(सिरी गणाइरिय विरायसायर विरइओ)
5. तित्थयर-भत्ति (अनुष्टुप छंद)
धम्मतित्थं च कत्तारं, पढमं पुरुणायगं।
आदिं उसहणाहं च, वंदे णाहेय-पांदणं ।।1।।
धर्मतीर्थ के प्रथम कर्ता, पुरुनायक, आदिप्रभु, नाभिराय के नंदन (पुत्र) प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ को मैं वंदन करता हूँ।
जेयो अजिय-कम्मेसुं, अजियो कम्म-णासगे।
जयो णो केण दिव्वेणं, अजियो अजियो जगे।।2।।
जो कर्मों में जयी हैं, कर्मनाशक हैं, वे अजितनाथ भगवान किस कारण से अजेय नहीं हुए हैं अर्थात् सभी में अजेय हैं।
केवलणाण-सुत्तेणं, संभव संभवो हवे ।
णिय-आदसहावेणं, वंदे तित्थय-संभवं ।।3।।
हे संभवनाथ जिन ! आत्मस्वभाव से केवलज्ञान और सूत्र (आगम) से सभी पदार्थों का ज्ञान संभव हो जाता है ऐसा आपका उपदेश है, इसलिए मैं उन तीर्थ प्रणेता संभवनाथ भगवान को नमस्कार करता हूँ।
कल्लाण-गब्भजम्मं च, तव-णाणं च मुत्तिगं ।
जगदाणंद-सामित्तं, वंदे मे अहिणंदणं ।।4।।
गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक को प्राप्त, जगत को आनंद देने वाले, स्वामित्व के गौरव अभिनंदननाथ भगवान की मैं वंदना करता हूँ।
सुमदिं सुमदीजुत्तो, सव्वण्डु सव्व-दंसगं ।
सुमदिं सोम्मलाहत्थं, वंदे हं सुमदिं पहुं ।।5।।
सुमतिनाथ भगवान सुमति गुण से सम्पन्न हैं तथा वे सर्वज्ञ, सर्वदर्शी हैं, मैं ऐसी सुमति के सम्यक् लाभ हेतु सुमति प्रभु की वंदना करता हूँ।
उत्तमवद-धम्मेणं, सव्वकम्मपमुत्तगं।
पउमप्पह-पोम्मत्तं, वंदे पोम्मपभासमं ।।6।।
उत्तम व्रत एवं धर्म से युक्त एवं सर्वकर्म से मुक्त हुए पद्म की प्रभा वाले पद्मप्रभ को मैं नमस्कार करता हूँ।
जणमण-सुपासे जो, चिट्ठेज्ज सुसदासणे ।
पसण्ण-वदणं सोम्मं, वंदे सुपास-णायगं ।।7।।
प्रत्येक व्यक्ति के पार्श्व में सम्यक् भाव रहता है, उसी भाव आसन पर वह स्थित होना चाहता है, ऐसे ही प्रसन्न वदन वाले सौम्यमूर्ति सुपार्श्वप्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ।
सय इंद- सुपुज्जाणं, चंदप्पहसमं जिणं।
अम्हे सुसोम्मसब्भावं, चंदप्पहुं च वंदमि ।।४।।
सौ इन्द्रों से पूज्य चन्द्र की प्रभा के समान सौम्य स्वभावी चन्द्रप्रभजिन को हम सब नमस्कार करते हैं।
लक्खसहस्सअट्ठाणं, अणंतचदु-सोहिदं।
धवलं देहवण्णं च, वंदे हं सुविहिं सया ।।9।।
एक हजार आठ लक्षणों वाले, अनंत चतुष्टय की शोभायुक्त, धवल वर्ण देह के धारी सुविधि जिन को मेरा सदा नमस्कार हो।
सीदलो संगमो साहू, सीदलो चंदचंदणो।
सीदलप्पसहावत्थं, वंदे हं सीदलं सया ।।10।।
साधु समागम शीतल होता है, शीतल चन्द्रमा है और चन्दन भी शीतल है। किन्तु मैं आत्म शीतलता की प्राप्ति हेतु शीतल जिनेश्वर को नमस्कार करता हूँ।
सेयो सेयकरो देवो, सेयोसेय सदा जगे।
सेयं सव्वजणाणं च, सेयंसं पहु-णंदणं।।11।।
श्रेय (रत्नत्रय) तो श्रेय (कल्याण) करने वाला होता है, और वह श्रेय दायक देव श्रेयांस हैं। इस जगत् के सभी जनों के कल्याण दाता श्रेयांस को मैं नमन करता हूँ।
तित्थयरेसु बम्हत्तं, आदिं बम्हपभासणं।
रत्तवण्णगसंजुत्तं, वासुपुज्जजिणं णमो ।।12।।
तीर्थंकरों में प्रथम बाल-ब्रह्मचारी आत्म-स्वभावदायक एवं रक्तवर्ण से संयुक्त वासुपूज्य जिन को मैं नमस्कार करता हूँ।
अट्ठकम्ममलं मुत्तं, विमलं सुहणंदणं ।
विमलं विमलं हेतुं, वंदे विमल-तित्थगं ।।13।।
अष्ट कर्म मल से मुक्त पूर्ण विमल एवं पूर्ण सुख के नन्दन विमलप्रभु को विमल/कर्ममल रहित होने के लिए मैं विमलनाथ तीर्थंकर को नमस्कार करता हूँ।
अणंताणतणाणाणिं, दंसणं अणंतं बलं।
महासोक्खं अणंतं च, वंदे जिण-अणंतगं ।।14।।
अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत बल एवं अनंत सुख से युक्त अनंत प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ।
धम्मे धम्मो महाधम्मो, धम्मणाह-जिणेसरो।
धम्मतित्थस्स कत्तारो, तं वंदे सिरसा सया ।।15।।
धर्मों में धर्म महाधर्म है, ऐसे धर्म तीर्थ के (प्रवर्तन) करने वाले धर्मनाथ तीर्थंकर को हमेशा सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ।
विस्स-संतिकरो तित्थो, संतिणाहो जिणेसरो।
अप्पसंतिं च लब्भत्थं, वंदे संतिप्पहुं जिणं । 16।।
विश्व में शान्ति तीर्थ को करने वाले शांतिनाथ जिनेश्वर हैं, मैं तो आत्मशान्ति की प्राप्ति हेतु जिन शान्तिनाथ प्रभु की वंदना करता हूँ।
कुंद पुप्फसमो कुंथू, कुंथु आदिदयाकरो।
सील-सम्म-सयायारो, कुंथु वंदे सया वयं ।।17।।
कुन्थुनाथ भगवान कुंद नामक प्रफुल्लित पुष्प की तरह हैं, वे कुन्थु आदि सभी जीव पर दया करने वाले हैं, शील एवं सम्यक् सदाचरण वाले कुन्थु नाथ भगवान् को हम सबका नमस्कार हो।
अहो अहो अरोणाहो, देव-देवो णमो णमो ।
अहो रत्तिं अहोभावं, णिच्चं णिच्वंणमो अरं ।।18।।
अनेकों आश्चर्य को उत्पन्न करने वाले देवों के देव अरनाथ देव हैं। मैं उन देवाधिदेव अरनाथ भगवान को दिन-रात विशुद्ध भाव से हमेशा नमस्कार करता हूँ।
तिलोयपुज्ज-सम्माणं, तिलोय-पदि-णायगं।
तिलोय-तिलगं णाहं, मल्लिणाहं णमो णमो।।19।।
जो त्रिलोक पूज्य हैं, त्रिलोक में सम्मान को प्राप्त हैं और त्रिलोक नायक हैं, ऐसे त्रिलोक तिलक मल्लिनाथ भगवान् को मेरा नमस्कार हो।
णिच्चणिरंजणं सुद्धं, णिच्चं आदपभासगं ।
आहि-वाहिसणिं धादु, तंवंदे मुणिसुव्वयं ।।20।।
जो नित्य हैं, निरंजन हैं, शुद्ध हैं और हमेशा आत्म स्वभाव प्रकाशक हैं, आधि-व्याधि और शनि दोष के नाश हेतु ऐसे मुनिसुव्रत भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ।
समवसरणे ठिद्दो, सुद्धप्प-सुह-कारगं।
णमिणाहं जिणं वंदे, लाहत्थं मोक्ख-सुद्धगं ।।21।।
समवशरण में स्थित शुद्धात्म सुख को प्राप्त करने वाले नमिनाथ भगवान् को मोक्ष सुख की प्राप्ति के लिए मैं नमस्कार करता हूँ।
बालबंभजिणं णेमिं, सिवमग्गं पगासगं।
मुत्तिसिद्धिमहालाहं, वंदे णेमिप्पहुं सया ।।22।।
जो बाल ब्रह्मचारी हैं, शिवमार्ग प्रकाशक हैं एवं मुक्ति सिद्धि के महालाभ को देने वाले ऐसे नेमिनाथ प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ।
कम्मपास-विमुक्तं च, उवसग्गजयं जिणं।
विरागाराम-आसंदिं, वंदे पासं च पासगं ।। 23।।
जो कर्म पास/कर्मजाल से विमुक्त हैं, उपसर्गजयी हैं, जिन हैं, एवं विराग रूपी आराम को जिन्होंने प्राप्त किया है, मैं उन पार्श्वनाथ भगवान को नमस्कार करता हूँ।
वड्डमाणं जगे-णंदं, वीरं च अदिवीरगं ।
सम्मदिं च महावीरं, चदुवीसं जिणं णमो ।।24।।
जगत में आनंदकारी चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान, वीर, अतिवीर,
सन्मति एवं महावीर इन पाँच नामों से युक्त जिन को नमस्कार करता हूँ।
इच्छेज्ज इगवीसम्हि, सदि-सासद-धम्मगं ।
आरोग्गबोहि-लाहत्थं, विरायो अंजलिं सिरे ।।25।।
इस इक्कीसवीं शताब्दी में शाश्वत धर्म, आरोग्य एवं बोधिलाभ के लिए मैं आचार्य विरागसागर शिर पर अंजलि करके विराग वीतराग भाव की कामना करता हूँ।
गणाइरिय-गण्णेसो, विरागीभाव-पुण्णगो।
रयणत्तय-सिद्धिं च, तित्थयराण-पंथगं ।।26।।
जो गणाचार्य हैं, गणेश हैं, विराग भाव से पूर्ण हैं तथा जो रत्नत्रय की सिद्धि को देने वाले हैं, ऐसे तीर्थंकरों के मार्ग को मैं प्राप्त करता हूँ।
अंचलिका
इच्छामि भंते ! चउवीस-तित्थयरभत्ति-काउस्सग्गो कओ,तस्सालोचेउं। पंचमहाकल्लाण-संपण्णाणं, अट्ठमहापाडिहेरसहियाणं चउतीसातिसय-विसेस- संजुत्ताणं बत्तीस-देविंद-मणिमय-मउड-मत्थय-महिदाणं, बलदेव- वासुदेव- चक्कहर-रिसि-मुणि-जदि (जइ) – अणगारोवगूढाणं, थुइसय-सहस्स-णिलयाणं, उसहाइवीर-पच्छिम - मंगल-महापुरिसाणं, णिच्चकालं अच्चेमि, पुज्जेमि, वंदामि, णमस्सामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो, सुगइ-गमणं, समाहिमरणं, जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं ।
हे भगवन् ! जो मैंने चौबीस तीर्थंकर भक्ति सम्बन्धी कायोत्सर्ग किया है, उसमें लगे दोषों की आलोचना करना चाहता हूँ। जो पाँच महाकल्याणकों से सम्पन्न हैं, अष्ट महाप्रतिहार्यों से सहित हैं, चौंतीस अतिशय विशेषों से संयुक्त हैं, बत्तीस इन्द्रों के मणिमय मुकुटों से युक्त मस्तकों से जिनकी पूजा होती है, बलदेव, नारायण, चक्रवर्ती, ऋषि, मुनि, यति और अनगार इन चार प्रकार के मुनियों से जो परिवृत हैं तथा हजारों स्तुतियों के जो घर हैं, ऐसे ऋषभादि महावीर पर्यन्त के मंगलमय महापुरुषों की मैं निरन्तर अर्चा करता हूँ, पूजा करता हूँ, वन्दना करता हूँ, उन्हें नमस्कार करता हूँ। उसके फलस्वरूप मेरे दुःखों का क्षय हो, कर्मों का क्षय हो, रत्नत्रय की प्राप्ति हो, सुगति में गमन हो, समाधिमरण हो और मुझे जिनेन्द्र भगवान के गुणों की सम्प्राप्ति हो।
(इदि तित्थयर भत्ति)
***
दृढ़ भक्ति की कामना
त्वां देव ! नित्य मभि वन्द्य कृत प्रणामो, नान्यत् फलं परिमितं परिमार्गयामि। त्यय्येव भक्ति मचलां जिन ! मे दिश त्वं, या सर्वमभ्युदय-मुक्तिफलं प्रसूते ।।
अर्थ – हे देव ! मैं निरन्तर आपकी वन्दना कर प्रणाम करता हुआ अन्य परिमित सीमित फल की याचना नहीं करता हूँ। हे जिनदेव ! आप में ही मेरी वह दृढ़ सुदृढ़ भक्ति विद्यमान रहे, जो समस्त स्वर्ग और मोक्षरुपी फल को देती है, वह वर मुझे दीजिए।
सुभाषित सहस्रम् श्लोक 538