Bhajan Sangrah

Bhajan Sangrah

आनंद स्रोत बह रहा मन

आनंद स्रोत बह रहा मन क्यों उदास है
अचरच है‌ जल में रहकर भी मछली को प्यास है
उठ ज्ञान चक्षु खोल दे देख तो जरा
जिसकी तूझे तलाश है वो‌ तेरे पास है
अचरज हे ‌ जल में ......
कुछ तो समय निकाल आत्मा शुद्धि के लिए ना
नर जन्म का उद्देश्य ,ना केवल विनाश है
अचरज है जल में........
भोगो‌ की वासनाओ‌ से दूषित है मन तेरा
प्रभु का स्मरण नहीं तुझे इस में आस है
अचरज‌‌। है‌ जल‌ में.........

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