Chalisa

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9. ।। श्री पुष्पदन्तजी चालीसा।।

दुःख से तृप्त मरुस्थल भाव में, सघन वृक्ष सम छायाकार ।

पुष्पदन्त पद छत्र छाव में, हम आश्रय पावें सुखकार ।।

।। चौपाई।। 

जम्बू द्वीप के भरत क्षेत्र में, काकंदी नामक नगरी में ।

राज्य करें सुग्रीव बलधारी, जयराम रानी थी प्यारी ।।1।।

नवमी फाल्गुन कृष्ण बखानी, षोडश स्वपन देखती रानी ।

सूत तीर्थंकर गर्भ में आये, गर्भ कल्याणक देव मनाये ।।2।। 

प्रतिपदा मंगसिर उजियारी, जन्मे पुष्पदंत हितकारी ।

जन्मोत्सव की शोभा न्यारी, स्वर्गपुरी सम नगरी प्यारी ।।3।।

आयु थी दो लक्ष पूर्व की, ऊंचाई शत एक धनुष की ।

थामी जब राज्य बागडोर, क्षेत्र वृद्धि हुई चहुँ और ।।4।। 

इच्छाए थी उनकी सिमित, मित्र प्रभु के हुए असीमित ।

एक दिन उल्कापात देख कर, दृष्टिपात किया जीवन पर ।।5।।

स्थिर कोई पदार्थ ना जग में, मिले ना सुख किंचित भवमग में ।

ब्रह्मलोक से सुरगन आये, जिनवर का वैराग्य बढ़ाये ।।6।।

सुमति पुत्र को देकर राज, शिविका में प्रभु गए विराज ।

पुष्पक वन में गए हितकार, दीक्षा ली संग भूप हजार ।।7।।

गए शैलपुर दो दिन बाद, हुआ आहार वह निराबाध ।

पात्रदान से हर्षित हो कर, पंचाश्चार्य करे सुर आकर।।8।।

प्रभुवर गए लौट उपवन को, तत्पर हुए कर्म छेदन को ।

लगी समाधि नाग वृक्ष ताल, केवल ज्ञान उपाया निर्मल ।।9।।

इन्द्राज्ञा से समोशरण की, धनपति ने आकर रचना की ।

दिव्या देशना होती प्रभु की, ज्ञान पिपासा मिति जगत की ।।10।। 

अनुप्रेक्षा द्वादश समझाई, धर्म स्वरुप विचारों भाई ।

शुक्ल ध्यान की महिमा गाई, शुक्ल ध्यान से हो शिवराई ।।12।।

चारो भेद सहित धारो मन, मोक्षमहल को पहुचो तत्क्षण ।

मोक्ष मार्ग दिखाया परभू ने, हर्षित हुए सकल जन मन में ।।13।।

इंद्र करे प्रार्थना जोड़ कर, सुखद विहार हुआ श्री जिनवर ।

गए अंत में शिखर सम्मेद, ध्यान में लीन हुए निरखेद ।।14।। 

शुक्ल ध्यान से किया कर्म क्षय, संध्या समय पाया पद अक्षय ।

अश्विन अष्टमी शुक्ल महान, मोक्ष कल्याणक करे सुख आन ।।15।।

सुप्रभ कूट की करते पूजा, सुविधि नाथ है नाम दूजा ।

मगरमच्छ हैं लक्षण प्रभु का, मंगलमय था जीवन उनका ।।16।। 

शिखर सम्मेद में भारी अतिशय, प्रभु प्रतिमा हैं चमत्कारमय ।

कलियुग में भी आते देव, प्रतिदिन नृत्य करें स्वयमेव ।।17।।

घुंघरू की झंकार गूंजती, सबके मन को मॊहित करती ।

ध्वनि सुनी हमने कानो से, पूजा की बहु उपमानो से ।।18।।

हमको हैं ये दृढ श्रद्धान, भक्ति से पाए शिवथान ।

भक्ति में शक्ति हैं न्यारी, राह दिखाए करुनाधारी ।।19।।

।।सोरठा।।

पुष्पदंत गुणगान से, निश्चित हो कल्याण ।

अरुणा अनुक्रम से मिले, अंतिम पद निर्वाण ।।

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