आनंद स्रोत बह रहा मन क्यों उदास है
अचरच है जल में रहकर भी मछली को प्यास है
उठ ज्ञान चक्षु खोल दे देख तो जरा
जिसकी तूझे तलाश है वो तेरे पास है
अचरज हे जल में ......
कुछ तो समय निकाल आत्मा शुद्धि के लिए ना
नर जन्म का उद्देश्य ,ना केवल विनाश है
अचरज है जल में........
भोगो की वासनाओ से दूषित है मन तेरा
प्रभु का स्मरण नहीं तुझे इस में आस है
अचरज। है जल में.........