अरिहंत सिद्ध आचार्य को करुं प्रणाम ।
उपाध्याय सर्वसाधू करते स्वपर कल्याण ।।
जिनधर्म, जिनागम, जिनमंदिर पवित्र धाम ।
वीतराग की प्रतिमा को कोटि कोटि प्रणाम ।।
। । चौपाई । ।
जय मुनिसुव्रत दया के सागर , नाम प्रभु का लोक उजागर ।
सुमित्रा राजा के तुम नन्दा , मां शामा की आंखो के चन्दा ।।1।।
श्यामवर्ण मूरत प्रभू की प्यारी , गुणगान करें निशदिन नर नारी ।
मुनिसुव्रत जिन हो अन्तरयामी ,श्रद्धा भाव सहित तुम्हें प्रणामी ।।2।।
भक्ति आपकी जो निशदिन करता, पाप ताप भय संकट हरता ।
प्रभू; संकटमोचन नाम तुम्हारा ,दीन दुखी जीवों का सहारा ।।3।।
कोई दरिद्री या तन का रोगी ,प्रभू दर्शन से होते हैं निरोगी ।
मिथ्या तिमिर भयो अति भारी , भव भव की बाधा हरो हमारी ।।4।।
यह संसार महा दुख दाई , सुख नहीं यहां दुख की खाई ।
मोह जाल में फंसा है बंदा , काटो प्रभु भव भव का फंदा ।।5।।
रोग शोक भय व्याधि मिटावो , भव सागर से पार लगावो ।
घिरा कर्म से चौरासी भटका ,मोह माया बन्धन में अटका ।।6।।
संयोग वियोग भव भव का नाता , राग द्वेष जग में भटकाता ।
हित मित प्रित प्रभू की वाणी , स्वपर कल्याण करें मुनि ध्यानी ।।7।।
भव सागर बीच नाव हमारी , प्रभु पार करो यह विरद तिहारी ।
मन विवेक मेरा अब जागा , प्रभु दर्शन से कर्ममल भागा ।।8।।
नाम आपका जपे जो भाई , लोका लोक सुख सम्पदा पाई ।
कृपा दृष्टी जब आपकी होवे , धन आरोग्य सुख समृधि पावे ।।9।।
प्रभु चरणन में जो जो आवे , श्रद्धा भक्ति फल वांच्छित पावे ।
प्रभु आपका चमत्कार है न्यारा , संकट मोचन प्रभु नाम तुम्हारा।।10।।
सर्वज्ञ अनंत चतुष्टय के धारी , मन वच तन वंदना हमारी ।
सम्मेद शिखर से मोक्ष सिधारे ,उद्धार करो मैं शरण तिहांरे ।।11।।
महाराष्ट्र का पैठण तीर्थ , सुप्रसिद्ध यह अतिशय क्षेत्र ।
मनोज्ञ मन्दिर बना है भारी , वीतराग की प्रतिमा सुखकारी ।।12।।
चतुर्थ कालीन मूर्ति है निराली , मुनिसुव्रत प्रभू की छवि है प्यारी ।
मानस्तंभ उत्तग की शोभा न्यारी ,देखत गलत मान कषाय भारी।।13।।
मुनिसुव्रत शनिग्रह अधिष्ठाता , दुख संकट हरे देवे सुख साता ।
शनि अमावस की महिमा भारी , दूर दूर से आते नर नारी ।।14।।
मुनिसुव्रत दर्शन महा हितकारी , मन वच तन वंदना हमारी ।।
दोहाः
सम्यक् श्रद्धा से चालीसा, चालीस दिन पढिये नर नार ।
मुक्ति पथ के राही बन, भक्ति से होवे भव पार ।।