangrah

वीर प्रभु!तेरे शासन की, फिर से आज जरूरत है

वीर प्रभु!तेरे शासन की, फिर से आज जरूरत है।

 क्योंकि यहाँ के मानव में, दिखती दानव की सूरत है।। महावीर.।।


तूने इस भारत का गौरव, दुनिया भर में फैलाया।

 सत्य अहिंसा अनेकान्त का, झण्डा जग में लहराया।।

सर्वोदय सिद्धान्तों की प्रगटे, अब सच्ची मूरत है।

 क्योंकि यहाँ के मानव में, दिखती दानव की सूरत है।।१।।


माँ त्रिशला पितु सिद्धारथ के, पुत्र भले तुम कहलाए। 

लेकिन जन जन के मानस में, तुम सूरज बन कर छाये।।

सिद्धशिला के वासी प्रभु, महावीर की आज जरूरत है 

क्योंकि यहाँ के मानव में, दिखती दानव की सूरत है।।२।। ।


तू कुण्डलपुर में जन्मा, लेकिन हो गया अजन्मा है।

 सत्कर्मों को दिखलाकर, तू तो हो गया अकर्मा है।।

सभी बने “चन्दना' वीर सम, युग को यही जरूरत है।

 क्योंकि यहाँ के मानव में, दिखती दानव की सूरत है।।३।।