तर्ज- जिन्दगी की न टुटे लड़ी ...
काहे कर्मो की बुनता लडी ,
धर्म कर ले-2 घडी दो घडी
ओ.. ओ... लम्बी उमरिया को छोडो ,
धर्म की एक घडी है बडी
धर्म कर ले, धर्म कर ले घडी दो घडी।
1.उन लोगो का कहना ही क्या,
जिनने धर्म हृदय न धरा,
वो जैनी कहाते नही,
जो सुनता जिनवाणी न हो।
जिनवाणी जगाने खडी।
धर्म कर लो.....
2.आज से अपना वादा रहा,
प्रभु को पुजेंगे घर छोडकर
रोज मंदिर में जायेंगे हम,
गम की दुनिया का दर छोडकर,
दुख ताहि परीक्षा घडी।
धर्म कर लो.......
3.लाख भोगे विषय जो तुने,
फिर भी धर्म न पाया हो कभी
रोज जिनवाणी को तू सुने,
तेरा वक्त न जाया हो।
मार्ग है यही मोक्ष सीढी ।
धर्म कर लो.......