तर्ज- बाबुल का ये घर.....
वीरा तेरे तीरथ का, मुझे दर्श जो मिल जावे।
तीरथ के दरश पाकर, मन उपवन खिल जावे।। टेक०।।
वह कुण्डलपुर नगरी, वीरान हुई प्रभु जी।
वह वीरानी लखकर, पत्थर भी पिघल जावे।। वीरा०।।।।
अब सिद्धायिनि माता, का आसन कांपा है।
उस कम्पन से तीरथ, का रूप बदल जावे।। वीरा०।।२।।
माँ ज्ञानमती को वह, दैवी प्रेरणा मिली।
उस प्रेरणा के बल पर, वह तीरथ बन जावे।। वीरा०।।३।।
जब चरण चले उनके, सचमुच उद्धार हुआ।
उद्धार की श्रेणी में, श्रुतसार भी मिल जावे।। वीरा०।।४।।
यदि रोम रोम मेरा, हो जाए समर्पित प्रभु।
"चन्दना" तभी जीवन, की कलियाँ खिल जावें।। वीरा०।।५।।