Bhakti

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03.अरहंत भक्ति प्राकृत

3. अरहंत-भत्ति (इन्द्रवज्रा छंद)

(सिरी गणाइरिय विरायसायर विरइओ)

जिणालयं जं पढमं च दिटुं, अप्पापवित्तं च करेदि णिच्चं।

ठिदं च दारं णिसिधोच्चारणं, पवेसि अंतो दुय हत्थ मत्थे ।।।।।

जिनालय का प्रथम दर्शन सदैव आत्मा को पवित्र करता है। उसके द्वार पर स्थित हो निषधिका निःसहि-3 ऐसे उच्चारण करते हुए अपने दोनों हाथ जोड़कर अंदर प्रवेश करें।

तिलोय चक्कं च विणासणटुं, सुद्धेण जोएण तएण जुत्तो। परिक्कमंतु तिय वारजुत्तं, जिणिंददेवं पणमामि णिच्वं ।।2।।

तीनों लोकों के परिभ्रमण को नष्ट करने के लिये तीनों शुद्ध योग (मन-वचन-काय) से युक्त होकर तीन बार परिक्रमा करके जिनेन्द्र देव की मैं सदा वंदना करता हूँ।

घाइस्स-णट्ठा-णिय धम्मजुत्ता, सुद्धाप्प लद्धा सिव सोक्ख सत्ता।

देविंद वंदं च णरिंद वंदं, तं देवदेवं पणमामि णिच्वं ।।3।।

जिन्होंने अष्ट कर्म को नष्ट किया है, निजधर्म संयुक्त हो शुद्धात्म स्वरूप को जिन्होंने प्राप्त किया है, जो शिव सुख-मोक्ष की सत्ता को प्राप्त हुए हैं। वे देवेन्द्र वंदित एवं नरेन्द्र पूजित हैं, उन देवों के देव जिनदेव को मैं नित्य नमन करता हूँ।

सग्गावतारं पुण जम्म-दिक्खं, णाणं च मोक्खं पणगं कलाणं।

तित्थंकराणं णियमेण-उत्तो, तं देवदेवं पणमामि णिच्चं ।।4।।

स्वर्गावतार (गर्भ), जन्म, दीक्षा, ज्ञान और मोक्ष ये पाँच कल्याणक तीर्थंकरों के नियम से कहे गए हैं (विदेह क्षेत्र में 5, 3 और 2 कल्याणक भी होते हैं)। ऐसे उन देवों के देव तीर्थंकर को मैं नित्य नमन करता हूँ।

कम्मारिहंता अरिहंत-उत्तो, आरहच्च पुज्जो अरहंत वुत्तो।

सहावजुत्तो अरहंत-देवं, तं देव देवं पणमामि णिच्चं ।।5।।

कर्म रूपी शत्रुओं के नाश से वे अरिहंत कहे गये हैं, वे आर्हत् अर्थात्, पूज्य हैं इसलिए अरहंत हैं तथा (अनंत चतुष्टय रूप) स्वभाव से युक्त अरहंत देव तो सर्वज्ञ देव हैं, उन देवाधिदेव अर्हन्तदेव को मैं नित्य नमन करता हूँ।

अणंतणाणं च अणंतदंसणं, अणंतसोक्खं च बलं अणंतं।

सहाव एत्थं कहिदं च सत्थे, तं देवदेवं पणमामि णिच्वं ।।6।।

जो अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतसुख, अनंतबल से युक्त हैं, वे अरहंत देव हैं, ऐसा आगम में कहा है। मैं उन देवों के देव जिनदेव को नित्य नमन करता हूँ।

दुद्धेवरत्तो अतुलो य छत्ति, णिस्सेद जुत्तो समदेह अंगो।

सुगंध कायो सहस्साट्ठलक्खं, तं देवदेवं पणमामि णिच्चं ।।7।।

जिनका रक्त दुग्ध वर्ण सदृश था, अतुल शक्ति थी, स्वेद (पसीना) रहित थे, समचतुरस्र संस्थान युक्त थे, जिनका सुगंधित शरीर था एवं एक हजार आठ (1008) लक्षणों से युक्त थे, वे अरहंत देव हैं। उन देवों के देव जिनदेव को मैं नित्य नमन करता हूँ।

वज्जसुह संहणणं पियवयणं, णीहार रित्तं सुंदरो च देहं ।

जम्मस्स जुत्तो य दहादिसायं, तं देवदेवं पणमामि णिच्चं ।।8।।

जो वज्र वृषभनाराच संहनन के धारी थे, जिनके प्रिय वचन थे, निहार-मल मूत्र से रहित थे, सुन्दर देह वाले थे, इस प्रकार जो जन्म के ये दश अतिशय सहित हैं, वे अरहंत हैं। मैं उन देवों के देव जिनदेव को नित्य नमन करता हूँ।

दुब्भिक्खिगं जोज्जण सत्तणं जं, सव्वाण मित्ति गमणं आयासे।

सव्वेसु दिहेसु च मुहं दिक्खंतो, ओसग्ग छाया अदया च रित्तं ।।9।।

जिनके चारों तरफ सौ योजन तक कहीं भी दुर्भिक्ष नहीं पड़ता था, सर्वत्र सभी जीवों में मैत्री थी तथा आकाश में गमन होता था। सभी दिशाओं से जिनका मुख दिखता था तथा जिन पर उपसर्ग नहीं होता, जिनके शरीर की छाया नहीं पड़ती एवं जिनकी मौजूदगी में कोई हिंसा भाव नहीं रखता।

सव्वस्स विज्जेसर जं च उत्तो, अच्छी च णिम्मीलणेण रहिओ। विद्धि विहीणा णहलोमणाणि, केवल णाणस्स दहादिसयाणि ।।10।।

जो सर्वविद्याओं के ईश्वर (सर्वज्ञ) कहे गये हैं, उनकी आँखें निश्चल रहती हैं। उनके नख, रोम, केश आदि नहीं बढ़ते हैं, ऐसे वे (जिनेन्द्र देव) केवलज्ञान के दस अतिशयों से युक्त थे।

सव्वद्ध मग्गी कहिया च भासा, सव्वस्स कालो अदि पुप्फवाणी। अण्णोणमेत्ती य आणंदजुत्तो, आयास णिम्मल्ल णिकक्क वाणी।11।

प्रति समय प्रत्येक भव्य प्राणी के लिये पुष्प के समान प्रिय एवं हितकारी वाणी को मागध जाति के देव दूर-दूर तक प्रसारित करते हैं तथा वहाँ जिनकी अर्धमागधी भाषा होती है, वहाँ समवशरण में परस्पर मैत्री भाव रहता है, सभी आनंद से पूर्ण रहते हैं, वहाँ का आकाश निर्मल स्वच्छ होता है, कर्कशता रहित अरहंत वाणी होती है।

मंदो य सुब्भी पवणा चलंती, गंधोदगा मंद-सुगंध-विट्ठी ।

विहार काले कमलं सुवण्णं, इंदो रचंतो पडि पाय-मूले ।।12।।

वहाँ मंद-मंद सुरभि युक्त पवन चलती है, गंधोदक की सुगंधित मंद वृष्टि होती है तथा तीर्थंकर भगवान के विहार काल में इन्द्र 225 सुवर्ण कमल प्रत्येक पाद मूल में बनाता जाता है।

निक्कंटकं दप्पण-वत्त-भूमि, सुधम्म चक्को य चलंति अग्गे । दव्वाणि अट्ठाणि सुमंगलाणि, चोदिस्स देवा जय नाद घोसं ।।13।।

भूमि कंटक रहित दर्पण की तरह होती है, उनके आगे-आगे सुधर्म चक्र चलता है, अष्ट मंगल द्रव्य एवं चारों दिशाओं में देव जय जय उद्घोष करते जाते हैं।

सव्वस्स कालस्स हवंति पुप्फं, फलाणि सव्वाणि भवंति णव्यं । णिच्वं च चौतीस अदीसयाणं, अरहंत देवं पणमामि णिच्वं । 14।।

सभी ऋतु के फूल तथा फूल एक साथ उत्पन्न होते हैं, ऐसे नित्य चौंतीस अतिशयों से युक्त अरहंत देव को मैं हमेशा नमस्कार करता हूँ।

धूली य सालो पुण चेदि भूमि, वेदिं परीखो च लदा य वेदी।

सालो च उज्जाण व वेदि उत्तो, जुत्तो धयं साल य कप्प रूक्खो।15।।

जिनके समवशरण में धूलीशाल (कोट), चैत्यप्रसाद भूमि, वेदिका, परिखा भूमि, वेदी, लता भूमि, द्वितीय शाल (कोट), उद्यान भूमि, वेदी, ध्वजभूमि, तृतीय कोट तथा कल्पवृक्ष भूमि हैं।

पासाद साला सिरि मंडपो यो, पीढत्तयेओ पढमो य पीठे।

पाडीयहारं वीये य मंगलं, दव्वं तदीए धुय चिण्ण जुत्ता।।16।।

भवन भूमि, चतुर्थ शाल (कोट), श्री मण्डप भूमि, वेदी, तीन पीठ है, प्रथम पीठ पर प्रातिहार्य, दूसरे पीठ में अष्ट मंगल द्रव्य एवं तृतीय पीठ पर चिन्ह युक्त ध्वजाएँ हैं।

तस्सोवरी आसण-सिंह-जुत्तो, इंदीवरस्सोवरि देव देवो।

सव्वण्हु देवो तुह वीदरागी, देवाहिदेवो सददं णमामि ।।17।।

उस (पीठ) के ऊपर सिंह युक्त सिंहासन है, उस पर कमल है, कमल के (चार अंगुल) ऊपर देवाधिदेव होते हैं, उन्हें मैं सतत नमन करता हूँ।

रुक्खो असोगो सिंह-पीठ-छत्तं, दिवज्झुणी चामर पभा विसुद्धं । पुप्फं च विद्धिं च दुदुंहि-वादं, अट्ठा पडीहारि जिणं च जुत्तं ।।18।।

अशोकवृक्ष, सिंहपीठ, छत्रत्रय, दिव्यध्वनि, चामर, विशुद्ध प्रभामण्डल, पुष्पवृष्टि, दुंदुभिवाद इन अष्ट प्रातिहार्य युक्त अरहंत जिन होते हैं।

भिंगार-चामर कलसं धयं च, णंदायवटुं सुपयट्ठियं च ।

दप्पण विजाणि सुदव्व जुत्तं, तं देव देवं पणमामि णिच्चं ।।19।।

भृंगार, चामर, कलश, ध्वज, नंदावर्त, सुप्रतिष्ठित (ठोना), दर्पण और विजना (पंखा) युक्त जो अरहंत देव हैं, उन देवों के देव जिनदेव को मैं नित्य नमन करता हूँ।

वारस्स सभायम्मि समणं च कप्पा, अज्जा य भावण्ण जोईस विंता। कप्पो य भावण्ण जोयिस्सविंतो, णरो-तिरियग्गो च वेर मुत्ता ।।20।।

जिनकी सभा में श्रमण (मुनि), कल्पवासी देवी, आर्यिकाएँ, भवनवासी देवी, ज्योतिषी देवी, व्यंतर देवी, कल्पवासी देव, भवनवासी देव, ज्योतिषी देव, व्यंतर देव सेवा में लीन रहते हैं, मनुष्य तथा तिर्यंच बैर मुक्त रहते हैं।

जम्मो तितिक्खो जर मिच्चु अरदो, छूहा च खेदो भय चिंत रोगो। सोगामदो विम्हय राग मोहो, णिद्दादि दोसद्दस अट्ठरित्तो ।।21।।

जो जन्म, प्यास, जरा, मृत्यु, आरद, क्षुधा, दुख, भय, चिंता, रोग, शोक, मद, विस्मय, राग, मोह, निद्रा (खेद, द्वेष) आदि अठारह दोषों से रहित हैं, उन देवों के देव जिनदेव को नित्य नमन करता हूँ।

दुक्कम्म हारी-अमरेहि वंदं-रागादि रित्तो रहिदो य गंथो ।

वत्थो च अत्थो गयं च भूसणं, तं देवदेवं पणमामि णिच्चं ।।22।।

दुष्ट अष्ट कर्म से जो रहित हैं तथा रागादि भाव कर्म से भी रहित हैं, सभी प्रकार के वस्त्र, अस्त्र एवं आभूषण से रहित हैं, जो देवों द्वारा वंदनीय हैं, उन देवों के देव जिनदेव को मैं नित्य नमन करता हूँ।

धण्णो जिणिंदो सम भाव जुत्तो, सुद्धप्प लीणो सुसहाव पत्तो। सव्वण्डु देवो य तिलोय पुज्जो, तं देवदेवं पणमामि णिच्वं ।।23।।

वे जिनेंद्रदेव धन्य हैं जो समता भाव से सहित हैं, शुद्धात्म में लीन हैं, शुद्ध स्वभाव को जिन्होंने प्राप्त किया है, जो सर्वज्ञ देव हैं और जो त्रिलोक पूज्य हैं, उन देवों के देव जिनदेव को मैं नित्य नमन करता हूँ।

(उपजाति छंद)

जिणिंद देवस्स सुदंसणेण, कम्माणिअट्ठाणि विणासयंति ।

थुदिं च भत्तिं पुण का फलोयं, सग्गं च मुत्ति भविलभ्यंति ।।24।।

जिनेन्द्रदेव के दर्शन से अष्ट कर्म समूह समाप्त हो जाते हैं, तो उनकी स्तुति, भक्ति आदि के फल के विषय में क्या कहना, उससे तो भव्य जीव मुक्ति या स्वर्ग प्राप्त कर लेते हैं।

(उपेन्द्रवज्रा छंद)

वयं च अच्छी सहलो जिणिंदो, दिवो च जम्मो सहलं जिणिंदो। जम्माणि पुण्णो उदयेण मे मत्तो, तिलोयसारो जिण-दंसणेण ।।25।।

हे जिनेन्द्र ! हम सबकी आँखें सफल हुई, दिन सफल हो गया और हे जिनेन्द्र देव ! मेरा जन्म भी सफल हो गया। जिनके दर्शन से मुझे जन्म-जन्म के पुण्य के उदय से तीनों लोकों का सार ही मानो प्राप्त हो गया है, ऐसा मैं मानता हूँ।

हियस्स भत्ति च कुणेमि णिच्वं, भवे-भवे होज्न णिक्काम-भत्ती। अहो मे देवो सिरि जिणिंददेवो, जिणस्स पाए पणमामि णिच्चं ।26।।

मैं हृदय से नित्य भक्ति करता हूँ। मेरी निष्काम भक्ति भव-भव में होती रहे। हे जिनेन्द्र देव ! मैं भाग्यशाली हूँ, कि आप ही मेरे देव हैं, मैं इसलिये जिनप्रभु के पादों में नित्य नमन करता हूँ।

(उपजाति छंद)

पाए य जुगमे हिए वसंति, हिया च पाये जुग मे वसंति ।

इणं च भावं फुरंति णिच्चं, भवे-भवे भाव कुणेमि णिच्चं ।।27।।

आपके युगल पाद मेरे हृदय में रहते हैं, मेरा हृदय (आपके) युगल पादों में लीन रहता है। यही भाव मुझमें सदा स्फुरित होता रहता है, इसलिए मैं भव-भव में आपकी सदा भाव भक्ति करता रहूँ।

(गाहा छंद)

पडि-मब्भिंतरे अरहं, पच्चक्खे मे सुदिस्सदे ।

तमेव भाव सहिएण, णमस्सामि पुणो-पुणो ।। 28।।

धण्णो वीद रागदं, धण्णो सव्वण्हू ते जिणो।

धण्णो हियो वदे सत्तो, धण्णो विराय भावणा।।29।।

जिणिंद ! मे हु कम्माणं, संसाराणं वियलेज्ज मे।

सिद्धं सुद्धं णियाणंद, सिग्धं लाहं मे हवे ।।30।।

प्रतिमा के अंदर मुझे प्रत्यक्ष जिनेन्द्र देव दिखते हैं, इसलिये मैं उनको ही भावसहित बार-बार नित्य नमन करता हूँ।आपकी वीतरागता धन्य है, धन्य हैं वे सर्वज्ञ जिन, जो हितोपदेश देते हैं, वे धन्य हैं, उनके प्रति विराग (गणाचार्य विरागसागर की भक्ति) भावना भी धन्य है। हे जिनेन्द्र ! मेरे समस्त कर्म शीघ्र ही नष्ट हो जायें और सिद्ध, शुद्ध एवं निजानंद का लाभ मुझे शीघ्र हो।

अंचलिका

इच्छामि भंते ! अरहंत-भत्ति काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं, पंचमहा कल्लाण-सम्पण्णाणं, अट्टमहापाडिहेर-सहियाणं, चउतीसादिसय विसेस संजुत्ताणं, अणंत चतुट्ठय मयाणं, बत्तीस-देविंद-मणि-मय-मउड-मत्थय-महिदाणं, बलदेव - वासुदेव-चक्कहर-रिसि- मुणि-जइ-अणगारोव-गूढाणं, थुइ-सय-सहस्स-णिलयाणं-उसहाइ-वीर-पच्छिम-मंगल (भूदभावि वड्डूमाण-काल-वंताणं) महापुरिसाणं सया णिच्चकालं अच्चेमि, पुज्जेमि, वंदामि, णमस्सामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाओ, सुगदिगमणं (सुगइ), समाहिमरणं, जिणगुण - सम्पत्ति होदु (होउ) मज्झं।

हे भगवन् ! मैंने अरहंत-भक्ति का कायोत्सर्ग किया, उसमें लगे दोषों की आलोचना करना चाहता हूँ। पाँच महाकल्याणकों से सम्पन्न, अष्ट महा प्रातिहार्य सहित, चौंतीस अतिशय विशेष से सहित, अनंत चतुष्टय युक्त, बत्तीस देवेन्द्रों के मणिमय मुकुटों से युक्त मस्तकों द्वारा वंदनीय, बलदेव, वासुदेव, चक्रधर, ऋषि, मुनि, यति, अनगार के समूहों द्वारा, हजारों स्तुति के निलय, ऋषभ आदि से लेकर वीर पर्यंत मंगलभूत महापुरुषों की सदैव मैं अर्चना करता हूँ, पूजा करता हूँ, वंदना करता हूँ और नमन करता हूँ। ताकि मेरे दुःखक्षय हों, कर्मक्षय हों, बोधिलाभ हो, सुगतिगमन हो, समाधिमरण हो और जिनगुण सम्पत्ति प्राप्त हो।

(इदि अरंहत भत्ति)

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