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प.पूज्य राष्ट्र गौरव
भक्तामर अनुष्ठान विशेषज्ञ
वात्सल्यनिधि आर्यिका रत्न 105
Dr. ज्ञेयश्री माताजी
पुरुलिया (प. बंगाल)
लालगोला (प. बंगाल)
जबलपुर (म.प्र.)
इंदौर (म.प्र.)
श्रेयांश गिरि (म.प्र.)
सुखलिया, इंदौर (म.प्र.)
दाहोद (गुजरात)
सलूम्बर उदयपुर (राजस्थान)
भांडुप, मुंबई (महाराष्ट्र)
सांगवी, पुणे (महाराष्ट्र)
कबनूर, इचलकरांजी (महाराष्ट्र)
श्रवणबेलगोला, कर्नाटक
तिरुप्परनकुंद्रम, कांचीपुरम (चेन्नई, तमिलनाडु)
कारंजा (लाड - महाराष्ट्र)
वडोदरा (गुजरात)
तिलक नगर (इंदौर - म.प्र.)
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माताजी ने बाल्यकाल से ही आध्यात्मिक जीवन की ओर रुचि दिखाई। जैन दर्शन के गहन अध्ययन और साधना के माध्यम से उन्होंने आत्मज्ञान की ओर अपनी यात्रा प्रारंभ की।
दीक्षा ग्रहण करने के उपरांत माताजी ने समस्त सांसारिक बंधनों का त्याग कर पूर्ण साध्वी जीवन अपनाया और अहिंसा, सत्य तथा अपरिग्रह के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारा।
अहिंसा परमो धर्मः — जीवमात्र के प्रति करुणा
आत्मज्ञान ही सच्चा मोक्ष का मार्ग है
सत्य और संयम से जीवन को पवित्र बनाएं
समता भाव से सुख-दुख को स्वीकार करें
जो आत्मा को जानता है, वही सच्चा ज्ञानी है।
बाकी सब केवल जानकारी है।