Bhakti

Bhakti

02. सिद्ध भत्ति

(सिरी आइरिय कुंदकुंद विरइओ)

2. सिद्ध भत्ति

(गाहा - छंद)

अट्ठविहकम्ममुक्के, अट्ठगुणड्डे अणोवमे सिद्धे।

अट्ठमपुढवि-णिविड्डे, णिट्ठिय-कज्जे य वंदिमो णिच्वं ।।1।।

जो आठ प्रकार के कर्मों से मुक्त हैं, जो आठ गुणों से संपन्न हैं, अनुपम हैं, अष्टम पृथिवी में स्थित हैं तथा अपने समस्त कार्यों को जिन्होंने समाप्त किया है अर्थात् कृतकृत्य हैं, ऐसे सिद्धों को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ।

तित्थयरेदर-सिद्धे, जलथल-आयास-णिव्वुदे सिद्धे ।

अंतयडेदर-सिद्धे, उक्कस्सजहण्ण-मज्झिमोगाहे।।2।।

उड्डमह-तिरियलोए, छव्विह-काले य णिव्वुदे सिद्धे।

उवसग्ग-णिरुवसग्गे, दीवोदहि-णिव्वुदे य वंदामि ।।३।।

जो तीर्थंकर होकर सिद्ध हुए हैं, जो तीर्थंकर न होकर सिद्ध हुए हैं, जो जल से, स्थल से, अथवा आकाश से निर्वाण को प्राप्त हुए हैं, जो अन्तःकृत् होकर सिद्ध हुए, जो अन्तःकृत न होकर सिद्ध हुए, जो उत्कृष्ट, जघन्य और मध्यम अवगाहना से सिद्ध हुए हैं, जो ऊर्ध्वलोक, अधोलोक अथवा तिर्यक्लोक से सिद्ध हुए हैं, जो छह प्रकार के कालों में निर्वाण को प्राप्त हुए हैं, जो उपसर्ग सहकर अथवा बिना उपसर्ग के सिद्ध हुए हैं तथा जो द्वीप अथवा समुद्र से निर्वाण को प्राप्त हुए हैं, ऐसे समस्त सिद्धों को मैं नमस्कार करता हूँ।

पच्छायडेय सिद्धे, दुग-तिग-चदुणाण - पंचचदुरजमे ।

परिपडिदा परिपडिदे, संजम-सम्मत्त-णाणमादीहिं।।4।।

साहरणा साहरणे समुग्धा देदरे य णिव्वादे।

ठिद-पलियंक-णिसण्णे, विगयमले परम-णाणगे वंदे ।।5।।

जिन्होंने दो, तीन अथवा चार ज्ञानों के पश्चात् केवलज्ञान प्राप्त कर सिद्ध पद प्राप्त किया, जिन्होंने पाँचों अथवा परिहारविशुद्धि से रहित शेष चार संयमों से सिद्ध पद प्राप्त किया है, जो संयम, सम्यक्त्व तथा ज्ञान आदि के द्वारा पतित होकर अथवा बिना पतित हुए सिद्ध हुए हैं, जो संहरण से अथवा संहरण के बिना ही सिद्ध हुए हैं, अथवा उपसर्गवश साभरण अथवा निराभरण सिद्ध हुए, जो समुद्घात से अथवा समुद्घात के बिना ही निर्वाण को प्राप्त हुए, जो खड़गासन अथवा पल्यंकासन से बैठकर सिद्ध हुए हैं, जिन्होंने कर्म मल को नष्ट कर दिया है और जो परमज्ञान उत्कृष्ट केवलज्ञान को प्राप्त हैं, ऐसे समस्त सिद्धों को मैं नमस्कार करता हूँ।

पुंवेदं वेदंता, जे पुरिसा खवगसेढिमारूढा ।

सेसोदयेण वि तहा, झाणुवजुत्ता य ते दु सिज्झति ।।6।।

जो पुरुष भावपुरुष वेद का अनुभव करते हुए क्षपक श्रेणी पर आरुढ हुए अथवा भाव स्त्री अथवा भाव नपुंसक वेद के उदय से क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ होते हुए, वे शुक्लध्यान में तल्लीन होते हुए सिद्ध अवस्था को प्राप्त होते हैं।

पत्तेयसयंबुद्धा, बोहियबुद्धा य होंति ते सिद्धा।

पत्तेयं पत्तेयं, समगं समगं पडिवदामि सदा ।। 7।।

जो प्रत्येक बुद्ध, स्वयं बुद्ध अथवा बोधित बुद्ध होकर सिद्ध होते हैं उन सबको पृथक् पृथक् अथवा एक साथ मैं सदा नमस्कार करता हूँ।

जो वैराग्य का कोई कारण देखकर विरक्त होते हैं, वे प्रत्येक बुद्ध कहलाते हैं, जो किसी कारण को बिना देखे ही स्वयं विरक्त होते हैं, वे स्वयंबुद्ध कहलाते हैं और भोगों में आसक्त रहने वाले जो मनुष्य दूसरों के द्वारा समझाये जाने पर विरक्त होते हैं, वे बोधित बुद्ध कहलाते हैं।

पण णव दु अट्ठबीसा चउतिय-णवदी य दोण्णि पंचेव।

बावण्ण-हीणवि-सया, पयडिविणासेण होंति ते सिद्धा ।।8।।

पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, तेरानवे, दो और पाँच इस प्रकार क्रम से ज्ञानावरणादि कर्मों की बावन कम दो सौ अर्थात् एक सौ अड़तालीस प्रकृतियों के क्षय से वे सिद्ध होते हैं।

अइसयमव्वावाहं, सोक्खमणंतं अणोवमं परमं ।

इंदियविसयातीदं, अप्पत्तं अच्चवं च ते पत्ता ।।9।।

वे सिद्ध भगवान अतिशय, अव्याबाध, अनन्त, अनुपम, उत्कृष्ट, इन्द्रिय विषयों से अतीत, अप्राप्त-जो पहले कभी प्राप्त नहीं हुआ तथा स्थायी शाश्वत सुख को प्राप्त हुए हैं।

लोयग्गमत्थयत्था, चरमसरीरेण ते हु किंचूणा।

गय-सित्थ-मूस-गब्भे, जारिस आयार तारिसायारा।।10।।

वे सिद्ध भगवान लोकाग्र के मस्तक पर विराजमान हैं, चरम शरीर से किंचित् न्यून हैं तथा जिसके भीतर का मोह गल गया है ऐसे सांचे के भीतरी भाग का जैसा आकार होता है, वैसे आकार से युक्त हैं।

जर-मरण-जम्म-रहिदा, ते सिद्धा मम सुभत्तिजुत्तस्स ।

दिंतु वर-णाण-लाहं, बुहयणपरियत्थणं परमसुद्धं ।।11।।

जरा, मरण और जन्म से रहित वे सिद्ध भगवान, समीचीन भक्ति से युक्त मुझ कुन्दकुन्द को बुधजनों के द्वारा प्रार्थित तथा परम शुद्ध उत्कृष्ट ज्ञान का लाभ दें।

किच्चा काउस्सग्गं, चउरट्ठय-दोस-विरहियं सु-परिसुद्धं ।

अइ-भत्ति-संपउत्तो, जो वंदइ लहु लहइ परमसुहं ।।12।।

जो बत्तीस दोषों से रहित, अत्यन्त शुद्ध कायोत्सर्ग करके अतिशय भक्ति से युक्त होता हुआ वन्दना करता है, वह शीघ्र ही परमसुख को प्राप्त होता है।

(क्षेपक गाथा)

संसार। चक्र गमना गति विप्रमुक्तान्,

नित्यं जरामरण जन्म विकार हीनान् ।

देवेन्द्र-दानव। - गणैरभि पूज्यमानान्,

सिद्धांस्त्रिलोक-महितान् शरणं प्रपद्ये ।।13।।

संसारचक्र (परिभ्रमण) रूप गतियों में गमन व आगमन से पूर्णतः मुक्त हो गये हैं तथा जो जन्म, जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु के विकारों (दोषों) से रहित हैं एवं जो देवेन्द्र व दानवेन्द्रों के गणों द्वारा पूजा को प्राप्त हुए हैं, ऐसे तीनों लोकों में महान सिद्धों की शरण को मैं प्राप्त होता हूँ।

असरीरा जीवघणा, उवजुत्ता दंसणे य णाणे य। सायारमणायारा, लक्खणमेयं तु सिद्धाणं ।।14।।

जो पौद्गलिक पंच शरीरों से रहित हैं, जिनके समस्त आत्मप्रदेश ठोस हो गये हैं, जो ज्ञान और दर्शन में उपयुक्त हैं अर्थात् सहित हैं, ऐसे साकार (ज्ञानोपयोग) अनाकार (दर्शनोपयोग) लक्षण से जो सिद्ध हैं।

बंधोदयसत्तकम्मउम्मुक्का। मूलुत्तरपयडीणं,

मंगलभूदा सिद्धा, अट्ठगुणातीदसंसारा ।।15।।

कर्मों की मूल प्रकृति, उत्तरप्रकृति एवं उनके बंध, उदय तथा सत्व से रहित हैं, मंगल स्वरूप हैं, सम्यक्त्व आदि आठ गुणों से सहित हैं तथा जो संसार से रहित हैं, ऐसे सिद्ध परमेष्ठी हैं।

अट्ठविहकम्मवियला, सीदीभूदा णिरंजणा णिच्चा।

अट्ठगुणा किदकिच्चा, लोयग्गणिवासिणो सिद्धा ।।16।।

जिन्होंने अष्ट प्रकार के कर्मों को विगलित अर्थात् नष्ट कर दिया है, जो शांतस्वरूपी हैं, कर्म रूप अंजन से रहित हैं, नित्य हैं, आत्मा के अष्टगुणों से सहित हैं, कृतकृत्य हैं, लोक के अग्रभाग (तनुवातवलय) में निवास करते हैं, ऐसे सिद्ध परमेष्ठी हैं।

सिद्धा-णट्ठट्ठमला, विसुद्धबुद्धीय लद्धिसब्भावा । तिहुयणसिरसेहरया, पसीयंतु भंडारया सव्वे ।।17।।

अष्ट कर्मरूप मलों को जिन्होंने नष्ट कर दिया है, विशुद्ध-बुद्धि (केवल ज्ञान) लब्धि का जिनके सद्भाव है, तीनों लोकों के सिर के जो मुकुटस्वरूप हैं, ऐसे भट्टारक (पूज्य) सिद्ध परमेष्ठी हम सब पर प्रसन्न हों।

गमणागमणविमुक्के, विहडियकम्मट्ठ-पयडिसंघाए। सासयसुहसंपत्ते, ते सिद्धा वंदिमो णिच्चं ।।18।।

जो संसार के गमन-आगमन से मुक्त हैं, जिन्होंने अष्टकर्मों की प्रकृतियों के समूह को विखण्डित (नष्ट) कर दिया है तथा शाश्वत आत्म-सम्पत्ति को प्राप्त कर लिया है, मैं हमेशा उन सिद्ध परमेष्ठियों की वंदना करता हूँ।

जय मंगलभूदाणं, विमलाणं णाण दंसणमयाणं। तियलोयसेहराणं, णमो सया सव्वसिद्धाणं।।19।।

मंगल स्वरूप विमल (शुद्ध) ज्ञान, दर्शनमय तथा तीनों लोकों के मुकुट स्वरूप हैं, उनकी जय हो, ऐसे सभी सिद्धों को मेरा नमस्कार हो।

सम्मत्तणाणदंसण, वीरियसुहुमं तहेव अवगहणं। अगुरुलहुमव्वाबाहं, अट्ठगुणा होंति सिद्धाणं ।।20।।

क्षायिक सम्यक्त्व, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतवीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अगुरूलघुत्व तथा अव्याबाधत्व ये आठ गुण सिद्धों में होते हैं।

तवसिद्धे णयसिद्धे, संजमसिद्धे चरित्तसिद्धे य।

णाणम्मि दंसणम्मि य, सिद्धे सिरसा णमंसामि ।।21।।

तप से सिद्ध, नय से सिद्ध, संयम से सिद्ध, चारित्र से सिद्ध, ज्ञान-दर्शन से सिद्ध, ऐसे सिद्ध परमेष्ठियों को मैं सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ।

अंचलिका

इच्छामि भंते ! सिद्धभत्ति काउस्सग्गो कओ, तस्सालोचेउं (तस्सालोचेदु) सम्मणाण-सम्म दंसण-सम्मचारित्त-जुत्ताणं, अट्ठविह -कम्म-विप्प-मुक्काणं, अट्ठ-गुण-संपण्णाणं, उड्डलोय-मत्थयम्मि पयट्ठियाणं, तवसिद्धाणं, णयसिद्धाणं, संजमसिद्धाणं, चरित्त-सिद्धाणं, अतीता-णागद-वट्टमाण कालत्तय-सिद्धाणं, सव्वसिद्धाणं, णिच्चकालं अच्चमि, पुज्जेमि, वंदामि, णमस्सामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो, सुगइगमणं, समाहिमरणं, जिणगुणसंपत्ति होदु मज्झं।

हे भगवन्! मैंने जो सिद्धभक्ति सम्बन्धी कायोत्सर्ग किया है, उसकी (कायोत्सर्ग में जितने दोष लगे हों, उनकी) आलोचना करना चाहता हूँ। जो सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र से युक्त हैं, आठ प्रकार के कर्मों से सर्वथा रहित हैं, आठ गुणों से सहित हैं, ऊर्ध्वलोक के अग्रभाग पर स्थित हैं, नय से सिद्ध हैं, संयम से सिद्ध हैं, अतीत, अनागत और वर्तमान काल सम्बन्धी सिद्ध हैं, ऐसे समस्त सिद्धों की मैं नित्यकाल अर्चा करता हूँ, पूजा करता हूँ, वंदना करता हूँ, उन्हें नमस्कार करता हूँ। मेरे दुःखों का क्षय हो, कर्मों का क्षय हो, रत्नत्रय की प्राप्ति हो, सुगति में गमन हो, समाधिमरण हो, और मुझे जिनेन्द्र भगवान के गुणों की संप्राप्ति हो।

(इदि सिद्ध भत्ति)

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