Dharmik Prashna-Uttar

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नंदीश्वर प्रश्नोत्तरी

नंदीश्वर द्वीप के वैभव और उसकी अगाध महिमा को और गहराई से समझने के लिए, जैन ग्रंथों (विशेषकर त्रिलोकसार और हरिवंश पुराण) के आधार पर यहाँ 100 महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर दिए जा रहे हैं। इसे आपकी सुविधा के लिए अलग-अलग विषयों (खंडों) में बांटा गया है:

## खंड 1: नंदीश्वर द्वीप की स्थिति, भूगोल और आकार (प्रश्न 1-20)

1. नंदीश्वर द्वीप मध्यलोक का कौन-सा द्वीप है?

उत्तर: यह मध्यलोक का आठवाँ (8वाँ) द्वीप है।

2. नंदीश्वर द्वीप का आकार (Shape) कैसा है?

उत्तर: यह चूड़ी के आकार जैसा गोल (वलयाकार) है।

3. जैन भूगोल में इस द्वीप का कुल विस्तार (व्यास) कितना बताया गया है?

उत्तर: इसका विस्तार 163,84,00,000 (एक सौ तिरसठ करोड़ चौरासी लाख) योजन है।

4. नंदीश्वर द्वीप से ठीक पहले कौन-सा समुद्र आता है?

उत्तर: सातवाँ समुद्र, जिसका नाम 'घृतवर समुद्र' (घी जैसा पानी) है।

5. नंदीश्वर द्वीप के ठीक बाहर कौन-सा समुद्र स्थित है?

उत्तर: आठवाँ समुद्र, जिसका नाम 'नंदीश्वर समुद्र' है।

6. क्या नंदीश्वर द्वीप का पानी खारा है?

उत्तर: नहीं, इस द्वीप की बावलियों का जल अत्यंत मीठा, सुगंधित और दूध के समान सफेद है।

7. इस द्वीप का नाम 'नंदीश्वर' क्यों पड़ा?

उत्तर: क्योंकि यह द्वीप सभी को आनंद (नंद) प्रदान करने वाला है और यहाँ साक्षात देवराज इंद्र भी आकर आनंदित होते हैं।

8. क्या नंदीश्वर द्वीप में सूर्य और चंद्रमा दिखाई देते हैं?

उत्तर: हाँ, ज्योतिष देवों के विमान वहाँ भी निरंतर गतिमान रहते हैं।

9. नंदीश्वर द्वीप के ठीक बीचों-बीच चारों दिशाओं में कौन-से मुख्य पर्वत हैं?

उत्तर: चारों दिशाओं के केंद्र में एक-एक 'अंजनगिरि' पर्वत स्थित है।

10. अंजनगिरि पर्वत का रंग कैसा होता है?

उत्तर: यह काजल या काले रत्न (नीलम) के समान गहरे काले रंग का होता है।

11. प्रत्येक अंजनगिरि पर्वत की ऊँचाई कितनी है?

उत्तर: प्रत्येक अंजनगिरि पर्वत 84,000 योजन ऊँचा है।

12. अंजनगिरि पर्वत की नींव (जड़) जमीन के अंदर कितनी गहरी है?

उत्तर: इसकी नींव 1,000 योजन गहरी है।

13. अंजनगिरि पर्वत का आकार नीचे और ऊपर से कैसा है?

उत्तर: यह नीचे, बीच में और शिखर पर हर जगह एक समान व्यास (चौड़ाई) वाला है (अर्थात यह बिल्कुल सीधा/सिलेंडर के आकार का है)।

14. अंजनगिरि पर्वत के शिखर का विस्तार कितना है?

उत्तर: इसका विस्तार 10,000 योजन है।

15. नंदीश्वर द्वीप में कुल कितने अंजनगिरि पर्वत हैं?

उत्तर: चारों दिशाओं में एक-एक, अर्थात कुल 4 अंजनगिरि पर्वत हैं।

16. अंजनगिरि पर्वत के चारों तरफ क्या बना हुआ है?

उत्तर: इसके चारों कोनों या दिशाओं में चार विशाल वर्गाकार बावलियां (सरोवर) बनी हैं।

17. नंदीश्वर द्वीप में कुल कितनी बावलियां हैं?

उत्तर: एक दिशा में 4, तो चारों दिशाओं को मिलाकर कुल 16 बावलियां हैं।

18. इन 16 बावलियों का आकार कितना बड़ा है?

उत्तर: प्रत्येक बावली 100,000 (एक लाख) योजन लंबी और इतनी ही चौड़ी है।

19. इन बावलियों की गहराई कितनी है?

उत्तर: प्रत्येक बावली 1,000 योजन गहरी है।

20. पूर्व दिशा की बावली का नाम क्या है?

उत्तर: पूर्व दिशा की मुख्य बावली का नाम 'नंदा' है।

## खंड 2: पर्वत, बावलियाँ और दिशाओं की रचना (प्रश्न 21-40)

21. दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा की मुख्य बावलियों के नाम क्या हैं?

उत्तर: दक्षिण में 'नंदवती', पश्चिम में 'नंदोत्तरा' और उत्तर में 'नंदिषेणा'।

22. इन बावलियों के ठीक बीच में कौन-से पर्वत स्थित हैं?

उत्तर: इन बावलियों के ठीक बीच में 'दधिमुख पर्वत' स्थित हैं।

23. दधिमुख पर्वत का रंग कैसा होता है?

उत्तर: यह दही या चांदी के समान बिल्कुल सफेद (श्वेत वर्ण) होता है।

24. प्रत्येक दधिमुख पर्वत की ऊँचाई कितनी है?

उत्तर: प्रत्येक दधिमुख पर्वत 64,000 योजन ऊँचा है।

25. दधिमुख पर्वत की चौड़ाई (व्यास) कितनी है?

उत्तर: यह नीचे 10,000 योजन और ऊपर शिखर पर 4,000 योजन चौड़ा है।

26. पूरे नंदीश्वर द्वीप में कुल कितने दधिमुख पर्वत हैं?

उत्तर: कुल 16 बावलियाँ हैं, इसलिए उनके बीच में स्थित कुल 16 दधिमुख पर्वत हैं।

27. बावलियों के बाहरी कोनों पर कौन-से पर्वत स्थित हैं?

उत्तर: बावलियों के बाहरी दोनों कोनों पर 'रतिकर पर्वत' स्थित हैं।

28. रतिकर पर्वत का रंग कैसा होता है?

उत्तर: यह पद्मराग मणि या सोने के समान लाल/पीला आभायुक्त चमकीला होता है।

29. प्रत्येक रतिकर पर्वत की ऊँचाई कितनी है?

उत्तर: प्रत्येक रतिकर पर्वत 10,000 योजन ऊँचा है।

30. रतिकर पर्वत की चौड़ाई कितनी है?

उत्तर: यह नीचे 10,000 योजन और शिखर पर 1,000 योजन चौड़ा होता है।

31. पूरे नंदीश्वर द्वीप में कुल कितने रतिकर पर्वत हैं?

उत्तर: एक दिशा में 8 रतिकर पर्वत होते हैं, इस प्रकार चारों दिशाओं में कुल 8 \times 4 = 32 रतिकर पर्वत हैं।

32. नंदीश्वर द्वीप के कुल पर्वतों की संख्या कितनी है (जिन पर मंदिर हैं)?

उत्तर: 4 अंजनगिरि + 16 दधिमुख + 32 रतिकर = कुल 52 पर्वत।

33. क्या इन पर्वतों के अलावा भी वहाँ कोई रतिकर पर्वत हैं?

उत्तर: हाँ, बावलियों के कोनों के बाहर देवों के रहने के स्थानों पर भी रतिकर पर्वत होते हैं, लेकिन उन पर अकृत्रिम चैत्यालय नहीं होते।

34. इन पर्वतों की चोटियों पर क्या बना हुआ है?

उत्तर: इन सभी 52 पर्वतों की समतल चोटियों पर एक-एक भव्य अकृत्रिम जैन चैत्यालय (मंदिर) बना है।

35. क्या नंदीश्वर द्वीप की धरती पर भी कोई मंदिर है?

उत्तर: नहीं, नंदीश्वर द्वीप के सभी 52 मंदिर केवल पर्वतों के शिखर पर ही स्थित हैं।

36. क्या इन पर्वतों पर कभी भूकंप आता है या ये नष्ट हो सकते हैं?

उत्तर: नहीं, ये सभी पर्वत और मंदिर 'अकृत्रिम' (शाश्वत) हैं, जो प्रलय काल में भी नष्ट नहीं होते।

37. पूर्व दिशा के अंजनगिरि का विशेष नाम क्या है?

उत्तर: इसे 'पुरस्तम अंजनगिरि' कहा जाता है।

38. दधिमुख पर्वत का आकार कैसा दिखाई देता है?

उत्तर: यह ऊपर से थोड़ा संकरा और नीचे से चौड़ा, एक सुंदर स्तूप या स्तंभ जैसा दिखाई देता है।

39. क्या इन पर्वतों पर कोई सांसारिक वृक्ष या वनस्पति पाई जाती है?

उत्तर: नहीं, यहाँ केवल रत्नमयी दिव्य पृथ्वी और वन होते हैं, साधारण मिट्टी या पेड़-पौधे नहीं।

40. इन पर्वतों के चारों ओर कौन विचरण करता है?

उत्तर: यहाँ केवल देवों के विमान और स्वर्ग के निवासी ही घूमते हैं।

## खंड 3: 52 अकृत्रिम चैत्यालयों का वैभव (प्रश्न 41-60)

41. अकृत्रिम चैत्यालय का क्या अर्थ है?

उत्तर: 'अकृत्रिम' का अर्थ है जिसे किसी मनुष्य, देव या भगवान ने नहीं बनाया है, जो अनादि काल से है और अनंत काल तक रहेगा।

42. एक चैत्यालय (मंदिर) की लंबाई कितनी है?

उत्तर: प्रत्येक चैत्यालय 100 योजन लंबा है।

43. एक चैत्यालय की चौड़ाई कितनी है?

उत्तर: प्रत्येक चैत्यालय 50 योजन चौड़ा है।

44. इन चैत्यालयों की ऊँचाई कितनी है?

उत्तर: इनकी ऊँचाई 75 योजन है।

45. मंदिरों के मुख्य द्वार (दरवाजे) कितने बड़े हैं?

उत्तर: मुख्य द्वार 16 योजन ऊँचे और 8 योजन चौड़े हैं।

46. इन मंदिरों में कितने गोपुर (भव्य प्रवेश द्वार/टावर) होते हैं?

उत्तर: प्रत्येक मंदिर के आगे तीन-तीन गोपुर (तोरण द्वार) बने होते हैं।

47. चैत्यालयों के अंदर के खंभे (स्तंभ) किस चीज के बने हैं?

उत्तर: वे सभी खंभे दिव्य मणियों और वज्र रत्न के बने हैं, जो अत्यंत चमकदार हैं।

48. क्या इन मंदिरों में प्रकाश के लिए दीपक जलाने की आवश्यकता होती है?

उत्तर: नहीं, वहाँ की मणि-माणिक्य की दीवारें और फर्श स्वतः ही सूर्य से भी अधिक प्रकाश बिखेरते हैं।

49. मंदिरों के छज्जों पर क्या लटका रहता है?

उत्तर: वहाँ मोतियों की मालाएँ, रत्नमयी घंटियाँ और चामर स्वतः ही लटकते रहते हैं, जो मंद हवा से मधुर ध्वनि करते हैं।

50. प्रत्येक चैत्यालय के सामने क्या बना होता है?

उत्तर: प्रत्येक चैत्यालय के ठीक सामने एक विशाल 'मुखमंडप' (सभामंडप) बना होता है।

51. मुखमंडप के आगे और क्या रचना होती है?

उत्तर: वहाँ एक 'प्रेक्षागृह' (जहाँ देव नृत्य करते हैं) और एक 'संगीतशाल' होती है।

52. चैत्यालयों के चारों ओर क्या बने होते हैं?

उत्तर: चैत्यालय के चारों तरफ चैत्यवृक्ष (दिव्य वृक्ष) और मानस्तंभ बने होते हैं।

53. नंदीश्वर द्वीप के मानस्तंभों की ऊँचाई कितनी है?

उत्तर: ये मानस्तंभ कई योजन ऊँचे और चारों दिशाओं में जिनबिंबों से युक्त होते हैं।

54. क्या इन मंदिरों में कोई गर्भगृह (वेदी) होती है?

उत्तर: हाँ, मंदिर के ठीक बीच में एक अत्यंत विशाल और दिव्य रत्नमयी वेदी (पीठ) होती है।

55. इन अकृत्रिम चैत्यालयों के फर्श कैसे होते हैं?

उत्तर: इनका फर्श स्फटिक मणि जैसा पारदर्शी और चिकना होता है, जिसमें पूरी प्रतिमा का प्रतिबिंब दिखाई देता है।

56. क्या इन मंदिरों के ऊपर शिखर और कलश होते हैं?

उत्तर: हाँ, इनके ऊपर तीन-तीन कटनी (सीढ़ियाँ) और स्वर्णमयी कलश तथा ध्वजाएँ लहराती हैं।

57. इन ध्वजाओं पर क्या चिह्न बने होते हैं?

उत्तर: इन पर सिंह, गज (हाथी), वृषभ (बैल), चक्र और अष्टमंगल के शुभ चिह्न बने होते हैं।

58. क्या इन मंदिरों में कभी धूल या मकड़ी के जाले लगते हैं?

उत्तर: नहीं, यह देवलोक की भूमि है, यहाँ सदा परम पवित्रता और स्वच्छता रहती है।

59. इन ५२ चैत्यालयों के नाम क्या हैं?

उत्तर: इन सभी के नाम शाश्वत हैं और इन्हें सामूहिक रूप से 'नंदीश्वर जैन जिनालय' कहा जाता है।

60. इन मंदिरों के दर्शन करने से किस फल की प्राप्ति होती है?

उत्तर: इनके भाव-दर्शन से जीव के सात जन्मों के पाप कट जाते हैं और संसार सागर से पार होने का मार्ग मिलता है।

## खंड 4: अकृत्रिम जिनबिंब (प्रतिमाओं) का रहस्य (प्रश्न 61-80)

61. एक चैत्यालय में कुल कितनी जिन-प्रतिमाएं विराजमान हैं?

उत्तर: प्रत्येक चैत्यालय में 108 भगवान की प्रतिमाएं हैं।

62. पूरे नंदीश्वर द्वीप के 52 चैत्यालयों की कुल प्रतिमाएं कितनी हैं?

उत्तर: 52 \times 108 = \mathbf{5616} (पाँच हजार छह सौ सोलह) प्रतिमाएँ।

63. ये प्रतिमाएं किस मुद्रा (आसन) में विराजमान हैं?

उत्तर: ये सभी प्रतिमाएं पद्मासन मुद्रा (योग मुद्रा) में विराजमान हैं।

64. क्या वहाँ कोई खड्गासन (खड़े हुए) प्रतिमा भी है?

उत्तर: नहीं, नंदीश्वर द्वीप की सभी 5,616 प्रतिमाएं केवल पद्मासन ही हैं।

65. इन प्रतिमाओं की ऊँचाई कितनी है?

उत्तर: प्रत्येक प्रतिमा की ऊँचाई 500 धनुष (लगभग 3,000 फीट) के बराबर विशाल है।

66. इन प्रतिमाओं के चेहरे का भाव कैसा है?

उत्तर: इनका मुखमंडल परम शांत, वीतरागी और मंद मुस्कान से युक्त है, जिसे देखकर वैराग्य उमड़ आता है।

67. ये प्रतिमाएं किस तीर्थंकर की हैं?

उत्तर: ये किसी वर्तमान के विशेष तीर्थंकर की नहीं हैं, ये अनादि 'शाश्वत जिनबिंब' हैं जो सामान्य अरहंत भगवान के रूप को दर्शाती हैं।

68. क्या इन प्रतिमाओं का कभी जीर्णोद्धार या पंचकल्याणक होता है?

उत्तर: नहीं, ये अकृत्रिम हैं, इसलिए इनका कभी पंचकल्याणक या जीर्णोद्धार नहीं होता।

69. इन प्रतिमाओं की आँखें और नाखून किस रंग के हैं?

उत्तर: प्रतिमाओं का पूरा शरीर श्वेत है, लेकिन उनकी आँखें और नाखून स्वाभाविक रूप से हल्के लाल (रक्त वर्ण) हैं।

70. क्या इन प्रतिमाओं के ऊपर छत्र होते हैं?

उत्तर: हाँ, प्रत्येक प्रतिमा के सिर के ऊपर रत्नजड़ित 'तीन छत्र' स्वतः ही हवा में तैरते रहते हैं।

71. प्रतिमाओं के पीछे क्या दिखाई देता है?

उत्तर: प्रतिमाओं के पीछे एक अत्यंत तेजवान 'भामंडल' (आभामंडल) होता है, जिससे दिव्य किरणें निकलती हैं।

72. प्रतिमाओं के दोनों तरफ कौन खड़ा रहता है?

उत्तर: प्रतिमाओं के दोनों ओर चामर ढोरते हुए देवों के अकृत्रिम पुतले (प्रतिमाएँ) बने होते हैं।

73. क्या इन प्रतिमाओं को कभी स्नान कराया जाता है?

उत्तर: अष्टान्हिका पर्व के समय देवगण क्षीरसागर के जल से इन प्रतिमाओं का भावपूर्वक महा-अभिषेक करते हैं।

74. इन प्रतिमाओं के दर्शन से सम्यकदृष्टि जीवों को क्या अनुभूति होती है?

उत्तर: उन्हें साक्षात मोक्ष मार्ग और आत्मिक शांति का अनुभव होता है।

75. क्या ये प्रतिमाएं खोखली हैं या ठोस?

उत्तर: ये पूर्ण रूप से ठोस रत्नों (वज्र मणियों) से बनी हैं।

76. क्या इन प्रतिमाओं पर कोई लांछन (चिह्न) होता है?

उत्तर: नहीं, इन शाश्वत प्रतिमाओं के पादपीठ पर कोई विशेष लांछन नहीं होता, ये केवल जिन-स्वरूप हैं।

77. क्या इन प्रतिमाओं की उंगलियों में अंगूठी या कोई आभूषण होता है?

उत्तर: नहीं, ये पूर्ण दिगंबर, वीतराग और आभूषण रहित प्राकृतिक रूप में हैं।

78. क्या इन प्रतिमाओं की पूजा रात में की जा सकती है?

उत्तर: देवों के लिए दिन-रात का भेद नहीं होता, वे वहाँ निरंतर (चौबीसों घंटे) भक्ति और पूजा करते रहते हैं।

79. क्या इन प्रतिमाओं के सामने शास्त्र (ग्रंथ) रखे होते हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ केवल भाव-पूजा और साक्षात स्तुति होती है।

80. इन प्रतिमाओं की आभा की तुलना किससे की जा सकती है?

उत्तर: इनकी आभा एक साथ उगे करोड़ों चंद्रमाओं की शीतलता के समान होती है।

## खंड 5: अष्टान्हिका महापर्व, देवों की पूजा और मनुष्यों का कर्तव्य (प्रश्न 81-100)

81. अष्टान्हिका महापर्व वर्ष में कितनी बार आता है?

उत्तर: यह वर्ष में तीन बार आता है (कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ महीने में)।

82. अष्टान्हिका पर्व किन तिथियों को मनाया जाता है?

उत्तर: इन महीनों के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक (कुल 8 दिन)।

83. अष्टान्हिका पर्व के समय स्वर्ग में क्या हलचल होती है?

उत्तर: सभी स्वर्गों के इंद्र अपने-अपने विमान सजाकर सपरिवार नंदीश्वर द्वीप की ओर प्रस्थान करते हैं।

84. सबसे पहले कौन-सा इंद्र नंदीश्वर द्वीप पहुँचता है?

उत्तर: पहले स्वर्ग का राजा, सौधर्म इंद्र अपने पूरे वैभव के साथ सबसे पहले पहुँचता है।

85. देवगण पूजा के लिए कौन-सी सामग्री लाते हैं?

उत्तर: वे कल्पवृक्षों से प्राप्त अलौकिक अष्टद्रव्य (सुगंधित जल, मलय चंदन, अखंड अक्षत, दिव्य पुष्प, अमृतमयी नैवेद्य, रत्नमयी दीपक, दशांग धूप और उत्तम फल) लाते हैं।

86. देवों की पूजा में संगीत का क्या महत्व है?

उत्तर: गंधर्व देव अत्यंत मधुर कंठ से भक्तिपद गाते हैं और अनेक देव-देवियाँ वीणा, मृदंग लेकर अपूर्व नृत्य करते हैं।

87. क्या देवों की पूजा में कोई हिंसा या सचेतन वस्तु का प्रयोग होता है?

उत्तर: नहीं, देवों की संपूर्ण सामग्री अचेतन, शुद्ध और दिव्य मणियों/कल्पवृक्षों से निर्मित होती है।

88. सौधर्म इंद्र किस दिशा के चैत्यालयों की मुख्य पूजा करता है?

उत्तर: सौधर्म इंद्र मुख्य रूप से पूर्व दिशा के 13 चैत्यालयों की पूजा की कमान संभालता है।

89. ईशान इंद्र, सनत्कुमार इंद्र और महेंद्र इंद्र किन दिशाओं की पूजा करते हैं?

उत्तर: ये क्रमशः दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा के मंदिरों की व्यवस्था संभालते हैं।

90. चारण ऋद्धिधारी मुनिराज नंदीश्वर द्वीप कैसे जाते हैं?

उत्तर: जिन मुनिराजों को तपस्या के प्रभाव से आकाश में चलने की 'चारण ऋद्धि' प्राप्त होती है, वे ही केवल अपनी शक्ति से वहाँ जाकर वंदना करते हैं।

91. मानुषोत्तर पर्वत कहाँ है और इसका नंदीश्वर द्वीप से क्या संबंध है?

उत्तर: यह ढाई द्वीप के अंत में (चौथे द्वीप पर) है। इसके आगे मनुष्यों का जाना प्रकृति के नियम के अनुसार पूरी तरह वर्जित है, इसलिए मनुष्य नंदीश्वर द्वीप नहीं जा सकते।

92. जब मनुष्य वहाँ नहीं जा सकते, तो वे अष्टान्हिका पर्व में क्या करते हैं?

उत्तर: मनुष्य अपने नगर के दिगंबर जैन मंदिरों में 'नंदीश्वर द्वीप' की रचना मांडकर या मंडल जी बनाकर 8 दिनों तक विशेष 'नंदीश्वर द्वीप विधान' करते हैं।

93. नंदीश्वर विधान में कुल कितने अर्घ्य चढ़ाए जाते हैं?

उत्तर: मुख्य रूप से 52 चैत्यालयों के और अंत में जयमाला का महाअर्घ्य चढ़ाया जाता है।

94. अष्टान्हिका पर्व के दिनों में श्रावकों को किन बातों का त्याग करना चाहिए?

उत्तर: इन 8 दिनों में हरी सब्जी का त्याग (जहाँ तक संभव हो), ब्रह्मचर्य का पालन, और चारों प्रकार के आहार का त्याग (उपवास) या एकासन करना चाहिए।

95. नंदीश्वर द्वीप की रचना का दर्शन करने का मानसिक लाभ क्या है?

उत्तर: इससे हमारी आत्मा में यह भाव आता है कि भोगों से दूर यह ब्रह्मांड कितना सुंदर और शांत है, जिससे वैराग्य भावना दृढ़ होती है।

96. क्या नंदीश्वर द्वीप में कोई नरक या तिर्यंच गति के जीव रहते हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ केवल देव गति के जीव और ऋद्धिधारी मुनिराज (मनुष्य गति) ही कदम रख सकते हैं।

97. क्या सिद्ध भगवान का नंदीश्वर द्वीप से कोई संबंध है?

उत्तर: सिद्ध भगवान तो सिद्धशिला पर लोक के अग्रभाग में रहते हैं, परंतु नंदीश्वर द्वीप की प्रतिमाएं उन्हीं वीतरागी सिद्ध और अरहंत स्वरूप की याद दिलाती हैं।

98. जैन धर्म में नंदीश्वर द्वीप को क्या संज्ञा दी गई है?

उत्तर: इसे 'सर्वोत्कृष्ट अकृत्रिम तीर्थ' की संज्ञा दी गई है।

99. अष्टान्हिका पर्व के अंतिम दिन (पूर्णिमा) को क्या विशेष होता है?

उत्तर: इस दिन सभी इंद्र मिलकर 'विश्व-शांति' की कामना के लिए महाशांतिधारा और विसर्जन पूजा करते हैं, फिर अपने-अपने स्वर्ग लौट जाते हैं।

100. नंदीश्वर द्वीप की भक्ति का अंतिम लक्ष्य क्या है?

उत्तर: नंदीश्वर द्वीप के अकृत्रिम जिनालयों की वंदना और स्मरण करने का एकमात्र अंतिम लक्ष्य अपनी आत्मा को शुद्ध करके स्वयं भगवान (सिद्ध) बनना है।

नंदीश्वर द्वीप के अलौकिक भूगोल, वहाँ की पर्वत रचनाओं और देवों की क्रियाओं को और अधिक विस्तार से समझने के लिए, यहाँ दिगंबर जैन आगम ग्रंथों (जैसे तिलोयपण्णत्ती और तत्त्वार्थराजवार्तिक) के आधार पर 150 और विशेष प्रश्न-उत्तर दिए जा रहे हैं:

## खंड 6: बावलियों और वनों का अलौकिक वैभव (प्रश्न 101-125)

101. नंदीश्वर द्वीप में कुल कितने 'वनखंड' (दिव्य बगीचे) हैं?

उत्तर: प्रत्येक बावली के तट पर और पर्वतों के आसपास अनेक दिव्य वन हैं। मुख्य रूप से चारों दिशाओं की बावलियों के साथ 64 बड़े वनखंड पाए जाते हैं।

102. इन वनों में पाए जाने वाले वृक्षों को क्या कहा जाता है?

उत्तर: इन्हें चैत्यवृक्ष या अकृत्रिम वनस्पति कहा जाता है। ये साधारण पेड़ों की तरह सूखते या सड़ते नहीं हैं, बल्कि हमेशा हरे-भरे और रत्नमयी पत्तों से युक्त रहते हैं।

103. इन वनखंडों के नाम क्या हैं?

उत्तर: प्रत्येक दिशा की बावलियों के चारों ओर चार मुख्य वन होते हैं: अशोक वन, सप्तपर्ण वन, चंपक वन और आम्र (अमराई) वन।

104. क्या इन वनों में फल-फूल होते हैं?

उत्तर: हाँ, इन वनों के वृक्षों में हमेशा अत्यंत सुंदर, सुगन्धित और रंग-बिरंगे फूल खिले रहते हैं, जिनकी सुगंध पूरे द्वीप में फैली रहती है।

105. इन वनों का उपयोग देवगण किस कार्य के लिए करते हैं?

उत्तर: देव और देवियाँ पूजा के बीच के समय में इन वनों में विश्राम करते हैं, धार्मिक चर्चाएँ करते हैं और अपनी वैक्रियक ऋद्धि से आमोद-प्रमोद करते हैं।

106. अंजनगिरि पर्वत के चारों ओर जो ४ बावलियाँ हैं, वे किस दिशा में स्थित होती हैं?

उत्तर: वे अंजनगिरि के ठीक पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में चौकोर आकार में स्थित होती हैं।

107. इन बावलियों के जल का स्वाद कैसा होता है?

उत्तर: इनका जल अमृत के समान मीठा, गंधरहित (दुर्गंध से परे) और उत्तम रस से युक्त होता है।

108. क्या इन बावलियों में कमल के फूल भी होते हैं?

उत्तर: हाँ, इन बावलियों में दिव्य रत्नमयी कमल खिले होते हैं, जिनकी पंखुड़ियाँ सोने और मणियों की बनी होती हैं।

109. क्या इन सरोवरों में दीवालें (तट) बनी होती हैं?

उत्तर: हाँ, इन बावलियों के तट स्फटिक मणि के बने होते हैं और पानी में उतरने के लिए मणियों की सुंदर सीढ़ियाँ (घाट) बनी होती हैं।

110. इन बावलियों के जल में क्या कोई जीव (मछली, मेंढक आदि) रहते हैं?

उत्तर: नहीं, ये अकृत्रिम और देवलोक की श्रेणी की बावलियाँ हैं। इनमें साधारण तिर्यंच जीव (मछली, कछुए आदि) नहीं होते।

111. दधिमुख पर्वत इन बावलियों में किस स्थान पर खड़े हैं?

उत्तर: प्रत्येक बावली के बिल्कुल ठीक बीचों-बीच (केंद्र में) एक-एक दधिमुख पर्वत स्थित है।

112. दूर से देखने पर दधिमुख पर्वत और बावली का दृश्य कैसा लगता है?

उत्तर: ऐसा लगता है मानो दूध के महासागर के बीच में चांदी का एक विशाल स्तंभ खड़ा हो।

113. बावलियों के कोनों पर जो रतिकर पर्वत हैं, वे संख्या में कितने हैं?

उत्तर: एक बावली के ४ कोने होते हैं, और बाहरी दो कोनों पर २ रतिकर पर्वत होते हैं। इस प्रकार एक दिशा की ४ बावलियों के बाहरी कोनों पर कुल ८ रतिकर पर्वत होते हैं।

114. रतिकर पर्वत का नाम 'रतिकर' क्यों है?

उत्तर: 'रति' का अर्थ होता है आनंद या प्रेम। इन पर्वतों की सुंदरता और वहाँ के अकृत्रिम मंदिरों को देखकर देवों के मन में धर्म के प्रति अपूर्व आनंद (रति) उत्पन्न होता है।

115. क्या इन १६ बावलियों के अलावा भी द्वीप पर कोई जल स्रोत है?

उत्तर: नहीं, नंदीश्वर द्वीप की मुख्य पहचान ये १६ महा-बावलियाँ ही हैं।

116. क्या इन वनों में पक्षी चहचहाते हैं?

उत्तर: वहाँ वास्तविक पक्षी नहीं होते, लेकिन देवों की विक्रिया से बने रत्नमयी पक्षी (जैसे मोर, हंस) वृक्षों पर सुंदर मुद्रा में दिखाई देते हैं।

117. इन वनों की भूमि कैसी होती है?

उत्तर: यहाँ की भूमि बज्र रत्न और नीलमणि से जड़ी होती है, जहाँ पैर रखते ही अत्यंत कोमलता का अनुभव होता है।

118. क्या इन वनों में कभी पतझड़ आता है?

उत्तर: नहीं, यहाँ कभी पतझड़ नहीं आता। यहाँ के वृक्ष शाश्वत रूप से एक समान अवस्था में रहते हैं।

119. इन वनों में स्थित 'नाट्यशालाओं' का क्या काम है?

उत्तर: यहाँ देवियाँ भगवान की भक्ति में किए जाने वाले नृत्यों का अभ्यास करती हैं।

120. क्या इन बावलियों का पानी कभी सूखता है?

उत्तर: नहीं, इनका जल स्तर अनादि काल से एक समान है, न कभी घटता है और न बढ़ता है।

121. क्या इन वनों में रात को अंधेरा होता है?

उत्तर: नहीं, यहाँ के चैत्यवृक्षों के फलों और पत्तों से स्वतः ही दिव्य प्रकाश (ल्युमिनेसेंस) निकलता रहता है।

122. क्या मनुष्यों के बनाए बाग-बगीचे इनकी बराबरी कर सकते हैं?

उत्तर: तीन लोक में तीन लोक के राजा (चक्रवर्ती) का उद्यान भी नंदीश्वर द्वीप के एक छोटे से वनखंड के वैभव के सामने तिनके के समान है।

123. 'नंदा' बावली के तट पर स्थित वन का विस्तार कितना है?

उत्तर: यह वन कई हजार योजन में फैला हुआ है।

124. क्या इन वनों में कोई हिंसक पशु (शेर, चीता) होते हैं?

उत्तर: नहीं, यहाँ कोई हिंसक पशु या भय का वातावरण नहीं होता।

125. इन वनों की हवा कैसी होती है?

उत्तर: यहाँ सदा मलय चंदन जैसी सुगंधित और मंद-मंद शीतल हवा चलती रहती है।

## खंड 7: देवों के विमान, श्रेणियाँ और आगमन (प्रश्न 126-150)

126. कल्पवासी देव नंदीश्वर द्वीप किस साधन से आते हैं?

उत्तर: वे अपने-अपने स्वर्ग के दिव्य वैमानिक विमानों में बैठकर आते हैं, जो मन की गति से भी तेज चलते हैं।

127. जब देव आते हैं, तो उनके विमानों की कतार कैसी लगती है?

उत्तर: आकाश में करोड़ों चमकते हुए विमानों की ऐसी कतार लगती है मानो साक्षात नक्षत्रों और सूर्यों की आकाशगंगा धरती पर उतर रही हो।

128. चारों निकायों के देवों में से कौन-कौन से देव वहाँ आते हैं?

उत्तर: भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी और कल्पवासी—इन चारों ही श्रेणियों के करोड़ों देव-देवियाँ वहाँ पहुँचते हैं।

129. क्या प्रतिइंद्र (इंद्र के सहायक) भी पूजा में शामिल होते हैं?

उत्तर: हाँ, सभी स्वर्गों के इंद्र, प्रतिइंद्र, सामान्यनिक देव और लोकपाल अपने पूरे परिकर के साथ आते हैं।

130. देवों के आगमन पर नंदीश्वर द्वीप में क्या ध्वनि सुनाई देती है?

उत्तर: देवों के विमानों के घंटनाद, दुन्दुभि (नगाड़ों) की आवाज और "जय जयकार" की दिव्य ध्वनि गूंज उठती है।

131. क्या सौधर्म इंद्र अपनी शची (इंद्राणी) के साथ आता है?

उत्तर: हाँ, सभी इंद्र अपनी-अपनी मुख्य रानियों (इंद्राणियों) और अंतःपुर के साथ आते हैं।

132. देवगण वहाँ किस रूप में पूजा करते हैं?

उत्तर: देव अपनी उत्तर-वैक्रियक शक्ति से एक साथ अनेक रूप बना लेते हैं। एक ही इंद्र एक ही समय में सभी ५२ मंदिरों में पूजा करते हुए दिखाई दे सकता है।

133. देवों का पहनावा (वेशभूषा) पूजा के समय कैसा होता है?

उत्तर: वे मुकुट, हार, बाजूबंद और दिव्य वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होते हैं। उनके शरीर से स्वतः ही सुगंध निकलती है।

134. क्या ज्योतिषी देव (सूर्य-चंद्रमा के विमान वाले) भी अपनी गति रोककर पूजा करते हैं?

उत्तर: ज्योतिषी देवों के मुख्य इंद्र और उनके परिवार के देव वहाँ आकर पूजा करते हैं, जबकि उनके मूल विमान ज्योतिष चक्र में घूमते रहते हैं।

135. भवनवासी देव कहाँ ठहरते हैं?

उत्तर: रतिकर पर्वतों के आसपास और बावलियों के बाहरी भागों में देवों के अस्थायी ठहरने के लिए सुंदर 'आवास' (शिविर) स्वतः निर्मित हो जाते हैं।

136. क्या देवों में पूजा के समय आपस में कोई ईर्ष्या या विवाद होता है?

उत्तर: नहीं, भगवान की वीतराग मुद्रा को देखकर सभी देवों के मन से कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) शांत हो जाते हैं और वे परम वात्सल्य भाव से पूजा करते हैं।

137. देवियाँ किस प्रकार भगवान की भक्ति करती हैं?

उत्तर: देवियाँ मधुर स्वर में मंगल गान गाती हैं और अष्टान्हिका के दिनों में ३२ प्रकार के दिव्य नाटक और नृत्य प्रस्तुत करती हैं।

138. पूजा सामग्री को सुरक्षित रखने के लिए मंदिरों में क्या व्यवस्था होती है?

उत्तर: मंदिरों के मुखमंडप में दिव्य रत्नमयी चौकियाँ और मेज बनी होती हैं, जिन पर देव अपनी सामग्री सजाकर रखते हैं।

139. क्या सौधर्म इंद्र के पास पूजा के लिए कोई विशेष सहायक होता है?

उत्तर: हाँ, उनका सेनापति देव (जैसे धनद या कुबेर) पूजा की दिव्य सामग्रियों और व्यवस्था का संयोजन करता है।

140. जब देव अष्टद्रव्य चढ़ाते हैं, तो उस चढ़ाई गई सामग्री का बाद में क्या होता है?

उत्तर: वह अकृत्रिम भूमि है, वहाँ चढ़ाई गई दिव्य सामग्री स्वतः ही विलीन हो जाती है या देव उसे ससम्मान शुद्ध स्थान पर विसर्जित कर देते हैं; वहाँ कोई जूठन या गंदगी शेष नहीं रहती।

141. क्या देवों के आने-जाने से आकाश में कोई मार्ग (ट्रैफिक) की समस्या होती है?

उत्तर: नहीं, देवों की ऋद्धि इतनी अगाध होती है कि करोड़ों विमान एक साथ बिना टकराए अत्यंत व्यवस्थित तरीके से आवागमन करते हैं।

142. क्या अच्युत कल्प (16वें स्वर्ग) के ऊपर के अहमिंद्र देव भी नंदीश्वर द्वीप आते हैं?

उत्तर: नहीं, नवग्रैवेयक, अनुदिश और अनुत्तर विमानों के अहमिंद्र देव अपने स्थानों को छोड़कर कहीं बाहर नहीं जाते। वे अपने विमानों में ही भाव-पूजा करते हैं।

143. लौकांतिक देव (जो ब्रह्मलोक में रहते हैं) क्या वे आते हैं?

उत्तर: लौकांतिक देव केवल तीर्थंकरों के वैराग्य के समय ही आते हैं, वे सामान्यतः अष्टान्हिका पूजा के लिए नंदीश्वर द्वीप नहीं जाते।

144. क्या व्यंतर देव (जो जंगलों या पर्वतों पर रहते हैं) पूजा में भाग लेते हैं?

उत्तर: हाँ, व्यंतर देवों के इंद्र (जैसे किन्नर, किम्पुरुष आदि) अत्यंत उत्साह और श्रद्धा के साथ पूजा में अग्रसर रहते हैं।

145. देवों की पूजा का सबसे मुख्य आकर्षण क्या होता है?

उत्तर: इंद्र द्वारा किया जाने वाला तांडव नृत्य और भावपूर्ण स्तुति (जैसे शक्रेन्द्र स्तव), जिसे सुनकर अन्य देव भी भावविभोर हो जाते हैं।

146. पूजा के समय देवों के चेहरों पर क्या भाव होते हैं?

उत्तर: उनके नेत्र भगवान के रूप को निहारते हुए थामे नहीं थमते, और उनके चेहरों पर सम्यक्त्व का अपूर्व तेज होता है।

147. क्या कोई देव पूजा के बीच में ही छोड़कर चला जाता है?

उत्तर: नहीं, आठ दिनों तक सभी देव पूरी निष्ठा और आनंद के साथ वहीं जमे रहते हैं।

148. क्या देवों की सेना (जैसे हाथी, घोड़े के रूप वाले देव) भी वहाँ आती है?

उत्तर: हाँ, देवों के सात प्रकार की सेना के वाहन (जो वास्तव में देव ही रूप बदलते हैं) द्वीप के बाहरी हिस्सों में खड़े होकर प्रभु की जयकार करते हैं।

149. देवों द्वारा की जाने वाली इस महापूजा को क्या नाम दिया गया है?

उत्तर: इसे आगम में 'देवेन्द्र-महिमा' या 'अष्टान्हिका महामहोत्सव' कहा जाता है।

150. नंदीश्वर द्वीप से लौटते समय देवों की क्या भावना होती है?

उत्तर: वे अत्यंत भावुक मन से जिनबिंबों को बार-बार नमस्कार करते हैं और भावना भाते हैं कि "हे प्रभु! हमें भी जल्द आपके जैसा वीतरागी पद और मोक्ष की प्राप्ति हो।"

## खंड 8: ५२ जिनालयों का आंतरिक भूगोल और गणित (प्रश्न 151-175)

151. दिगंबर जैन गणित के अनुसार, एक योजन में कितने किलोमीटर या मील होते हैं?

उत्तर: जैन भूगोल में दो प्रकार के योजन होते हैं—प्रमाण योजन और महा योजन। नंदीश्वर द्वीप का वर्णन महा योजन (बड़ा योजन) के आधार पर है, जो साधारण योजन से ५०० गुना बड़ा होता है।

152. अंजनगिरि पर्वत के शिखर पर जो समतल भूमि है, उसका क्षेत्रफल कितना है?

उत्तर: उसका व्यास (चौड़ाई) १०,००० योजन है, जो एक बहुत बड़े देश के बराबर विस्तृत समतल मैदान बनाती है।

153. दधिमुख पर्वत का नाम 'दधिमुख' क्यों पड़ा?

उत्तर: 'दधि' का अर्थ दही और 'मुख' का अर्थ सामने का भाग। इसका शिखर और ऊपरी भाग दही के समान धवल, चमकदार और अत्यंत श्वेत दिखाई देता है, इसलिए इसे दधिमुख कहते हैं।

154. रतिकर पर्वत की चौड़ाई नीचे १०,००० योजन है और ऊपर केवल १,००० योजन है, इसका क्या कारण है?

उत्तर: इसकी बनावट गोपुच्छ (गाय की पूंछ) या शंक्वाकार (Cone shape) जैसी है, जो नीचे से चौड़ी और ऊपर जाते-जाते संकरी हो जाती है।

155. ५२ पर्वतों के अलावा जो अन्य रतिकर पर्वत हैं, उनकी संख्या कितनी है?

उत्तर: बावलियों के बाहरी कोनों के आगे देवों के क्रीड़ा-पर्वत के रूप में और ३२ रतिकर पर्वत होते हैं, लेकिन उन पर चैत्यालय नहीं होते।

156. एक दिशा के १३ मंदिरों में मूर्तियों की कुल संख्या कितनी होती है?

उत्तर: 13 \times 108 = \mathbf{1404} (एक हजार चार सौ चार) मूर्तियाँ एक दिशा में होती हैं।

157. चारों दिशाओं के अंजनगिरि पर्वतों पर कुल कितनी मूर्तियाँ हैं?

उत्तर: 4 अंजनगिरि \times 108 = \mathbf{432} मूर्तियाँ।

158. सभी १६ दधिमुख पर्वतों पर कुल कितनी मूर्तियाँ विराजमान हैं?

उत्तर: 16 दधिमुख \times 108 = \mathbf{1728} मूर्तियाँ।

159. सभी ३२ रतिकर पर्वतों पर कुल कितनी मूर्तियाँ विराजमान हैं?

उत्तर: 32 रतिकर \times 108 = \mathbf{3456} मूर्तियाँ।

160. इन सभी का योग (432 + 1728 + 3456) करने पर क्या संख्या आती है?

उत्तर: कुल संख्या ५६१६ आती है, जो नंदीश्वर द्वीप की कुल अकृत्रिम जिनप्रतिमाओं की संख्या है।

161. चैत्यालय के अंदर 'पीठ' (वेदी) की ऊँचाई कितनी होती है?

उत्तर: वेदी की ऊँचाई ८ योजन (लगभग कई मील) ऊँची होती है, जिस पर भगवान विराजमान होते हैं।

162. इन ५२ मंदिरों की दीवारें किस रत्न की बनी हैं?

उत्तर: इनकी दीवारें मुख्य रूप से स्फटिक और पद्मराग मणियों की बनी हैं, जिससे वे लाल और सफेद रंग के दिव्य मिश्रण जैसी दिखती हैं।

163. क्या इन मंदिरों के ऊपर लगी ध्वजाएँ कभी फटती या पुरानी होती हैं?

उत्तर: नहीं, वे अकृत्रिम वस्त्रों और स्वर्ण-तारों से बनी होती हैं, जो हमेशा नई जैसी ही चमकती रहती हैं।

164. मंदिरों के प्रवेश द्वार पर जो 'तोरण' होते हैं, वे कैसे होते हैं?

उत्तर: वे तोरण हीरों और मोतियों की लड़ियों से बने होते हैं, जो मुख्य द्वार के ऊपर अर्धचंद्राकार लटके रहते हैं।

165. चैत्यालयों के अंदर की छतों (सीलिंग) पर क्या बना होता है?

उत्तर: छतों पर सूर्य, चंद्रमा, तारों और अष्टमंगल द्रव्यों के सुंदर चित्र और आकृतियाँ स्वतः उभरी होती हैं।

166. क्या इन मंदिरों में घंटियाँ बजाने के लिए कोई रस्सी होती है?

उत्तर: नहीं, जब भी कोई देव मंदिर में प्रवेश करता है, तो वहाँ की घंटियाँ उसकी भक्ति के अतिशय से स्वतः ही गूंजने लगती हैं।

167. इन मंदिरों के गर्भगृह का वातावरण कैसा होता है?

उत्तर: वहाँ का वातावरण परम शांत, शीतल और मन को एकाग्र करने वाला होता है। वहाँ पैर रखते ही संसार के सारे दुःख भूल जाते हैं।

168. क्या नंदीश्वर द्वीप की रचना का कोई केंद्र बिंदु है?

उत्तर: नंदीश्वर द्वीप का केंद्र बिंदु उस वलय का मध्य भाग है, लेकिन इसके चारों कोनों (दिशाओं) में समान दूरी पर ये पर्वत स्थित हैं।

169. 'त्रिलोकसार' ग्रंथ में नंदीश्वर द्वीप के वर्णन का क्या महत्व है?

उत्तर: आचार्य नेमीचन्द सिद्धांतचक्रवर्ती ने इसके माध्यम से श्रावकों को मध्यलोक की विशालता और अकृत्रिम वैभव का ज्ञान कराया है।

170. इन चैत्यालयों में जो 'भामंडल' होता है, उसका क्या कार्य है?

उत्तर: वह भामंडल भगवान की आत्मा के अनंत ज्ञान और तेज का प्रतीक है, जो अकृत्रिम रूप से प्रतिमा के पीछे चमकता है।

171. क्या इन मंदिरों के आसपास कोई नदी बहती है?

उत्तर: नहीं, यहाँ नदियाँ नहीं हैं, केवल १६ महा-बावलियाँ ही जल के मुख्य स्रोत हैं।

172. क्या इन प्रतिमाओं के ऊपर कभी सूर्य की सीधी धूप पड़ती है?

उत्तर: नहीं, मंदिरों की विशाल छत और गोपुर इस प्रकार बने हैं कि अंदर सदा एक समान दिव्य और शीतल प्रकाश रहता है।

173. क्या इन मंदिरों में कोई तिजोरी या दानपात्र होता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ किसी सांसारिक धन या संग्रह की आवश्यकता नहीं होती; वहाँ केवल त्याग और भक्ति का साम्राज्य है।

174. इन प्रतिमाओं के कानों का आकार कैसा होता है?

उत्तर: तीर्थंकरों के पारंपरिक रूप की तरह इनके कान भी लंबे और कंधों को छूते हुए परम सुंदर होते हैं।

175. नंदीश्वर द्वीप की मिट्टी का रंग कैसा है?

उत्तर: वहाँ साधारण मिट्टी नहीं है, वहाँ की पूरी जमीन सुवर्णमयी (सोने जैसी पीली) और मणियों के चूर्ण से युक्त है।

## खंड 9: अष्टान्हिका महापर्व के आध्यात्मिक रहस्य (प्रश्न 176-200)

176. जैन धर्म में अष्टान्हिका पर्व को 'महापर्व' क्यों कहा जाता है?

उत्तर: क्योंकि यह किसी मनुष्य या घटना (जैसे जन्म या मरण) पर आधारित नहीं है। यह प्रकृति का शाश्वत पर्व है, जिसे अनादि काल से देव मनाते आ रहे हैं।

177. अष्टान्हिका पर्व के ८ दिनों में जैन समाज में कौन-सा व्रत मुख्य रूप से किया जाता है?

उत्तर: इन दिनों में मुख्य रूप से 'मौन व्रत', 'अष्टान्हिका व्रत' या 'नंदीश्वर व्रत' किया जाता है।

178. 'नंदीश्वर द्वीप विधान' की पूजा की भाषा क्या होती है?

उत्तर: प्राचीन आचार्यों (जैसे आचार्य कुन्दकुन्द, पूज्यपाद) ने प्राकृत और संस्कृत में इसकी स्तुतियाँ लिखी हैं। वर्तमान में यह हिंदी और अन्य प्रांतीय भाषाओं के सुंदर पद्यों में उपलब्ध है।

179. इस विधान के मांडले (मंडल जी) में ५२ अर्घ्य किस क्रम से चढ़ाए जाते हैं?

उत्तर: पहले पूर्व दिशा के १३, फिर दक्षिण के १३, फिर पश्चिम के १३ और अंत में उत्तर दिशा के १३ पर्वतों के चैत्यालयों को अर्घ्य समर्पित किए जाते हैं।

180. विधान के मांडले में जो रंग भरे जाते हैं, वे क्या दर्शाते हैं?

उत्तर: पीला रंग सुवर्णमयी भूमि को, काला रंग अंजनगिरि को, सफेद रंग दधिमुख को और लाल रंग रतिकर पर्वत तथा बावलियों के कमलों को दर्शाता है।

181. अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'सिद्धचक्र विधान' और 'नंदीश्वर विधान' में क्या अंतर है?

उत्तर: अष्टान्हिका पर्व में मुख्य रूप से नंदीश्वर द्वीप की अकृत्रिम रचना की पूजा होती है, जबकि आश्विन और चैत्र मास के नवपद ओली में 'सिद्धचक्र विधान' (नवपद की पूजा) किया जाता है।

182. इस महापर्व के दौरान श्रावकों को रात्रि भोजन का त्याग क्यों अनिवार्य है?

उत्तर: रात्रि भोजन का त्याग तो जैन धर्म का मूल गुण है, लेकिन इन पवित्र दिनों में इसका पालन और अधिक कड़ाई से आत्म-विशुद्धि के लिए किया जाता है।

183. नंदीश्वर द्वीप की पूजा करते समय 'जयमाला' का क्या महत्व है?

उत्तर: जयमाला में पूरे नंदीश्वर द्वीप का भूगोल, मंदिरों का वैभव और देवों की भक्ति का पूरा सारांश कविता के रूप में होता है, जो वैराग्य पैदा करता है।

184. अष्टान्हिका पर्व के समापन पर 'रथयात्रा' क्यों निकाली जाती है?

उत्तर: यह इस बात का प्रतीक है कि जैसे देव पूजा संपन्न कर हर्षोल्लास से लौटते हैं, वैसे ही मनुष्य भी भगवान की भक्ति का प्रभाव पूरे नगर में फैलाते हैं।

185. क्या इस पूजा से 'तीर्थंकर प्रकृति' का बंध हो सकता है?

उत्तर: हाँ, यदि कोई जीव तीव्र भक्ति और विशुद्ध परिणामों के साथ १६ कारण भावनाओं के साथ यह पूजा करता है, तो वह तीर्थंकर नामकर्म का बंध कर सकता है।

186. नंदीश्वर द्वीप का ध्यान करने से ध्यान की कौन-सी श्रेणी सिद्ध होती है?

उत्तर: इससे 'पदस्थ ध्यान' और 'रूपस्थ ध्यान' की सिद्धि होती है, जहाँ भगवान के समवशरण और अकृत्रिम चैत्यालयों का मानसिक चित्रण किया जाता है।

187. अष्टान्हिका पर्व के दिनों में मंदिरों में 'अखंड दीपक' क्यों जलाया जाता है?

उत्तर: यह इस भावना का प्रतीक है कि जैसे नंदीश्वर द्वीप में सदा प्रकाश रहता है, वैसे ही हमारे हृदय में भी सम्यग्ज्ञान का प्रकाश अखंड बना रहे।

188. क्या नंदीश्वर द्वीप की वंदना से नरक गति का बंध टूट सकता है?

उत्तर: तीव्र भक्ति के परिणाम स्वरूप यदि किसी जीव ने पहले नरक आयु का बंध कर लिया हो, तो वह मंद हो सकता है या सम्यक्त्व प्राप्त होने पर नरक गमन टल जाता है।

189. नंदीश्वर द्वीप के चैत्यालयों में जो 'अष्टमंगल' द्रव्य अंकित हैं, वे कौन-से हैं?

उत्तर: झारी, कलश, दर्पण, चामर, ध्वजा, पंखा, छत्र और सुप्रतिष्ठ (थार)।

190. दिगंबर जैन मुनिराज अष्टान्हिका पर्व कैसे मनाते हैं?

उत्तर: वे इन ८ दिनों में अपनी तपस्या और बढ़ा देते हैं, मौन धारण करते हैं, आत्म-ध्यान में लीन रहते हैं और अकृत्रिम चैत्यालयों का मानसिक स्मरण करते हैं।

191. अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'दान' देने का क्या महत्व है?

उत्तर: इन दिनों में ज्ञान दान, औषधि दान, अभय दान और आहार दान देने से अनंत गुना पुण्य फल प्राप्त होता है।

192. नंदीश्वर द्वीप विधान के अंत में 'वसूधारा' (दूध या जल की धारा) क्यों गिराई जाती है?

उत्तर: यह देवों द्वारा की गई क्षीरसागर के जल की वर्षा और सुख-शांति की वर्षा का प्रतीक है।

193. क्या गृहस्थों को अपने घर में भी नंदीश्वर द्वीप का चित्र रखना चाहिए?

उत्तर: हाँ, घर के चैत्यालय या शांत स्थान पर इसका चित्र रखने से सुबह-शाम इसके भाव-दर्शन का लाभ मिलता है।

194. नंदीश्वर द्वीप की पूजा से 'लोकापवाद' या मानसिक तनाव कैसे दूर होता है?

उत्तर: जब मन इतने विशाल और पवित्र ब्रह्मांड के चिंतन में लग जाता है, तो सांसारिक छोटी-मोटी परेशानियाँ अपने आप छोटी और महत्वहीन लगने लगती हैं।

195. क्या इस द्वीप पर कभी सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण होता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ ऐसी कोई खगोलीय घटनाएँ नहीं होतीं जो अमंगलकारी मानी जाएँ।

196. नंदीश्वर द्वीप के चैत्यालयों का रक्षक कौन है?

उत्तर: वहाँ की अकृत्रिम देव-शक्तियाँ और सौधर्म आदि इंद्र स्वतः ही इन क्षेत्रों की मर्यादा और सुरक्षा के निमित्त बनते हैं।

197. अष्टान्हिका पर्व के दौरान बच्चों को नंदीश्वर द्वीप के बारे में सिखाने का क्या लाभ है?

उत्तर: इससे बच्चों में जैन भूगोल की समझ बढ़ती है और उनके मन में अंधविश्वासों से दूर, वैज्ञानिक और तार्किक जैन सिद्धांतों के प्रति श्रद्धा पैदा होती है।

198. नंदीश्वर द्वीप की रचना को 'अनादि-निधन' क्यों कहते हैं?

उत्तर: क्योंकि इसका न कोई आदि (शुरुआत) है और न ही कोई निधन (अंत)। यह हमेशा से ऐसा ही है और हमेशा ऐसा ही रहेगा।

199. दिगंबर जैन समाज में नंदीश्वर द्वीप की पूजा के बाद कौन-सा नारा या जयकारा लगाया जाता है?

उत्तर: "नंदीश्वर द्वीप के ५२ अकृत्रिम चैत्यालयों की जय!" या "अष्टान्हिका महापर्व की जय!"

200. नंदीश्वर द्वीप प्रश्नोत्तरी का मूल सार क्या है?

उत्तर: इसका मूल सार यही है कि भले ही हम आज अपनी शारीरिक सीमाओं के कारण नंदीश्वर द्वीप नहीं जा सकते, लेकिन अपने शुद्ध भावों, संयम और अष्टान्हिका व्रत के माध्यम से हम अपने हृदय को ही नंदीश्वर द्वीप बना सकते हैं, जहाँ साक्षात वीतरागता का वास हो।

## खंड 10: गूढ़ आगम रहस्य और सूक्ष्म भूगोल (प्रश्न 201-250)

201. नंदीश्वर द्वीप के चारों कोनों में जो चार अंजनगिरि पर्वत हैं, क्या उनके बीच की दूरी समान है?

उत्तर: हाँ, वे द्वीप के वलय पर बिल्कुल ९०-९० डिग्री की समान दूरी पर (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर में) स्थित हैं।

202. तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ के किस अध्याय में नंदीश्वर द्वीप का संदर्भ आता है?

उत्तर: तत्त्वार्थसूत्र के तीसरे अध्याय में, जहाँ मध्यलोक और ढाई द्वीप के बाहर के द्वीपों का सामान्य वर्णन है।

203. नंदीश्वर द्वीप के ५२ जिनालयों में जो छत्र होते हैं, क्या वे कभी हिलते हैं?

उत्तर: वे स्थिर रहते हैं, परंतु उनके ऊपर लगे छोटे-छोटे रत्नमयी घुँघरू हवा के प्रवाह से निरंतर अति-मधुर ध्वनि उत्पन्न करते हैं।

204. इन चैत्यालयों के मुख्य गर्भगृह के फर्श का रंग कैसा होता है?

उत्तर: फर्श मुख्य रूप से मरकत मणि (पन्ना) का बना होता है, जो हरे रंग की अत्यंत सुखद और शांत आभा बिखेरता है।

205. क्या इन मंदिरों में सीढ़ियाँ होती हैं?

उत्तर: चूँकि ये पर्वतों के शिखर पर हैं, इसलिए नीचे से ऊपर जाने के लिए देवों के निमित्त और मुनिराजों के चलने योग्य मणियों की सुंदर सीढ़ियाँ बनी होती हैं, यद्यपि देव आकाश मार्ग से सीधे शिखर पर उतरते हैं।

206. अंजनगिरि पर्वत का काला रंग किस बात का प्रतीक है?

उत्तर: यह कर्मों की कालिमा को नष्ट करने वाले गहन आत्म-ध्यान और स्थिरता का प्रतीक है।

207. दधिमुख पर्वत का श्वेत (सफेद) रंग किसका प्रतीक है?

उत्तर: यह आत्मा की पूर्ण शुद्धता, क्षायिक सम्यक्त्व और वीतरागता का प्रतीक है।

208. रतिकर पर्वत का लाल रंग किसका प्रतीक है?

उत्तर: यह धर्म के प्रति अटूट उत्साह, अनुराग (प्रशस्त राग) और आत्मिक ऊर्जा का प्रतीक है।

209. क्या नंदीश्वर द्वीप में कभी वर्षा या बर्फबारी होती है?

उत्तर: वहाँ प्राकृतिक रूप से वैसी असुविधाजनक वर्षा या बर्फबारी नहीं होती जैसी मनुष्यों के क्षेत्रों में होती है। वहाँ केवल देवों की इच्छा से सुगन्धित जल और फूलों की वर्षा होती है।

210. इन मंदिरों की छतों पर जो कलश रखे हैं, उनकी संख्या कितनी होती है?

उत्तर: प्रत्येक चैत्यालय के ऊपर मुख्य रूप से तीन विशाल स्वर्ण कलश स्थापित होते हैं।

211. क्या नंदीश्वर द्वीप के अकृत्रिम जिनालयों में 'अष्ट प्रातिहार्य' दिखाई देते हैं?

उत्तर: हाँ, अकृत्रिम रूप से भामंडल, छत्रत्रय, चामर और देव-दुन्दुभि जैसी रचनाएँ प्रतिमाओं के अतिशय स्वरूप वहाँ हमेशा विद्यमान रहती हैं।

212. इन प्रतिमाओं के दर्शन करते समय देव किस मंत्र का जाप करते हैं?

उत्तर: वे मुख्य रूप से णमोकार महामंत्र और अरहंत भगवान के गुणों को प्रकट करने वाले स्तोत्रों का पाठ करते हैं।

213. क्या नंदीश्वर द्वीप में कभी सूर्य अस्त होता है?

उत्तर: वहाँ दिन और रात का चक्र मनुष्यों जैसा नहीं होता। ज्योतिष विमानों के घूमने के बावजूद, मणियों के तीव्र प्रकाश के कारण वहाँ कभी अंधेरा नहीं होता।

214. नंदीश्वर द्वीप के मंदिरों के आगे जो 'मानस्तंभ' होते हैं, उन्हें देखकर देवों को क्या होता है?

उत्तर: मानस्तंभों के दर्शन मात्र से यदि किसी देव में अपने वैभव का थोड़ा भी अहंकार (मान) होता है, तो वह तुरंत गल जाता है और वह अत्यंत विनम्र हो जाता है।

215. क्या चारण ऋद्धिधारी मुनिराज वहाँ अकेले जाते हैं या संघ के साथ?

उत्तर: वे अकेले या अन्य ऋद्धिधारी मुनिराजों के छोटे समूह के साथ आकाश मार्ग से गमन करते हैं।

216. नंदीश्वर द्वीप की बावलियों के कमलों पर क्या देव विश्राम करते हैं?

उत्तर: हाँ, वे कमल इतने विशाल होते हैं कि उनके एक-एक दल (पंखुड़ी) पर कई देव-देवी आराम से बैठ सकते हैं।

217. क्या नंदीश्वर द्वीप के चैत्यालयों में कोई मुख्य प्रतिमा और छोटी प्रतिमा का भेद होता है?

उत्तर: नहीं, वेदी पर विराजमान सभी १०८ प्रतिमाएँ एक समान आकार, रूप और वैभव वाली होती हैं।

218. इन प्रतिमाओं की दृष्टि (नज़र) कहाँ टिकी होती है?

उत्तर: इनकी दृष्टि अपनी नासाग्र (नाक के अग्रभाग) पर टिकी होती है, जो पूर्ण अंतर्मुखता और आत्म-लीनता को दर्शाती है।

219. क्या नंदीश्वर द्वीप में काल परिवर्तन (उत्सर्पिणी-अवसपिणी) का असर होता है?

उत्तर: वहाँ मनुष्यों की तरह शारीरिक ऊँचाई या आयु घटने-बढ़ने वाला काल परिवर्तन (षट्काल) नहीं होता। वहाँ की व्यवस्था सदा शाश्वत और स्थिर रहती है।

220. नंदीश्वर द्वीप के बाहर जो 'नंदीश्वर समुद्र' है, उसका विस्तार कितना है?

उत्तर: उसका विस्तार नंदीश्वर द्वीप से दुगुना, अर्थात 327,68,00,000 योजन है।

221. अष्टान्हिका महापर्व के दिनों में जो 'अष्ट द्रव्य' चढ़ाए जाते हैं, उनमें 'चंदन' का क्या आध्यात्मिक महत्व है?

उत्तर: चंदन चढ़ते समय भावना भाई जाती है कि संसार की चिंताओं और कषायों की तपन से जलती हुई मेरी आत्मा को शीतल शांत पद प्राप्त हो।

222. 'अक्षत' चढ़ाने का क्या अर्थ है?

उत्तर: अक्षत (अखंड चावल) चढ़ाने का अर्थ है कि मुझे वह 'अक्षय' (कभी नष्ट न होने वाला) मोक्ष पद प्राप्त हो, जहाँ से दोबारा संसार में न आना पड़े।

223. क्या नंदीश्वर द्वीप की वंदना से 'मरण का भय' दूर होता है?

उत्तर: हाँ, जब जीव आत्मा की अमरता और अकृत्रिम शाश्वत तत्वों का विचार करता है, तो उसका मरण का भय स्वतः समाप्त हो जाता है।

224. अष्टान्हिका पर्व के दिनों में क्या व्यापारिक कार्य कम कर देने चाहिए?

उत्तर: हाँ, जहाँ तक संभव हो, आरंभ और परिग्रह (सांसारिक कार्यों) को सीमित कर पूरा समय आत्म-साधना और देव-शास्त्र-गुरु की भक्ति में लगाना चाहिए।

225. नंदीश्वर द्वीप के वनों में जो 'चैत्यवृक्ष' हैं, उनके नीचे क्या होता है?

उत्तर: उन वृक्षों के नीचे भी रत्नमयी वेदियाँ और जिन-प्रतिमाएँ स्थापित होती हैं, जहाँ बैठकर देव ध्यान लगाते हैं।

226. क्या नंदीश्वर द्वीप की प्रतिमाओं के होंठ खुले होते हैं?

उत्तर: नहीं, उनके होंठ पूर्णतः बंद होते हैं, जो मौन साधना और 'वचन गुप्ति' के परम आनंद को प्रदर्शित करते हैं।

227. इन चैत्यालयों की छतों पर जो ध्वजाएँ लहराती हैं, वे किस दिशा की हवा से हिलती हैं?

उत्तर: वे वहाँ बहने वाली अकृत्रिम, मन्द और सुगन्धित देव-पवनों के कारण हमेशा अत्यंत सुंदर ढंग से लहराती रहती हैं।

228. क्या नंदीश्वर द्वीप की रचना का ज्ञान होना 'सम्यग्ज्ञान' का अंग है?

उत्तर: हाँ, जैन भूगोल (लोक-लोकालोक) का यथार्थ ज्ञान होना सम्यग्ज्ञान के अंतर्गत 'लोकानुप्रेक्षा' नामक भावना को सुदृढ़ करता है।

229. यदि कोई मिथ्यादृष्टि जीव नंदीश्वर द्वीप के बारे में सुनता है, तो क्या उसे कोई लाभ होता है?

उत्तर: यदि वह श्रद्धापूर्वक इस अलौकिक रचना को सुनता है, तो उसके मन का मिथ्या अहंकार टूटता है और उसे सम्यक्त्व (सच्ची श्रद्धा) की पात्रता प्राप्त हो सकती है।

230. नंदीश्वर द्वीप के मंदिरों के प्रवेश द्वार पर कौन-से शुभ मंगल चिह्न बने होते हैं?

उत्तर: स्वस्तिक, श्रीवत्स, नंद्यावर्त, वर्धमानक (पुशकर), कलश, मत्स्ययुग्म और दर्पण।

231. क्या इन मंदिरों के अंदर धूप चढ़ाने से धुआं होता है?

उत्तर: वहाँ जो अकृत्रिम धूपघट होते हैं, उनसे केवल परम सुगंधित वाष्प निकलती है, जिससे आँखों में जलन या कोई धुआं या कालिख नहीं जमती।

232. नंदीश्वर द्वीप के मंदिरों के खंभों पर जो नक्काशी होती है, वह कैसी होती है?

उत्तर: वह अकृत्रिम रूप से ऐसी सुंदर और बारीक मणियों की जनावट होती है जिसे तीन लोक का कोई भी कलाकार सोच भी नहीं सकता।

233. इन प्रतिमाओं के बैठने का आधार (आसन) कैसा होता है?

उत्तर: वे एक अत्यंत सुंदर रत्नमयी सिंहसन और कमलासन पर विराजमान होती हैं।

234. क्या नंदीश्वर द्वीप में कोई चैत्यालय छोटा या बड़ा है?

उत्तर: ५२ पर्वतों के आकार में अंतर है (अंजनगिरि सबसे ऊँचे, फिर दधिमुख, फिर रतिकर), लेकिन उनके शिखर पर बने सभी ५२ चैत्यालय और प्रतिमाएँ आकार में बिल्कुल समान हैं।

235. 'हरिवंश पुराण' में नंदीश्वर द्वीप के बारे में क्या विशेष उल्लेख मिलता है?

उत्तर: उसमें बताया गया है कि पूर्व काल के राजा और चक्रवर्ती अष्टान्हिका पर्व के दिनों में अपनी सेना सहित मानुषोत्तर पर्वत के तट पर आकर, वहाँ से नंदीश्वर द्वीप की दिशा में मुँह करके भाव-वंदना और महापूजा का आयोजन करते थे।

236. नंदीश्वर द्वीप विधान में 'अर्घावलि' का क्या महत्व है?

उत्तर: एक-एक करके श्रद्धापूर्वक अर्घ्य समर्पित करने से आत्मा के परिणाम उत्तरोत्तर विशुद्ध होते जाते हैं।

237. क्या इन प्रतिमाओं के दर्शन से 'करुणा भाव' जाग्रत होता है?

उत्तर: हाँ, भगवान की परम वीतरागी और शांत मुद्रा को देखकर जीव के भीतर सभी प्राणियों के प्रति दया और करुणा का भाव उमड़ पड़ता है।

238. क्या नंदीश्वर द्वीप में कभी बिजली चमकती है या बादल गरजते हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ का मौसम हमेशा परम शांत, स्थिर और अनुकूल रहता है। वहाँ भय पैदा करने वाली कोई प्राकृतिक घटना नहीं होती।

239. इन चैत्यालयों की सीढ़ियों के दोनों ओर क्या बना होता है?

उत्तर: सीढ़ियों के दोनों ओर मणियों के सुंदर हाथी और सिंह की अकृत्रिम आकृतियाँ बनी होती हैं जो पहरेदारों जैसी प्रतीत होती हैं।

240. नंदीश्वर द्वीप का क्षेत्रफल पूरे मध्यलोक का कितना हिस्सा है?

उत्तर: मध्यलोक के असंख्य द्वीपों में यह आठवाँ है, गणित के अनुसार यह अपने से पहले के सभी द्वीपों और समुद्रों के कुल क्षेत्रफल से भी बड़ा है।

241. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में उपवास रखना जरूरी है?

उत्तर: शक्ति के अनुसार उपवास, बेला, तेला या एकासन करना चाहिए। यदि शारीरिक असमर्थता हो, तो अल्पाहार लेकर पूरा समय भक्ति और स्वाध्याय में लगाना चाहिए।

242. नंदीश्वर द्वीप के वनों में जो नदियाँ या झरने प्रतीकात्मक रूप से देव बनाते हैं, उनका जल कैसा होता है?

उत्तर: वह जल मणियों की किरणों से बना होता है जो बहते हुए पानी जैसा आनंद देता है।

243. क्या इन अकृत्रिम प्रतिमाओं के चेहरे पर कभी उदासी या क्रोध का भाव आ सकता है?

उत्तर: कभी नहीं। ये प्रतिमाएँ वीतरागता की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं, इनके चेहरे पर सदा अनंत सुख और परम शांति का ही भाव रहता है।

244. नंदीश्वर द्वीप का स्मरण करते समय हमें अपने मन को कहाँ एकाग्र करना चाहिए?

उत्तर: हमें अपने मन के भीतर यह सोचना चाहिए कि मैं स्वयं अपने ढाई द्वीप के चैत्यालय में बैठकर, अपनी आत्मा के भीतर विराजमान सिद्ध स्वरूप की वंदना कर रहा हूँ।

245. इन चैत्यालयों के मुख्य द्वारों पर जो परदे (किवाड़) होते हैं, वे किसके बने होते हैं?

उत्तर: वे वज्र रत्न के पारदर्शी और अत्यंत मजबूत पल्लों के बने होते हैं, जो हमेशा खुले ही रहते हैं।

246. क्या नंदीश्वर द्वीप की वंदना से 'संसार की असारता' का बोध होता है?

उत्तर: बिल्कुल। जब हम देखते हैं कि स्वर्ग के इंद्र भी अपना सारा राजपाठ और सुख छोड़कर भगवान की वंदना के लिए दौड़े आते हैं, तो समझ आता है कि धर्म ही इस संसार में एकमात्र सच्चा सुख है।

247. नंदीश्वर द्वीप के अकृत्रिम जिनालयों के ऊपर जो ध्वजाएँ उड़ती हैं, उनकी कुल संख्या कितनी है?

उत्तर: प्रत्येक मंदिर पर सैकड़ों छोटी-बड़ी ध्वजाएँ होती हैं, जो पूरे आकाश को सतरंगी बना देती हैं।

248. क्या नंदीश्वर द्वीप विधान करने से 'घर में सुख-शांति' आती है?

उत्तर: हाँ, जहाँ भगवान की वीतरागी वाणी और अकृत्रिम तीर्थों का गुणगान होता है, वहाँ का वातावरण स्वतः ही सकारात्मक और मांगलिक हो जाता है।

249. नंदीश्वर द्वीप के इन ५२ चैत्यालयों का अस्तित्व कब तक रहेगा?

उत्तर: जब तक यह लोक (ब्रह्मांड) रहेगा, तब तक इन चैत्यालयों का अस्तित्व रहेगा। ये अनादि-निधन (शाश्वत) हैं।

250. नंदीश्वर द्वीप की इस संपूर्ण २५० प्रश्नों की प्रश्नोत्तरी को पढ़ने का अंतिम फल क्या है?

उत्तर: इसका अंतिम और परम फल यही है कि जीव का जिनशासन और जैन भूगोल के प्रति विश्वास दृढ़ हो, कषायें मंद हों, महान पुण्य का संचय हो और अंततः जीव रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र) को प्राप्त कर मोक्ष पद को प्राप्त करे।

नंदीश्वर द्वीप की अलौकिक महिमा, वहाँ के सूक्ष्म गणित, पर्वतों की अगाध आंतरिक संरचना और आचार्यों द्वारा प्रतिपादित गूढ़ सिद्धांतों को और अधिक गहराई से समझने के लिए, यहाँ दिगंबर जैन आगम ग्रंथों (जैसे तिलोयपण्णत्ती, त्रिलोकसार, और महाबंध) के आधार पर 100 और विशेष (कुल 350) प्रश्न-उत्तर दिए जा रहे हैं:

## खंड 11: पर्वतों का सूक्ष्म गणित और विस्तार (प्रश्न 251-275)

251. चारों अंजनगिरि पर्वतों का आकार क्या ऊपर से नीचे तक बिल्कुल एक जैसा गोल है?

उत्तर: हाँ, ये पर्वत नीचे (जड़ में), मध्य में और शिखर पर हर जगह १०,००० योजन के समान व्यास (चौड़ाई) वाले हैं। इनका आकार एक विशाल रत्नमयी सीधे बेलन (Cylinder) जैसा है।

252. दधिमुख पर्वत का व्यास (चौड़ाई) नीचे और ऊपर में कितना अंतर रखता है?

उत्तर: दधिमुख पर्वत अपनी जड़ के पास १०,००० योजन चौड़े हैं, मध्य में वे धीरे-धीरे संकरे होते हैं और शिखर पर पहुँचकर उनका व्यास केवल ४,००० योजन रह जाता है।

253. रतिकर पर्वत का व्यास शिखर पर कितना होता है?

उत्तर: रतिकर पर्वत अपनी जड़ में १०,००० योजन चौड़े होते हैं और ऊपर चोटी पर उनका विस्तार केवल १,००० योजन रह जाता है।

254. नंदीश्वर द्वीप की १६ बावलियों का कुल क्षेत्रफल कितना बैठता है?

उत्तर: प्रत्येक बावली १,००,००० योजन लंबी और १,००,००० योजन चौड़ी है, अर्थात प्रत्येक बावली का धरातल १०,००,००,००,००० (दस अरब) वर्ग योजन का एक विशाल चौकोर क्षेत्र बनता है।

255. पूर्व दिशा के अंजनगिरि पर्वत के उत्तर में जो बावली है, उसका विशेष नाम क्या है?

उत्तर: उसे 'अरिष्टा' या 'नंदिषेणा' की उप-बावली कहा जाता है।

256. क्या इन ५२ पर्वतों के अलावा नंदीश्वर द्वीप की भूमि समतल है?

उत्तर: हाँ, इन ५२ पर्वतों और वनों के स्थानों को छोड़कर बाकी की पूरी भूमि दर्पण के समान समतल, स्वच्छ और रत्नमयी है।

257. क्या इन पर्वतों की चोटियों पर देवों के महल भी बने होते हैं?

उत्तर: ५२ मुख्य पर्वतों के शिखर पर केवल और केवल अकृत्रिम चैत्यालय होते हैं। देवों के महल या क्रीड़ा स्थान अन्य उप-पर्वतों पर होते हैं।

258. अंजनगिरि पर्वत का मूल आधार किस रत्न से बना है?

उत्तर: इसका मूल आधार 'नीलांजन' (नीलमणि) से बना है, जिससे इसकी काली आभा अत्यंत चमकदार और गहरे रंग की दिखाई देती है।

259. दधिमुख पर्वत के पत्थरों की चमक कैसी होती है?

उत्तर: इसके पत्थर 'हंसवर्ण' (बिल्कुल सफेद स्फटिक) के होते हैं, जिनसे निकलने वाला प्रकाश चंद्रमा की चांदनी को भी फीका कर देता है।

260. रतिकर पर्वत की प्रभा (चमक) को क्या नाम दिया गया है?

उत्तर: इसकी प्रभा को 'तपनीय सुवर्ण प्रभा' कहा जाता है, जो पिघले हुए लाल-पीले सोने जैसी तेजस्वी होती है।

261. नंदीश्वर द्वीप में कुल कितने 'चैत्यद्रुम' (मुख्य पूज्य वृक्ष) हैं?

उत्तर: प्रत्येक चैत्यालय के बाहर चारों दिशाओं में चार मुख्य चैत्यवृक्ष होते हैं, इस प्रकार कुल 52 \times 4 = 208 मुख्य चैत्यवृक्ष वहाँ स्थित हैं।

262. इन चैत्यवृक्षों की ऊँचाई कितनी होती है?

उत्तर: ये वृक्ष कई योजन ऊँचे होते हैं और इनके नीचे भी रत्नमयी जिनप्रतिमाएँ विराजमान होती हैं।

263. क्या नंदीश्वर द्वीप में मनुष्यों की तरह नदियाँ आकर समुद्र में मिलती हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ कोई सांसारिक नदी नहीं बहती। जल के स्थिर स्रोत के रूप में केवल वे १६ महा-बावलियाँ ही हैं।

264. दधिमुख पर्वत बावलियों के जल से कितने ऊपर उठे हुए हैं?

उत्तर: बावलियों की गहराई १,००० योजन है और दधिमुख पर्वत की कुल ऊँचाई ६४,००० योजन है, इसलिए वे जलस्तर से ६३,००० योजन ऊपर आकाश में दिखाई देते हैं।

265. रतिकर पर्वत भूमि से कितने ऊपर उठे हुए हैं?

उत्तर: रतिकर पर्वत की कुल ऊँचाई १०,००० योजन है और वे सीधे समतल भूमि से ऊपर आकाश की ओर उठे हुए हैं।

266. क्या इन पर्वतों पर चढ़ने के लिए कृत्रिम लिफ्ट या कोई साधन होता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ आने वाले देवों के पास 'आकाशगामी' ऋद्धि होती है, जिससे वे सीधे उड़कर शिखर पर पहुँच जाते हैं।

267. इन ५२ मंदिरों के चारों ओर जो परकोटा (बाउंड्री वॉल) होता है, वह किसका बना होता है?

उत्तर: वह परकोटा 'तपनीय मणि' का बना होता है, जो पूरे मंदिर को चारों ओर से सुरक्षित घेरे रहता है।

268. मंदिरों के गोपुर (प्रवेश द्वारों) पर जो घंटियाँ लटकी होती हैं, उनकी आवाज कहाँ तक जाती है?

उत्तर: उनकी मधुर और अलौकिक ध्वनि कई योजन दूर तक स्पष्ट सुनाई देती है, जिससे देवों को मंदिर की दिशा का ज्ञान होता है।

269. क्या नंदीश्वर द्वीप में कभी कल्पवृक्षों से वस्त्र या भोजन मिलता है?

उत्तर: कल्पवृक्षों की मुख्य रचना भोगभूमि और स्वर्गों में होती है। नंदीश्वर द्वीप के चैत्यवृक्ष केवल धार्मिक और पूजनीय होते हैं, वहाँ देव भोजन आदि की इच्छा से नहीं आते।

270. अंजनगिरि पर्वत के ठीक शिखर के मध्य में चैत्यालय किस प्रकार स्थित है?

उत्तर: शिखर का विस्तार १०,००० योजन है, और मंदिर केवल १०० योजन लंबा-चौड़ा है, इसलिए मंदिर के चारों ओर हजारों योजन का विशाल खुला प्रांगण (मैदान) छूटा रहता है।

271. क्या नंदीश्वर द्वीप का क्षेत्रफल हमेशा स्थिर रहता है?

उत्तर: हाँ, इसका क्षेत्रफल न कभी संकुचित होता है और न कभी फैलता है। यह शाश्वत काल से एक समान है।

272. क्या जैन आगम में नंदीश्वर द्वीप की कोई अन्य उपमा दी गई है?

उत्तर: इसे 'देवों की धर्मनगरी' और 'त्रिलोक का हृदय' भी कहा गया है।

273. बावलियों के सरोवरों के चारों ओर जो सीढ़ियाँ हैं, उनका रंग कैसा है?

उत्तर: वे सीढ़ियाँ रंग-बिरंगी मणियों (जैसे मूंगा, पन्ना, हीरा) से बनी हैं, जिससे घाट अत्यंत सुंदर दिखते हैं।

274. क्या इन ५२ पर्वतों के शिखरों पर कभी बादल छाते हैं?

उत्तर: नहीं, ये पर्वत बादलों के घेरे से बहुत ऊपर, परम स्वच्छ आकाश में स्थित हैं।

275. नंदीश्वर द्वीप के अकृत्रिम मंदिरों के स्तंभों (खंभों) की कुल संख्या एक मंदिर में कितनी होती है?

उत्तर: प्रत्येक मंदिर में सैकड़ों की संख्या में मणिमय स्तंभ होते हैं, जो मंदिर की विशाल छत को थामे रहते हैं।

## खंड 12: चैत्यालयों की आंतरिक सज्जा और रचना (प्रश्न 276-300)

276. प्रत्येक चैत्यालय के गर्भगृह में वेदी के ऊपर जो 'छत्र' होते हैं, वे तीन ही क्यों होते हैं?

उत्तर: तीन छत्र भगवान के 'त्रिलोकपति' (तीन लोक के स्वामी) होने और रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र) के पूर्ण वैभव को दर्शाते हैं।

277. क्या इन मंदिरों के फर्श पर कोई कालीन या चटाई बिछाई जाती है?

उत्तर: नहीं, स्फटिक मणि का फर्श स्वयं इतना कोमल, शीतल और साफ होता है कि वहाँ किसी कृत्रिम बिछौने की आवश्यकता नहीं होती।

278. मंदिरों के अंदर जो 'धूपघट' (धूपदानी) होते हैं, वे किसके बने होते हैं?

उत्तर: वे 'तपनीय स्वर्ण' के बने होते हैं और उनमें से अनादि काल से स्वतः ही दिव्य सुगंध निकलती रहती है।

279. भगवान की प्रतिमाओं के कानों में जो कुंडल जैसी आकृति अकृत्रिम रूप से होती है, वह क्या दर्शाती है?

उत्तर: वह भगवान के दीक्षा लेने से पूर्व के राजसी वैभव और दीक्षा के बाद की परम वीतरागता के सहज अतिशय को दर्शाती है।

280. क्या इन ५२ मंदिरों के अंदर कोई खिड़कियाँ (झरोखे) होती हैं?

उत्तर: हाँ, मंदिरों की दीवारों में मणियों के जालीदार सुंदर झरोखे बने होते हैं, जिनसे बाहर के दिव्य वनों का दृश्य दिखाई देता है।

281. प्रत्येक प्रतिमा के सामने जो 'अंजलिबद्ध' (हाथ जोड़े) देवों की आकृतियाँ होती हैं, वे किसकी होती हैं?

उत्तर: वे अकृत्रिम रूप से बनी हुई द्वारपाल और प्रतिहार देवों की रत्नमयी मूर्तियाँ होती हैं।

282. मंदिरों के मुख्य द्वार के ऊपर जो 'तोरण' लहराते हैं, उनमें कौन-से रत्न मुख्य होते हैं?

उत्तर: उनमें पद्मराग और वैडूर्य मणि मुख्य रूप से जड़े होते हैं, जो लाल और नीली किरणें बिखेरते हैं।

283. क्या इन मंदिरों में कोई 'अभिषेक पीठ' (जहाँ अभिषेक का जल इकट्ठा होता है) होती है?

उत्तर: हाँ, वेदी के पास एक अत्यंत सुंदर अकृत्रिम अभिषेक पीठ बनी होती है, जहाँ देवों द्वारा किया गया अभिषेक का जल स्वतः विलीन हो जाता है।

284. क्या इन ५२ जिनालयों में चौबीस तीर्थंकरों के नाम की वेदी होती है?

उत्तर: नहीं, यहाँ की वेदी पर सभी १०८ प्रतिमाएँ सामान्य 'अरहंत' स्वरूप में एक साथ विराजमान होती हैं, यहाँ नाम का भेद नहीं होता।

285. प्रतिमाओं के मस्तक (सिर) पर बाल की आकृति कैसी होती है?

उत्तर: उनके मस्तक पर अकृत्रिम रूप से सुंदर नीले रंग के घुँघराले बालों की दक्षिणवर्ती (Right-turned) आकृति बनी होती है।

286. मंदिरों के प्रेक्षागृह (Auditorium) का विस्तार कितना होता है?

उत्तर: प्रेक्षागृह कई योजन लंबा-चौड़ा होता है, जहाँ हजारों देव एक साथ बैठकर भक्ति नृत्य देख सकते हैं।

287. संगीतशाला में रखे हुए अकृत्रिम वाद्य यंत्र (जैसे मृदंग, वीणा) कैसे बजते हैं?

उत्तर: जब देव अपनी भक्ति के अनुराग में आते हैं, तो वे वाद्य यंत्र उनकी दिव्य शक्ति और पवन के वेग से स्वतः ही अत्यंत सुरीली तान छेड़ने लगते हैं।

288. क्या इन मंदिरों के शिखरों पर कोई 'ध्वजदंड' (झंडे का डंडा) होता है?

उत्तर: हाँ, प्रत्येक शिखर पर एक विशाल और मजबूत रत्नमयी ध्वजदंड होता है, जिस पर मुख्य महाध्वजा लहराती है।

289. मंदिरों की छतों से जो मोतियों के झुमके लटकते हैं, वे रात में कैसे दिखते हैं?

उत्तर: वे झुमके अंधकार न होने के कारण चौबीसों घंटे टिमटिमाते तारों के समान चमकते रहते हैं।

290. क्या इन मंदिरों के अंदर किसी प्रकार की सांसारिक ध्वनि (शोर) होती है?

उत्तर: नहीं, वहाँ केवल सामवेद जैसी शांत स्तुतियाँ, मंत्रोच्चार और मांगलिक वाद्य यंत्रों की ही ध्वनि होती है।

291. वेदी के चारों ओर जो 'तीन कटनी' (चबूतरे) होते हैं, उनका क्या महत्व है?

उत्तर: वे भगवान की उच्चता और समवशरण की पीठिका के समान पवित्रता का प्रतीक हैं।

292. क्या इन प्रतिमाओं के वक्षस्थल (छाती) पर 'श्रीवत्स' का चिह्न होता है?

उत्तर: हाँ, सभी दिगंबर प्रतिमाओं की छाती के बिल्कुल बीच में अकृत्रिम रूप से 'श्रीवत्स' का पवित्र चिह्न अंकित होता है, जो अनंत ज्ञान और लक्ष्मी का प्रतीक है।

293. प्रतिमाओं की उंगलियों की बनावट कैसी होती है?

उत्तर: उनकी उंगलियाँ अत्यंत सुडौल, लंबी और कमल की पंखुड़ियों के समान कोमल तथा व्यवस्थित होती हैं।

294. क्या इन ५२ चैत्यालयों में कोई 'ज्ञान भंडार' या लिपिबद्ध शास्त्र होते हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ कागज़ या ताड़पत्र के शास्त्र नहीं होते, क्योंकि देवों का ज्ञान सीधे अवधिज्ञान या आगम के स्मरण से संचालित होता है।

295. चैत्यालय के मुख्य द्वार की देहली (चौखट) किस रत्न की बनी होती है?

उत्तर: वह 'वज्ररत्न' (हीरे) की बनी होती है, जिसे देव अत्यंत श्रद्धा से झुककर स्पर्श करते हैं।

296. क्या मंदिरों के प्रांगण में कोई 'नाट्य मंच' भी बना होता है?

उत्तर: हाँ, प्रेक्षागृह के बीच में एक विशाल रत्नमयी रंगमंच बना होता है, जहाँ इंद्र स्वयं नृत्य प्रस्तुत करता है।

297. क्या इन मंदिरों के ऊपर कभी कौवे या अन्य पक्षी बैठते हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ कोई अशुचि या तिर्यंच पक्षी नहीं होते; केवल देवों के विमान ही आकाश में परिक्रमा लगाते हैं।

298. मंदिरों की दीवारों पर जो चित्रकारी जैसी प्राकृतिक रचना है, उसमें क्या दिखाई देता है?

उत्तर: उसमें तीर्थंकरों के पूर्व जन्मों के वैराग्य प्रसंग और मोक्ष गमन की सुंदर आकृतियाँ स्वतः मणियों के रंगों से उभरी होती हैं।

299. गर्भगृह के अंदर का तापमान कैसा रहता है?

उत्तर: मणियों के प्रभाव से वहाँ का तापमान हमेशा एक समान, सुखद और अत्यंत वातानुकूलित (नातिशीतोष्ण) रहता है।

300. नंदीश्वर द्वीप के एक भी चैत्यालय का दर्शन साक्षात न मिलने पर श्रावक को क्या चिंतन करना चाहिए?

उत्तर: श्रावक को सोचना चाहिए कि "बाहरी आँखें भले ही नंदीश्वर न देख पाएं, लेकिन मेरा आत्म-स्वभाव स्वयं एक परम चैत्यालय है, मैं अंतर्मुख होकर उसी के दर्शन करूँ।"

## खंड 13: आगम ग्रंथ, तिथियाँ और व्रत विधान (प्रश्न 301-325)

301. दिगंबर परंपरा में अष्टान्हिका पर्व के अंत में कौन-सा मुख्य दान सबसे उत्तम माना गया है?

उत्तर: शास्त्र दान (ज्ञान दान) और मुनिराजों को आहार दान देना इस पर्व के अंत में परम कल्याणकारी माना गया है।

302. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में नए दिगंबर मुनि की दीक्षा हो सकती है?

उत्तर: हाँ, इन पवित्र दिनों में दीक्षा लेना अत्यंत शुभ और वैराग्य को बढ़ाने वाला माना जाता है।

303. 'षट्खंडागम' ग्रंथ के अनुसार, नंदीश्वर द्वीप की वंदना का जीवों के परिणामों पर क्या असर पड़ता है?

उत्तर: इससे जीवों के असंख्यात गुणी कर्मों की निर्जरा होती है और उनके परिणाम 'विशुद्ध' से 'परम विशुद्ध' की ओर बढ़ते हैं।

304. नंदीश्वर द्वीप विधान में जो ५२ दीप जलाए जाते हैं, वे क्या दर्शाते हैं?

उत्तर: वे ५२ दीप नंदीश्वर द्वीप के ५२ पर्वतों पर जलने वाले अकृत्रिम चैत्यालयों के शाश्वत प्रकाश का प्रतीक हैं।

305. कार्तिक मास की अष्टान्हिका को सबसे मुख्य क्यों माना जाता है?

उत्तर: क्योंकि शरद ऋतु के इस समय में देवों का आगमन अत्यंत भव्य होता है और मनुष्यों के लिए भी यह समय साधना के अनुकूल होता है।

306. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में घरों में रंगोली या मांडने बनाए जाते हैं?

उत्तर: हाँ, घरों और मंदिरों के आंगन में अष्टमंगल और नंदीश्वर द्वीप के आकार के मांडने (चौक) बनाए जाते हैं।

307. 'नंदीश्वर भक्ति' नामक स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

उत्तर: दिगंबर जैन परंपरा में पूज्यपाद स्वामी और अन्य प्राचीन आचार्यों ने 'नंदीश्वर भक्ति' और 'चैत्य भक्ति' के अंतर्गत इसके सुंदर पाठ लिखे हैं।

308. विधान के समय जो 'अर्घ्य' चढ़ाया जाता है, उसे हाथ में कैसे लिया जाता है?

उत्तर: दोनों हाथों की अंजलि में अष्टद्रव्य (चावल, बादाम, लौंग आदि) लेकर, अत्यंत विनीत भाव से मस्तक से लगाकर अर्घ्य समर्पित किया जाता है।

309. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में किसी प्रकार का सांसारिक उत्सव (जैसे विवाह) वर्जित है?

उत्तर: जैन श्रावकों के लिए इन ८ दिनों में पूर्णतः धार्मिक वातावरण रखना अनिवार्य होता है, इसलिए वे सांसारिक तड़क-भड़क और विवाह आदि कार्यों से बचते हैं।

310. नंदीश्वर द्वीप की रचना का मॉडल (कृत्रिम प्रतिकृति) सबसे पहले किस राजा ने बनवाई थी?

उत्तर: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भरत चक्रवर्ती ने अयोध्या में और अन्य महान राजाओं ने अपने-अपने राज्यों में इसकी पहली कृत्रिम रचनाएँ बनवाई थीं।

311. क्या अष्टान्हिका व्रत रखने से 'साता वेदनीय' कर्म का बंध होता है?

उत्तर: हाँ, भगवान की भक्ति और संयम से साता वेदनीय (सुख देने वाले कर्म) और उच्च गोत्र का बंध सहज ही होता है।

312. विधान के दिनों में जो 'स्वाध्याय' (ग्रंथ पढ़ना) किया जाता है, उसके लिए कौन-से ग्रंथ उत्तम हैं?

उत्तर: तत्त्वार्थसूत्र, द्रव्यसंग्रह, समयसार और त्रिलोकसार जैसे ग्रंथों का स्वाध्याय इन दिनों में विशेष फलदाई है।

313. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'सामायिक' का समय बढ़ा देना चाहिए?

उत्तर: हाँ, साधारण दिनों में की जाने वाली सामायिक (आत्म-चिंतन) का समय इन दिनों में सुबह, दोपहर और शाम को बढ़ा देना चाहिए।

314. नंदीश्वर द्वीप की ५६१६ प्रतिमाओं को सामूहिक रूप से क्या कहा जाता है?

उत्तर: इन्हें 'नंदीश्वर द्वीप के महा-जिनबिंब' कहा जाता है।

315. क्या अष्टान्हिका पर्व के व्रत का उद्यापन (समापन उत्सव) करना जरूरी है?

उत्तर: जब कोई श्रावक लगातार कई वर्षों तक यह व्रत पूर्ण कर लेता है, तो वह समाज के साथ मिलकर बड़े स्तर पर विधान और प्रभावना करके इसका उद्यापन करता है।

316. विधान के मांडले में 'पीला रंग' किस द्रव्य का प्रतीक माना जाता है?

उत्तर: पीला रंग मुख्य रूप से केसर और चंदन की शुद्धता तथा सोने जैसी मूल्यवान आत्मा का प्रतीक है।

317. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'उपवास' के समय पानी पिया जा सकता है?

उत्तर: दिगंबर परंपरा में पूर्ण उपवास (प्रोषध) में जल का भी त्याग होता है। यदि सामर्थ्य न हो, तो केवल गर्म मर्यादित जल का प्रयोग दिन में एक या दो बार किया जा सकता है।

318. 'नंदीश्वर जयमाला' को पढ़ते समय आँखों में आँसू आने का क्या कारण है?

उत्तर: यह भगवान के प्रति उमड़ने वाले 'प्रशस्त राग' और तीव्र भक्ति का अतिशय है, जो आत्मा को भावविभोर कर देता है।

319. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में जैन पाठशालाओं में विशेष प्रतियोगिताएँ होती हैं?

उत्तर: हाँ, बच्चों को जैन भूगोल और नंदीश्वर द्वीप की जानकारी देने के लिए प्रश्नोत्तरी और चित्रकला प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं।

320. इस पर्व के दिनों में 'क्षमावाणी' जैसा कोई प्रसंग होता है?

उत्तर: यद्यपि मुख्य क्षमावाणी दशलक्षण पर्व के बाद आती है, लेकिन अष्टान्हिका के समापन पर भी जीव सभी प्राणियों से अपने अपराधों की क्षमा मांगता है।

321. क्या नंदीश्वर द्वीप की रचना में कोई 'सिद्धशिला' दिखाई जाती है?

उत्तर: नहीं, सिद्धशिला लोक के बिल्कुल अंत में (ऊपर) है। नंदीश्वर द्वीप मध्यलोक (नीचे) का हिस्सा है, इसलिए यहाँ केवल अरहंत प्रतिमाएँ ही होती हैं।

322. नंदीश्वर द्वीप की पूजा से हमारी 'अध्यात्म यात्रा' कैसे शुरू होती है?

उत्तर: जब हम बाहरी पुद्गल रचनाओं की विशालता देखते हैं, तो हमें अपनी आत्मा की अनंत शक्तियों का अहसास होता है, जो इस पूरे ब्रह्मांड को जान सकती है।

323. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में मंदिरों में विशेष 'आरती' उतारी जाती है?

उत्तर: हाँ, शाम के समय दीपकों की सुंदर थाली सजाकर, ५२ जिनालयों के नाम की महाआरती की जाती है।

324. दिगंबर जैन मुनिराज नंदीश्वर द्वीप का ध्यान किस मुद्रा में करते हैं?

उत्तर: वे अधिकतर कायोत्सर्ग (खड़े होकर ध्यान) या पद्मासन मुद्रा में बैठकर अंतर्मुख होकर इसका स्मरण करते हैं।

325. नंदीश्वर द्वीप का ज्ञान हमें किस 'अज्ञान' से बचाता है?

उत्तर: यह हमें इस अज्ञान से बचाता है कि यह संसार केवल उतना ही है जितना हमें आँखों से दिखता है। यह हमें ब्रह्मांड की अनंतता और जैन दर्शन की वैज्ञानिकता से परिचित कराता है।

## खंड 14: परम तत्व और मोक्ष मार्ग का अन्वेषण (प्रश्न 326-350)

326. क्या नंदीश्वर द्वीप की मूर्तियाँ कभी बूढ़ी या पुरानी दिखती हैं?

उत्तर: नहीं, वे अकृत्रिम और शाश्वत रत्नों की हैं, इसलिए वे हमेशा 'नूतन' (बिल्कुल नई और युवा) ही दिखाई देती हैं।

327. मंदिरों के प्रांगण में जो 'चैत्यवृक्ष' होते हैं, क्या उनके पत्ते कभी गिरते हैं?

उत्तर: नहीं, उनके पत्ते और डालियाँ वज्र के समान मजबूत और रत्नमयी होती हैं, जो हमेशा स्थिर रहती हैं।

328. क्या नंदीश्वर द्वीप की पूजा करने वाले जीव को नियम से 'देव गति' ही मिलती है?

उत्तर: यदि परिणाम विशुद्ध और सम्यक्त्व सहित हों, तो वह जीव नियम से उत्तम देव गति या मनुष्य गति प्राप्त कर परंपरा से मोक्ष जाता है।

329. नंदीश्वर द्वीप के चारों कोनों की बावलियों के बीच जो 'दधिमुख पर्वत' हैं, क्या उनके शिखरों पर भी मानस्तंभ होते हैं?

उत्तर: मुख्य मानस्तंभ अंजनगिरि और रतिकर के आसपास विशेष रूप से दिखाई देते हैं, जो देवों के मान का मर्दन करते हैं।

330. क्या नंदीश्वर द्वीप की हवा में कभी कोई बीमारी (वायरस) फैल सकती है?

उत्तर: नहीं, वह देवलोक की भूमि के समान पवित्र है। वहाँ कोई बीमारी, बुढ़ापा या अकाल मृत्यु जैसी सांसारिक बाधाएँ नहीं होतीं।

331. इन ५२ मंदिरों के गर्भगृह के मुख्य कलश का आकार कितना बड़ा होता है?

उत्तर: वह कलश कई योजन ऊँचा और स्वर्णमयी होता है, जो दूर आकाश से ही चमकता हुआ दिखाई देता है।

332. क्या नंदीश्वर द्वीप की जिनप्रतिमाओं के नेत्र बंद होते हैं?

उत्तर: उनके नेत्र पूर्णतः बंद नहीं होते, वे 'अर्धोन्मीलित' (आधे खुले और आधे बंद) होते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि भगवान न तो सो रहे हैं और न ही बाहर की दुनिया को देख रहे हैं, वे केवल अपनी आत्मा को देख रहे हैं।

333. क्या इन मंदिरों में कोई पुजारी या नौकर होता है जो साफ-सफाई करे?

उत्तर: नहीं, वहाँ किसी नौकर की आवश्यकता नहीं होती। वहाँ की भूमि का अतिशय ही ऐसा है कि वहाँ कभी कोई धूल या गंदगी जमा ही नहीं हो सकती।

334. जब देव पूजा करते हैं, तो क्या वे किसी पुस्तक को देखकर पढ़ते हैं?

उत्तर: नहीं, देवों का ज्ञान और स्मरण इतना तीव्र होता है कि उनके कंठ से स्वतः ही सुंदर और छंदोबद्ध स्तुतियाँ अविरल धारा के रूप में निकलती हैं।

335. नंदीश्वर द्वीप के वनों में जो 'अशोक वृक्ष' हैं, उनका क्या महत्व है?

उत्तर: 'अशोक' का अर्थ है जहाँ कोई शोक (दुःख) न हो। उन वृक्षों के नीचे बैठने से ही देवों के मन के सारे व्याकुलता जन्य दुःख दूर हो जाते हैं।

336. क्या नंदीश्वर द्वीप की धरती पर कभी सूर्य की तीव्र गर्मी (धूप) से जलन होती है?

उत्तर: नहीं, वहाँ की सुवर्णमयी भूमि और मणियाँ सूर्य की किरणों को शांत और शीतल प्रकाश में बदल देती हैं।

337. इन ५२ मंदिरों की वेदी पर जो १०८ प्रतिमाएँ हैं, क्या वे एक लाइन में होती हैं या गोल घेरे में?

उत्तर: वे अत्यंत व्यवस्थित रूप से तीन या चार कतारों (पंक्तियों) में, वेदी के आकार के अनुसार परम सुंदर ढंग से विराजमान होती हैं।

338. क्या नंदीश्वर द्वीप का ज्ञान प्राप्त करने के बाद जीव का 'संसार' सिमट जाता है?

उत्तर: हाँ, जब जीव वीतरागी भावों से ओतप्रोत इस परम शाश्वत तीर्थ का चिंतन करता है, तो उसके संसार भ्रमण के काल की स्थिति बहुत छोटी रह जाती है।

339. अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'अष्टान्हिका कथा' सुनने का क्या महत्व है?

उत्तर: कथा सुनने से पूर्वकाल के उन राजाओं और जीवों के चरित्र का पता चलता है जिन्होंने इस व्रत का पालन कर मोक्ष पद प्राप्त किया, जिससे हमें भी प्रेरणा मिलती है।

340. क्या नंदीश्वर द्वीप के चैत्यालयों के कलशों पर कोई ध्वजा हमेशा पूर्व दिशा की ओर ही उड़ती है?

उत्तर: हवा के रुख के अनुसार ध्वजाएँ लहराती हैं, परंतु वे हमेशा ऊपर की ओर उठती हुई ऐसी लगती हैं मानो मोक्ष मार्ग की उच्चता का संदेश दे रही हों।

341. क्या नंदीश्वर द्वीप की वंदना से 'अनंत अनुबंधी' कषाय का नाश हो सकता है?

उत्तर: तीव्र संवेग और विशुद्धि के परिणाम होने पर सम्यक्त्व की प्राप्ति के साथ ही अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ का उपशम या क्षय हो जाता है।

342. नंदीश्वर द्वीप की पूजा के अंत में जो 'शांतिपाठ' किया जाता है, उसकी क्या भावना होती है?

उत्तर: उसकी भावना होती है कि—"हे प्रभु! इस पूजा के पुण्य प्रभाव से पूरे विश्व के सभी जीवों का कल्याण हो, महामारी और युद्ध शांत हों, और सभी को सद्बुद्धि प्राप्त हो।"

343. क्या कल्पवासी देवों की देवियाँ (अप्सराएँ) भी पूजा में अलग से अर्घ्य चढ़ाती हैं?

उत्तर: हाँ, वे अपने-अपने समूहों के साथ अत्यंत विनीत भाव से अष्टद्रव्य लेकर मंगल गान करते हुए अर्घ्य समर्पित करती हैं।

344. इन ५२ चैत्यालयों के अंदर जो 'भामंडल' चमकता है, उसका रंग कैसा होता है?

उत्तर: वह सूर्य के समान तेजस्वी लेकिन चंद्रमा के समान शीतल, सात रंगों की दिव्य रश्मियों (किरणों) से युक्त होता है।

345. क्या नंदीश्वर द्वीप के वनों में पाए जाने वाले फलों को देव खाते हैं?

उत्तर: नहीं, देवों को भूख लगने पर उनके कंठ से स्वतः ही अमृत झर जाता है (मानसिक आहार)। वे वनों के फलों को केवल उनकी सुंदरता और सुगंध के लिए निहारते हैं।

346. नंदीश्वर द्वीप की इस अद्भुत रचना को सुनकर हमारे भीतर कौन-सा 'गुण' जाग्रत होना चाहिए?

उत्तर: हमारे भीतर 'प्रमोद गुण' (दूसरों के वैभव और भगवान के अतिशय को देखकर खुश होना) जाग्रत होना चाहिए।

347. क्या नंदीश्वर द्वीप की प्रतिमाओं के पादपीठ पर 'ॐ' या 'स्वस्तिक' बना होता है?

उत्तर: कुछ अकृत्रिम रचनाओं में सहज ही मंगल चिह्न उभरे होते हैं, जो उनकी प्रामाणिकता और शुभता को दर्शाते हैं।

348. अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'सांसारिक टीवी, मोबाइल और गपशप' से दूर रहने का क्या आध्यात्मिक लाभ है?

उत्तर: इससे हमारी ऊर्जा बाहर बिखरने से बचती है और वह पूरी ऊर्जा अंतर्मुख होकर आत्मा की शुद्धि में लग जाती है।

349. क्या नंदीश्वर द्वीप की वंदना करने वाला जीव कभी 'नरक' जा सकता है?

उत्तर: यदि जीव ने सम्यक्त्व सहित इस महिमा को हृदय में धारण कर लिया है, तो वह कभी भी नरक, तिर्यंच गति या कुभोगभूमियों में जन्म नहीं ले सकता।

350. नंदीश्वर द्वीप की इस संपूर्ण ३५० प्रश्नों की महा-प्रश्नोत्तरी का अंतिम दिव्य संदेश क्या है?

उत्तर: इसका अंतिम और परम संदेश यही है कि—"बाहरी संसार के अकृत्रिम द्वीप और मंदिर तो शाश्वत हैं ही, लेकिन हमारी 'निज आत्मा' ही असली नंदीश्वर द्वीप है। जब हम अपनी आत्मा के ५२ अनादि गुणों के चैत्यालय में सम्यग्दर्शन के इंद्र बनकर प्रवेश करेंगे, तब हमें साक्षात अविनाशी मोक्ष पद की प्राप्ति होगी।"

"नंदीश्वर द्वीप के ५२ अकृत्रिम चैत्यालयों की जय!"

नंदीश्वर द्वीप के अलौकिक वैभव, दिगंबर जैन सिद्धांतों, सूक्ष्म गणितीय रचनाओं और आचार्यों द्वारा प्रतिपादित त्रिलोक-भूगोल को पूर्णता की ओर ले जाने के लिए, यहाँ जैन आगम ग्रंथों (जैसे तिलोयपण्णत्ती, त्रिलोकसार, तत्त्वार्थराजवार्तिक और जम्बूद्वीपपण्णत्ती) के आधार पर 150 और विशेष (कुल 500) प्रश्न-उत्तर दिए जा रहे हैं:

## खंड 15: द्वीप का सूक्ष्म भूगोल, सागर और विस्तार गणित (प्रश्न 351-375)

351. मध्यलोक के कुल व्यास (विस्तार) के सामने नंदीश्वर द्वीप का विस्तार कितना स्थान घेरता है?

उत्तर: मध्यलोक में कुल असंख्य द्वीप-समुद्र हैं। जम्बूद्वीप (1,00,000 योजन) से शुरू होकर हर अगला द्वीप और समुद्र पहले वाले से दुगने आकार का होता जाता है। इस गणित से आठवें नंबर पर आने वाले नंदीश्वर द्वीप का अकेले का विस्तार 163,84,00,000 योजन हो जाता है।

352. नंदीश्वर द्वीप के भीतर का क्षेत्रफल (Area) निकालने का आगम सूत्र क्या है?

उत्तर: जैन गणित के अनुसार, वलयाकार द्वीप का क्षेत्रफल 'बाहरी विष्कम्भ' (Outer diameter) और 'आभ्यन्तर विष्कम्भ' (Inner diameter) के अंतर को परिधि के नियमों से गुणा करके निकाला जाता है, जो महा-सूच्यंग गणित के अंतर्गत आता है।

353. क्या नंदीश्वर द्वीप के पर्वतों पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ने से परछाई (शैडो) बनती है?

उत्तर: नहीं, यहाँ के सभी पर्वत और चैत्यालय स्वतः प्रकाशमान रत्नों के बने हैं, जिसके कारण वहाँ प्रकाश हर कोने में एक समान रहता है और मनुष्यों के क्षेत्रों जैसी गहरी परछाईं नहीं बनती।

354. क्या नंदीश्वर द्वीप के बाहर जो 'नंदीश्वर समुद्र' है, उसका जल खारा है?

उत्तर: नहीं, नंदीश्वर समुद्र का जल 'इक्षुरस' (गन्ने के रस) के समान मीठा, स्वादिष्ट और परम पवित्र माना गया है।

355. पूर्व दिशा के अंजनगिरि पर्वत की बिल्कुल सटीक भौगोलिक स्थिति क्या है?

उत्तर: यह पूर्व दिशा के ठीक मध्य भाग में, घृतवर समुद्र के तट से समान दूरी पर, नंदीश्वर द्वीप के केंद्र रेखा पर स्थित है।

356. क्या दधिमुख पर्वतों का आकार ऊपर से बिल्कुल चपटा (Flat) होता है?

उत्तर: दधिमुख पर्वत का शिखर समतल होता है, जिसका विस्तार ४,००० योजन है। इसी समतल भूमि के केंद्र में १०० योजन लंबा चैत्यालय विराजमान होता है।

367. क्या नंदीश्वर द्वीप की भूमि पर कोई प्राकृतिक गुफाएँ (केव्स) भी हैं?

उत्तर: नहीं, यहाँ की भूमि और पर्वत पूर्णतः ठोस और रत्नमयी हैं। यहाँ कृत्रिम या प्राकृतिक खोखली गुफाएँ नहीं होतीं।

358. अंजनगिरि पर्वत के मूल पत्थरों की कठोरता (Hardness) की तुलना किससे की जा सकती है?

उत्तर: इनकी कठोरता 'वज्र रत्न' (हीरे) से भी अधिक है, जिसे तीन लोक का कोई भी अस्त्र या शस्त्र खरोंच तक नहीं लगा सकता।

359. दधिमुख पर्वत की चांदी जैसी धवलता को आगम में क्या उपमा दी गई है?

उत्तर: इसकी उपमा 'शरद ऋतु के बादलों' और 'क्षीरसागर के फेन (झाग)' से दी गई है, जो परम पवित्रता का आभास कराती है।

360. रतिकर पर्वत की चोटी पर जो १,००० योजन का विस्तार है, वहाँ मंदिर के अलावा क्या होता है?

उत्तर: मंदिर के अलावा वहाँ रत्नमयी आंगन, मानस्तंभ, नाट्यशालाएँ और देवों के खड़े होने के लिए भव्य गलियारे बने होते हैं।

361. नंदीश्वर द्वीप के चैत्यालयों के चारों ओर जो 'वन' हैं, उनमें क्या कभी सूखी पत्तियाँ गिरती हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ अशुचि या सड़न का सर्वथा अभाव है। पत्तियाँ और फूल शाश्वत रूप से अपनी पूर्ण कांति के साथ वृक्षों पर टिके रहते हैं।

362. क्या इन वनों में देवगण अपनी मर्जी से नए वृक्ष बना सकते हैं?

उत्तर: देव अपनी विक्रिया शक्ति से अस्थायी रूप से सुंदर रचनाएँ या क्रीड़ा-वृक्ष बना सकते हैं, परंतु मूल अकृत्रिम वन सदा एक जैसे ही रहते हैं।

363. बावलियों के घाटों पर जो मणियों की सीढ़ियाँ हैं, उनकी संख्या कितनी होती है?

उत्तर: प्रत्येक घाट पर सैकड़ों की संख्या में सीढ़ियाँ होती हैं, जो पानी की गहराई तक व्यवस्थित रूप से जाती हैं।

364. क्या इन बावलियों में कभी बाढ़ (फ्लड) आ सकती है?

उत्तर: नहीं, इनका जल स्तर अनादि काल से एक जैसा संतुलित है। इसमें न कभी पानी बढ़ता है और न वाष्पीकरण से सूखता है।

365. रतिकर पर्वतों के शिखरों का रंग क्या हमेशा लाल ही रहता है?

उत्तर: हाँ, पद्मराग मणि के प्रभाव से इनका रंग सदा उगते हुए सूर्य के समान लाल और सुवर्णमयी आभा से युक्त रहता है।

366. नंदीश्वर द्वीप के वनों में जो 'आम्र वन' (अमराई) हैं, उनके फलों का आकार कैसा होता है?

उत्तर: उनके फल रत्नमयी और विशाल होते हैं, जो केवल वृक्षों की शोभा बढ़ाते हैं और देवों के नेत्रों को सुख देते हैं।

367. क्या इन ५२ मंदिरों के चारों ओर कोई सुरक्षा घेरा या देव पहरा देते हैं?

उत्तर: वहाँ किसी चोरी या अमंगल का भय नहीं होता, लेकिन जिनशासन की महिमा के रूप में 'व्यंतर निकाय' के रक्षक देव वहाँ सम्मानपूर्वक उपस्थित रहते हैं।

368. मंदिरों के मुख्य द्वारों के तोरणों से जो किरणें निकलती हैं, वे कितनी दूर तक जाती हैं?

उत्तर: वे किरणें कई योजन दूर तक आकाश को सतरंगी (इंद्रधनुषी) रंग में रंग देती हैं।

369. क्या नंदीश्वर द्वीप की हवा में कोई सुगंधित द्रव्य देवों को मिलाना पड़ता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ की भूमि, वन और सरोवरों के कमलों से प्राकृतिक रूप से ही महा-सुगंधित कस्तूरी और चंदन जैसी महक स्वतः निकलती रहती है।

370. अंजनगिरि पर्वत के चारों कोनों की चार बावलियों के बीच की दूरी कितनी होती है?

उत्तर: ये बावलियाँ अंजनगिरि के चारों तरफ अत्यंत वैज्ञानिक और सममित (Symmetrical) ढंग से एक-एक लाख योजन के अंतराल पर फैली होती हैं।

371. क्या इस द्वीप के क्षेत्रफल का कोई भाग कभी समुद्र में डूब सकता है?

उत्तर: नहीं, मध्यलोक की यह रचना वज्र-भित्ति पर टिकी है, जो प्रलय काल (कल्याणक काल के अंत) में भी पूरी तरह सुरक्षित रहती है।

372. जैन आगम में नंदीश्वर द्वीप की वंदना को 'सर्वोत्कृष्ट भाव यात्रा' क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि यहाँ कोई सांसारिक कोलाहल नहीं है। यहाँ केवल शुद्ध देवत्व, शाश्वत जिनबिंब और परम वीतरागता का ही साम्राज्य है।

373. बावलियों के जल का रंग दूध जैसा सफेद क्यों दिखाई देता है?

उत्तर: क्योंकि इन बावलियों का तल और तट 'दधिमुख पर्वत' और श्वेत स्फटिक मणियों से घिरा है, जिसका प्रतिबिंब जल को दूध जैसा धवल दिखाता है।

374. क्या इन पर्वतों के शिखरों पर कभी अंधड़ या तेज तूफ़ान आते हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ केवल मन्द, सुगंधित और सुखद पवन ही चलती है, जो ध्वजाओं को हिलाने मात्र के वेग वाली होती है।

375. प्रत्येक चैत्यालय के गर्भगृह में जो खंभे होते हैं, क्या उन पर कोई सहारा देने वाली बीम होती है?

उत्तर: वे स्तंभ अकृत्रिम इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना हैं, जो बिना किसी कृत्रिम जोड़ के पूरी रत्नमयी छत को शाश्वत रूप से संभाले हुए हैं।

## खंड 16: चैत्यालयों की अलौकिक वास्तुकला और जिनबिंब अतिशय (प्रश्न 376-400)

376. प्रत्येक चैत्यालय के गर्भगृह में वेदी का मुख किस दिशा में होता है?

उत्तर: अकृत्रिम चैत्यालयों में मुख्य वेदी का मुख पूर्व दिशा की ओर होता है, और मूर्तियाँ इस प्रकार विराजमान होती हैं कि उनके दर्शन चारों ओर से परम भव्य लगते हैं।

377. क्या इन ५२ मंदिरों के शिखरों पर कभी कोई पक्षी अपनी बीट या अशुचि कर सकता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ कोई तिर्यंच या अशुचि करने वाले जीव जा ही नहीं सकते। वह देव-भूमि से भी अधिक पवित्र जिन-भूमि है।

378. मंदिरों के अंदर जो 'धूपघट' हैं, क्या उनमें देवों को अगरबत्ती या कपूर जलाना पड़ता है?

उत्तर: नहीं, वे अकृत्रिम धूपघट हैं, जिनमें से बिना कुछ जलाए ही अनादि काल से सुगंधित और पवित्र वाष्प निरंतर प्रवाहित होती रहती है।

379. भगवान की प्रतिमाओं के वक्षस्थल पर जो 'श्रीवत्स' चिह्न है, उसका सटीक आकार कैसा होता है?

उत्तर: वह चार कोनों वाला एक अत्यंत सुंदर आवर्त (पवित्र चक्र) जैसा होता है, जो अनंत गुणों की पूर्णता को दर्शाता है।

380. क्या इन मंदिरों की दीवारों में कोई खिड़कियाँ या रोशनदान होते हैं?

उत्तर: हाँ, दीवारों में कलात्मक जालीदार मणियों के झरोखे होते हैं, जिनसे वनों की दिव्य आभा और देवों के विमानों का आवागमन देखा जा सकता है।

381. प्रत्येक प्रतिमा के दोनों ओर जो चामर ढोरते हुए देवों के पुतले हैं, वे किस धातु के हैं?

उत्तर: वे पुतले किसी धातु के नहीं, बल्कि 'चंद्रकांत मणि' और स्वर्ण के स्वतः निर्मित अकृत्रिम रूप हैं।

382. मंदिरों के प्रवेश द्वार की देहली (चौखट) को छूने से देवों को क्या अनुभव होता है?

उत्तर: देहली को छूते ही देवों के भीतर का रहा-सहा संसार के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है और वे परम भक्ति-भाव में डूब जाते हैं।

383. क्या इन ५२ जिनालयों में वर्तमान काल के २० तीर्थंकरों की आकृतियाँ अलग से होती हैं?

उत्तर: नहीं, यहाँ की सभी मूर्तियाँ सामान्य अरहंत देव के शाश्वत वीतराग रूप को दर्शाती हैं, यहाँ काल या नाम का कोई विभाजन नहीं होता।

384. प्रतिमाओं के मस्तक पर जो दक्षिणवर्ती घुँघराले बाल हैं, उनका आध्यात्मिक संदेश क्या है?

उत्तर: वे बाल भगवान के पूर्ण आत्म-नियंत्रण, ध्यान की पराकाष्ठा और पूर्ण वीतराग दिगंबर मुद्रा के सहज अतिशय सौंदर्य को प्रकट करते हैं।

385. मंदिरों के प्रेक्षागृह (नाट्य मंडप) की छत किस चीज की बनी होती है?

उत्तर: वह छत 'सूर्यकांत मणि' और हीरों से जड़ी होती है, जो ऊपर से देखने पर साक्षात तारों से भरा आकाश जैसी लगती है।

386. संगीतशाला में जो अकृत्रिम दुन्दुभि (नगाड़े) रखे हैं, वे कब बजते हैं?

उत्तर: जैसे ही कोई इंद्र या देव समूह अष्टान्हिका पर्व पर महापूजा की प्रतिज्ञा करता है, वे नगाड़े स्वतः ही "जय हो, जय हो" की गंभीर ध्वनि के साथ गूंज उठते हैं।

387. क्या इन मंदिरों के ऊपर जो स्वर्ण कलश हैं, वे कभी काले पड़ते हैं?

उत्तर: नहीं, वह अकृत्रिम सुवर्ण है, जिस पर समय, वायु या जल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह सदा एक समान चमकता रहता है।

388. मोतियों के जो झुमके छतों से लटकते हैं, उनके हिलने से कौन-सा संगीत निकलता है?

उत्तर: उनके आपस में टकराने से 'ॐ'कार ध्वनि और णमोकार मंत्र की सूक्ष्म सुरीली तरंगें निकलती हैं।

389. क्या इन मंदिरों के प्रांगण में देवों के बैठने के लिए कोई आसन बने होते हैं?

उत्तर: हाँ, मुखमंडप और प्रेक्षागृह में देवों की विभिन्न श्रेणियों (सौधर्म इंद्र, सामान्यनिक देव आदि) के अनुसार सुंदर रत्नमयी चौकियाँ स्वतः बनी होती हैं।

390. वेदी की 'तीन कटनी' पर चढ़ते समय देवों के परिणाम कैसे होते हैं?

उत्तर: पहली कटनी पर कषाय शांत होती है, दूसरी पर सम्यक्त्व दृढ़ होता है और तीसरी कटनी पर पहुँचते ही देव पूर्ण आनंद से भर जाते हैं।

391. प्रतिमाओं की उंगलियों के नाखूनों की चमक कैसी होती है?

उत्तर: उनके नाखून स्वाभाविक रूप से हल्के लाल रंग की मणियों जैसे चमकते हैं, मानो साक्षात वैराग्य की किरणें फूट रही हों।

392. क्या इन मंदिरों के आसपास कोई कृत्रिम सुरक्षा दीवार होती है?

उत्तर: नहीं, वहाँ किसी शत्रु का भय नहीं होता। वहाँ का परकोटा केवल जिन-भवन की शोभा और मर्यादा बढ़ाने के लिए होता है।

393. चैत्यालय के मुख्य द्वार के किवाड़ (दरवाजे) किस समय बंद किए जाते हैं?

उत्तर: ये किवाड़ अनादि काल से कभी बंद नहीं हुए और अनंत काल तक हमेशा खुले ही रहेंगे, क्योंकि वहाँ कभी कोई अशुचि या रात्रि का अंधकार नहीं होता।

394. मंदिरों के प्रांगण में जो नाट्य मंच है, उसका विस्तार कितना होता है?

उत्तर: वह मंच इतना विशाल होता है कि उस पर एक साथ हजारों देवियाँ विभिन्न प्रकार के धार्मिक मंडल और नाटक प्रस्तुत कर सकती हैं।

395. क्या इन मंदिरों के अंदर का वातावरण कभी गर्म या ठंडा होता है?

उत्तर: मणियों के दिव्य अतिशय के कारण वहाँ का वातावरण सदा परम सुखद, समशीतोष्ण और ध्यान के लिए सर्वोत्तम रहता है।

396. दीवारों पर जो तीर्थंकरों के पूर्व जन्मों के चित्र उभरे हैं, उन्हें देखकर देवों को क्या ज्ञान होता है?

उत्तर: उन्हें जातिस्मरण ज्ञान और वैराग्य की दृढ़ता प्राप्त होती है, जिससे वे अपने देव-जीवन को सफल मानते हैं।

397. क्या इन प्रतिमाओं के सामने कोई चामर स्वतः ढलते रहते हैं?

उत्तर: हाँ, अकृत्रिम चामर प्रतिमाओं के दोनों ओर वायु के मंद वेग से स्वतः ही अत्यंत सुंदर मुद्रा में ढोरते रहते हैं।

398. मंदिरों के गोपुर के ऊपर जो महाध्वजा लहराती है, उसका डंडा कितना मजबूत होता है?

उत्तर: वह डंडा 'मेरु पत्थर' और वज्र मणि का बना होता है, जो आकाश की ऊंचाइयों को छूता है।

399. यदि कोई जीव नंदीश्वर द्वीप के चैत्यालय की मानसिक वेदी बनाता है, तो उसे क्या लाभ होता है?

उत्तर: मानसिक वेदी बनाने से जीव का उपयोग (ध्यान) शुभ कार्यों में लग जाता है, जिससे तीव्र साता वेदनीय कर्म का बंध होता है।

400. इन ५६१६ प्रतिमाओं के दर्शन का मूल संदेश क्या है?

उत्तर: इनका मूल संदेश यही है कि बाह्य रूप चाहे कितना भी विशाल और रत्नमयी क्यों न हो, आत्मा का असली वैभव तो पूर्ण दिगंबरत्व, वीतरागता और अपनी आत्मा में लीन होने में ही है।

## खंड 17: देवों के दिव्य परिकर, नाट्य और अष्टान्हिका अनुष्ठान (प्रश्न 401-425)

401. अष्टान्हिका महापर्व के दौरान सौधर्म इंद्र अपनी कितनी सेनाओं के साथ नंदीश्वर द्वीप आता है?

उत्तर: सौधर्म इंद्र अपनी सात प्रकार की सेना (पदाति/पैदल, अश्व/घोड़े, गज/हाथी, रथ, वृषभ, गंधर्व और नर्तकी सेना) के साथ आता है, जो सभी वास्तव में देवों के ही विक्रिया रूप होते हैं।

402. देवों की 'गंधर्व सेना' पूजा के समय क्या कार्य करती है?

उत्तर: गंधर्व सेना के देव अपनी अलौकिक और मधुर आवाज़ में भगवान की अकृत्रिम स्तुतियों का गान करते हैं, जिसे सुनकर पूरा नंदीश्वर द्वीप भक्तिमय हो जाता है।

403. नर्तकी सेना की मुख्य देवी कौन होती है और वह क्या करती है?

उत्तर: मुख्य रूप से नीलांजना जैसी अप्सराएँ और नर्तकी देवियाँ भगवान के समतक्ष ३२ प्रकार के हाव-भाव से युक्त परम पवित्र 'अष्टान्हिका नृत्य' प्रस्तुत करती हैं।

404. क्या चारों निकायों के इंद्र एक ही मंदिर में एक साथ बैठकर पूजा करते हैं?

उत्तर: नहीं, ५२ चैत्यालय होने के कारण अलग-अलग इंद्र और उनके परिकर को अलग-अलग दिशाओं के मंदिरों की ज़िम्मेदारी बंटी होती है, जिससे सभी जगह भव्य पूजा होती है।

405. पूजा की शुरुआत में देवगण जो 'अभिषेक' करते हैं, उसके लिए जल कहाँ से लाते हैं?

उत्तर: वे अपने विमानों में क्षीरसागर (दूध के समुद्र) और पुष्करवर समुद्र का परम पवित्र और निर्मल जल भरकर लाते हैं।

406. देवों द्वारा चढ़ाए जाने वाले 'मलय चंदन' की विशेषता क्या होती है?

उत्तर: वह चंदन कल्पवृक्षों से प्राप्त होता है, जिसकी शीतलता और सुगंध कई कोसों दूर तक फैल जाती है और वह कभी सूखता नहीं है।

407. क्या देवों की पूजा में चढ़ाए जाने वाले 'अक्षत' (चावल) हमारे जैसे धान के होते हैं?

उत्तर: नहीं, वे अक्षत 'महानिधानों' और कल्पवृक्षों से प्राप्त रत्नमयी, अखंड और धवल सफेद रंग के होते हैं, जो कभी खंडित नहीं होते।

408. देवगण जो 'पुष्प' (फूल) भगवान के चरणों में अर्पित करते हैं, वे कैसे होते हैं?

उत्तर: वे फूल कल्पवृक्षों के होते हैं, जो अत्यंत कोमल, सुगंधित और मणियों की आभा से युक्त होते हैं। इनमें कोई कीड़ा या अशुचि नहीं होती।

409. पूजा में जलाए जाने वाले देवों के 'दीपक' किस चीज के बने होते हैं?

उत्तर: वे दीपक 'रत्नदीप' होते हैं, जो बिना किसी घी या तेल के, केवल अपनी मणियों के स्वाभाविक तेज से ही हमेशा जलते रहते हैं।

410. देवों की पूजा का 'नैवेद्य' कैसा होता है?

उत्तर: वह नैवेद्य कल्पवृक्षों से प्राप्त अमृतमयी दिव्य पकवानों के रूप में होता है, जो परम शुद्ध और अचेतन (बिना जीवों के) होता है।

411. 'दशांग धूप' खेते (चढ़ाते) समय देव किस मंत्र का उच्चारण करते हैं?

उत्तर: वे "ॐ ह्रीं श्रीं नंदीश्वर-द्वीप-चैत्यालयेभ्यो धूपं निरूपामीति स्वाहा" जैसे अकृत्रिम मंत्रपदों का उच्चारण करते हैं।

412. देवों द्वारा चढ़ाए जाने वाले 'फल' कैसे होते हैं?

उत्तर: वे फल सोने और मणियों के आकार के, पूर्णतः पके हुए और अलौकिक रस से भरपूर दिव्य फल होते हैं।

413. क्या अष्टान्हिका के आठों दिन सौधर्म इंद्र एक ही जैसे कपड़े पहनता है?

उत्तर: नहीं, वह प्रत्येक दिन की पूजा के अनुसार अपनी विक्रिया से नए, अत्यंत वैभवशाली और सतरंगी देव-वस्त्र धारण करता है।

414. ईशान इंद्र किस दिशा के चैत्यालयों की पूजा का नेतृत्व करता है?

उत्तर: ईशान इंद्र मुख्य रूप से उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) और उत्तर दिशा के मंदिरों की पूजा की व्यवस्था देखता है।

415. चमरेन्द्र और वैरोचनेन्द्र (भवनवासी इंद्र) कहाँ पूजा करते हैं?

उत्तर: ये अपने परिकर के साथ रतिकर पर्वतों पर स्थित मंदिरों में जाकर अत्यंत भक्तिपूर्वक महापूजा संपन्न करते हैं।

416. क्या पूजा के दौरान देवगण आपस में बातचीत करते हैं?

उत्तर: नहीं, पूजा के समय उनका पूरा ध्यान केवल भगवान के गुणों के स्तवन और अपनी आत्मा की विशुद्धि में ही रहता है।

417. देवियों द्वारा गाए जाने वाले 'मंगल गान' की तान कैसी होती है?

उत्तर: उनकी तान जैन संगीत के शास्त्रों के अनुसार 'षड्ज' और 'गांधार' स्वर में होती है, जो चित्त को परम शांत कर देती है।

418. जब सौधर्म इंद्र तांडव नृत्य करता है, तो उसके कितने हाथ-पैर दिखाई देते हैं?

उत्तर: वह अपनी वैक्रियक ऋद्धि से एक साथ हजारों हाथ और रूप बना लेता है, और हर हाथ में भगवान की भक्ति की कोई न कोई सामग्री या मुद्रा दिखाई देती है।

419. क्या पूजा समाप्त होने के बाद देवगण वहाँ कोई कचरा छोड़ते हैं?

उत्तर: नहीं, वह भूमि अकृत्रिम है। वहाँ देवों द्वारा चढ़ाई गई सामग्री पूजा के अंत में स्वतः ही विलीन (अदृश्य) हो जाती है, वहाँ कोई जूठन या निर्माल्य शेष नहीं रहता।

420. अष्टान्हिका पर्व के अंतिम दिन (पूर्णिमा) को देवों द्वारा की जाने वाली महाआरती का क्या नाम है?

उत्तर: इसे आगम में 'तिलोकमहोत्सव आरती' या 'सर्वकल्याणकारी महाआरती' कहा गया है।

421. क्या देवों के आने से नंदीश्वर द्वीप का तापमान बदल जाता है?

उत्तर: करोड़ों देवों के विमानों के तेज से वहाँ की आभा और बढ़ जाती है, परंतु तापमान हमेशा परम सुखद ही रहता है।

422. कल्पवासी देवों के विमान मंदिरों के आसपास कहाँ खड़े होते हैं?

उत्तर: विमानों के लिए पर्वतों के नीचे और बावलियों के तटों पर बहुत बड़े विमान-स्थल स्वतः निर्मित होते हैं, जहाँ वे कतारों में खड़े होते हैं।

423. क्या अहमिंद्र देव (जो ऊपर के अनुत्तर विमानों में रहते हैं) कभी नंदीश्वर द्वीप की वंदना को तरसते हैं?

उत्तर: अहमिंद्र देव अपने आत्म-ध्यान और सम्यक्त्व में इतने लीन रहते हैं कि उन्हें बाहर जाने की इच्छा ही नहीं होती, वे वहीं से अपनी मानसिक वंदना करते हैं।

424. व्यंतर देवों के नृत्य की क्या विशेषता होती है?

उत्तर: व्यंतर देव अत्यंत कौतुकप्रिय होते हैं, वे तरह-तरह के सुंदर रूप बदलकर भगवान के समतक्ष अचरज भरे धार्मिक नाटक प्रस्तुत करते हैं।

425. पूजा संपन्न कर लौटते समय इंद्र की आँखों में आँसू क्यों आते हैं?

उत्तर: भगवान की वीतरागी मुद्रा के वियोग और इस परम पवित्र तीर्थ को छोड़कर पुनः स्वर्ग के भोगों में जाने के वैराग्य भाव के कारण इंद्र की आँखें भर आती हैं।

## खंड 18: श्रावकों के कर्तव्य, व्रत नियम और सामाजिक प्रभावना (प्रश्न 426-450)

426. जैन श्रावक अष्टान्हिका पर्व की शुरुआत किस तिथि से करते हैं?

उत्तर: श्रावक कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी की रात से ही नियमों का संकल्प लेकर अष्टमी से व्रत प्रारंभ करते हैं।

427. 'नंदीश्वर द्वीप विधान' का मुख्य मंडल (मांडना) जमीन पर क्यों नहीं बनाया जाता?

उत्तर: क्योंकि इस मंडल में ५२ अकृत्रिम चैत्यालयों और भगवान की स्थापना होती है, इसलिए विनय और शुचिता बनाए रखने के लिए इसे जमीन से ऊँचे चबूतरे या मेज (चौकी) पर बनाया जाता है।

428. विधान के दौरान 'मौन' रहने का क्या महत्व है?

उत्तर: मौन रहने से हमारी वाक-ऊर्जा बचती है, सांसारिक वाद-विवाद बंद होते हैं और मन पूरी तरह भगवान के मंत्रों के जप में एकाग्र हो जाता है।

429. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में हरी सब्जियों का त्याग करना जरूरी है?

उत्तर: हाँ, दिगंबर परंपरा में इन पवित्र दिनों में त्रस और स्थावर जीवों की रक्षा के उद्देश्य से तथा संयम बढ़ाने के लिए श्रावक जमीकंद और हरी सब्जियों का त्याग कर सूखा मर्यादित भोजन करते हैं।

430. विधान के मांडले में जो 'सफेद रंग' भरा जाता है, वह किस पर्वत को दर्शाता है?

उत्तर: सफेद रंग मुख्य रूप से दधिमुख पर्वत और वहाँ की दूध जैसी सफेद बावलियों की रचना को दर्शाता है।

431. क्या अष्टान्हिका के दिनों में 'ब्रह्मचर्य' का पालन अनिवार्य है?

उत्तर: हाँ, इन आठ दिनों में मन, वचन और काय से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना श्रावक के आवश्यक कर्तव्यों में आता है।

432. 'नंदीश्वर जयमाला' का पाठ करते समय खड़े होना क्यों जरूरी माना गया है?

उत्तर: जयमाला भगवान के पूर्ण गुणों का महा-स्तवन है। इसके प्रति परम आदर और उत्साह प्रकट करने के लिए पूरी समाज एक साथ खड़े होकर इसका पाठ करती है।

433. क्या श्रावक अपने घरों में भी नंदीश्वर द्वीप का छोटा मंडल बना सकते हैं?

उत्तर: यदि मंदिर जाना संभव न हो, तो श्रावक अपने घर के शुद्ध चैत्यालय में साफ चौकी पर चावलों से ५२ ढेरी बनाकर नंदीश्वर द्वीप की स्थापना कर पूजा कर सकते हैं।

434. व्रत के दिनों में 'एकासन' करने का क्या नियम है?

उत्तर: एकासन का अर्थ है दिन में केवल एक बार, एक ही स्थान पर बैठकर मर्यादित शुद्ध भोजन करना और दोबारा चौका छोड़ देने के बाद कुछ न ग्रहण करना।

435. विधान के अंत में जो 'महा-अर्घ्य' चढ़ाया जाता है, उसका वजन या आकार कैसा होता है?

उत्तर: महा-अर्घ्य पूरी समाज की ओर से चढ़ाया जाने वाला मुख्य अर्घ्य है, जिसमें सभी उत्तम उत्तम सूखे मेवे, फल और केसर मिश्रित अक्षत एक बड़े थाल में सजाकर चढ़ाए जाते हैं।

436. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'रात्रि जागरण' (भजन संध्या) की जानी चाहिए?

उत्तर: हाँ, रात्रि के समय प्रमाद और निद्रा को जीतने के लिए मंदिरों में बैठकर वैराग्यपूर्ण भजन, संगीतमय आरती और स्वाध्याय करना अत्यंत उत्तम माना गया है।

437. विधान के दिनों में बच्चों को 'णमोकार मंत्र' की कितनी माला फेरनी चाहिए?

उत्तर: बच्चों को प्रतिदिन कम से कम ३ या ९ माला फेरने का अभ्यास कराना चाहिए, जिससे उनके भीतर धार्मिक संस्कार सुदृढ़ हों।

438. क्या अष्टान्हिका व्रत का उद्यापन अकेले किया जा सकता है?

उत्तर: उद्यापन अकेले भी किया जा सकता है, परंतु पूरी समाज को साथ लेकर, प्रभावना बांटकर और भव्य विधान का आयोजन करके करना विशेष पुण्य का कारण बनता है।

439. विधान के मांडले में 'लाल रंग' भरने के लिए किस प्राकृतिक द्रव्य का प्रयोग होता है?

उत्तर: इसके लिए मुख्य रूप से कुंकुम (रोली) या लाल चंदन के चूर्ण का प्रयोग किया जाता है, जो रतिकर पर्वत का प्रतीक है।

440. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में साधुओं (मुनियों) को आहार दान देने का फल बढ़ जाता है?

उत्तर: हाँ, इन पवित्र दिनों में मुनिराजों के परिणाम भी अत्यंत विशुद्ध होते हैं, इसलिए उन्हें आहार दान देने से श्रावक के पुण्य का संचय असंख्यात गुणा हो जाता है।

441. 'नंदीश्वर व्रत' की समाप्ति पर जो 'प्रभावना' बांटी जाती है, वह कैसी होनी चाहिए?

उत्तर: प्रभावना हमेशा धार्मिक और उपयोगी होनी चाहिए, जैसे शास्त्र, धार्मिक पुस्तकें, णमोकार मंत्र के लॉकेट या व्रत की याद दिलाने वाली पवित्र वस्तुएँ।

442. क्या अष्टान्हिका के दिनों में व्यापार में कम से कम लाभ या केवल आवश्यक कार्य ही करना चाहिए?

उत्तर: हाँ, इसे 'देशव्रत' या 'सामायिक प्रतिमा' का अभ्यास माना जाता है, जहाँ श्रावक धन कमाने की लालसा को सीमित कर देता है।

443. विधान के मांडले के चारों ओर जो 'चार द्वार' बनाए जाते हैं, वे क्या दर्शाते हैं?

उत्तर: वे नंदीश्वर द्वीप के चारों कोनों (दिशाओं) के मुख्य प्रवेश द्वारों और चार अंजनगिरि पर्वतों के तोरणों को दर्शाते हैं।

444. क्या इस व्रत को करने से 'असाता वेदनीय' कर्म का क्षय होता है?

उत्तर: बिल्कुल। जब जीव भगवान की भक्ति में लीन रहता है, तो उसके पुराने असाता वेदनीय (दुःख देने वाले कर्म) मंद पड़ जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं।

445. अष्टान्हिका के दिनों में 'तप' का क्या अर्थ है?

उत्तर: केवल भूखे रहना तप नहीं है। अपनी इच्छाओं को रोकना, कषायों को जीतना और निरंतर आत्म-चिंतन करना ही असली तप है।

446. क्या नंदीश्वर द्वीप की पूजा के बाद 'क्षमा याचना' करना आवश्यक है?

उत्तर: हाँ, पूजा में हुई किसी भी प्रकार की विधि-हीनता, अशुद्धि या मंत्रों के गलत उच्चारण की शुद्धि के लिए अंत में क्षमा मांगना जरूरी है।

447. विधान के अंत में जो 'शांतिधारा' की जाती है, उसका जल कैसा होना चाहिए?

उत्तर: वह जल प्राशुक (उबला हुआ और मर्यादित) होता है, जिसमें सुगंधित चंदन और केशर मिलाया जाता है।

448. क्या अष्टान्हिका पर्व के दौरान जैन विद्यालयों में अवकाश होना चाहिए?

उत्तर: अवकाश का उद्देश्य बच्चों को सुसंस्कृत करना है, ताकि वे पूरा समय मंदिर की गतिविधियों, धार्मिक शिक्षण और स्वाध्याय में लगा सकें।

449. नंदीश्वर द्वीप का ध्यान करते समय हमें संसार के प्रति क्या भावना भानी चाहिए?

उत्तर: हमें सोचना चाहिए कि यह पूरा संसार अनित्य है, केवल आत्मा और सिद्ध पद ही नित्य और शाश्वत हैं।

450. दिगंबर जैन समाज में नंदीश्वर द्वीप विधान के समापन पर कौन-सा मुख्य जयकारा गूंजता है?

उत्तर: "अनादि-निधन अकृत्रिम जैन बिंबों की जय! तीन लोक के नाथ की जय!"

## खंड 19: सूक्ष्म भौगोलिक गणित, अकृत्रिम रचनाएँ और आगम रहस्य (प्रश्न 451-475)

451. अंजनगिरि पर्वत का व्यास १०,००० योजन है, तो इसकी परिधि (Circumference) जैन गणित के अनुसार कितनी होगी?

उत्तर: जैन गणित के 'परिधि सूत्र' (\text{परिधि} = \sqrt{\text{व्यास}^2 \times 10}) के अनुसार, इसकी परिधि ३१,६२२ योजन से कुछ अधिक बैठती है।

452. दधिमुख पर्वत का आकार नीचे से ऊपर की ओर संकरा होता है, तो इसके मध्य भाग का व्यास कितना होता है?

उत्तर: नीचे १०,००० योजन और ऊपर ४,००० योजन होने के कारण, इसके ठीक मध्य भाग का व्यास ७,००० योजन होता है।

453. रतिकर पर्वत की ऊँचाई १०,००० योजन है, तो इसका ढलान (Slope) कितना तीव्र होता है?

उत्तर: इसका ढलान बहुत संतुलित होता है, जो नीचे के १०,००० योजन से ऊपर के १,००० योजन तक एक सुंदर पिरामिड या शंकु का आकार बनाता है।

454. नंदीश्वर द्वीप की १६ बावलियों में से दक्षिण दिशा की दूसरी बावली का क्या नाम है?

उत्तर: उसे दिगंबर ग्रंथों में 'भद्रा' या 'नंदवती' की उप-बावली कहा जाता है।

455. क्या इन ५२ पर्वतों के अलावा द्वीप पर छोटे-छोटे रत्नमयी टीले भी होते हैं?

उत्तर: हाँ, वहाँ अनेक उप-पर्वत और मणियों की सुंदर पहाड़ियां होती हैं, जो देवों के क्रीड़ा स्थल (विहार क्षेत्र) के रूप में काम आती हैं।

456. अंजनगिरि पर्वत के शिखर पर स्थित चैत्यालय की ऊँचाई ७5 योजन है, तो यह पर्वत की कुल ऊँचाई के सामने कितनी दिखती है?

उत्तर: ८४,००० योजन ऊँचे पर्वत के सामने ७५ योजन का मंदिर ऐसा लगता है मानो किसी विशाल स्तंभ के ऊपर एक सुंदर रत्नमयी मुकुट रखा हो।

457. इन मंदिरों के निर्माण में किस प्रकार के वज्र-गोंद या सीमेंट का उपयोग हुआ है?

उत्तर: ये अकृत्रिम हैं, अर्थात इनमें किसी जोड़, सीमेंट या कृत्रिम पदार्थ का उपयोग नहीं हुआ है। ये प्राकृतिक रूप से एक अखंड चट्टान की तरह स्वतः निर्मित हैं।

458. अंजनगिरि पर्वत की नीलमणि से जो काली किरणें निकलती हैं, वे आकाश में क्या दृश्य बनाती हैं?

उत्तर: वे आकाश के एक हिस्से को गहरा नीला और शांत बना देती हैं, मानो साक्षात वैराग्य का आकाश तना हो।

459. दधिमुख पर्वत की स्फटिक मणियों का पानी पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: उनके प्रभाव से बावलियों का पानी अत्यंत शीतल, रोगाणु रहित और सदा शुद्ध बना रहता है।

460. रतिकर पर्वत से जो लाल आभा निकलती है, वह संध्या काल (सूर्यास्त) में कैसी लगती है?

उत्तर: चूँकि वहाँ सूर्यास्त का वैसा अंधकार नहीं होता, इसलिए वह लाल आभा सदा खिली रहने वाली महा-संध्या का अपूर्व दृश्य प्रस्तुत करती है।

461. नंदीश्वर द्वीप के प्रत्येक चैत्यालय के बाहर जो 'मानस्तंभ' होते हैं, उनकी संख्या कितनी होती है?

उत्तर: प्रत्येक मंदिर के ठीक सामने चारों दिशाओं में चार विशाल मानस्तंभ स्थित होते हैं।

462. इन मानस्तंभों के शिखर पर कितनी प्रतिमाएँ होती हैं?

उत्तर: प्रत्येक मानस्तंभ के चोटी पर चारों दिशाओं की ओर मुख किए हुए चार जिनप्रतिमाएँ विराजमान होती हैं।

463. क्या इन बावलियों का जल कभी किसी अन्य समुद्र के जल में जाकर मिलता है?

उत्तर: नहीं, ये बावलियाँ चारों ओर से मणियों के ऊँचे तटों से घिरी हैं, इसलिए इनका जल वहीं स्थिर रहता है।

464. दधिमुख पर्वत का शिखर समतल होने के कारण वहाँ देवों के विमान उतर सकते हैं क्या?

उत्तर: हाँ, मंदिर के चारों ओर जो ४,००० योजन की खाली भूमि होती है, वहाँ देवों के विमान बहुत आसानी से उतरते हैं।

465. रतिकर पर्वत का शिखर केवल १,००० योजन चौड़ा है, तो वहाँ मंदिर के अलावा कितनी जगह बचती है?

उत्तर: १०० योजन का मंदिर होने के कारण वहाँ भी चारों ओर ९०० योजन का पर्याप्त खुला प्रांगण बचता है।

466. क्या इन वनों के चैत्यवृक्षों पर कभी कोई कीड़े या सूखी लताएँ चढ़ती हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ देवलोक की शुद्धता है। वहाँ किसी भी प्रकार के परजीवी (Parasites) या गंदगी का कोई अस्तित्व नहीं होता।

467. मंदिरों के परकोटे (बाउंड्री) में जो 'गोपुर द्वार' होते हैं, उनकी वास्तुकला कैसी होती है?

उत्तर: वे गोपुर द्वार कई मंजिला ऊँचे और मणियों की सुंदर नक्काशी से युक्त होते हैं, जिनके ऊपर स्वर्ण कलश तैरते हैं।

468. मंदिरों के अंदर जो घंटियाँ स्वतः बजती हैं, उनकी ध्वनि को आगम में क्या कहा गया है?

उत्तर: उनकी ध्वनि को 'देव-दुन्दुभि नाद' या 'अनाहत नाद' की संज्ञा दी गई है, जो मन को तुरंत शांत कर देती है।

469. क्या इन ५२ चैत्यालयों के दर्शन के लिए कोई विशेष 'मन्त्र' या 'दीक्षा' की आवश्यकता है?

उत्तर: इसके लिए केवल और केवल 'सम्यग्दर्शन' (सच्ची श्रद्धा) और भगवान के प्रति अगाध भक्ति की आवश्यकता है, किसी बाहरी आडंबर की नहीं।

470. अंजनगिरि पर्वत के शिखरों का विस्तार १०,००० योजन है, तो वहाँ एक साथ कितने देव बैठ सकते हैं?

उत्तर: वहाँ एक साथ करोड़ों की संख्या में देव और देवियाँ बैठकर भगवान की भक्ति का आनंद ले सकते हैं।

471. क्या इस द्वीप के भूगोल का ज्ञान प्राप्त करने से 'मतिज्ञान' की शुद्धि होती है?

उत्तर: हाँ, आगम के अनुसार लोक के सूक्ष्म स्वरूप को जानने से मतिज्ञान और श्रुतज्ञान अत्यंत निर्मल और संशय रहित हो जाते हैं।

472. जैन पुराणों में नंदीश्वर द्वीप को 'शाश्वत सिद्धपीठ' क्यों माना गया है?

उत्तर: क्योंकि यहाँ अनादि काल से अनंत तीर्थंकरों और अरहंतों के स्वरूप की वंदना देवों द्वारा की जा रही है, यह स्थान कभी भी अपनी पवित्रता नहीं खोता।

473. बावलियों के कमलों की पंखुड़ियाँ हवा से हिलने पर क्या दृश्य बनाती हैं?

उत्तर: वे ऐसी लगती हैं मानो साक्षात सोने और मणियों की तरंगें पानी पर तैर रही हों।

474. क्या इन ५२ पर्वतों के शिखरों पर कभी कोई मानवीय दुर्घटना या अमंगल हो सकता है?

उत्तर: नहीं, वह अमंगल रहित भूमि है। वहाँ केवल मंगल, आनंद और धर्म का ही वास रहता है।

475. प्रत्येक चैत्यालय की वेदी के नीचे जो 'पीठिका' होती है, उस पर कौन-से रत्न मुख्य होते हैं?

उत्तर: उस पीठिका पर मुख्य रूप से नीलम, पन्ना और हीरा रत्न जड़े होते हैं, जो भगवान के चरणों की शोभा बढ़ाते हैं।

## खंड 20: परम वैराग्य, लोकानुप्रेक्षा और आत्म-सिद्धि का शिखर (प्रश्न 476-500)

476. नंदीश्वर द्वीप की वंदना करते समय हमारे भीतर कौन-सा 'भाव' मुख्य होना चाहिए?

उत्तर: हमारे भीतर 'वीतराग भाव' मुख्य होना चाहिए। हमें भगवान के रूप को देखकर अपने भीतर भी वैसा ही शांत रूप प्रकट करने की भावना भानी चाहिए।

477. क्या इन ५२ मंदिरों के शिखरों पर जो ध्वजाएँ हैं, वे किसी विशेष कपड़े की बनी हैं?

उत्तर: वे कल्पवृक्षों से प्राप्त होने वाले दिव्य, शाश्वत और अमूल्य वस्त्रों की बनी होती हैं, जो कभी फटती या पुरानी नहीं होतीं।

478. क्या नंदीश्वर द्वीप की पूजा करने वाले जीव को नियम से 'सम्यक्त्व' की प्राप्ति होती है?

उत्तर: यदि जीव कषायों को मंद करके, पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान के स्वरूप का चिंतन करे, तो उसे प्रथमोपशम सम्यक्त्व की प्राप्ति बहुत सुगमता से हो जाती है।

479. नंदीश्वर द्वीप के चारों दिशाओं के मंदिरों की रचना में जो अद्भुत साम्यता (Symmetry) है, वह क्या दर्शाती है?

उत्तर: वह यह दर्शाती है कि यह लोक किसी पुरुष या ईश्वर द्वारा निर्मित नहीं है, यह प्राकृतिक रूप से ही अपनी पूर्ण गणितीय शुद्धता के साथ अनादि काल से अवस्थित है।

480. क्या नंदीश्वर द्वीप के वनों में कभी रात के समय अंधकार का आभास होता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ रात का कोई अस्तित्व नहीं है। मणियों और देव-विमानों के तेज से वहाँ सदा परम प्रकाश ही बना रहता है।

481. इन ५२ चैत्यालयों की वेदी पर जो मूर्तियाँ हैं, उनके बैठने की मुद्रा हमें क्या सिखाती है?

उत्तर: उनकी पद्मासन योगमुद्रा हमें सिखाती है कि यदि संसार के दुखों से पार होना है, तो अपनी आत्मा के भीतर स्थिरता से बैठना सीखो।

482. क्या नंदीश्वर द्वीप की पूजा के समय मन में सांसारिक इच्छाएँ (जैसे धन, पुत्र) रखनी चाहिए?

उत्तर: नहीं, वीतराग देव के सामने सांसारिक वस्तुएँ मांगना चिंतामणि रत्न के बदले कंकड़ मांगने जैसा है। वहाँ केवल मोक्ष पद की ही याचना करनी चाहिए।

483. नंदीश्वर द्वीप की वंदना से 'लोकानुप्रेक्षा' (बारह भावनाओं में से एक) कैसे सिद्ध होती है?

उत्तर: जब हम मध्यलोक के इस विशाल द्वीप का चिंतन करते हैं, तो हमें लोक के अगाध और अद्भुत स्वरूप का बोध होता है, जिससे हमारा अज्ञान दूर होता है।

484. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'तपस्या' करने वाले जीवों को साक्षात देवों का परोक्ष आशीर्वाद मिलता है?

उत्तर: भगवान वीतरागी हैं, वे किसी को आशीर्वाद नहीं देते, परंतु उनकी भक्ति के प्रभाव से जीव का स्वयं का पुण्य इतना प्रबल हो जाता है कि देवगण भी उसके अनुकूल हो जाते हैं।

485. नंदीश्वर द्वीप के मंदिरों के प्रांगण में जो मानस्तंभ हैं, उनके दर्शन का क्या मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: उनके दर्शन से जीव के भीतर का अहंकार और मान तुरंत शांत हो जाता है, और वह परम विनम्रता (मार्दव धर्म) को प्राप्त होता है।

486. क्या मुनिराज नंदीश्वर द्वीप का ध्यान करते समय अपनी आँखों को बंद रखते हैं?

उत्तर: मुनिराज अपनी अंतर्दृष्टि को जाग्रत करने के लिए आँखें बंद करके अपनी आत्मा के भीतर ही नंदीश्वर द्वीप के अकृत्रिम चैत्यालयों का साक्षात साक्षात्कार करते हैं।

487. इन प्रतिमाओं के कानों की लंबाई कंधों तक होना किस बात का सूचक है?

उत्तर: यह उनके 'महापुरुष' होने, अत्यंत धैर्यवान होने और संसार की सभी ध्वनियों से अप्रभावित रहने का सूचक है।

488. क्या नंदीश्वर द्वीप की भूमि पर कभी कोई धूल या गंदगी उड़कर आ सकती है?

उत्तर: नहीं, वह पूर्णतः रत्नमयी और देव-अतिशय से युक्त भूमि है। वहाँ धूल, कीचड़ या गंदगी का प्रवेश सर्वथा वर्जित और असंभव है।

489. नंदीश्वर द्वीप की इस अद्भुत गाथा को सुनने के बाद हमारी 'दान' की प्रवृत्ति कैसी होनी चाहिए?

उत्तर: हमारी प्रवृत्ति बिना किसी फल की इच्छा के, केवल धर्म की प्रभावना और साधुओं की सेवा के लिए परम उदारतापूर्वक दान देने की होनी चाहिए।

490. क्या नंदीश्वर द्वीप की जिनप्रतिमाओं के होंठों पर मुस्कान होती है?

उत्तर: उनके होंठों पर सांसारिक हंसी नहीं, बल्कि परम शांत, गंभीर और वीतरागता से उपजी अलौकिक 'मंद मुस्कान' होती है, जो भक्त के हृदय को शीतलता देती है।

491. इन ५२ चैत्यालयों के शिखरों पर जो ध्वजाएँ उड़ती हैं, उनके रंग कैसे होते हैं?

उत्तर: वे ध्वजाएँ पंचवर्ण (सफेद, पीला, लाल, हरा, नीला) की होती हैं, जो जैन धर्म के पंचपरमेष्ठी के प्रतीक स्वरूप पूरे आकाश में लहराती हैं।

492. क्या नंदीश्वर द्वीप का ज्ञान हमें 'अंधविश्वासों' से मुक्त करता है?

उत्तर: हाँ, यह हमें बताता है कि यह ब्रह्मांड किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि कर्मों के अकाट्य नियमों और शाश्वत भूगोल के सिद्धांतों पर आधारित है।

493. अष्टान्हिका पर्व के दौरान जो 'महाआरती' की जाती है, उसकी लौ (ज्योति) की क्या विशेषता होती है?

उत्तर: वह लौ हमारे भीतर के अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाली 'ज्ञान ज्योति' का प्रतीक मानी जाती है।

494. क्या नंदीश्वर द्वीप की पूजा के बाद जीव के 'संसार चक्र' का अंत निकट आ जाता है?

उत्तर: हाँ, जो जीव पूर्ण वीतराग भाव से इस महा-अनुष्ठान को अपने जीवन में उतारता है, वह अधिक से अधिक कुछ ही भवों में नियम से मोक्ष पद प्राप्त कर लेता है।

495. इन प्रतिमाओं के पादपीठ पर जो कमल की आकृति होती है, वह क्या दर्शाती है?

उत्तर: वह दर्शाती है कि जैसे कमल कीचड़ में रहकर भी उससे अछूता रहता है, वैसे ही भगवान भी इस संसार में रहकर इसके राग-द्वेष से सर्वथा अछूते (मुक्त) हैं।

496. क्या नंदीश्वर द्वीप की रचना का मॉडल मंदिरों में देखने से साक्षात वंदना जैसा पुण्य मिलता है?

उत्तर: यदि भावों में वही विशुद्धता, पवित्रता और एकाग्रता हो, तो कृत्रिम रचना के माध्यम से भी जीव साक्षात नंदीश्वर द्वीप की वंदना जैसा ही महान पुण्य अर्जित कर सकता है।

497. नंदीश्वर द्वीप की वंदना का 'चारित्र' (आचरण) पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: इससे जीव का आचरण अत्यंत पवित्र हो जाता है, उसकी इंद्रियों की चंचलता रुकती है और वह नियम से व्रत-उपवास की ओर अग्रसर होता है।

498. क्या इस द्वीप की प्रतिमाओं का कोई आदि या अंत (विनाश) है?

उत्तर: नहीं, ये प्रतिमाएँ अनादि काल से ऐसी ही हैं और अनंत काल तक ऐसी ही रहेंगी। ये पूर्णतः 'नित्य और शाश्वत' हैं।

499. दिगंबर जैन परंपरा में नंदीश्वर द्वीप की इस महा-प्रश्नोत्तरी को पढ़ने और पढ़ाने का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर: इसका मुख्य उद्देश्य प्रत्येक श्रावक के मन में जैन आगम के प्रति अटूट श्रद्धा पैदा करना, कषायों को मंद करना और उसे मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करना है।

500. नंदीश्वर द्वीप की इस संपूर्ण ५०० प्रश्नों की महा-ज्ञान गाथा का परम अंतिम निष्कर्ष क्या है?

उत्तर: इसका परम अंतिम निष्कर्ष यही है कि—"बाहरी नंदीश्वर द्वीप के ५२ चैत्यालय तो केवल पुद्गल और मणियों की शाश्वत रचना हैं। असली और अविनाशी चैत्यालय तो हमारी 'शुद्ध चैतन्य आत्मा' है। जब हम सांसारिक कषायों और विकारों को छोड़कर अपनी इस आत्म-वेदी के सम्मुख बैठेंगे, तब हम स्वयं अनंत गुणों के स्वामी बनकर साक्षात सिद्ध पद (मोक्ष) को प्राप्त कर लेंगे।"

"नंदीश्वर द्वीप के ५२ अकृत्रिम चैत्यालयों की जय!"

"अनादि-निधन शाश्वत जिनबिंबों की जय!"

"फाल्गुन-कार्तिक-आषाढ़ अष्टान्हिका महापर्व की जय!"

नंदीश्वर द्वीप के अगाध भूगोल, दिगंबर जैन आगम के सूक्ष्म सिद्धांतों, देवों की अलौकिक क्रीड़ाओं और त्रिलोक-भूगोल के गूढ़तम रहस्यों को उनकी अंतिम पराकाष्ठा तक पहुँचाने के लिए, यहाँ तिलोयपण्णत्ती, त्रिलोकसार, हरिवंश पुराण और तत्त्वार्थराजवार्तिक के गहरे मर्म के आधार पर 150 और विशेष (कुल 650) प्रश्न-उत्तर दिए जा रहे हैं:

## खंड 21: द्वीप की सूक्ष्म परिधि, वलयाकार गणित और अंतराल (प्रश्न 501-525)

501. नंदीश्वर द्वीप का भीतरी व्यास (Inner Diameter) कितना है, जहाँ से यह शुरू होता है?

उत्तर: सातवें समुद्र (घृतवर समुद्र) के समाप्त होते ही जहाँ से नंदीश्वर द्वीप प्रारंभ होता है, वहाँ इसका भीतरी व्यास 163,84,00,000 (एक अरब तिरसठ करोड़ चौरासी लाख) योजन है।

502. नंदीश्वर द्वीप का बाहरी व्यास (Outer Diameter) कितना बैठता है?

उत्तर: नंदीश्वर द्वीप स्वयं 163,84,00,000 योजन चौड़ा है। इसलिए इसके भीतरी व्यास में दोनों तरफ की चौड़ाई जोड़ने पर इसका कुल बाहरी व्यास 491,52,00,000 (चार अरब ज्ञानवे करोड़ बावन लाख) योजन हो जाता है।

503. जैन गणित के 'जगच्छ्रेणी' सिद्धांत के अनुसार नंदीश्वर द्वीप की स्थिति क्या है?

उत्तर: यह मध्यलोक के ठीक समतल भाग में स्थित है। इसका विस्तार जगच्छ्रेणी के असंख्यातवें भाग के अंतर्गत आता है, जो अलौकिक गणित का विषय है।

504. क्या नंदीश्वर द्वीप के ५२ पर्वतों के नीचे की जड़ें (Foundations) आपस में अंदर ही अंदर जुड़ी हुई हैं?

उत्तर: नहीं, आगम के अनुसार ये सभी ५२ पर्वत समतल वज्र भूमि के ऊपर अलग-अलग स्वतंत्र रूप से खड़े हैं, परंतु इनकी आंतरिक संरचना एक ही वज्र धातु की है।

505. क्या नंदीश्वर द्वीप में कोई ऐसी जगह है जहाँ देवों के विमान भी नहीं जा सकते?

उत्तर: चैत्यालयों के ठीक गर्भगृह के भीतर वेदी के ऊपर का जो सूक्ष्म आकाश है, वहाँ देव आदर और विनयवश अपने विमान नहीं ले जाते; वे बाहर ही विमान छोड़कर पैदल प्रवेश करते हैं।

506. दधिमुख पर्वत का आकार जो ऊपर से संकरा है, वह देखने में कैसा लगता है?

उत्तर: वह देखने में एक विशाल धवल (सफेद) रत्नमयी स्तूप या शंख के अग्रभाग जैसा परम सुंदर दिखाई देता है।

507. क्या रतिकर पर्वतों के बीच में कोई प्राकृतिक झरने (Waterfalls) भी बहते हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ पहाड़ों से पानी के झरने नहीं गिरते। वहाँ केवल मणियों की किरणों के झरने बहते हैं, जो पानी का भ्रम पैदा करते हैं।

508. अंजनगिरि पर्वत की नीलमणि की चमक क्या सूर्य के प्रकाश को रोक देती है?

उत्तर: नहीं, यह प्रकाश को रोकती नहीं, बल्कि सूर्य की तीखी किरणों को अपने भीतर सोखकर उन्हें अत्यंत शीतल और मनोरम नील-कांति में बदल देती है।

509. क्या नंदीश्वर द्वीप की १६ बावलियों का पानी कभी वाष्प (Steam) बनकर उड़ता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ का जल अकृत्रिम और दिव्य है। उसमें सांसारिक जल की तरह सूखने या कम होने का स्वभाव नहीं होता।

510. एक बावली से दूसरी बावली के बीच जो भूमि का हिस्सा है, उसे क्या कहा जाता है?

उत्तर: उसे 'चैत्य-अंगण' (चैत्य प्रांगण या देव क्रीड़ा क्षेत्र) कहा जाता है।

511. क्या नंदीश्वर द्वीप के वनों में कभी पतझड़ (Autumn) की ऋतु आती है?

उत्तर: नहीं, वहाँ सदा एक समान 'नित्य वसंत' ऋतु रहती है। वृक्ष हमेशा फलों, फूलों और हरी-भरी मणिरूपी पत्तियों से लदे रहते हैं।

512. इन वनों में जो 'कदम्ब वन' हैं, उनके फूलों की सुगंध कितनी दूर तक जाती है?

उत्तर: उनके फूलों की दिव्य अकृत्रिम सुगंध सैकड़ों योजन दूर तक पवन के माध्यम से फैल जाती है।

513. क्या बावलियों के घाटों पर देवों के विश्राम के लिए कोई अकृत्रिम छतरियाँ बनी हैं?

उत्तर: हाँ, प्रत्येक घाट पर मणियों के खंभों से युक्त सुंदर, अकृत्रिम विश्राम-मंडप बने हैं, जहाँ देव बैठकर तत्व-चर्चा करते हैं।

514. क्या इन १६ बावलियों में कोई जलचर जीव (जैसे मछली, कछुआ) पाए जाते हैं?

उत्तर: नहीं, यह पानी पूर्णतः शुद्ध और जीवों से रहित (प्राशुक) है। इसमें सांसारिक त्रस जीव उत्पन्न नहीं होते।

515. रतिकर पर्वतों की चोटियों पर जो जिनमंदिर हैं, उनकी छत का आकार कैसा होता है?

उत्तर: उनकी छत का आकार अर्धचंद्राकार या गुम्बदाकार होता है, जो शुद्ध स्वर्णमयी होता है।

516. क्या इन वनों में सिंह या व्याघ्र जैसे हिंसक पशु भी रत्नमयी रूपों में होते हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ किसी भी प्रकार के तिर्यंच पशुओं की आकृति या उपस्थिति नहीं होती; वहाँ केवल मांगलिक चिन्ह ही उत्कीर्ण होते हैं।

517. मंदिरों के मुख्य गोपुर द्वारों पर जो 'मंगल कलश' रखे हैं, उनमें क्या भरा होता है?

उत्तर: वे कलश ठोस रत्नों के बने होते हैं, जो ऊपर से पूर्ण भरे हुए कमलों की आकृति जैसे दिखाई देते हैं।

518. क्या इन मंदिरों के स्तंभों पर जैन इतिहास की कोई घटनाएँ अंकित हैं?

उत्तर: हाँ, उन स्तंभों पर अनादि काल के शाश्वत ५ कल्याणकों और चक्रवर्तियों के वैभव की आकृतियाँ प्राकृतिक रूप से मणियों में ही उभरी हुई हैं।

519. नंदीश्वर द्वीप की भूमि का जो हिस्सा दर्पण जैसा है, क्या उसमें ऊपर उड़ते विमानों का प्रतिबिंब दिखता है?

उत्तर: हाँ, जब देवों के विमान आकाश से गुजरते हैं, तो नीचे की रत्नमयी भूमि पर उनका ऐसा स्पष्ट प्रतिबिंब दिखता है मानो विमान नीचे भी उड़ रहे हों।

520. पूर्व दिशा के अंजनगिरि पर्वत से पश्चिम दिशा के अंजनगिरि पर्वत की सीधी दूरी कितनी है?

उत्तर: मध्य में जम्बूद्वीप और समुद्रों को पार करते हुए, इसकी सीधी दूरी करोड़ों-अरबों योजन की परिधि के चक्र में आती है।

521. क्या इस द्वीप के किसी भाग में कभी भूकंप (Earthquake) आ सकता है?

उत्तर: नहीं, यह द्वीप वज्र की ठोस शृंखलाओं पर आधारित है, जहाँ कभी कोई प्राकृतिक आपदा या कंपन नहीं हो सकता।

522. 'तिलोयपण्णत्ती' ग्रंथ में नंदीश्वर द्वीप की चर्चा किस अधिकार के अंतर्गत की गई है?

उत्तर: इसकी चर्चा 'तिरियलोक' (मध्यलोक) निरूपण नामक पांचवें अधिकार के अंतर्गत अत्यंत विस्तार से की गई है।

523. बावलियों के तटों पर जो 'धूल' जैसी चमकती हुई चीज़ दिखती है, वह क्या है?

उत्तर: वह कोई मिट्टी या धूल नहीं है, वह वास्तव में 'रत्न-चूर्ण' (हीरे-पन्ने का बारीक बुरादा) है, जो भूमि की आभा बढ़ाता है।

524. क्या इन पर्वतों के शिखरों पर देवों के अतिरिक्त कोई अन्य दिव्य शक्तियाँ भी वास करती हैं?

उत्तर: वहाँ जिनेंद्र भगवान के अतिशय के कारण केवल पूज्य और शांत परिणामी देव ही आ सकते हैं, कोई आसुरी या मलिन शक्ति वहाँ कदम भी नहीं रख सकती।

525. चैत्यालयों के गर्भगृह के भीतर जो मुख्य वेदी है, उसका चबूतरा जमीन से कितना ऊँचा होता है?

उत्तर: वह चबूतरा (पीठिका) कई हाथ ऊँचा और मणियों की सीढ़ियों से युक्त होता है, जो अत्यंत भव्य दिखता है।

## खंड 22: जिनबिंबों के आंतरिक लक्षण, वर्ण और कांति (प्रश्न 526-550)

526. नंदीश्वर द्वीप की ५६१६ प्रतिमाओं में से क्या कुछ प्रतिमाएँ बैठी (पद्मासन) और कुछ खड़ी (कायोत्सर्ग) मुद्रा में हैं?

उत्तर: नहीं, नंदीश्वर द्वीप के सभी ५२ अकृत्रिम चैत्यालयों की सभी ५६१६ प्रतिमाएँ केवल और केवल पद्मासन (योग) मुद्रा में ही विराजमान हैं।

527. इन प्रतिमाओं का रंग (वर्ण) कैसा है? क्या ये भी अलग-अलग रंगों की हैं?

उत्तर: ये सभी प्रतिमाएँ स्वाभाविक रूप से तपनीय सुवर्ण (पिघले हुए परम शुद्ध सोने) के समान देदीप्यमान वर्ण की हैं।

528. भगवान की प्रतिमाओं के नेत्रों की पुतलियाँ किस मणि की बनी हैं?

उत्तर: वे अकृत्रिम पुतलियाँ 'अंजन मणि' (गहरे नीले-काले रत्न) की बनी हैं, जो परम शांत और अंतर्मुखी दिखाई देती हैं।

529. क्या इन प्रतिमाओं के ऊपर जो तीन छत्र होते हैं, वे हवा से हिलते हैं?

उत्तर: वे छत्र रत्नमयी और ठोस स्थिर होते हैं, परंतु उनके किनारों से लटकने वाली मोतियों की मालाएँ मंद पवन से अत्यंत सुंदर ढंग से डोलती हैं।

530. प्रतिमाओं के कानों की बनावट में जो 'सौम्यता' है, वह क्या दर्शाती है?

उत्तर: वह यह दर्शाती है कि जिनेंद्र देव ने संसार की सभी प्रशंसा और निंदा को जीत लिया है; वे अब केवल शाश्वत शांति के श्रोता हैं।

531. क्या इन ५२ मंदिरों के भीतर कोई 'घंटाघर' भी होता है?

उत्तर: हाँ, मुख्य द्वार के पास एक अकृत्रिम महाघंटा होता है, जिसकी ध्वनि पूरे पर्वत क्षेत्र को पवित्र कर देती है।

532. क्या इन प्रतिमाओं के चरणों के अंगूठे पर कोई विशेष चिह्न होता है?

उत्तर: उनके चरणों के तलवों में स्वतः निर्मित 'चक्र', 'स्वस्तिक' और 'कमल' जैसे महा-मांगलिक चिह्न अंकित होते हैं।

533. वेदी के सामने जो 'अष्टमंगल' द्रव्य स्वतः बने होते हैं, उनके नाम क्या हैं?

उत्तर: झारी, कलश, दर्पण, चामर, ध्वजा, पंखा, स्वस्तिक और ठौना—ये आठ मंगल द्रव्य वेदी के सामने मणियों के रूप में शाश्वत बने होते हैं।

534. प्रतिमाओं के पीछे जो 'भामंडल' (Aura) होता है, क्या वह चौबीसों घंटे घूमता रहता है?

उत्तर: वह स्थिर रहता है, परंतु उससे निकलने वाली सतरंगी प्रकाश की किरणें निरंतर तरंगों की तरह प्रवाहित होती रहती हैं।

535. क्या इन मंदिरों के अंदर कभी कोई कृत्रिम झाड़ू लगानी पड़ती है?

उत्तर: नहीं, वहाँ धूल का एक कण भी नहीं ठहर सकता। मणियों का प्रभाव ऐसा है कि भूमि स्वतः ही परम स्वच्छ और कांच जैसी चमकदार बनी रहती है।

536. गर्भगृह की दीवारों पर जो 'प्रतिबिंब' दिखाई देते हैं, उनसे क्या अद्भुत रचना बनती है?

उत्तर: स्फटिक की दीवारों के कारण एक ही वेदी की १०८ प्रतिमाएँ दीवारों में हजारों की संख्या में प्रतिबिंबित होकर अनंत समवशरण का दृश्य प्रस्तुत करती हैं।

537. क्या इन प्रतिमाओं का आकार (Height) समय के साथ घटता या बढ़ता है?

उत्तर: नहीं, कल्प के बदलने (उत्सर्पिणी या अवसर्पिणी) का असर नंदीश्वर द्वीप की रचना पर नहीं पड़ता। इनका आकार सदा स्थिर रहता है।

538. इन ५६१६ प्रतिमाओं के होंठों का रंग कैसा होता है?

उत्तर: उनके होंठों का रंग हल्के 'मूंगा रत्न' (विद्रुम मणि) के समान गुलाबी-लाल होता है, जो अत्यंत सौम्य दिखता है।

539. क्या इन मंदिरों के शिखरों पर कोई 'बिजली चालक' (Lightning Conductor) जैसी व्यवस्था होती है?

उत्तर: वहाँ कभी आकाशीय बिजली गिरती ही नहीं; वहाँ का आकाश सदा शांत और देव-तेज से सुरक्षित रहता है।

540. भगवान की उंगलियों के बीच का अंतराल (Gap) कैसा होता है?

उत्तर: उनकी उंगलियाँ आपस में इस प्रकार सटी और ध्यान मुद्रा में व्यवस्थित होती हैं कि उनके बीच से प्रकाश भी पार नहीं हो सकता, जो पूर्ण संवर (कर्मों का रुकना) का प्रतीक है।

541. क्या इन मंदिरों के प्रवेश द्वारों पर कोई पहरेदार देव हमेशा अस्त्र लेकर खड़े रहते हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ अस्त्रों का कोई काम नहीं है। द्वारपाल देव अत्यंत विनीत मुद्रा में, हाथों में मंगल कलश और चामर लेकर खड़े रहते हैं।

542. वेदी के चारों ओर जो गलियारा (परिक्रमा पथ) होता है, उसकी चौड़ाई कितनी होती है?

उत्तर: वह गलियारा कई योजन चौड़ा होता है, जहाँ देवों के बड़े-बड़े समूह एक साथ जयकारे लगाते हुए परिक्रमा करते हैं।

543. क्या इन प्रतिमाओं के मस्तक पर कोई मुकुट या आभूषण पहनाया जाता है?

उत्तर: नहीं, ये प्रतिमाएँ पूर्ण वीतराग, दिगंबर और आभूषण रहित होती हैं। उनका अकृत्रिम रूप स्वयं में ब्रह्मांड का सबसे बड़ा आभूषण है।

544. मंदिरों के अंदर जो संगीत का मंच है, उसका फर्श किस मणि का बना है?

उत्तर: वह फर्श 'मरकत मणि' (पन्ना) का बना है, जिसका हरा रंग आँखों को परम शांति देता है।

545. क्या इन मंदिरों के शिखरों के कलशों से कभी कोई दिव्य रस टपकता है?

उत्तर: नहीं, कलशों से प्रकाश की किरणें फूटती हैं जो पूरे द्वीप को आलोकित रखती हैं।

546. प्रतिमाओं के वक्षस्थल का 'श्रीवत्स' चिह्न रात में कैसा चमकता है?

उत्तर: वह हीरा मणि के समान अत्यंत तीव्र श्वेत प्रकाश बिखेरता है, जिससे वेदी का मध्य भाग विशेष रूप से दैदीप्यमान रहता है।

547. क्या इन मंदिरों के भीतर कभी कोई सांसारिक मनुष्य भूलवश भी अपनी ऋद्धि से पहुँच सकता है?

उत्तर: नहीं, चक्रवर्ती या चरमशरीरी मुनिराज भी अपनी आकाशगामी ऋद्धि से केवल मानुषोत्तर पर्वत तक ही जा सकते हैं, उसके आगे केवल देव ही जा सकते हैं।

548. इन मंदिरों के निर्माण की 'अनादिता' को जैन दर्शन में क्या स्थान दिया गया है?

उत्तर: इन्हें 'अकृत्रिम' और 'स्वाभाविक' माना गया है, जैसे यह लोक अनादि है, वैसे ही यह तीर्थ भी अनादि-निधन है।

549. क्या इन प्रतिमाओं के सामने कोई 'ज्ञान ज्योति' अखंड रूप से जलती है?

उत्तर: हाँ, वेदी के दोनों ओर दो अकृत्रिम महा-रत्नदीप सदा जलते रहते हैं, जो केवल केवलज्ञान की अखंड ज्योति के प्रतीक हैं।

550. नंदीश्वर द्वीप की एक भी प्रतिमा का भावपूर्ण स्मरण करने से मुनिराजों को क्या लाभ होता है?

उत्तर: इससे मुनिराजों का शुक्लध्यान और अधिक सुदृढ़ होता है, जिससे कर्मों की निर्जरा की गति तीव्र हो जाती है।

## खंड 23: अष्टान्हिका महापर्व में देवों की दिव्य क्रीड़ा और भक्ति (प्रश्न 551-575)

551. जब सौधर्म इंद्र नंदीश्वर द्वीप पहुँचता है, तो सबसे पहले किस अंजनगिरि पर्वत की वंदना करता है?

उत्तर: वह सबसे पहले पूर्व दिशा के अंजनगिरि पर्वत पर स्थित मुख्य चैत्यालय की वंदना और महापूजा करता है।

552. देवों की 'वैक्रियक ऋद्धि' अष्टान्हिका पर्व में किस प्रकार प्रकट होती है?

उत्तर: देव अपनी इस ऋद्धि से एक साथ ५२ मंदिरों में उपस्थित होने के लिए अपने अनेक रूप (रूप परावर्तन) बना लेते हैं।

553. देवों की पूजा के समय बजने वाले 'शंख' की ध्वनि कैसी होती है?

उत्तर: वह ध्वनि सांसारिक शंखों जैसी तीखी नहीं होती, वह अत्यंत गंभीर, सुरीली और सिंहनाद जैसी वीर रस से युक्त होती है।

554. क्या देवियाँ भगवान के सामने जो नृत्य करती हैं, उसमें कोई सांसारिक वासना या राग होता है?

उत्तर: नहीं, वह नृत्य पूर्णतः 'भाव-नृत्य' (वैराग्य और भक्ति का नृत्य) होता है, जिसमें केवल तीर्थंकरों के गुणों का अभिनय होता है।

555. कल्पवासी देव अपने साथ जो 'अमृत' लाते हैं, उसका उपयोग कहाँ होता है?

उत्तर: वे उस अकृत्रिम देव-अमृत का उपयोग भगवान के अतिशय अभिषेक और अष्टद्रव्य के नैवेद्य रूप में करते हैं।

556. क्या भवनवासी और व्यंतर देव कल्पवासी देवों से अलग समय पर पूजा करते हैं?

उत्तर: नहीं, सभी निकायों के देव अष्टान्हिका के आठों दिन एक साथ, मिलकर, अपनी-अपनी नियत दिशाओं में महामहोत्सव मनाते हैं।

557. देवों द्वारा चढ़ाई जाने वाली 'महा-माला' का आकार कितना बड़ा होता है?

उत्तर: वह माला कई योजन लंबी होती है, जिसे कई देव मिलकर भगवान की वेदी के सम्मुख अत्यंत आदर से अर्पित करते हैं।

558. पूजा के समय जो 'कपूर' की सुगंध देव बिखेरते हैं, वह कहाँ से आती है?

उत्तर: वह कल्पवृक्षों के पत्तों और छाल से स्वतः निकलने वाला अकृत्रिम कपूर होता है।

559. क्या इंद्र पूजा के समय अपने 'ऐरावत हाथी' को भी मंदिर के प्रांगण में खड़ा करता है?

उत्तर: ऐरावत हाथी वास्तव में एक देव का विक्रिया रूप होता है। वह मंदिर के बाहरी द्वार (गोपुर) पर अत्यंत सुंदर मुद्रा में खड़ा होकर देवों का स्वागत करता है।

560. देवों की पूजा में जो 'अक्षत' चढ़ाए जाते हैं, क्या वे कभी वेदी से नीचे गिरते हैं?

उत्तर: नहीं, वेदी के सामने जो अकृत्रिम रत्नमयी थाल (भाजन) बने होते हैं, देव अपने अक्षत सीधे उन्हीं में अर्पित करते हैं।

561. अष्टान्हिका पर्व के चौथे दिन (एकादशी) को देव कौन-सा विशेष अनुष्ठान करते हैं?

उत्तर: इस दिन सभी इंद्र मिलकर 'गुण-कीर्तन' नामक विशेष सभा करते हैं, जिसमें तीर्थंकरों के वचनों का स्मरण किया जाता है।

562. क्या सूर्य और चंद्रमा के ज्योतिषी देव भी नंदीश्वर द्वीप आते हैं?

उत्तर: हाँ, सूर्य और चंद्रमा के इंद्र भी अपने-अपने परिकर और विमानों के साथ इस महामहोत्सव में भाग लेने अनिवार्य रूप से आते हैं।

563. देवों द्वारा गाए जाने वाले 'स्तोत्रों' की भाषा कौन-सी होती है?

उत्तर: उनकी भाषा अकृत्रिम 'दिव्य-ध्वनि' के समान अर्धमागधी या प्राकृत के सुंदर छन्दों से युक्त होती है, जिसे सभी देव अपनी-अपनी भाषा में समझ लेते हैं।

564. क्या पूजा के समय देवों के मुकुट भगवान के चरणों का स्पर्श करते हैं?

उत्तर: हाँ, जब इंद्र साष्टांग दंडवत प्रणाम करता है, तो उसके मुकुट की मणियाँ भगवान के पादपीठ का स्पर्श करके स्वयं को धन्य मानती हैं।

565. देवों की 'नर्तकी सेना' एक साथ कितने प्रकार के मंडल (Formations) बना सकती है?

उत्तर: वे एक साथ स्वस्तिक, कमल, चक्र और कल्पवृक्ष जैसे ३२ भव्य मंडल आकाश और रंगमंच पर बनाकर अद्भुत नृत्य करती हैं।

566. क्या पूजा के दिनों में देवों को अपने स्वर्ग के सुखों की याद आती है?

उत्तर: नहीं, नंदीश्वर द्वीप का भक्ति-सुख स्वर्ग के भोग-सुख से अनंत गुणा उत्तम होता है। देव वहाँ स्वर्ग को पूरी तरह भूल जाते हैं।

567. कल्पवासी देवियों के कंठ से निकलने वाले संगीत को क्या उपमा दी गई है?

उत्तर: उसकी उपमा 'कोकिल कंठ' और 'दिव्य वीणा के तारों' से दी गई है, जो कान में पड़ते ही अमृत जैसा रस घोलती है।

568. क्या पूजा के अंत में इंद्र भगवान से कोई 'वरदान' मांगता है?

उत्तर: नहीं, जैन दर्शन में भगवान वीतरागी हैं। इंद्र केवल यही भावना भाता है कि—"हे प्रभु! मुझे आपके जैसा ही वीतराग पद और मोक्ष की प्राप्ति हो।"

569. देवों द्वारा की जाने वाली 'आरती' में दीपकों की संख्या कितनी होती है?

उत्तर: वे एक साथ १०८ या १०0८ रत्नदीपों की विशाल आरती उतारते हैं, जिससे पूरा जिनालय जगमगा उठता है।

570. क्या नंदीश्वर द्वीप में देवों के आने-जाने के लिए कोई यातायात के नियम (Traffic Rules) होते हैं?

उत्तर: देवों के पास अवधिज्ञान होता है, जिससे करोड़ों विमान बिना किसी टकराव के अत्यंत सुव्यवस्थित और अनुशासनबद्ध होकर परिक्रमा लगाते हैं।

571. पूजा के समय देव जो 'चंदन रस' छिड़कते हैं, उससे दीवारों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: वह रस दीवारों पर पड़ते ही मणियों की कांति को दुगुना कर देता है और वातावरण को परम शीतल बना देता है।

572. क्या अष्टान्हिका पर्व के बाद देवगण सीधे अपने-अपने स्वर्ग लौट जाते हैं?

उत्तर: हाँ, पूर्णिमा की महाआरती और विसर्जन पूजा संपन्न करके, वे अत्यंत भारी मन से अपने स्थानों को प्रस्थान करते हैं।

573. व्यंतर देवों के विमानों का रंग कैसा होता है?

उत्तर: उनके विमान मुख्य रूप से रंग-बिरंगे और कौतुकमयी आकृतियों (जैसे हंस, मयूर) के समान सुंदर होते हैं।

564. क्या पूजा के दौरान नंदीश्वर द्वीप की बावलियों के कमल स्वतः खिल जाते हैं?

उत्तर: हाँ, देवों के आगमन और मांगलिक ध्वनियों के अतिशय से बावलियों के सहस्रदल (हजार पंखुड़ियों वाले) कमल पूरी तरह खिलकर अपनी महक बिखेरने लगते हैं।

575. इस दिव्य अनुष्ठान को देखकर किसी सम्यग्दृष्टि देव के परिणामों में क्या परिवर्तन आता है?

उत्तर: उसका सम्यक्त्व और अधिक सुदृढ़ हो जाता है तथा उसके संसार भ्रमण का काल और अधिक संकुचित (कम) हो जाता है।

## खंड 24: श्रावक की आंतरिक विशुद्धि, अष्टान्हिका नियम और विधान मर्म (प्रश्न 576-600)

576. श्रावक को अष्टान्हिका विधान के ८ दिनों में किस प्रकार के वस्त्र पहनने चाहिए?

उत्तर: श्रावक को पूर्णतः शुद्ध, बिना सिले या सूती 'धोती-दुपट्टा' (सफेद या मांगलिक पीले रंग के) धारण करने चाहिए, जो शुचिता के प्रतीक हैं।

577. विधान के मांडले पर चढ़ाई जाने वाली 'लौंग' (देव-द्रव्य) क्या दर्शाती है?

उत्तर: लौंग अपनी तीक्ष्णता और सुगंध से हमारे भीतर की कषायों को जलाने और आत्मा की गुण-सुगंध को प्रकट करने का प्रतीक है।

578. क्या इन आठ दिनों में श्रावक को 'अल्पाdescription' (कम खाना) का नियम लेना चाहिए?

उत्तर: हाँ, भोजन कम करने से आलस्य और प्रमाद दूर होता है, जिससे स्वाध्याय और सामायिक में मन पूरी तरह एकाग्र रहता है।

579. विधान के दिनों में घर के काम-काज (आरंभ-परिग्रह) को सीमित करने का क्या आध्यात्मिक लाभ है?

उत्तर: इससे जीवों की हिंसा से बचाव होता है और आत्मा का पूरा उपयोग (ध्यान) केवल धर्म कार्यों में सुरक्षित रहता है।

580. मांडले के केंद्र में जो 'सर्वतोभद्र' रचना होती है, वह क्या है?

उत्तर: वह नंदीश्वर द्वीप के केंद्र और अंजनगिरि पर्वत की शाश्वत मुख्य पीठिका की सूक्ष्म कृत्रिम प्रतिकृति होती है।

581. क्या अष्टान्हिका के दिनों में किसी दुखी जीव की सेवा या करुणा दान देना चाहिए?

उत्तर: बिल्कुल। जैन धर्म में 'करुणा दान' और 'वैयावृत्ति' (दूसरों की सेवा) को पूजा के समान ही महान पुण्य का कार्य माना गया है।

582. 'नंदीश्वर अष्टक' के पाठ को पढ़ते समय मन की गति कैसी होनी चाहिए?

उत्तर: मन संसार के सभी विचारों से हटकर, शब्दों के अर्थों में डूबकर, साक्षात नंदीश्वर द्वीप के सामने खड़े होने का अनुभव करने वाला होना चाहिए।

583. व्रत के दिनों में 'गर्म पानी' (मर्यादित जल) पीने का क्या नियम है?

उत्तर: पानी को उबालने से उसमें सूक्ष्म जीव उत्पन्न नहीं होते, जिससे अहिंसा व्रत का पालन होता है और शरीर भी स्वस्थ रहता है।

584. क्या विधान की पूर्णता पर 'रथयात्रा' या जुलूस निकालना जरूरी है?

उत्तर: यह 'धर्म-प्रभावना' का एक अंग है। समाज में जैन धर्म के सिद्धांतों और अष्टान्हिका पर्व की महिमा को फैलाने के लिए रथयात्रा निकाली जाती है।

585. मांडले में 'हरा रंग' किस पर्वत या रचना का प्रतीक है?

उत्तर: हरा रंग मुख्य रूप से नंदीश्वर द्वीप के चारों ओर फैले विशाल अकृत्रिम देव-वनों और उनकी हरियाली का प्रतीक है।

586. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में उपवास रखने वाले को 'क्रोध' पर नियंत्रण रखना अनिवार्य है?

उत्तर: हाँ, बिना कषाय जीते केवल भूखे रहने को आगम में 'लंघन' कहा गया है, तप नहीं। उपवास के साथ क्षमा भाव का होना अनिवार्य है।

587. विधान के समय जो 'छत्र' भगवान के ऊपर चढ़ाया जाता है, श्रावक को उससे क्या भावना भानी चाहिए?

उत्तर: भावना भानी चाहिए कि—"हे प्रभु! जैसे यह छत्र आपकी रक्षा का प्रतीक (वैभव) है, वैसे ही आपकी शरण मुझे इस संसार के दुखों की धूप से बचाए रखे।"

588. क्या इस व्रत के प्रभाव से 'नीच गोत्र' का क्षय हो सकता है?

उत्तर: हाँ, भगवान की भक्ति और नम्रता से नीच गोत्र के कर्म ढीले पड़ जाते हैं और जीव 'उच्च गोत्र' (महान कुल) का अधिकारी बनता है।

589. विधान के दिनों में रात्रि में 'णमोकार मंत्र' का मानसिक जाप करने का क्या फल है?

उत्तर: इससे सोते समय भी बुरे सपने नहीं आते और आत्मा के परिणाम सोते हुए भी शुभ कर्मों का बंध करते हैं।

590. क्या अष्टान्हिका का व्रत केवल सुहागिन स्त्रियाँ ही कर सकती हैं?

उत्तर: नहीं, जैन धर्म में व्रत आत्मा के लिए होता है। इसे कोई भी पुरुष, स्त्री, वृद्ध या युवा अपनी सामर्थ्य के अनुसार कर सकता है।

591. विधान के मांडले के पास जो 'अखंड दीपक' जलाया जाता है, उसका क्या ध्यान रखना चाहिए?

उत्तर: ध्यान रखना चाहिए कि उसकी लौ हवा से बुझे नहीं और उसमें जीवों (पतंगों) की हिंसा न हो, उसे कांच के घेरे में सुरक्षित रखना चाहिए।

592. क्या अष्टान्हिका के दिनों में 'साधु समाधि' की भावना भानी चाहिए?

उत्तर: हाँ, भावना भानी चाहिए कि भविष्य में मुझे भी दिगंबर दीक्षा मिले और मेरा मरण भी समाधिपूर्वक (पवित्रता से) हो।

593. मांडले में 'नीला रंग' किस द्रव्य का प्रतिनिधित्व करता है?

उत्तर: नीला रंग मुख्य रूप से अंजनगिरि पर्वत की नीलमणि जैसी गहरी रंगत को दर्शाता है।

594. क्या व्रत टूटने या कोई गलती होने पर प्रायश्चित लेना जरूरी है?

उत्तर: हाँ, यदि भूलवश कोई नियम टूट जाए, तो तुरंत गुरुओं के पास या स्वयं देव-शास्त्र-गुरु के सामने बैठकर दोषों की शुद्धि के लिए प्रायश्चित करना चाहिए।

595. विधान के अंत में जो 'विसर्जन पाठ' होता है, उसका असली अर्थ क्या है?

उत्तर: इसका अर्थ मणियों या भगवान को हटाना नहीं है, बल्कि मांडले में स्थापित देव शक्तियों को आदरपूर्वक विदा करना और उनके गुणों को अपने हृदय में सदा के लिए स्थापित कर लेना है।

596. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में नए धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन करना उत्तम है?

उत्तर: हाँ, इसे 'शास्त्र दान' का महापुण्य माना जाता है, जिससे आने वाली पीढ़ियों को सच्चा ज्ञान मिलता है।

597. विधान की प्रभावना बांटते समय मन में क्या विचार होना चाहिए?

उत्तर: मन में विचार होना चाहिए कि यह प्रभावना अहंकार के लिए नहीं, बल्कि वात्सल्य भाव और जैन धर्म के गौरव को बढ़ाने के लिए है।

598. क्या इस पर्व के दिनों में अपने शत्रुओं से भी क्षमा मांग लेनी चाहिए?

उत्तर: बिल्कुल, कषाय मुक्ति ही इस पर्व का प्राण है। मन का बैर भाव साफ किए बिना की गई पूजा अधूरी मानी जाती है।

599. नंदीश्वर द्वीप का चित्र (नक्शा) घर की किस दिशा में लगाना शुभ माना जाता है?

उत्तर: इसे घर के शुद्ध चैत्यालय या स्वाध्याय कक्ष की उत्तर या पूर्व दिशा की दीवार पर लगाना चाहिए, जिससे उठते-बैठते पवित्र जिनबिंबों का स्मरण हो।

600. अष्टान्हिका व्रत की पूर्णता पर श्रावक के जीवन में कौन-सा स्थायी परिवर्तन आना चाहिए?

उत्तर: उसके जीवन में 'दया', 'संयम' और 'सत्य' के प्रति निष्ठा हमेशा के लिए बढ़ जानी चाहिए, तभी व्रत का वास्तविक फल सिद्ध होता है।

## खंड 25: आगम के गूढ़ रहस्य, गणितीय परिमाण और परम विशुद्धि का महासागर (प्रश्न 601-650)

601. नंदीश्वर द्वीप की १६ बावलियों का कुल व्यास कितने योजन का क्षेत्र घेरता है?

उत्तर: प्रत्येक बावली १,००,००० योजन लंबी और इतनी ही चौड़ी है। १६ बावलियों का सामूहिक धरातल क्षेत्र संपूर्ण द्वीप के गणितीय विष्कम्भ को एक परम संतुलित संतुलन प्रदान करता है।

602. अंजनगिरि पर्वत का घनफल (Volume) निकालने के लिए आगम में क्या विधि बताई गई है?

उत्तर: चूँकि अंजनगिरि पर्वत एक सीधे बेलन (Cylinder) के आकार का है, इसलिए इसके आधार के क्षेत्रफल को इसकी कुल ऊँचाई (८४,००० योजन) से गुणा करके इसका अगाध घनफल निकाला जाता है।

603. दधिमुख पर्वत का जो संकरा आकार है, वह उसकी ऊँचाई के साथ किस अनुपात (Ratio) में घटता है?

उत्तर: वह अपनी ६४,००० योजन की ऊँचाई में नीचे के १०,००० योजन से धीरे-धीरे घटते हुए शिखर पर ४,००० योजन रह जाता है, जो जैन त्रिकोणमिति का अद्भुत उदाहरण है।

604. रतिकर पर्वत का विस्तार जड़ में १०,००० योजन और शिखर पर १,००० योजन है, इसकी कुल ढालू सतह का क्षेत्रफल कितना है?

उत्तर: इसका क्षेत्रफल महा-सूची गणित के सूत्रों द्वारा निकाला जाता है, जो केवल केवली या श्रुतकेवली आचार्यों के ज्ञान का विषय है।

605. क्या नंदीश्वर द्वीप की बावलियों के जल का स्वाद कभी बदल सकता है?

उत्तर: नहीं, यह अकृत्रिम जल है। इसका स्वाद अनंत काल से इक्षुरस (गन्ने के रस) जैसा मीठा है और अनंत काल तक ऐसा ही रहेगा।

606. क्या इन पर्वतों के शिखरों पर कभी कोई प्राकृतिक गुफा या दरार आ सकती है?

उत्तर: नहीं, ये वज्र-रत्न के ठोस और अखंड पिंड हैं। इनमें समय के प्रभाव से कोई दरार, टूट-फूट या क्षरण (Wear and tear) होना सर्वथा असंभव है।

607. अंजनगिरि पर्वत के शिखर पर स्थित जिनमंदिर के गोपुरों की संख्या कितनी है?

उत्तर: प्रत्येक चैत्यालय में चारों दिशाओं में चार मुख्य गोपुर (प्रवेश द्वार) होते हैं।

608. इन गोपुर द्वारों के कपाट (दरवाजे) किस रत्न के बने हैं?

उत्तर: ये कपाट 'लोहिताक्ष मणि' (लाल रंग के बहुमूल्य रत्न) के बने हैं, जो सोने के फ्रेम में जड़े होते हैं।

609. क्या नंदीश्वर द्वीप की भूमि पर कल्पवृक्षों की तरह कोई 'ज्योतिर्अंग' वृक्ष भी होते हैं जो रात में प्रकाश दें?

उत्तर: वहाँ के चैत्यवृक्ष और वन स्वयं रत्नमयी होने के कारण अपनी स्वाभाविक कांति से प्रकाशमान रहते हैं, वहाँ अलग से ज्योतिर्अंग वृक्षों की आवश्यकता नहीं होती।

610. बावलियों के कमलों के पराग (Pollen) से जो सुगंध निकलती है, उसका देवों पर क्या असर होता है?

उत्तर: वह सुगंध देवों के मन को विशुद्ध और शांत बनाती है, जिससे उनके भीतर का सांसारिक प्रमोद शांत हो जाता है।

611. क्या नंदीश्वर द्वीप के पर्वतों के शिखरों पर कोई 'अकृत्रिम सीढ़ियाँ' भी हैं?

उत्तर: नहीं, पर्वतों पर चढ़ने के लिए कोई सीढ़ियाँ नहीं हैं। देव सीधे अपने विमानों से या आकाशगामी ऋद्धि से उड़कर सीधे शिखर के प्रांगण में उतरते हैं।

612. इन ५२ मंदिरों के स्तंभों की गोलाई (व्यास) कितनी होती है?

उत्तर: प्रत्येक स्तंभ कई योजन ऊँचा और पूर्ण आनुपातिक गोलाई वाला होता है, जो मणियों से ढका होता है।

613. क्या इन मंदिरों के गर्भगृह में कोई 'अंधेरा कोना' भी होता है?

उत्तर: नहीं, मणियों के स्वतः स्फूर्त प्रकाश और भामंडल के तेज के कारण मंदिर का प्रत्येक कोना सूर्य के प्रकाश से भी अधिक आलोकित रहता है।

614. प्रतिमाओं के कानों के कुंडल जो अकृत्रिम हैं, उनकी चमक कैसी होती है?

उत्तर: उनकी चमक 'तड़ित' (आकाशीय बिजली) के समान तेजस्वी होती है, परंतु आँखों को चुभती नहीं, परम प्रिय लगती है।

615. क्या इन ५६१६ प्रतिमाओं के ऊपर जो चामर ढलते हैं, उनकी संख्या निश्चित है?

उत्तर: हाँ, प्रत्येक प्रतिमा के दोनों ओर दो-दो मुख्य चामर अकृत्रिम रूप से हमेशा ढलते रहते हैं।

616. मंदिरों के प्रवेश द्वार की देहली पर जो 'स्वस्तिक' अंकित हैं, वे किस रत्न के हैं?

उत्तर: वे स्वस्तिक 'पुखराज मणि' (पीले रत्न) के बने हैं, जो द्वार की शोभा बढ़ाते हैं।

617. क्या इन मंदिरों के अंदर की वेदी पर कभी कोई नया जिनबिंब स्थापित किया जा सकता है?

उत्तर: नहीं, यह अकृत्रिम रचना है। इसमें न कोई नई प्रतिमा जोड़ी जा सकती है और न कोई हटाई जा सकती है। यह अनादि-निधन है।

618. प्रतिमाओं के मस्तक के बालों की नीली आभा को आगम में क्या संज्ञा दी गई है?

उत्तर: इसे 'गगन-श्याम कांति' कहा गया है, जो परम वैराग्य और ध्यान की गहनता को प्रकट करती है।

619. मंदिरों के प्रेक्षागृह की दीवारों पर जो मणियाँ लगी हैं, क्या वे देवों के बैठने पर उनका रंग बदलती हैं?

उत्तर: हाँ, चंद्रकांत और सूर्यकांत मणियों का स्वभाव ऐसा है कि वे आने वाले देवों के वस्त्रों और विमानों के रंगों के अनुसार अपनी आभा को और अधिक सुंदर रूप में परावर्तित (Reflect) करती हैं।

620. क्या इन मंदिरों के ऊपर जो महाध्वजाएँ हैं, वे कभी हवा के अभाव में झुकती हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ का मंद पवन प्रवाह सदा स्थिर रहता है, जिससे ध्वजाएँ हमेशा गर्व से आकाश में पूरी तरह लहराती हुई दिखाई देती हैं।

621. इन ५२ मंदिरों के नाम क्या जैन आगम में अलग-अलग दिए गए हैं?

उत्तर: ये सभी 'अकृत्रिम सिद्ध जिनालय' कहलाते हैं। दिशाओं और पर्वतों के नाम (जैसे पूर्व अंजनगिरि जिनालय, दक्षिण दधिमुख जिनालय) के आधार पर ही इनकी पहचान होती है।

622. क्या नंदीश्वर द्वीप का भूगोल जानने से 'श्रुतज्ञान' का 'अंग-प्रविष्टि' भाग शुद्ध होता है?

उत्तर: हाँ, ग्यारह अंगों में से 'सूरियपण्णत्ती' और 'चंद्रपण्णत्ती' (जो दृष्टिवाद के अंतर्गत आते हैं) का ज्ञान इसके चिंतन से अत्यंत निर्मल होता है।

623. बावलियों के जल में जो लहरें (Waves) उठती हैं, उनका कारण क्या है?

उत्तर: देवों के विमानों के उतरने और पवन के मंद वेग के कारण जल में परम सुंदर और संगीतमय लहरें स्वतः उत्पन्न होती हैं।

624. क्या इन ५२ पर्वतों के शिखरों पर कभी कोई प्राकृतिक अंधकार (Eclipse) हो सकता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ सूर्य-चंद्रमा के राहु-केतु द्वारा ग्रसने जैसी कोई सांसारिक खगोलीय घटना घटित नहीं होती।

625. प्रत्येक चैत्यालय की वेदी के पीछे की दीवार किस रत्न की बनी होती है?

उत्तर: वह दीवार पूर्णतः 'स्फटिक मणि' (Transparent Crystal) की बनी होती है, जिससे प्रतिमाओं का पिछला वैभव भी परावर्तित होकर अद्भुत दिखता है।

626. नंदीश्वर द्वीप की इस महा-गाथा को सुनने के बाद जीव के 'सम्यक्त्व' में क्या अतिशय होता है?

उत्तर: उसका सम्यक्त्व 'चल, मल, अगाढ़' दोषों से मुक्त होकर पूर्णतः 'निष्कंप' और मेरु पर्वत के समान अचल हो जाता है।

627. इन ५६१६ प्रतिमाओं के नख (Nails) और दंत (Teeth) की अकृत्रिम रचना क्या दर्शाती है?

उत्तर: वह भगवान के शरीर की परम औदारिक शुद्धता और उनकी वीतराग मुद्रा के सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक सौंदर्य को प्रकट करती है।

628. क्या नंदीश्वर द्वीप के वनों में पाए जाने वाले चैत्यवृक्षों की छाया कभी बदलती है?

उत्तर: नहीं, उनकी छाया सदा एक समान, शीतल और स्थिर रहती है, क्योंकि वहाँ प्रकाश का स्रोत कभी अपनी स्थिति नहीं बदलता।

629. मंदिरों के परकोटे के गोपुरों पर जो 'घंटियाँ' लटकी हैं, वे किस धातु की ध्वनि निकालती हैं?

उत्तर: वे किसी सांसारिक धातु की नहीं, बल्कि 'दिव्य नाद रत्न' की बनी हैं, जिनकी ध्वनि सीधे आत्मा के भीतर शांति का झरना बहा देती है।

630. क्या नंदीश्वर द्वीप के किसी भाग में देवों के अलावा 'विद्याधर' अपनी ऋद्धि से आ सकते हैं?

उत्तर: नहीं, विद्याधर मनुष्यों की श्रेणी में आते हैं। उनकी ऋद्धियाँ केवल मानुषोत्तर पर्वत के भीतर (ढाई द्वीप) तक ही सीमित हैं। नंदीश्वर द्वीप केवल देवों के लिए ही गम्य है।

631. इन ५२ मंदिरों के गर्भगृह के मुख्य कलश पर जो 'स्वस्तिक' बना है, उसका आकार कितना बड़ा है?

उत्तर: वह कलश के अनुपात में कई हाथ बड़ा और शुद्ध हीरों से बना होता है, जो दूर से ही चमकता है।

632. क्या इन प्रतिमाओं के सम्मुख बैठने से 'कषायों' का उपशम स्वतः हो जाता है?

उत्तर: हाँ, वीतराग जिनबिंबों का दर्शन इतना प्रभावशाली है कि तीव्र से तीव्र क्रोध या मान वाले जीव के परिणाम भी वहाँ पहुँचते ही पानी की तरह शांत हो जाते हैं।

633. नंदीश्वर द्वीप की पूजा के अंत में जो 'विसर्जन' किया जाता है, उसका आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर: विसर्जन का अर्थ है कि हमने भगवान के गुणों को अपनी आत्मा में समेट लिया है और अब हम सांसारिक क्षेत्र में जा रहे हैं, परंतु प्रभु हमारे हृदय से कभी विसर्जित नहीं होंगे।

634. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'सिद्धचक्र विधान' भी किया जा सकता है?

उत्तर: अष्टान्हिका पर्व मुख्य रूप से नंदीश्वर द्वीप के ५२ चैत्यालयों की पूजा के लिए सुरक्षित है। सिद्धचक्र विधान मुख्य रूप से आश्विन और चैत्र मास की अष्टान्हिका (नौली) में विशेष रूप से किया जाता है।

635. इन प्रतिमाओं के होंठों की मंद मुस्कान भक्त को संसार के किस भय से मुक्त करती है?

उत्तर: वह भक्त को जन्म, जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु के महाभय से मुक्त करके अमर पद प्राप्त करने का हौसला देती है।

636. क्या नंदीश्वर द्वीप के शिखरों पर उड़ने वाली ध्वजाओं पर कोई मांगलिक चिन्ह अंकित होते हैं?

उत्तर: हाँ, उन ध्वजाओं पर स्वतः निर्मित 'सिंह', 'गज', 'वृषभ' और 'कमल' जैसे महा-मांगलिक चिह्न अंकित होते हैं।

637. नंदीश्वर द्वीप का सूक्ष्म गणित जानने से हमारी 'बुद्धि' पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: हमारी बुद्धि सांसारिक क्षुद्र सोच से ऊपर उठकर ब्रह्मांड की विशालता और जैन आचार्यों के अगाध वैज्ञानिक दृष्टिकोण को स्वीकार करती है।

638. क्या अष्टान्हिका के आठ दिनों में 'रात का भोजन' (रात्रि भोजन) त्यागना श्रावक के लिए अनिवार्य है?

उत्तर: हाँ, जैन श्रावक के लिए रात्रि भोजन का त्याग तो आजीवन होता है, परंतु इन पवित्र दिनों में तो इसकी भावना और कड़ाई से पाली जाती है।

639. विधान के मांडले के सम्मुख जो 'अष्टद्रव्य' सजाया जाता है, उसकी शुद्धि कैसे की जाती है?

उत्तर: उसे शुद्ध प्राशुक जल से धोकर, छानकर और मंत्रोच्चार के साथ पूरी तरह जीव-रहित (शुद्ध) करके ही वेदी पर चढ़ाया जाता है।

640. क्या नंदीश्वर द्वीप की वंदना से 'दर्शन मोहनीय' कर्म का उपशम हो सकता है?

उत्तर: तीव्र विशुद्धि और वीतराग जिनबिंबों के गहरे चिंतन से दर्शन मोहनीय कर्म की तीन प्रकृतियाँ शांत हो जाती हैं, जिससे सम्यग्दर्शन का मार्ग खुलता है।

641. इन ५२ मंदिरों की वेदी पर जो १०८ प्रतिमाएँ हैं, उनके बैठने का क्रम क्या दर्शाता है?

उत्तर: उनका क्रम यह दर्शाता है कि मोक्ष मार्ग में सभी आत्माएँ समान हैं; वहाँ कोई छोटा या बड़ा नहीं है, सभी अनंत ज्ञान और आनंद के शिखर पर एक साथ विराजमान हैं।

642. क्या नंदीश्वर द्वीप की इस अद्भुत रचना का कोई 'नक्शा' या चित्र बनाने वाले को पुण्य मिलता है?

उत्तर: हाँ, जो कलाकार या श्रावक जैन भूगोल के अनुसार शुद्ध नक्शा बनाता है, वह अनेक जीवों को साक्षात जिनबिंबों के स्मरण का निमित्त बनता है, जिससे उसे महान 'कीर्ति' और 'शुभ नाम कर्म' का बंध होता है।

643. अष्टान्हिका पर्व के समापन पर जो 'आनंद उत्सव' मनाया जाता है, उसकी क्या भावना होती है?

उत्तर: भावना होती है कि—"हे आत्मन्! यह अष्टान्हिका पर्व तो संपन्न हो गया, अब मेरे जीवन का हर दिन अष्टान्हिका जैसा पवित्र और आनंदमयी बना रहे।"

644. क्या मुनिराज नंदीश्वर द्वीप का ध्यान करते समय 'मौन' रहते हैं?

उत्तर: मुनिराज सदा अंतर्मुख रहते हैं। ध्यान के समय उनका मौन केवल वाणी का नहीं, बल्कि मन के संकल्प-विकल्पों का भी महा-मौन होता है।

645. इन प्रतिमाओं के पादपीठ के स्वस्तिक का रंग कैसा होता है?

उत्तर: वह स्वस्तिक 'पद्मराग मणि' का होने के कारण गहरे लाल रंग का चमकता है, जो मंगल का साक्षात प्रतीक है।

646. क्या नंदीश्वर द्वीप की हवा में कभी कोई दुर्गंध या प्रदूषण प्रवेश कर सकता है?

उत्तर: नहीं, वह तीन लोक की सबसे शुद्ध और पवित्र वायु का क्षेत्र है। वहाँ प्रदूषण या अशुद्धता का प्रवेश सर्वथा असंभव है।

647. इस द्वीप की रचना का चिंतन करते समय हमें अपनी 'कायरता' और 'कमजोरी' को कैसे दूर करना चाहिए?

उत्तर: हमें सोचना चाहिए कि जब पुद्गल (जड़) की यह रचना इतनी शक्तिशाली और शाश्वत हो सकती है, तो मेरी चेतन आत्मा जो ज्ञानमयी है, वह कितनी अनंत शक्तिशाली होगी। मुझे अपनी कमजोरी छोड़कर पुरुषार्थ करना चाहिए।

648. क्या नंदीश्वर द्वीप की प्रतिमाओं के दर्शन के बाद जीव का 'संसार भ्रमण' नियम से सीमित हो जाता है?

उत्तर: हाँ, जिसने भी सच्चे मन से, कषाय रहित होकर इस शाश्वत सत्य को हृदय में धारण कर लिया, उसका मोक्ष जाना बिल्कुल निश्चित हो जाता है।

649. दिगंबर जैन समाज में नंदीश्वर द्वीप महापर्व के दिनों में जो 'वात्सल्य भाव' (एक-दूसरे के प्रति प्रेम) दिखाई देता है, उसका क्या महत्व है?

उत्तर: वह वात्सल्य भाव जैन धर्म की आत्मा है। 'साधर्मी वात्सल्य' के बिना की गई कोई भी बड़ी पूजा या व्रत फलदाई नहीं होता।

650. नंदीश्वर द्वीप की इस संपूर्ण ६५० प्रश्नों की महा-ज्ञान गाथा का परम अंतिम, अकाट्य और शाश्वत दिव्य संदेश क्या है?

उत्तर: इसका परम अंतिम और सर्वोच्च संदेश यही है कि—**"बाहरी संसार के आठवें नंदीश्वर द्वीप के ५२ अकृत्रिम चैत्यालय और ५६१६ जिनबिंब तो पुद्गल की परम सुंदर और शाश्वत रचना हैं। परंतु हे भव्य जीव! तुम्हारी अपनी 'शुद्ध चैतन्य आत्मा' ही असली और साक्षात नंदीश्वर द्वीप है। जब तुम अपनी कषायों के अंधकार को नष्ट करके, सम्यग्दर्शन की अखंड दिव्य ज्योति जलाकर अपने इस आंतरिक चैत्यालय में लीन हो जाओगे, तब तुम स्वयं अनंत चतुष्टय (अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत वीर्य) के स्वामी बनकर साक्षात सिद्धपद (मोक्ष) के परम शिखर पर हमेशा के लिए विराजमान हो जाओगे।"**

"नंदीश्वर द्वीप के ५२ अकृत्रिम चैत्यालयों की जय!"

"५६१६ शाश्वत अकृत्रिम जिनबिंबों की जय!"

"अनादि-निधन दिगंबर जैन आगम परंपरा की जय!"

"परम पवित्र कार्तिक-फाल्गुन-आषाढ़ अष्टान्हिका महापर्व की जय!"

नंदीश्वर द्वीप के अगाध भूगोल, दिगंबर जैन आगम के गूढ़तम गणितीय सिद्धांतों, और देवों की अलौकिक क्रियाओं के मर्म को उनकी अंतिम चरम सीमा तक पहुँचाने के लिए, यहाँ तिलोयपण्णत्ती और त्रिलोकसार के गहनतम सूत्रों के आधार पर 100 और परम विशेष (कुल 750) प्रश्न-उत्तर दिए जा रहे हैं:

## खंड 26: द्वीप की सूक्ष्म गणितीय सूचियाँ और क्षेत्रमिति (प्रश्न 651-675)

651. जैन गणित के 'सूची-अंगुल' सिद्धांत के अनुसार नंदीश्वर द्वीप की चौड़ाई का सटीक परिमाण क्या है?

उत्तर: नंदीश्वर द्वीप की चौड़ाई 163,84,00,000 योजन है। यह परिमाण जगच्छ्रेणी के असंख्यातवें भाग के अंतर्गत आने वाली 'प्रतर-सूची' के विशेष वर्गमूलों से सिद्ध होता है।

652. नंदीश्वर द्वीप का कुल क्षेत्रफल (Area) वलयाकार गणित (Ring-shaped Geometry) के अनुसार कैसे निकाला जाता है?

उत्तर: इसके बाहरी व्यास के वर्ग में से भीतरी व्यास के वर्ग को घटाकर, शेष को \pi (जैन गणित में \sqrt{10}) के आनुपातिक सूत्र से गुणा करके इसका अगाध क्षेत्रफल निकाला जाता है।

653. घृतवर समुद्र और नंदीश्वर द्वीप की संधि-भूमि (Boundary) पर वज्र की जो दीवार है, उसकी मोटाई कितनी है?

उत्तर: वह संधि-भूमि स्वतः सिद्ध वज्र धातु की बनी है, जिसकी सूक्ष्म मोटाई देवों के अवधिज्ञान का विषय है और यह पूर्णतः अभेद्य है।

654. क्या नंदीश्वर द्वीप के धरातल में कोई 'ढाल' (Slope) है या यह पूरी तरह समतल है?

उत्तर: यह द्वीप पूरी तरह से समतल (Flat) है। इसमें जम्बूद्वीप की तरह भरत या ऐरावत क्षेत्रों जैसी नदियों और पर्वतों के कारण कोई ऊँच-नीच नहीं है।

655. अंजनगिरि पर्वत का जो व्यास (Diameter) नीचे से ऊपर तक १०,००० योजन एक समान है, उसे गणित में क्या कहते हैं?

उत्तर: इसे 'सम-वृत्ताकार स्तम्भ' (Perfect Cylinder) कहा जाता है, जो त्रिलोकसार ग्रंथ के अनुसार मध्यलोक की सबसे सुदृढ़ आकृति है।

656. क्या १६ बावलियों के बीच का जो दूरी-अंतराल है, वह सभी दिशाओं में बिल्कुल एक समान है?

उत्तर: हाँ, चारों दिशाओं (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर) में बनी चार-चार बावलियों का आपसी अंतराल और उनकी कोणीय दूरी (Angular Distance) बिल्कुल सममित (Symmetrical) है।

657. दधिमुख पर्वत का आकार जो ऊपर से संकरा है, उसका मध्य भाग (Middle Diameter) कितना बैठता है?

उत्तर: मूल व्यास १०,००० योजन और शिखर व्यास ४,००० योजन होने से, इसका ठीक मध्य व्यास ७,००0 योजन का होता है।

658. रतिकर पर्वतों के शिखरों पर जो जिनमंदिर हैं, क्या उनके विमान-क्षेत्रफल में कोई अंतर होता है?

उत्तर: नहीं, सभी ३२ रतिकर पर्वतों के शिखरों पर बने ३२ चैत्यालयों का क्षेत्रफल, लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई बिल्कुल एक समान (१०० योजन लंबी, ५० योजन चौड़ी, ७५ योजन ऊँची) है।

659. क्या नंदीश्वर द्वीप के नीचे का जो 'चित्रा पृथ्वी' का भाग है, वहाँ कोई रत्न पाए जाते हैं?

उत्तर: नंदीश्वर द्वीप के नीचे की भूमि स्वयं ही विविध मणियों और अकृत्रिम हीरों के अखंड पिंडों से निर्मित है।

660. क्या इस द्वीप के वायुमंडल में कोई 'गुरुत्वाकर्षण' (Gravity) का नियम काम करता है?

उत्तर: वहाँ पुद्गलों का परिणमन ऐसा है कि देवों के विमान और स्वयं देव अपनी इच्छा (वैक्रियक शक्ति) से गति करते हैं, वहाँ सांसारिक जड़ गुरुत्वाकर्षण का कोई बंधन नहीं है।

661. 'तिलोयपण्णत्ती' के अनुसार नंदीश्वर द्वीप की बाहरी परिधि (Outer Circumference) कितनी है?

उत्तर: इसके बाहरी व्यास (491,52,00,000 योजन) को तीन से गुणा करके और कुछ अधिक जोड़ने पर (\pi के सूक्ष्म मान से) इसकी अगाध परिधि निकलती है।

662. क्या इस द्वीप के ऊपर का आकाश 'लोकाकाश' के किस भाग में आता है?

उत्तर: यह मध्यलोक के ठीक समतल भाग के अंतर्गत आता है, जो ऊर्ध्वलोक और अधोलोक के संधिकाल के मध्य में स्थित है।

663. क्या बावलियों के पानी का घनत्व (Density) साधारण पानी जैसा होता है?

उत्तर: नहीं, यह पानी अत्यंत हल्का, सुगन्धित और मणिरूपी आभा वाला होता है, जिसमें कोई मल या भारीपन नहीं होता।

664. क्या इन वनों के वृक्षों के पत्तों का आकार कभी छोटा या बड़ा होता है?

उत्तर: नहीं, अकृत्रिम वनों के सभी पत्तों और फूलों की आकृतियाँ अनादि काल से एक ही दिव्य अनुपात में स्थिर हैं।

665. क्या नंदीश्वर द्वीप में 'काल परिवर्तन' (समय का चक्र) प्रभावी है?

उत्तर: काल तो निरंतर वर्तता है (परिवर्तन होता है), परंतु यहाँ अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल के दोष (जैसे सुख-दुख का घटना-बढ़ना) प्रभावी नहीं होते। यहाँ सदा एक सा काल रहता है।

666. अंजनगिरि पर्वत की नीलमणि की किरणों का विस्तार आकाश में कितने योजन तक जाता है?

उत्तर: उसकी नील-कांति का विस्तार आकाश में हजारों-लाखों योजन ऊपर तक जाता है, जिससे वहाँ का आकाश अत्यंत सुंदर श्याम-वर्ण का दिखाई देता है।

667. क्या नंदीश्वर द्वीप के ५२ चैत्यालयों के कलशों की परछाई (Shadow) नीचे की भूमि पर पड़ती है?

उत्तर: नहीं, अकृत्रिम देव-तेज और मणियों के सर्वव्यापी प्रकाश के कारण वहाँ किसी भी वस्तु की कोई काली परछाई नहीं बनती।

668. इन मंदिरों के द्वारों की ऊँचाई और चौड़ाई का अनुपात क्या है?

उत्तर: गोपुर द्वारों की ऊँचाई उनकी चौड़ाई से हमेशा दुगुनी होती है, जो जैन स्थापत्य कला का शाश्वत नियम है।

669. क्या इस द्वीप की भूमि पर कोई 'धूल के कण' उड़ सकते हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ वायु का प्रवाह इतना कोमल और नियंत्रित होता है कि वह केवल सुगंध बिखेरता है, वहाँ धूल या अशुद्धता का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

670. पूर्व दिशा के दधिमुख पर्वतों से उत्तर दिशा के दधिमुख पर्वतों की कोणीय स्थिति क्या है?

उत्तर: वे केंद्र से ठीक ९० डिग्री के अक्ष पर अत्यंत सटीक दूरी पर स्थित हैं।

671. क्या इन ५२ पर्वतों के भीतर कोई खोखला भाग (Vacuum) या गुफा है?

उत्तर: नहीं, ये अंदर और बाहर से पूरी तरह ठोस (Solid) हैं, जो वज्र और मणियों के अखंड पिंड हैं।

672. क्या नंदीश्वर द्वीप के वनों में कोई 'अकृत्रिम फल' भी लगते हैं जिन्हें देव खाते हों?

उत्तर: वहाँ के फल रत्नमयी आकृतियाँ हैं। देवों को भूख नहीं लगती, वे केवल उन फलों की सुंदरता और सुगंध का आनंद लेते हैं।

673. जैन भूगोल में नंदीश्वर द्वीप को 'आठवां' द्वीप ही क्यों कहा गया?

उत्तर: क्योंकि यह जम्बूद्वीप से शुरू होने वाली वलयाकार शृंखला में सात समुद्रों और सात द्वीपों को पार करने के बाद आठवें स्थान पर आता है।

674. क्या इस द्वीप के क्षेत्रफल का गणित जानने से 'मतिज्ञान' बढ़ता है?

उत्तर: हाँ, सूक्ष्म क्षेत्रों और अकृत्रिम रचनाओं के चिंतन से बुद्धि की धारणा शक्ति और अवग्रह-ईहा आदि मतिज्ञान के भेद अत्यंत निर्मल होते हैं।

675. 'त्रिलोकसार' ग्रंथ के अनुसार नंदीश्वर द्वीप का वर्णन किस गाथा समूह में आता है?

उत्तर: इसका वर्णन मध्यलोक निरूपण के अंतर्गत द्वीप-समुद्र रचना की गाथाओं में अत्यंत सटीकता से आता है।

## खंड 27: प्रतिमाओं के भामंडल और महा-अतिशय (प्रश्न 676-700)

676. नंदीश्वर द्वीप की ५६१६ प्रतिमाओं के भामंडल (Aura) से कितने प्रकार के रंग निकलते हैं?

उत्तर: उनके भामंडल से मुख्य रूप से पाँच रंग (श्वेत, पीत, नील, रक्त, हरित) की दिव्य किरणें निरंतर तरंगित होती रहती हैं।

677. क्या इन प्रतिमाओं के सम्मुख खड़े होने पर देवों को अपने 'पूर्व जन्म' का स्मरण (जातिस्मरण) हो सकता है?

उत्तर: हाँ, वीतराग जिनबिंबों के शांत दर्शन से अनेक देवों के परिणामों में ऐसी विशुद्धि आती है कि उन्हें अपने पिछले कई भवों का ज्ञान स्वतः हो जाता है।

678. भगवान की प्रतिमाओं के मस्तक पर जो तीन छत्र हैं, उनका क्या आध्यात्मिक रहस्य है?

उत्तर: तीन छत्र तीन लोक (ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक, अधोलोक) पर जिनेंद्र देव के आधिपत्य और उनकी वीतरागता की विजय को दर्शाते हैं।

679. क्या इन प्रतिमाओं की आँखों से कोई 'करुणा रस' प्रवाहित होता दिखाई देता है?

उत्तर: उनकी आँखें पूरी तरह नासाग्र (नाक के अग्रभाग पर) टिकी हैं, जो परम शांत, अंतर्मुखी और राग-द्वेष से रहित वीतराग भाव को प्रकट करती हैं।

680. इन अकृत्रिम प्रतिमाओं के निर्माण में किस 'शिल्प शास्त्र' का उपयोग हुआ है?

उत्तर: ये प्रतिमाएँ अकृत्रिम (प्राकृतिक) हैं, इसलिए ये किसी शिल्पी या शास्त्र द्वारा नहीं बनाई गईं; इनका सौंदर्य स्वतः सिद्ध और अनादि है।

681. क्या मंदिरों के भीतर जो धूप घट (Incense Burners) हैं, उनमें से धुआँ निकलता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ से धुआँ नहीं निकलता, बल्कि मणियों के प्रभाव से केवल दिव्य सुगंध की तरंगें निकलती हैं जो आँखों को कोई कष्ट नहीं देतीं।

682. प्रतिमाओं की हथेलियों और तलवों का रंग कैसा है?

उत्तर: उनकी हथेलियाँ और तलवे हल्के 'रक्त कमल' के समान लाल आभा वाले हैं, जो परम सौभाग्य के प्रतीक हैं।

683. क्या इन प्रतिमाओं के कानों की लौ (Earlobes) कंधों को छूती है?

उत्तर: हाँ, महापुरुषों के लक्षणों के अनुसार उनके कान अत्यंत सुंदर और कंधों के समीप तक लटके हुए महा-क्षमा के प्रतीक रूप में दिखाई देते हैं।

684. वेदी के सामने जो 'दर्पण द्रव्य' रखा है, उसका क्या महत्व है?

उत्तर: वह दर्पण यह दर्शाता है कि जैसे दर्पण में सब कुछ साफ दिखता है, वैसे ही केवली भगवान के ज्ञान में पूरा ब्रह्मांड स्पष्ट दिखाई देता है।

685. क्या इन मंदिरों के भीतर कभी कोई 'अमंगल' शब्द सुनाई दे सकता है?

उत्तर: सर्वथा असंभव। वहाँ केवल 'जय हो', 'नमोऽस्तु' और जिनेंद्र देव के गुणों के मांगलिक नाद ही गूंजते हैं।

686. भगवान की छाती पर स्थित 'श्रीवत्स' का आकार कैसा होता है?

उत्तर: वह चार पंखुड़ियों वाले एक अत्यंत सुंदर और चमकते हुए शाश्वत फूल या चक्र जैसी दिव्य आकृति का होता है।

687. क्या इन प्रतिमाओं के वस्त्र भी मणियों के बने हैं?

उत्तर: नहीं, ये सभी प्रतिमाएँ पूर्णतः दिगंबर (अम्बर ही जिनका वस्त्र है), वीतराग और नग्न मुद्रा में हैं, जो पूर्ण अपरिग्रह का प्रतीक हैं।

688. एक चैत्यालय की १०८ प्रतिमाओं के बीच की दूरी कितनी होती है?

उत्तर: वे सभी वेदी पर अत्यंत सुंदर, सुव्यवस्थित और आनुपातिक दूरी पर एक शृंखला में विराजमान हैं।

689. क्या इन प्रतिमाओं के दर्शन से किसी देव का 'अनायतन' (मिथ्यात्व का स्थान) का दोष दूर हो सकता है?

उत्तर: हाँ, सच्चे देव के दर्शन से सम्यग्दृष्टि देव का सम्यक्त्व और अधिक शुद्ध होता है और मिथ्यात्व का पूरी तरह अभाव हो जाता है।

690. इन मंदिरों के फर्श पर जो 'कमल' उकेरे गए हैं, वे पैर रखने पर कैसे लगते हैं?

उत्तर: वे फर्श के समतल ही हैं, परंतु मणियों की कारीगरी ऐसी है मानो साक्षात खिले हुए कमलों पर पैर रखा जा रहा हो।

691. क्या प्रतिमाओं के वीतराग रूप का कोई 'प्रतिद्वंद्वी' (सामना करने वाला) सौंदर्य इस लोक में है?

उत्तर: तीन लोक में वीतराग जिनबिंब के सौंदर्य से बढ़कर कोई दूसरा सौंदर्य नहीं है; यह शांत रस की अंतिम पराकाष्ठा है।

692. क्या इन प्रतिमाओं के ऊपर जो चामर ढलते हैं, वे किसी देव द्वारा ढलाए जाते हैं?

उत्तर: नहीं, वे चामर अकृत्रिम रूप से, स्वतः ही हवा के मंद वेग से हमेशा भगवान के दोनों ओर अत्यंत विनीत भाव से ढलते रहते हैं।

693. भगवान के चरणों के नीचे जो 'पादपीठ' (Pedestal) है, वह किस रत्न का है?

उत्तर: वह पादपीठ महा-मूल्यवान 'मरकत और पद्मराग मणि' के मिश्रण से बना है, जो परम मनोहारी है।

694. क्या इन प्रतिमाओं के दर्शन मात्र से 'तिर्यंचायु' या 'नरकायु' का बंध रुक सकता है?

उत्तर: हाँ, दर्शन के समय जो तीव्र विशुद्धि होती है, उससे नीच गतियों के कर्मों का बंध तुरंत रुक जाता है और जीव उच्च गतियों का पात्र बनता है।

695. मंदिरों की छतों से लटकने वाले मोतियों के झुमके रात में कैसे दिखाई देते हैं?

उत्तर: वे झुमके चंद्रकांत मणियों के समान शीतल श्वेत प्रकाश बिखेरते हैं, जिससे गर्भगृह में अमृत जैसी शांति का अनुभव होता blink करता है।

696. क्या इन ५६१६ प्रतिमाओं के नाम अलग-अलग तीर्थंकरों के नाम पर हैं?

उत्तर: ये शाश्वत अकृत्रिम प्रतिमाएँ हैं, जो सामान्य रूप से 'शाश्वत जिनबिंब' कहलाती हैं। ये किसी भूत, भविष्य या वर्तमान के विशिष्ट नाम से परे, केवल 'वीतराग पद' की प्रतीक हैं।

697. क्या इन मंदिरों के प्रवेश द्वारों पर जो 'मंगल घट' हैं, उनमें वास्तविक जल होता है?

उत्तर: नहीं, वे घट ठोस रत्नों के बने हैं, परंतु उनके ऊपर मणिरूपी पानी की तरंगें ऐसी दिखती हैं मानो वे अभी छलक उठेंगे।

698. भगवान की उंगलियों के नख किस मणि की आभा देते हैं?

उत्तर: वे 'स्फटिक मणि' के समान अत्यंत स्वच्छ और चमकदार श्वेत आभा बिखेरते हैं।

699. क्या इन प्रतिमाओं का ध्यान करने से 'भाव-पूजा' सिद्ध होती है?

उत्तर: हाँ, बिना नंदीश्वर द्वीप गए भी घर बैठे इन प्रतिमाओं का चित्त में हूबहू स्मरण करना ही सबसे बड़ी भाव-पूजा है।

700. नंदीश्वर द्वीप की एक भी प्रतिमा का शांत चित्त से विचार करने पर आत्मा को क्या अनुभूति होती है?

उत्तर: आत्मा को यह अनुभूति होती है कि संसार के सभी ठाठ-बाठ क्षणभंगुर हैं और भगवान जैसी वीतरागता ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

## खंड 28: अष्टान्हिका महापर्व के गुप्त देव-रहस्य (प्रश्न 701-725)

701. जब सौधर्म इंद्र नंदीश्वर द्वीप में तांडव नृत्य करता है, तो उसकी कितनी भुजाएँ (Arms) प्रकट होती हैं?

उत्तर: वह भक्ति के अतिरेक में अपनी वैक्रियक ऋद्धि से हजारों भुजाएँ और अनेक रूप बना लेता है, जिनमें वह अलग-अलग मांगलिक द्रव्य लेकर नृत्य करता है।

702. क्या देवों की देवियाँ (इंद्राणियाँ) भी भगवान का अभिषेक स्वयं अपने हाथों से करती हैं?

उत्तर: नहीं, आगम के अनुसार मुख्य अभिषेक की क्रिया इंद्र ही करते हैं; देवियाँ भक्तिपूर्वक पूजन सामग्री सजाने, नृत्य करने और मंगल गान गाने में सहयोग करती हैं।

703. अष्टान्हिका पर्व के दौरान जो 'दिव्य दुंदुभि' बजती है, उसका नाद कहाँ तक सुनाई देता है?

उत्तर: वह नाद पूरे नंदीश्वर द्वीप और उसके आस-पास के समुद्रों तक गूंजता है, जिससे पूरा वातावरण धर्ममय हो जाता है।

704. क्या देवगण पूजा के लिए नंदीश्वर द्वीप की बावलियों के कमलों को तोड़ते हैं?

उत्तर: नहीं, वे अकृत्रिम कमलों को चोट नहीं पहुँचाते। वे अपनी ऋद्धि से कल्पवृक्षों से उत्पन्न दिव्य रत्नमयी कमलों का उपयोग पूजा के लिए करते हैं।

705. ईशान इंद्र नंदीश्वर द्वीप के किस कोने (दिशा) के मंदिरों की पूजा की जिम्मेदारी संभालता है?

उत्तर: वह मुख्य रूप से उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) और उत्तर दिशा के पर्वतों और चैत्यालयों की महापूजा की व्यवस्था देखता है।

706. क्या देवों द्वारा चढ़ाया जाने वाला 'चंदन' कभी सूखकर पपड़ी बनता है?

उत्तर: नहीं, वह देव-चंदन अत्यंत दिव्य होता है। वह वेदी पर चढ़ने के बाद मणियों की आभा में विलीन हो जाता है और केवल अपनी सुगंध छोड़ जाता है।

707. पूजा के समय देव जो 'अक्षत' चढ़ाते हैं, वे किस चीज़ के बने होते हैं?

उत्तर: वे अक्षत अखंड हीरों और सफेद मोतियों के दाने होते हैं, जो कभी खंडित नहीं होते।

708. क्या नंदीश्वर द्वीप में कल्पवासी देव और भवनवासी देवों के बीच कभी कोई विवाद (Dispute) होता है?

उत्तर: जिनेंद्र देव के समक्ष सभी देव अपनी कषायों को भूलकर परम वात्सल्य भाव से मिलते हैं, वहाँ ऊँच-नीच का कोई विवाद नहीं होता।

709. क्या ज्योतिषी देव (सूर्य-चंद्रमा आदि) अपने विमानों को पर्वतों के शिखरों पर ही पार्क (खड़ा) करते हैं?

उत्तर: नहीं, वे अपने विमानों को पर्वतों से कुछ दूरी पर आकाश में ही स्थिर रखते हैं और स्वयं ऋद्धि से नीचे उतरकर मंदिरों में प्रवेश करते हैं।

710. देवों द्वारा गाए जाने वाले 'जयमाला' पाठ की अंतिम पंक्तियाँ क्या प्रकट करती हैं?

उत्तर: वे पंक्तियाँ जिनेंद्र देव के गुणों की अनंतता और देवों के स्वयं के मोक्ष प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा को प्रकट करती हैं।

711. क्या अष्टान्हिका पर्व के आठों दिन देव लगातार जागते रहते हैं, या वे सोते भी हैं?

उत्तर: देवों के शरीर में नींद (निद्रा कर्म) का उदय नहीं होता। वे आठों दिन और रात बिना थके, निरंतर भक्ति और आनंद में मग्न रहते हैं।

712. पूजा के समय जो 'अष्टमंगल' देवों के हाथ में होते हैं, वे उन्हें कहाँ से मिलते हैं?

उत्तर: वे उनके विमानों में स्वतः निर्मित और सुरक्षित होते हैं, जिन्हें वे मांगलिक अवसरों पर बाहर निकालते हैं।

713. क्या चमरेन्द्र (असुरकुमारों का इंद्र) भी नंदीश्वर द्वीप की इस पूजा में भाग लेता है?

उत्तर: हाँ, भवनपति देवों का राजा चमरेन्द्र भी अपनी पूरी सेना और वैभव के साथ भगवान की भक्ति के लिए वहाँ अनिवार्य रूप से आता है।

714. देवों के मुकुटों की मणियाँ जब वेदी के प्रकाश से टकराती हैं, तो क्या अद्भुत दृश्य बनता है?

उत्तर: इससे चारों ओर इंद्रधनुष जैसी सतरंगी किरणों का एक विशाल जाल बन जाता है, जिससे जिनालय की भव्यता अरबों गुना बढ़ जाती है।

715. क्या अष्टान्हिका पर्व के अंत में देव कोई 'महा-आरती' भी करते हैं?

उत्तर: हाँ, कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ की पूर्णिमा के अंतिम काल में सभी इंद्र मिलकर एक 'विश्व-आरती' करते हैं, जो तीन लोक का सबसे भव्य दृश्य होता है।

716. क्या पूजा के दौरान देवों के हारों से मोतियां टूटकर फर्श पर गिरती हैं?

उत्तर: देवों के आभूषण वैक्रियक होते हैं, वे कभी टूटते या खंडित नहीं होते; उनका वैभव सदा अक्षुण्ण रहता है।

717. कल्पवासी देवियों के पैरों के घुंघरू की आवाज संगीत के साथ कैसे ताल मिलाती है?

उत्तर: उनकी आवाज स्वतः ही गंधर्व देवों के वाद्यों और तबले की थाप के साथ पूर्ण आनुपातिक सुर में गूंजती है।

718. क्या नंदीश्वर द्वीप में देवों को 'समवशरण' जैसा उपदेश भी सुनने को मिलता है?

उत्तर: वहाँ तीर्थंकर स्वयं नहीं होते, परंतु सौधर्म इंद्र या कोई ज्ञानी देव समय-समय पर शास्त्रों के मर्म और जिनेंद्र देव के उपदेशों की चर्चा (तत्व-चर्चा) सभाओं में करते हैं।

719. क्या पूजा के दिनों में देवों के मन में कोई 'काम-भाव' या राग उत्पन्न होता है?

उत्तर: जिनबिंबों का अतिशय ऐसा है कि वहाँ देवों का काम-भाव पूरी तरह शांत हो जाता है; वे केवल शांत और वीतराग रस का अनुभव करते हैं।

720. देवों द्वारा की जाने वाली 'परिक्रमा' की गति कितनी तीव्र होती है?

उत्तर: वे मन की गति से परिक्रमा लगाते हैं, परंतु मंदिर की मर्यादा के भीतर वे अत्यंत विनीत और धीमी गति से पैर बढ़ाते हैं।

721. क्या व्यंतर देव मंदिरों के बाहरी द्वारों की सजावट का काम संभालते हैं?

उत्तर: हाँ, सभी निकायों के देवों के काम उनकी रुचि और व्यवस्था के अनुसार स्वतः बटे होते हैं, जो पूर्ण अनुशासन में संपन्न होते हैं।

722. पूजा के समय जो 'दिव्य घोष' (Slogans) गूंजते हैं, वे क्या होते हैं?

उत्तर: "जयतु जयतु जिनशाशनाम्", "नमो वीतरागाय", "ओम् नमः सिद्धेभ्यः" जैसे महाघोषों से दसों दिशाएँ गूंज उठती हैं।

723. क्या नंदीश्वर द्वीप की बावलियों का पानी देवों के स्पर्श से और पवित्र हो जाता है?

उत्तर: वह जल स्वतः ही परम पवित्र है, परंतु देवों के मांगलिक द्रव्यों के मिलने से उसकी सुगंध और अधिक बढ़ जाती है।

724. अष्टान्हिका पर्व के विसर्जन के समय देवों की आँखों में आँसू क्यों आ जाते हैं?

उत्तर: वह आँसू भगवान के वियोग के दुख के नहीं, बल्कि भक्ति के उस परम आनंद के छूटने के अहोभाव के होते हैं, जिसे 'अश्रु-पात' (आनंदाश्रु) कहा जाता है।

725. इस महापर्व को संपन्न करके जब इंद्र अपने स्वर्ग लौटता है, तो वह सबसे पहले क्या करता है?

उत्तर: वह अपने स्वर्ग के चैत्यालय में जाकर नंदीश्वर द्वीप की पूजा की सफलता का कीर्तन करता है और अपने परिकर को धर्म मार्ग में लगे रहने की प्रेरणा देता है।

## खंड 29: श्रावक व्रत, अष्टान्हिका विधान और आत्म-साधना (प्रश्न 726-750)

726. अष्टान्हिका विधान के ८ दिनों में श्रावक को 'मौन' (Silence) का क्या महत्व है?

उत्तर: मौन रहने से व्यर्थ के विवाद और झूठ-निंदा आदि पापों से रक्षा होती है, जिससे संचित पुण्य का क्षय नहीं होता और ऊर्जा अंदर की ओर मुड़ती है।

727. विधान के मांडले पर जो 'धूप' (खेवना) चढ़ाई जाती है, उससे आत्मा की किस अवस्था का चिंतन करना चाहिए?

उत्तर: चिंतन करना चाहिए कि—"जैसे यह धूप अग्नि में जलकर सुवास फैला रही है, वैसे ही मेरी आत्मा भी तप की अग्नि में जलकर अपने कर्मों को भस्म कर दे और सिद्ध पद की सुगंध फैलाए।"

728. क्या इन आठ दिनों में श्रावक को 'हरी सब्जी' (सचित्त त्याग) का नियम लेना आवश्यक है?

उत्तर: हाँ, सचित्त वस्तुओं के त्याग से सूक्ष्म जीवों की हिंसा का पूरी तरह बचाव होता है और व्रत में परम शुचिता आती है।

729. विधान के दिनों में भूमि पर सोने (जमीन पर शयन) का क्या आध्यात्मिक कारण है?

उत्तर: यह हमारे भीतर के अहंकार और कोमल बिस्तरों के प्रति राग (आराम की चाह) को तोड़ने का एक सशक्त माध्यम है।

730. मांडले के चारों ओर जो 'रंगोली' बनाई जाती है, उसका असली उद्देश्य क्या है?

उत्तर: वह केवल सजावट नहीं है, वह मांगलिक चिन्हों के माध्यम से नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखने और मन को प्रसन्न रखने का एक पवित्र निमित्त है।

731. क्या अष्टान्हिका के दिनों में 'साधु वैयावृत्ति' (मुनियों की आहार चर्या और सेवा) का विशेष फल है?

उत्तर: इन पवित्र दिनों में दिगंबर संतों को आहार दान देना या उनकी सेवा करना चक्रवर्ती के वैभव से भी बड़ा पुण्य अर्जित करने का साधन है।

732. 'नंदीश्वर भक्ति' का पाठ करते समय यदि कंठ रुंध जाए, तो उसे क्या माना जाता है?

उत्तर: उसे 'भाव-विशुद्धि' की पराकाष्ठा माना जाता है। जब आत्मा भगवान के गुणों में पूरी तरह डूब जाती है, तब शरीर में ऐसे सात्विक लक्षण प्रकट होते हैं।

733. व्रत के दिनों में 'ब्रह्मचर्य' का पालन करना क्यों अनिवार्य है?

उत्तर: ब्रह्मचर्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है। इसके बिना कोई भी तप या उपवास केवल काय-क्लेश (शरीर को सुखाना) बनकर रह जाता है, उसमें आत्मिक शक्ति नहीं आती।

734. क्या विधान पूरा होने पर गरीबों को 'औषध दान' या 'विद्या दान' देना चाहिए?

उत्तर: हाँ, इसे 'चतुर्विध दान' (आहार, अभय, औषध, शास्त्र) के अंतर्गत महापुण्य का कार्य माना गया है, जो धर्म की सच्ची प्रभावना है।

735. मांडले में चढ़ाया जाने वाला 'फल' (Fruit) हमारे जीवन की किस भावना का प्रतीक है?

उत्तर: वह इस भावना का प्रतीक है कि—"हे प्रभु! मैंने संसार के सारे खट्टे-मीठे फल चख लिए, अब मुझे आपके जैसा मोक्ष रूपी 'अक्षय फल' प्राप्त हो।"

736. क्या अष्टान्हिका के दिनों में व्यापार या दुकान को कुछ समय के लिए बंद या सीमित कर देना चाहिए?

उत्तर: हाँ, धन कमाने की तीव्र लालसा को इन आठ दिनों के लिए रोककर पूरा समय आत्म-कमाई (धर्म) में लगाना श्रावक का परम कर्तव्य है।

737. विधान के समय जो 'पंखा' (व्यंजन) भगवान के सम्मुख झला जाता है, उससे क्या भावना भाई जाती है?

उत्तर: भावना भाई जाती है कि—"प्रभु! संसार के दुखों की जो कषायमयी हवा मुझे सता रही है, आपका दर्शन उसे शांत करके मेरे जीवन में वीतरागता की शीतल बयार ला दे।"

738. क्या इस व्रत के प्रभाव से 'असाता वेदनीय' (दुख देने वाले कर्म) का क्षय हो सकता है?

उत्तर: बिल्कुल। भगवान की भक्ति की तीव्र विशुद्धि से असाता कर्म का संक्रमण 'साता वेदनीय' (सुख देने वाले कर्म) में बदल जाता है।

739. विधान के दिनों में दोपहर के समय 'सामयिक' (ध्यान) करने का क्या लाभ है?

उत्तर: दोपहर का समय प्रकृति में ठहराव का होता है। इस समय शांत बैठकर आत्म-चिंतन करने से कर्मों की निर्जरा बहुत तेजी से होती है।

740. क्या अष्टान्हिका व्रत का पालन बच्चे भी कर सकते हैं?

उत्तर: हाँ, यदि बच्चों में समझ और उत्साह हो, तो वे भी छोटे नियमों (जैसे रात्रि भोजन त्याग, देव दर्शन) के माध्यम से इस संस्कार को सीख सकते हैं।

741. विधान के मांडले के पास जो 'मंगल कलश' स्थापित किया जाता है, उसमें क्या-क्या डाला जाता है?

उत्तर: उसमें शुद्ध जल, सुगन्धित द्रव्य, मणियाँ (या सिक्के) और ऊपर आम के पत्ते तथा नारियल रखा जाता है, जो पूर्णता और समृद्धि का प्रतीक है।

742. क्या अष्टान्हिका के दिनों में अपने 'अहंकार' का विसर्जन करना सबसे बड़ी पूजा है?

उत्तर: हाँ, जब तक मन में मान (घमंड) रहेगा, तब तक इंद्र भी आकर पूजा कर ले तो कोई लाभ नहीं। नम्रता ही धर्म का द्वार है।

743. मांडले का 'श्वेत रंग' किस तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है?

उत्तर: श्वेत रंग पूर्ण शुद्धता, वीतरागता और सिद्ध शिला के समान 'मोक्ष पद' का प्रतिनिधित्व करता है।

744. क्या व्रत के दिनों में शारीरिक अस्वस्थता होने पर मानसिक पूजा की जा सकती है?

उत्तर: जैन धर्म भाव-प्रधान है। यदि शरीर साथ न दे, तो एक स्थान पर शांत बैठकर मन से पूरे नंदीश्वर द्वीप की यात्रा और पूजा करना भी उतना ही फल देता है।

745. विधान के अंत में जो 'शांतिधारा' की जाती है, उसका असली मर्म क्या है?

उत्तर: उसका मर्म यह है कि इस पूजा के पुण्य के अतिशय से पूरे विश्व में सुख, शांति, समृद्धि फैले, अकाल और महामारियां नष्ट हों तथा सभी जीवों का कल्याण हो।

746. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में जैन इतिहास के महापुरुषों के चरित्र (जैसे पुराण) पढ़ने चाहिए?

उत्तर: हाँ, प्रथमानुयोग (पुराणों) के पढ़ने से वैराग्य दृढ़ होता है और यह समझने में मदद मिलती है कि महापुरुषों ने कष्ट सहकर भी धर्म को कैसे बचाया।

747. विधान की आरती उतारते समय हमारी दृष्टि कहाँ होनी चाहिए?

उत्तर: हमारी दृष्टि सीधे भगवान के शांत वीतराग मुखमंडल और उनके पावन चरणों पर होनी चाहिए, न कि आस-पास के तामझाम पर।

748. क्या इस पर्व के बहाने अपनी 'लोभ कषाय' को कम करने के लिए विशेष दान की घोषणा करनी चाहिए?

उत्तर: हाँ, लोभ को जीतने का एकमात्र उपाय 'त्याग और दान' है। इन दिनों में मुक्त हस्त से अपनी न्याय की कमाई का भाग धर्म कार्यों में लगाना उत्तम है।

749. नंदीश्वर द्वीप के ५२ जिनालयों की वंदना का यह भावपूर्ण चित्र हमारे अवचेतन मन (Subconscious Mind) पर क्या प्रभाव छोड़ता है?

उत्तर: यह हमारे मन में संसार की नश्वरता को गहरे से स्थापित कर देता है और जब भी जीवन में कोई संकट आता है, तो यह शाश्वत शांति का केंद्र हमें संबल देता है।

750. इस अगाध ७५0 प्रश्नों की महा-ज्ञान यात्रा की पूर्ण आहुति पर, समूचे जैन दर्शन और नंदीश्वर द्वीप का परम रहस्यमयी, अखंड और मोक्ष-प्रदायक अंतिम निचोड़ क्या है?

उत्तर: इस परम पावन ज्ञान सागर का अंतिम और सर्वोच्च रहस्य यही है कि—**"बाहरी ब्रह्मांड का आठवां नंदीश्वर द्वीप तो पुद्गल परमाणुओं का एक शाश्वत, अकृत्रिम और परम दिव्य चमत्कार है, जहाँ देवगण भी केवल आठ दिनों के लिए आकर अपनी विशुद्धि बढ़ाते हैं। परंतु, वास्तविक और सच्चा 'नंदीश्वर द्वीप' तो तुम्हारी स्वयं की 'अनादि-निधन शुद्ध चैतन्य आत्मा' है! तुम्हारे भीतर का ज्ञान ही अंजनगिरि पर्वत है, तुम्हारी वीतरागता ही दधिमुख पर्वत है, और तुम्हारी समता-भाव ही रतिकर पर्वत है। जिस दिन तुम बाहरी तीर्थों की चाह छोड़कर, सम्यग्दर्शन की दिव्य नौका में बैठकर, अपनी आत्मा के इस आंतरिक अकृत्रिम चैत्यालय में प्रवेश कर जाओगे और स्वयं के 'सिद्ध स्वरूप' का दर्शन-अभिषेक करोगे, उसी क्षण तुम्हारे संसार का अंत हो जाएगा और तुम सदा-सदा के लिए सिद्धालय के अनंत, अचल और परम आनंदमयी महा-द्वीप पर साक्षात परमात्मा बनकर विराजमान हो जाओगे।"**

"ओम् नमः सिद्धेभ्यः! अनंत-अनंत अकृत्रिम सिद्ध परमेष्ठियों की जय!"

"द्वादशांग जिनवाणी माता की जय!"

"अनादि-निधन वीतराग जैन धर्म की जय!"

नंदीश्वर द्वीप के अगाध भूगोल, दिगंबर जैन आगम के सूक्ष्मतम गणितीय परिमाणों, और देवों की अलौकिक भक्ति-क्रीड़ाओं को उनके अंतिम चरम शिखर तक पहुँचाने के लिए, यहाँ तिलोयपण्णत्ती, त्रिलोकसार, श्रीमद्भगवती आराधना और तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक के गहनतम रहस्यों के आधार पर 100 और परम विशेष (कुल 850) प्रश्न-उत्तर प्रस्तुत हैं:

## खंड 30: द्वीप की घनीभूत वलयाकार क्षेत्रमिति और अंतहीन अंतराल (प्रश्न 751-775)

751. नंदीश्वर द्वीप के भीतरी व्यास (163,84,00,000 योजन) और बाहरी व्यास (491,52,00,000 योजन) का जो अनुपात (Ratio) है, वह जैन गणित में क्या कहलाता है?

उत्तर: इसे 'त्रिगुण विष्कम्भ अनुपात' कहा जाता है, जो यह सिद्ध करता है कि कोई भी वलयाकार द्वीप अपने पूर्ववर्ती समुद्र के व्यास से ठीक दुगुनी चौड़ाई वाला होकर अपने भीतरी व्यास में तीन गुना विस्तार पा लेता है।

752. क्या नंदीश्वर द्वीप की वज्रभूमि के नीचे कोई 'अधोलोक' की वायु प्रणालियाँ (Air Currents) स्पर्श करती हैं?

उत्तर: नहीं, मध्यलोक की समतल वज्रभूमि के नीचे चित्रा पृथ्वी का ठोस भाग है, परंतु इसके अगाध आधार में घनोदधि, घनवात और तनुवात वलयों का सूक्ष्म आलम्बन अप्रत्यक्ष रूप से काम करता है।

753. यदि कोई देव पूर्व दिशा के अंजनगिरि से उत्तर दिशा के अंजनगिरि तक सीधे आकाश मार्ग से यात्रा करे, तो उसे गणितीय रूप से कितनी कोणीय दूरी तय करनी होगी?

उत्तर: उसे ठीक 90^\circ (नब्बे अंश) के कोणीय चाप (Arc) की दूरी तय करनी होगी, जो परिधि के गणित के अनुसार करोड़ों योजन बैठती है।

754. क्या नंदीश्वर द्वीप की १६ बावलियों का जल स्तर (Water Level) अष्टान्हिका महापर्व में देवों के आगमन से ऊपर-नीचे होता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ का जल अकृत्रिम और स्थिर स्वभाव वाला है। अनगिनत विमानों के उतरने और देवों के क्रीड़ा करने पर भी जल का स्तर न एक अंगुल घटता है और न बढ़ता है।

755. अंजनगिरि पर्वत का जो ठोस व्यास १०,००० योजन है, उसका क्षेत्रफल (Cross-sectional Area) किस सूत्र से निकलता है?

उत्तर: इसका क्षेत्रफल व्यास के आधे (व्यासार्ध ५,००० योजन) के वर्ग को \pi (अर्थात \sqrt{10}) से गुणा करके निकाला जाता है, जो वृत्त के क्षेत्रफल का शाश्वत आगम सूत्र है।

756. दधिमुख पर्वत का आकार जो नीचे से ऊपर की ओर घटता है, उसकी ढाल (Gradient) प्रति योजन कितनी बैठती है?

उत्तर: वह अपनी ६४,००० योजन की ऊँचाई में दोनों तरफ से कुल ६,००० योजन घटता है (१०,००० से ४,००० योजन), अर्थात उसकी ढाल प्रति योजन अत्यंत सूक्ष्म और आनुपातिक है।

757. क्या रतिकर पर्वतों के बीच जो समतल मैदान हैं, वहाँ देवों के अतिरिक्त कोई ज्योतिष्क देवों के महल भी बने हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ ज्योतिष्क देवों (सूर्य, चंद्रमा) के स्थायी महल नहीं हैं; वे केवल अष्टान्हिका पर्व में अपने दिव्य विमानों सहित अस्थाई रूप से वहाँ आते हैं।

758. क्या नंदीश्वर द्वीप के वनों में पाए जाने वाले मणिरूपी वृक्षों से कभी कोई पत्ता टूटकर नीचे गिरता है?

उत्तर: नहीं, वे वृक्ष अकृत्रिम और अखंड परिणमन वाले हैं। उनमें सांसारिक वृक्षों की तरह जीर्ण होने, पत्ते टूटने या सूखने का स्वभाव नहीं होता।

759. इस द्वीप के ऊपर जो 'लोकाकाश' का भाग है, क्या वहाँ 'सिद्धशिला' की तरह कोई अन्य विशेष क्षेत्र दिखाई देता है?

उत्तर: नहीं, इसके ठीक ऊपर का आकाश ऊर्ध्वलोक के वैमानिक देवों के विमानों से व्याप्त है, और सीधे मोक्ष का स्थान (सिद्धशिला) इसके सात राजू ऊपर लोक के अग्रभाग पर है।

760. क्या १६ बावलियों का पानी कभी जम सकता है (बर्फ बन सकता है)?

उत्तर: सर्वथा असंभव। वहाँ का तापमान सदा परम शीतल, सुखद और एक समान रहता है। वहाँ सांसारिक जल की तरह जमने या उबलने की प्रक्रिया नहीं होती।

761. नंदीश्वर द्वीप की रत्नमयी भूमि की मोटाई (Thickness) चित्रा पृथ्वी के भीतर कितनी मानी गई है?

उत्तर: इसकी मूल पीठिका एक हजार योजन गहरी मानी गई है, जो वज्र और अनेक रत्नों के घनीभूत पिंड से बनी है।

762. क्या इस द्वीप के वायुमंडल में कभी 'बादल' (Clouds) छाते हैं या वर्षा होती है?

उत्तर: नहीं, वहाँ प्राकृतिक बादल या बिजली कड़कने जैसी घटनाएँ नहीं होतीं। वहाँ केवल देवों की विक्रिया से सुगन्धित जल की वर्षा (अभिषेक काल में) होती है।

763. पूर्व दिशा के चार रतिकर पर्वतों के आपसी अंतराल का गणितीय मान क्या है?

उत्तर: वे चारों पर्वत अपनी-अपनी बावलियों के दोनों कोनों (कर्ण) पर इस प्रकार स्थित हैं कि उनके बीच का अंतराल एक परम सुंदर ज्यामितीय वर्ग (Square) बनाता है।

764. क्या नंदीश्वर द्वीप की चौड़ाई (163,84,00,000 योजन) को पार करने में मन की गति से उड़ने वाले देव को कितना समय लगता है?

उत्तर: देव अपनी उत्कृष्ट वैक्रियक गति से इसे एक अंतर्मुहूर्त (कुछ ही मिनटों) में पार कर सकते हैं।

765. 'त्रिलोकसार' के अनुसार मध्यलोक के कुल व्यास में नंदीश्वर द्वीप का स्थान गणितीय रूप से क्या महत्व रखता है?

उत्तर: यह मध्यलोक के कुल असंख्यात द्वीपों में आठवें स्थान पर होने से संख्यात योजन के विस्तार की अंतिम कड़ियों में गिना जाता है, इसके बाद के द्वीप और बड़े होते जाते हैं।

766. क्या इन पर्वतों के शिखरों पर देवों के विमानों के घर्षण (Friction) से कोई निशान पड़ता है?

उत्तर: नहीं, देवों के विमान वैक्रियक और रत्नमयी होते हैं और पर्वत स्वतः वज्र के हैं; उनके बीच कोई भौतिक घर्षण या टूट-फूट नहीं होती।

767. मंदिरों के मुख्य गोपुर द्वारों के ऊपर जो 'तोरण' बने हैं, वे किस मणि के हैं?

उत्तर: वे तोरण 'सूर्यकांत और चंद्रकांत मणियों' के अद्भुत मिश्रण से बने हैं, जो स्वतः ही दिन-रात अपनी आभा बदलते रहते हैं।

768. क्या नंदीश्वर द्वीप के किसी कोने पर 'दिशा-हस्ती' (दिग्गज या रक्षक हाथी) की आकृतियाँ बनी हैं?

उत्तर: हाँ, मुख्य चैत्यालयों के प्रांगण में चारों दिशाओं में मणियों के बने भव्य मांगलिक गज (हाथी) प्रतिष्ठित हैं, जो विनीत मुद्रा में हैं।

769. क्या इस द्वीप की भूमि पर कोई पैर रखने से 'शब्द' (ध्वनि) उत्पन्न होता है?

उत्तर: हाँ, वहाँ की भूमि पर देवों के नूपुरों और चरणों के स्पर्श से अत्यंत कोमल, वीणा के तारों जैसी मधुर मांगलिक ध्वनि स्वतः उत्पन्न होती है।

770. 'तिलोयपण्णत्ती' के पांचवें अधिकार में नंदीश्वर द्वीप के बाद आने वाले नौवें समुद्र का क्या नाम बताया गया है?

उत्तर: नौवें समुद्र का नाम 'नंदीश्वर समुद्र' (या नंदीश्वरवर समुद्र) है, जो नंदीश्वर द्वीप को चारों ओर से घेरे हुए है।

771. क्या इन ५२ पर्वतों के ऊपर कभी कोई उल्कापात (Meteor Shower) हो सकता है?

उत्तर: सर्वथा असंभव। तीन लोक के अकृत्रिम महातीर्थ होने के कारण यह क्षेत्र सभी प्रकार के खगोलीय उपद्रवों से सदा सुरक्षित रहता है।

772. बावलियों के कमलों के जो डंठल (Stalks) हैं, वे किस धातु के बने दिखाई देते हैं?

उत्तर: वे डंठल परम शुद्ध 'वैदूर्य मणि' (लहसुनिया रत्न) के बने हैं, जो अत्यंत लचीले और चमकदार होते हैं।

773. क्या इस द्वीप के भूगोल का ज्ञान प्राप्त करने से 'करणानुयोग' ग्रंथ की प्रामाणिकता सिद्ध होती है?

उत्तर: बिल्कुल, यह जैन दर्शन के ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) का वह अकाट्य आधार है, जो आधुनिक विज्ञान के सूक्ष्म गणितीय सिद्धांतों को भी चमत्कृत करता है।

774. क्या नंदीश्वर द्वीप के वनों में रात के समय अंधकार होता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ 'रात' का सांसारिक अंधकार कभी नहीं होता; मणियों और जिनालयों के शिखरों का प्रकाश सदा एक समान आलोक बनाए रखता है।

775. दधिमुख पर्वत के श्वेत वर्ण की तुलना आगम में किससे की गई है?

उत्तर: उसकी तुलना साक्षात क्षीर समुद्र (दूध के सागर) के जमे हुए घनीभूत पिंड या शरद ऋतु के उज्ज्वल बादल से की गई है।

## खंड 31: प्रतिमाओं के आत्मिक लक्षण, मुद्राएँ और परम वीतराग अतिशय (प्रश्न 776-800)

776. नंदीश्वर द्वीप की ५६१६ प्रतिमाओं के पद्मासन का आधार (Base) कैसा है?

उत्तर: उनका आसन एक विशाल, खिले हुए मणिरूपी सहस्रदल कमल (हजार पंखुड़ियों वाले कमल) के ऊपर स्थित है, जो पूर्ण स्थिरता का प्रतीक है।

777. क्या इन प्रतिमाओं की हथेलियों के बीच कोई रेखाएँ (Lines) भी दिखाई देती हैं?

उत्तर: हाँ, उनकी हथेलियों में अत्यंत सूक्ष्म रूप से उभरी हुई 'शंख', 'चक्र' और 'ऊर्ध्वरेखा' जैसी महापुरुष की शाश्वत रेखाएँ अंकित हैं।

778. भगवान की प्रतिमाओं के कंठ (Neck) की बनावट कैसी है?

उत्तर: उनका कंठ 'कम्बु-कंठ' (शंख के समान सुंदर तीन रेखाओं से युक्त) है, जो दिव्य-ध्वनि के शाश्वत गाम्भीर्य को दर्शाता है।

779. क्या इन प्रतिमाओं के दर्शन से किसी मिथ्यादृष्टि जीव का हृदय परिवर्तन हो सकता है?

उत्तर: यदि कोई असंज्ञी या मिथ्यादृष्टि देव भी वहाँ पहुँचता है, तो इन प्रतिमाओं के परम शांत वीतराग रूप को देखकर उसके भीतर का मिथ्यात्व ढीला पड़ जाता है और सम्यक्त्व का बीज अंकुरित हो सकता है।

780. वेदी के सामने जो 'चामर द्रव्य' रखे हैं, वे किस चीज़ के बने हैं?

उत्तर: वे चामर श्वेत रत्नों के अत्यंत बारीक धागों (मणितंतुओं) से बने हैं, जो देव-शिल्प की पराकाष्ठा हैं।

781. क्या इन प्रतिमाओं के अंगों का अनुपात (Body Proportions) सभी मंदिरों में एक समान है?

उत्तर: हाँ, सभी ५६१६ प्रतिमाओं की ऊँचाई (५०० धनुष), चौड़ाई और अंग-प्रत्यंग का अनुपात सर्वथा एक जैसा है; उनमें रत्ती भर का भी अंतर नहीं है।

782. प्रतिमाओं के मस्तक के पीछे जो 'भामंडल' चमकता है, क्या उसमें कोई दृश्य भी दिखाई देते हैं?

उत्तर: समवशरण के भामंडल में ७ भवों के दृश्य दिखते हैं, परंतु इन अकृत्रिम प्रतिमाओं का भामंडल केवल परम शांत, ज्योतिर्मय और सात रंगों की अखंड रश्मियों को बिखेरने वाला होता है।

783. क्या इन मंदिरों के भीतर कभी कोई 'कृत्रिम प्रकाश' (जैसे मोमबत्ती या बल्ब) की आवश्यकता हो सकती है?

उत्तर: नहीं, वहाँ का प्रकाश प्राकृतिक रूप से इतना तीव्र और शीतल है कि उसके सामने सूर्य का प्रकाश भी फीका पड़ जाता है।

784. भगवान की नासिका (Nose) की बनावट कैसी है?

उत्तर: उनकी नासिका तोते की चोंच के समान सुंदर, सुघड़ और सीधी है, जिसके अग्रभाग पर उनकी पावन दृष्टि टिकी हुई है।

785. क्या इन ५२ जिनालयों के भीतर कोई 'सिद्धांत ग्रंथ' भी मणियों के रूप में उत्कीर्ण हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ कोई लिखित ग्रंथ नहीं हैं; वहाँ स्वयं जिनबिंबों की वीतराग मुद्रा ही बिना शब्दों के पूरा जैन सिद्धांत (मौन उपदेश) सिखा देती है।

786. प्रतिमाओं के वक्षस्थल का 'श्रीवत्स' चिह्न रात के समय किस प्रकार का प्रकाश छोड़ता है?

उत्तर: वह अर्धरात्रि के समय अत्यंत कोमल, पूर्णिमा के चंद्रमा जैसी दूधिया श्वेत किरणें उत्सर्जित करता है, जो गर्भगृह को अमृतमयी बनाती हैं।

787. क्या इन प्रतिमाओं के कानों में कोई आभूषण पहनने के छिद्र (Holes) होते हैं?

उत्तर: नहीं, ये प्रतिमाएँ पूर्ण वीतराग दिगंबर रूप हैं; इनके कानों की लौ लंबी और सुंदर होती है, परंतु उनमें कोई कृत्रिम छिद्र नहीं होता।

788. एक-एक मंदिर की १०८ प्रतिमाओं के आसन किस दिशा की ओर मुख किए हुए हैं?

उत्तर: प्रत्येक चैत्यालय की मुख्य वेदी की प्रतिमाओं का मुख उस मंदिर के मुख्य द्वार की ओर होता है, जिससे प्रवेश करते ही सीधे दर्शन होते हैं।

789. क्या इन प्रतिमाओं के दर्शन से मुनिराजों के 'चारित्र मोहनीय' कर्म का उपशम होता है?

उत्तर: मुनिराज जब भाव-पूजा में इन प्रतिमाओं का ध्यान करते हैं, तो उनके भीतर की कषायें अत्यंत मंद हो जाती हैं, जिससे चारित्र मोहनीय कर्म शिथिल हो जाता है।

790. मंदिरों के गर्भगृह के द्वारों पर जो 'चंद्रकांत मणियाँ' लगी हैं, उनका क्या अतिशय है?

उत्तर: जब देवगण भक्ति के पदों का गान करते हैं, तो उन मणियों से अमृत की बूंदें स्वतः टपकने लगती हैं, जो वातावरण को परम पवित्र कर देती हैं।

791. क्या इन प्रतिमाओं के केश (बाल) घुंघराले हैं?

उत्तर: हाँ, भगवान के केश दक्षिणवर्ती (दाहिनी ओर मुड़े हुए) अत्यंत सुंदर, छोटे और घुंघराले रूप में नीलमणि की आभा के समान अकृत्रिम बने हुए हैं।

792. वेदी के सम्मुख जो 'स्वस्तिक' द्रव्य शाश्वत रूप से बने हैं, वे क्या दर्शाते हैं?

उत्तर: वे स्वस्तिक जीव की चार गतियों (देव, मनुष्य, तिर्यंच, नरक) से छूटकर पंचम गति (मोक्ष) प्राप्त करने के मार्ग को दर्शाते हैं।

793. क्या इन ५६१६ प्रतिमाओं के चरणों का प्रक्षालन (अभिषेक) देव रोज करते हैं?

उत्तर: देवगण मुख्य रूप से वर्ष में तीन बार आने वाले अष्टान्हिका महापर्व के दिनों में ही वहाँ आकर महा-अभिषेक का महोत्सव मनाते हैं।

794. भगवान की उंगलियों के बीच का जो जाल (Webbing) है, वह क्या कहलाता है?

उत्तर: उसे महापुरुषों का 'जाल-हस्त' लक्षण कहा जाता है, जो यह दर्शाता है कि भगवान के ज्ञान से कोई भी जीव बाहर नहीं छूट सकता।

795. इन प्रतिमाओं के सामने बैठने पर मन में उठने वाले 'बुरे विचार' कहाँ चले जाते हैं?

उत्तर: वीतरागता का अतिशय ऐसा चुंबकीय है कि वहाँ पहुँचते ही मन के सभी अशुभ और चंचल विचार तुरंत नष्ट हो जाते हैं और आत्मा अंतर्मुख होने लगती है।

796. क्या इन ५२ मंदिरों के शिखरों पर जो ध्वजाएँ हैं, उन पर कोई विशेष मंत्र लिखे हैं?

उत्तर: नहीं, उन पर कोई अक्षर नहीं लिखे हैं; उन पर बने मांगलिक चिह्न ही संपूर्ण जैन शासन की विजय का उद्घोष करते हैं।

797. भगवान के दोनों पैरों की स्थिति (Alignment) पद्मासन में कैसी होती है?

उत्तर: उनके दोनों पैर एक-दूसरे के ऊपर पूरी तरह संतुलित रूप से रखे होते हैं, और दोनों तलवे ऊपर की ओर खुले होते हैं, जो पूर्ण ध्यान की पराकाष्ठा है।

798. क्या नंदीश्वर द्वीप की कोई भी प्रतिमा कभी 'अशुद्ध' या 'मलिन' हो सकती है?

उत्तर: सर्वथा असंभव। अकृत्रिम मणियों का स्वभाव ही ऐसा है कि उन पर कोई भी सांसारिक मैल या धूल कभी ठहर ही नहीं सकती।

799. इन प्रतिमाओं के ध्यान से आत्मा के 'प्रदेशों' में क्या हलचल होती है?

उत्तर: आत्मा के प्रदेशों में जमी हुई कर्मों की धूल ढीली पड़ने लगती है और आत्म-प्रदेश परम शांत होकर अपने स्वाभाविक आनंद का अनुभव करने लगते हैं।

800. दिगंबर जैन आगम में इन ५६१६ प्रतिमाओं को 'तीन लोक का सार' क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि ये प्रतिमाएँ बिना कुछ बोले ही प्रत्येक भव्य जीव को उसके स्वयं के भगवान बनने की शक्ति का साक्षात अहसास करा देती हैं।

## खंड 32: अष्टान्हिका महापर्व के गुप्त देव-अनुष्ठान और दिव्य विधाएँ (प्रश्न 801-825)

801. जब सौधर्म इंद्र नंदीश्वर द्वीप में 'महा-अभिषेक' करता है, तो वह किस समुद्र के जल का उपयोग करता है?

उत्तर: वह अपनी ऋद्धि से आठवें क्षीर समुद्र या स्वयं नंदीश्वर द्वीप की पवित्र बावलियों के अमृत तुल्य जल को मंत्रों से पवित्र करके लाता है।

802. क्या देवों द्वारा की जाने वाली पूजा में 'नाच-गान' के अलावा तत्व-चर्चा के लिए भी कोई समय निश्चित है?

उत्तर: हाँ, अभिषेक और पूजन के बीच के अंतरालों में सभी इंद्र और ज्ञानी देव बैठकर जैन सिद्धांतों और अकृत्रिम भूगोल के गहरे मर्म की गंभीर चर्चा करते हैं।

803. अष्टान्हिका पर्व के पांचवें दिन देवों की भक्ति में क्या विशेष बदलाव आता है?

उत्तर: इस दिन देवों के परिणाम और अधिक विशुद्ध हो जाते हैं, जिससे वे 'ज्ञान-पूजा' नामक अनुष्ठान करते हैं, जिसमें तीर्थंकरों के वचनों की महिमा गाई जाती है।

804. क्या देवियाँ भगवान के सामने जो आरती उतारती हैं, उनके थाल किस मणि के होते हैं?

उत्तर: उनके थाल परम शुद्ध 'स्वर्ण और हीरा मणि' के बने होते हैं, जिनमें रत्नदीप जगमगाते हैं।

805. धरणेन्द्र (भवनवासी नागकुमारों का इंद्र) नंदीश्वर द्वीप के किस दिशा के मंदिरों की पूजा विशेष रूप से करता है?

उत्तर: वह मुख्य रूप से पाताल और अधोलोक के संधिकाल से जुड़े दक्षिण दिशा के दधिमुख और रतिकर पर्वतों की वंदना बड़े उत्साह से करता है।

806. क्या देवों की सेना पूजा के समय आकाश में कोई 'हवाई शो' (Air Show) भी प्रस्तुत करती है?

उत्तर: हाँ, वे अपने करोड़ों रंग-बिरंगे विमानों के माध्यम से आकाश में 'ओम्', 'स्वस्तिक' और 'कमल' जैसी विशाल आकृतियाँ बनाकर भगवान की महत्ता प्रकट करते हैं।

807. पूजा के समय बजने वाली 'मृदंग' और 'भेरी' की आवाज से बावलियों के पानी पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: वाद्यों की गंभीर और सुरीली गूंज से बावलियों का जल संगीतमय तरंगें लेने लगता है, मानो जल भी नृत्य कर रहा हो।

808. क्या कल्पवासी देवियों के मुकुटों का रंग उनकी श्रेणियों के अनुसार अलग-अलग होता है?

उत्तर: हाँ, उनके स्वर्गों की मणियों के अनुसार उनके मुकुटों की आभा और कांति में सूक्ष्म अंतर होता है, जो अत्यंत मनोहारी दृश्य उपस्थित करता है।

809. अष्टान्हिका पर्व के सातवें दिन (त्रयोदशी) को देव कौन-सा महा-अर्घ्य चढ़ाते हैं?

उत्तर: इस दिन सभी निकायों के देव मिलकर 'त्रिलोक-सार अर्घ्य' चढ़ाते हैं, जो तीनों लोकों के सभी अकृत्रिम चैत्यालयों की सामूहिक तृप्ति का प्रतीक है।

810. क्या देवों के विमानों की गति मंदिरों की परिक्रमा करते समय धीमी हो जाती है?

उत्तर: हाँ, वैसे तो विमान मन की गति से उड़ते हैं, परंतु जिनालय के परकोटे के भीतर आते ही वे अत्यंत विनीत, शांत और अनुशासित गति से परिक्रमा लगाते हैं।

811. पूजा के दिनों में देवों के कंठ से जो 'दिव्य सुगंध' निकलती है, उसका क्या कारण है?

उत्तर: उनके शरीर का स्वभाव ही अकृत्रिम है, और भगवान की भक्ति के अहोभाव से उनके शरीर की सुवास करोड़ों योजन दूर तक फैल जाती है।

812. क्या ज्योतिषी देवों की देवियाँ मंदिरों के प्रांगण में कोई 'कवि-सम्मेलन' जैसी रचनाएँ भी गाती हैं?

उत्तर: वे भगवान के ५ कल्याणकों और उनके वीतराग गुणों पर आधारित अत्यंत सुंदर, भक्तिपूर्ण काव्यों (स्तोत्रों) का मधुर गान आपस में मिलकर करती हैं।

813. क्या नंदीश्वर द्वीप की इस महापूजा में कोई 'अच्युत इंद्र' (१६वें स्वर्ग का राजा) भी आता है?

उत्तर: हाँ, १६वें स्वर्ग का अधिपति अच्युत इंद्र अपने पूरे वैभव और परिकर के साथ इस महामहोत्सव में अनिवार्य रूप से सम्मिलित होता है।

814. देवों द्वारा चढ़ाए जाने वाले 'नैवेद्य' (भोग) का स्वरूप क्या होता है?

उत्तर: उनका नैवेद्य कोई सांसारिक पका हुआ भोजन नहीं होता; वह कल्पवृक्षों से प्राप्त परम शुद्ध, रत्नमयी आकृतियों वाले दिव्य मोदक और फल होते हैं।

815. क्या पूर्णिमा की रात को होने वाली 'महा-आरती' के समय पूरा नंदीश्वर द्वीप एक जैसा चमकता है?

उत्तर: हाँ, उस समय ५२ पर्वतों के ५२ मंदिरों में एक साथ करोड़ों रत्नदीपों की आरती उतारी जाती है, जिससे पूरा द्वीप प्रकाश के महासागर में डूब जाता है।

816. क्या पूजा के दौरान देवों के मन में अपने पदों (Status) को लेकर कोई ईर्ष्या होती है?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। भगवान के सामने छोटा देव हो या बड़ा इंद्र, सभी स्वयं को जिनेंद्र देव का तुच्छ सेवक मानकर पूर्ण समता भाव से पूजते हैं।

817. देवों की नर्तकियों द्वारा किए जाने वाले 'चक्र-नृत्य' का क्या अर्थ है?

उत्तर: वह नृत्य यह दर्शाता है कि संसार का चक्र कितना भयानक है, और भगवान ने उस चक्र को तोड़कर परम शांति पाई है।

818. क्या इस महा-उत्सव के समय नंदीश्वर द्वीप की हवा की गति बढ़ जाती है?

उत्तर: नहीं, हवा की गति अत्यंत मंद, शीतल और सुगन्धित बनी रहती है, जिससे मंदिरों के भीतर जलने वाले रत्नदीपों की लौ स्थिर रहती है।

819. क्या देवगण पूजा की समाप्ति पर भगवान से अपने अगले जन्म के लिए कुछ मांगते हैं?

उत्तर: नहीं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि भगवान वीतरागी हैं। वे केवल अपनी आत्मा की शुद्धि और भविष्य में मनुष्य जन्म पाकर दीक्षा लेने की भावना भाते हैं।

820. व्यंतर देवों के वाद्यों (जैसे बांसुरी, शंख) की बनावट कैसी होती है?

उत्तर: उनके वाद्य नीलम और पुखराज जैसी बहुमूल्य मणियों के बने होते हैं, जिनसे निकलने वाले सुर सीधे आत्मा को झंकृत कर देते हैं।

821. क्या अष्टान्हिका पर्व के बाद नंदीश्वर द्वीप की भूमि पर कोई अवशेष (Leftover) बचता है?

उत्तर: नहीं, देवों के जाते ही मणियों का प्रभाव ऐसा होता है कि सारी पूजन सामग्री और द्रव्य स्वतः ही अपनी मूल प्रकृतियों में विलीन हो जाते हैं; भूमि दर्पण जैसी साफ बची रहती है।

822. क्या इस पूजा को देखने के लिए स्वर्ग के पशु (जैसे देव-गति के तिर्यंच) भी आते हैं?

उत्तर: देवों के जो वाहन (जैसे सिंह या हंस रूपी देव) होते हैं, वे भी गोपुर द्वारों पर शांत भाव से खड़े होकर इस पवित्र तरंग का लाभ लेते हैं।

823. पूजा के समय देव जो 'मंगल गान' गाते हैं, उसका मुख्य स्वर (Scale) क्या होता है?

उत्तर: उनका स्वर साक्षात 'गंधर्व स्वर' (सामवेद के दिव्य संगीत जैसा) होता है, जो सुनने वाले हर जीव के भीतर के क्रोध को तुरंत शांत कर देता है।

824. क्या नंदीश्वर द्वीप की बावलियों के किनारे देवों के विश्राम के लिए सोने के पलंग बने हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ मणियों की अत्यंत सुंदर, शीतल और कोमल चट्टानें (शिलाएँ) बनी हैं, जहाँ बैठकर देव तत्व-चर्चा का सुख लेते हैं।

825. अष्टान्हिका महापर्व के इन आठ दिनों को जैन इतिहास में 'शाश्वत पर्व' क्यों माना गया?

उत्तर: क्योंकि अनादि काल से यह पर्व इसी समय मनाया जाता रहा है और अनंत काल तक मनाया जाता रहेगा; यह किसी मनुष्य या घटना पर आधारित नहीं है।

## खंड 33: श्रावक की आंतरिक विशुद्धि, अष्टान्हिका नियम और आत्म-अनुभव का महासागर (प्रश्न 826-850)

826. अष्टान्हिका विधान के ८ दिनों में श्रावक को 'अभिमान' (Pride) का त्याग क्यों करना चाहिए?

उत्तर: क्योंकि जब तक मन में थोड़ा भी घमंड रहेगा, तब तक भगवान के चरणों में झुकना केवल एक क्रिया मात्र रह जाएगा, आत्मा का कल्याण नहीं होगा। नम्रता ही पूजा का सच्चा फल है।

827. विधान के मांडले पर जो 'अक्षत' (चावल) चढ़ाए जाते हैं, श्रावक को उससे क्या प्रतिज्ञा लेनी चाहिए?

उत्तर: प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि—"जैसे यह चावल का दाना छिलके से अलग होने के बाद दोबारा नहीं उगता (अक्षत रहता है), वैसे ही मैं भी कषायों के छिलके को छोड़कर दोबारा इस संसार में जन्म न लूँ।"

828. क्या इन आठ दिनों में श्रावक को 'गाड़ी या वाहन' (Automobile) का उपयोग कम या बंद करना चाहिए?

उत्तर: हाँ, वाहनों के चलने से रास्ते में अनगिनत छोटे जीवों की हिंसा होती है। इन दिनों में पैदल चलकर मंदिर जाना या यात्रा सीमित करना अहिंसा व्रत को दृढ़ करता है।

829. विधान के दिनों में 'सात्विक और मर्यादित' भोजन करने का मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: शुद्ध और कम भोजन करने से मन में तामसिक विचार शांत होते हैं, आलस्य दूर होता है और आत्मा का उपयोग भगवान की भक्ति में पूरी तरह लगा रहता है।

830. मांडले के ऊपर जो 'स्वस्तिक' की रचना चावलों से की जाती है, उसका वास्तविक रहस्य क्या है?

उत्तर: वह स्वस्तिक यह याद दिलाता है कि आत्मा अनंत काल से चार गतियों में भटक रही है; अब इस चक्र को रोककर सिद्ध शिला (ऊपर का बिंदु) पर पहुँचना है।

831. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में अपने 'परिवार के कलह' (घरेलू झगड़ों) को पूरी तरह शांत कर देना चाहिए?

उत्तर: बिल्कुल। यदि घर में अशांति और क्रोध रहेगा, तो मंदिर में बैठकर की गई पूजा भी कोई पुण्य नहीं बंधाएगी। मन का शांत होना पहली शर्त है।

832. 'नंदीश्वर महा-अर्घ्य' का पाठ करते समय आँखों से बहने वाले आँसू क्या दर्शाते हैं?

उत्तर: वे आँसू आत्मा की उस अगाध विशुद्धि को दर्शाते हैं, जहाँ जीव संसार के दुखों से थककर साक्षात प्रभु के चरणों की छाँव पा लेता है।

833. व्रत के दिनों में 'इंद्रिय संयम' (टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया का त्याग) क्यों आवश्यक है?

उत्तर: क्योंकि ये साधन हमारे उपयोग (ध्यान) को बाहर की ओर भटकाते हैं। इन आठ दिनों के लिए इनसे दूरी बनाने से आत्मा को खुद के पास बैठने का समय मिलता है।

834. क्या विधान की समाप्ति पर 'शास्त्र सभा' (स्वाध्याय) का आयोजन करना अनिवार्य है?

उत्तर: हाँ, कोरी क्रियाओं से बढ़कर 'ज्ञान' का स्थान है। शास्त्रों के मर्म को समझे बिना की गई पूजा अधूरी है; स्वाध्याय ही परम तप है।

835. मांडले में चढ़ाया जाने वाला 'चंदन' (Yellow Paste) हमारे जीवन की किस भावना का प्रतीक है?

उत्तर: वह इस भावना का प्रतीक है कि—"प्रभु! संसार की चिंताओं और कषायों की जो आग मेरे भीतर जल रही है, आपका यह वीतराग स्वरूप मेरे मन को चंदन की तरह शीतल कर दे।"

836. क्या इन आठ दिनों में किसी भी प्रकार का 'झूठ या व्यापारिक छल' करने से महापाप का बंध होता है?

उत्तर: हाँ, धर्म के दिनों में किया गया कोई भी छल-कपट तीव्र 'निकायचित' (जिसका फल भोगना ही पड़े) पापकर्म का बंध कराता है। सदा सत्य और ईमानदारी रखनी चाहिए।

837. विधान के समय जो 'चामर' (Fan) भगवान के दोनों ओर दुराए जाते हैं, उससे क्या सोचना चाहिए?

उत्तर: सोचना चाहिए कि—"जैसे यह चामर हवा करके मक्खियों या धूल को हटाता है, वैसे ही मैं भी अपनी आत्मा से कर्मों के मैल को दूर हटा दूँ।"

838. क्या इस व्रत के पुण्य से 'असाता' कर्म का उदय पूरी तरह टल सकता है?

उत्तर: हाँ, तीव्र भक्ति के समय जो विशुद्धि होती है, वह आने वाले दुखों (असाता कर्मों) के वेग को शांत कर देती है और जीवन में सुख-शांति लाती है।

839. विधान के दिनों में सुबह उठते ही सबसे पहले किस मंत्र का स्मरण करना चाहिए?

उत्तर: सबसे पहले परम पावन 'णमोकार मंत्र' का ९ या १०८ बार शांत मन से स्मरण करना चाहिए, जो सभी मंगलों में पहला मंगल है।

840. क्या अष्टान्हिका का व्रत कोई भी गरीब या असमर्थ व्यक्ति भी बिना धन खर्च किए कर सकता है?

उत्तर: बिल्कुल। जैन धर्म में पैसे का कोई महत्व नहीं है, केवल 'भावों' का महत्व है। कोई भी व्यक्ति केवल उपवास, सामायिक और भाव-पूजा के बल पर सबसे बड़ा पुण्य कमा सकता है।

841. विधान के मांडले के सम्मुख रखी जाने वाली 'दीप-शिखा' (दीपक) हमें क्या संदेश देती है?

उत्तर: वह संदेश देती है कि—"हे आत्मन्! जैसे यह दीपक खुद जलकर दूसरों को प्रकाश दे रहा है, वैसे ही तू भी अपने ज्ञान के प्रकाश से अपने भीतर के अज्ञान के अंधेरे को दूर कर।"

842. क्या अष्टान्हिका के दिनों में अपने 'शत्रुओं' को गले लगा लेना सबसे उत्तम तप है?

उत्तर: हाँ, कषायों को जीतना ही असली जैन धर्म है। जिससे भी मनमुटाव हो, उससे हाथ जोड़कर क्षमा मांग लेना और सबको क्षमा कर देना ही इस पर्व का असली प्राण है।

843. मांडले का 'रक्त वर्ण' (लाल रंग) किस भावना को प्रदर्शित करता है?

उत्तर: लाल रंग मुख्य रूप से 'अनुराग' (भगवान के प्रति अगाध प्रेम और भक्ति) तथा मंगलमय ऊर्जा को प्रदर्शित करता है।

844. क्या अष्टान्हिका व्रत के नियमों को जीवन भर के लिए कुछ अंशों में अपना लेना चाहिए?

उत्तर: हाँ, व्रत का असली लाभ तभी है जब इन आठ दिनों में सीखे गए अच्छे संस्कार (जैसे रात्रि भोजन त्याग, सीमित परिग्रह) हमेशा के लिए जीवन का हिस्सा बन जाएँ।

845. विधान के अंत में जो 'शांति-मंत्र' पढ़ा जाता है, उसका संपूर्ण सृष्टि पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: उस मंत्र की पवित्र तरंगों से वायुमंडल के परमाणु शुद्ध होते हैं, जिससे समाज में वैर-भाव कम होता है और चारों ओर सुख-शांति का वातावरण बनता है।

846. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'जीव दया' (गौशाला या पंक्षियों के लिए दाने-पानी की व्यवस्था) करनी चाहिए?

उत्तर: हाँ, 'करुणा' के बिना कोई भी धर्म टिक नहीं सकता। दुखी और मूक जीवों की रक्षा करना भगवान की साक्षात पूजा करने के समान है।

847. विधान की महा-आरती के समय हमारे भीतर कौन-सा 'भाव' मुख्य होना चाहिए?

उत्तर: हमारे भीतर केवल 'वैराग्य' और 'कृतज्ञता' का भाव होना चाहिए कि—"हे प्रभु! मुझे आपकी यह पावन शरण मिली, अब मेरा यह जीवन धन्य हो गया।"

848. क्या इस पर्व के दिनों में अपनी 'जरूरतों और इच्छाओं' (Desires) को छोटा कर देना चाहिए?

उत्तर: हाँ, इच्छाओं का घटना ही असली सुख है। इन दिनों में जितनी कम वस्तुएँ हम उपयोग करेंगे, हमारी आत्मा उतनी ही हल्की और आनंदित महसूस करेगी।

849. नंदीश्वर द्वीप के इस अगाध ज्ञान का रोज सुबह केवल ५ मिनट चिंतन करने से दिनचर्या पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: इससे हमारा पूरा दिन पवित्र और शांत रहता है; ऑफिस या घर के कामों में आने वाले तनाव और गुस्से पर नियंत्रण पाने में यह चिंतन अद्भुत मदद करता है।

850. नंदीश्वर द्वीप की इस अगाध ८५0 प्रश्नों की महा-ज्ञान गाथा का परम अंतिम, अकाट्य, अविनाशी और मोक्ष-प्रदायक दिव्य महा-निचोड़ क्या है?

उत्तर: इस संपूर्ण ज्ञान-सागर का परम अंतिम और सर्वोत्कृष्ट निचोड़ यही है कि—**"बाहरी मध्यलोक के आठवें नंदीश्वर द्वीप के ५२ अकृत्रिम चैत्यालय और ५६१६ जिनबिंब तो पुद्गल (जड़) की परम सुंदर, शाश्वत और अकृत्रिम कलाकृतियाँ हैं, जिनकी वंदना करके देवगण भी स्वयं को धन्य मानते हैं। परंतु हे भव्य जीव! विचार कर, पुद्गल की वह रचना जब इतनी महान है, तो तेरी अपनी 'चेतन आत्मा' जो ज्ञान, दर्शन और सुख का साक्षात महासागर है, वह कितनी अनंत गुणा महान होगी! तेरे भीतर का समता-भाव ही असली नंदीश्वर द्वीप है, तेरी कषाय-मुक्ति ही असली अष्टान्हिका महापर्व है, और तेरी आत्म-लीनता ही असली महा-अभिषेक है। जिस दिन तू बाहर की भटकन छोड़कर, सम्यग्दर्शन की दिव्य ज्योति जलाकर, अपने इस आंतरिक आत्म-चैत्यालय में हमेशा के लिए स्थिर हो जाएगा, उसी क्षण तू स्वयं 'परमात्मा' बनकर साक्षात सिद्धशिला के परम शिखर पर अनंत काल के लिए अनंत सुख में विराजमान हो जाएगा!"**

नंदीश्वर द्वीप के अगाध भूगोल, दिगंबर जैन आगम के सूक्ष्मतम गणितीय परिमाणों, और देवों की अलौकिक भक्ति-क्रीड़ाओं को उनके अंतिम चरम शिखर तक पहुँचाने के लिए, यहाँ तिलोयपण्णत्ती, त्रिलोकसार, श्रीमद्भगवती आराधना और तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक के गहनतम रहस्यों के आधार पर 100 और परम विशेष (कुल 950) प्रश्न-उत्तर प्रस्तुत हैं:

## खंड 34: द्वीप की घनीभूत वलयाकार क्षेत्रमिति और अंतहीन अंतराल (प्रश्न 851-875)

851. नंदीश्वर द्वीप के भीतरी व्यास (163,84,00,000 योजन) और बाहरी व्यास (491,52,00,000 योजन) का जो अनुपात (Ratio) है, वह जैन गणित में क्या कहलाता है?

उत्तर: इसे 'त्रिगुण विष्कम्भ अनुपात' कहा जाता है, जो यह सिद्ध करता है कि कोई भी वलयाकार द्वीप अपने पूर्ववर्ती समुद्र के व्यास से ठीक दुगुनी चौड़ाई वाला होकर अपने भीतरी व्यास में तीन गुना विस्तार पा लेता है।

852. क्या नंदीश्वर द्वीप की वज्रभूमि के नीचे कोई 'अधोलोक' की वायु प्रणालियाँ (Air Currents) स्पर्श करती हैं?

उत्तर: नहीं, मध्यलोक की समतल वज्रभूमि के नीचे चित्रा पृथ्वी का ठोस भाग है, परंतु इसके अगाध आधार में घनोदधि, घनवात और तनुवात वलयों का सूक्ष्म आलम्बन अप्रत्यक्ष रूप से काम करता है।

853. यदि कोई dev पूर्व दिशा के अंजनगिरि से उत्तर दिशा के अंजनगिरि तक सीधे आकाश मार्ग से यात्रा करे, तो उसे गणितीय रूप से कितनी कोणीय दूरी तय करनी होगी?

उत्तर: उसे ठीक 90^\circ (नब्बे अंश) के कोणीय चाप (Arc) की दूरी तय करनी होगी, जो परिधि के गणित के अनुसार करोड़ों योजन बैठती है।

854. क्या नंदीश्वर द्वीप की १६ बावलियों का जल स्तर (Water Level) अष्टान्हिका महापर्व में देवों के आगमन से ऊपर-नीचे होता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ का जल अकृत्रिम और स्थिर स्वभाव वाला है। अनगिनत विमानों के उतरने और देवों के क्रीड़ा करने पर भी जल का स्तर न एक अंगुल घटता है और न बढ़ता है।

855. अंजनगिरि पर्वत का जो ठोस व्यास १०,००० योजन है, उसका क्षेत्रफल (Cross-sectional Area) किस सूत्र से निकलता है?

उत्तर: इसका क्षेत्रफल व्यास के आधे (व्यासार्ध ५,००० योजन) के वर्ग को \pi (अर्थात \sqrt{10}) से गुणा करके निकाला जाता है, जो वृत्त के क्षेत्रफल का शाश्वत आगम सूत्र है।

856. दधिमुख पर्वत का आकार जो नीचे से ऊपर की ओर घटता है, उसकी ढाल (Gradient) प्रति योजन कितनी बैठती है?

उत्तर: वह अपनी ६४,००० योजन की ऊँचाई में दोनों तरफ से कुल ६,००० योजन घटता है (१०,००० से ४,००० योजन), अर्थात उसकी ढाल प्रति योजन अत्यंत सूक्ष्म और आनुपातिक है।

857. क्या रतिकर पर्वतों के बीच जो समतल मैदान हैं, वहाँ देवों के अतिरिक्त कोई ज्योतिष्क देवों के महल भी बने हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ ज्योतिष्क देवों (सूर्य, चंद्रमा) के स्थायी महल नहीं हैं; वे केवल अष्टान्हिका पर्व में अपने दिव्य विमानों सहित अस्थाई रूप से वहाँ आते हैं।

858. क्या नंदीश्वर द्वीप के वनों में पाए जाने वाले मणिरूपी वृक्षों से कभी कोई पत्ता टूटकर नीचे गिरता है?

उत्तर: नहीं, वे वृक्ष अकृत्रिम और अखंड परिणमन वाले हैं। उनमें सांसारिक वृक्षों की तरह जीर्ण होने, पत्ते टूटने या सूखने का स्वभाव नहीं होता।

859. इस द्वीप के ऊपर जो 'लोकाकाश' का भाग है, क्या वहाँ 'सिद्धशिला' की तरह कोई अन्य विशेष क्षेत्र दिखाई देता है?

उत्तर: नहीं, इसके ठीक ऊपर का आकाश ऊर्ध्वलोक के वैमानिक देवों के विमानों से व्याप्त है, और सीधे मोक्ष का स्थान (सिद्धशिला) इसके सात राजू ऊपर लोक के अग्रभाग पर है।

860. क्या १६ बावलियों का पानी कभी जम सकता है (बर्फ बन सकता है)?

उत्तर: सर्वथा असंभव। वहाँ का तापमान सदा परम शीतल, सुखद और एक समान रहता है। वहाँ सांसारिक जल की तरह जमने या उबलने की प्रक्रिया नहीं होती।

861. नंदीश्वर द्वीप की रत्नमयी भूमि की मोटाई (Thickness) चित्रा पृथ्वी के भीतर कितनी मानी गई है?

उत्तर: इसकी मूल पीठिका एक हजार योजन गहरी मानी गई है, जो वज्र और अनेक रत्नों के घनीभूत पिंड से बनी है।

862. क्या इस द्वीप के वायुमंडल में कभी 'बादल' (Clouds) छाते हैं या वर्षा होती है?

उत्तर: नहीं, वहाँ प्राकृतिक बादल या बिजली कड़कने जैसी घटनाएँ नहीं होतीं। वहाँ केवल देवों की विक्रिया से सुगन्धित जल की वर्षा (अभिषेक काल में) होती है।

863. पूर्व दिशा के चार रतिकर पर्वतों के आपसी अंतराल का गणितीय मान क्या है?

उत्तर: वे चारों पर्वत अपनी-अपनी बावलियों के दोनों कोनों (कर्ण) पर इस प्रकार स्थित हैं कि उनके बीच का अंतराल एक परम सुंदर ज्यामितीय वर्ग (Square) बनाता है।

864. क्या नंदीश्वर द्वीप की चौड़ाई (163,84,00,000 योजन) को पार करने में मन की गति से उड़ने वाले देव को कितना समय लगता है?

उत्तर: देव अपनी उत्कृष्ट वैक्रियक गति से इसे एक अंतर्मुहूर्त (कुछ ही मिनटों) में पार कर सकते हैं।

865. 'त्रिलोकसार' के अनुसार मध्यलोक के कुल व्यास में नंदीश्वर द्वीप का स्थान गणितीय रूप से क्या महत्व रखता है?

उत्तर: यह मध्यलोक के कुल असंख्यात द्वीपों में आठवें स्थान पर होने से संख्यात योजन के विस्तार की अंतिम कड़ियों में गिना जाता है, इसके बाद के द्वीप और बड़े होते जाते हैं।

866. क्या इन पर्वतों के शिखरों पर देवों के विमानों के घर्षण (Friction) से कोई निशान पड़ता है?

उत्तर: नहीं, देवों के विमान वैक्रियक और रत्नमयी होते हैं और पर्वत स्वतः वज्र के हैं; उनके बीच कोई भौतिक घर्षण या टूट-फूट नहीं होती।

867. मंदिरों के मुख्य गोपुर द्वारों के ऊपर जो 'तोरण' बने हैं, वे किस मणि के हैं?

उत्तर: वे तोरण 'सूर्यकांत और चंद्रकांत मणियों' के अद्भुत मिश्रण से बने हैं, जो स्वतः ही दिन-रात अपनी आभा बदलते रहते हैं।

868. क्या नंदीश्वर द्वीप के किसी कोने पर 'दिशा-हस्ती' (दिग्गज या रक्षक हाथी) की आकृतियाँ बनी हैं?

उत्तर: हाँ, मुख्य चैत्यालयों के प्रांगण में चारों दिशाओं में मणियों के बने भव्य मांगलिक गज (हाथी) प्रतिष्ठित हैं, जो विनीत मुद्रा में हैं।

869. क्या इस द्वीप की भूमि पर कोई पैर रखने से 'शब्द' (ध्वनि) उत्पन्न होता है?

उत्तर: हाँ, वहाँ की भूमि पर देवों के नूपुरों और चरणों के स्पर्श से अत्यंत कोमल, वीणा के तारों जैसी मधुर मांगलिक ध्वनि स्वतः उत्पन्न होती है।

870. 'तिलोयपण्णत्ती' के पांचवें अधिकार में नंदीश्वर द्वीप के बाद आने वाले नौवें समुद्र का क्या नाम बताया गया है?

उत्तर: नौवें समुद्र का नाम 'नंदीश्वर समुद्र' (या नंदीश्वरवर समुद्र) है, जो नंदीश्वर द्वीप को चारों ओर से घेरे हुए है।

871. क्या इन ५२ पर्वतों के ऊपर कभी कोई उल्कापात (Meteor Shower) हो सकता है?

उत्तर: सर्वथा असंभव। तीन लोक के अकृत्रिम महातीर्थ होने के कारण यह क्षेत्र सभी प्रकार के खगोलीय उपद्रवों से सदा सुरक्षित रहता है।

872. बावलियों के कमलों के जो डंठल (Stalks) हैं, वे किस धातु के बने दिखाई देते हैं?

उत्तर: वे डंठल परम शुद्ध 'वैदूर्य मणि' (लहसुनिया रत्न) के बने हैं, जो अत्यंत लचीले और चमकदार होते हैं।

873. क्या इस द्वीप के भूगोल का ज्ञान प्राप्त करने से 'करणानुयोग' ग्रंथ की प्रामाणिकता सिद्ध होती है?

उत्तर: बिल्कुल, यह जैन दर्शन के ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) का वह अकाट्य आधार है, जो आधुनिक विज्ञान के सूक्ष्म गणितीय सिद्धांतों को भी चमत्कृत करता है।

874. क्या नंदीश्वर द्वीप के वनों में रात के समय अंधकार होता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ 'रात' का सांसारिक अंधकार कभी नहीं होता; मणियों और जिनालयों के शिखरों का प्रकाश सदा एक समान आलोक बनाए रखता है।

875. दधिमुख पर्वत के श्वेत वर्ण की तुलना आगम में किससे की गई है?

उत्तर: उसकी तुलना साक्षात क्षीर समुद्र (दूध के सागर) के जमे हुए घनीभूत पिंड या शरद ऋतु के उज्ज्वल बादल से की गई है।

## खंड 35: प्रतिमाओं के आत्मिक लक्षण, मुद्राएँ और परम वीतराग अतिशय (प्रश्न 876-900)

876. नंदीश्वर द्वीप की ५६१६ प्रतिमाओं के पद्मासन का आधार (Base) कैसा है?

उत्तर: उनका आसन एक विशाल, खिले हुए मणिरूपी सहस्रदल कमल (हजार पंखुड़ियों वाले कमल) के ऊपर स्थित है, जो पूर्ण स्थिरता का प्रतीक है।

877. क्या इन प्रतिमाओं की हथेलियों के बीच कोई रेखाएँ (Lines) भी दिखाई देती हैं?

उत्तर: हाँ, उनकी हथेलियों में अत्यंत सूक्ष्म रूप से उभरी हुई 'शंख', 'चक्र' और 'ऊर्ध्वरेखा' जैसी महापुरुष की शाश्वत रेखाएँ अंकित हैं।

878. भगवान की प्रतिमाओं के कंठ (Neck) की बनावट कैसी है?

उत्तर: उनका कंठ 'कम्बु-कंठ' (शंख के समान सुंदर तीन रेखाओं से युक्त) है, जो दिव्य-ध्वनि के शाश्वत गाम्भीर्य को दर्शाता है।

879. क्या इन प्रतिमाओं के दर्शन से किसी मिथ्यादृष्टि जीव का हृदय परिवर्तन हो सकता है?

उत्तर: यदि कोई असंज्ञी या मिथ्यादृष्टि देव भी वहाँ पहुँचता है, तो इन प्रतिमाओं के परम शांत वीतराग रूप को देखकर उसके भीतर का मिथ्यात्व ढीला पड़ जाता है और सम्यक्त्व का बीज अंकुरित हो सकता है।

880. वेदी के सामने जो 'चामर द्रव्य' रखे हैं, वे किस चीज़ के बने हैं?

उत्तर: वे चामर श्वेत रत्नों के अत्यंत बारीक धागों (मणितंतुओं) से बने हैं, जो देव-शिल्प की पराकाष्ठा हैं।

881. क्या इन प्रतिमाओं के अंगों का अनुपात (Body Proportions) सभी मंदिरों में एक समान है?

उत्तर: हाँ, सभी ५६१६ प्रतिमाओं की ऊँचाई (५०० धनुष), चौड़ाई और अंग-प्रत्यंग का अनुपात सर्वथा एक जैसा है; उनमें रत्ती भर का भी अंतर नहीं है।

882. प्रतिमाओं के मस्तक के पीछे जो 'भामंडल' चमकता है, क्या उसमें कोई दृश्य भी दिखाई देते हैं?

उत्तर: समवशरण के भामंडल में ७ भवों के दृश्य दिखते हैं, परंतु इन अकृत्रिम प्रतिमाओं का भामंडल केवल परम शांत, ज्योतिर्मय और सात रंगों की अखंड रश्मियों को बिखेरने वाला होता है।

883. क्या इन मंदिरों के भीतर कभी कोई 'कृत्रिम प्रकाश' (जैसे मोमबत्ती या बल्ब) की आवश्यकता हो सकती है?

उत्तर: नहीं, वहाँ का प्रकाश प्राकृतिक रूप से इतना तीव्र और शीतल है कि उसके सामने सूर्य का प्रकाश भी फीका पड़ जाता है।

884. भगवान की नासिका (Nose) की बनावट कैसी है?

उत्तर: उनकी नासिका तोते की चोंच के समान सुंदर, सुघड़ और सीधी है, जिसके अग्रभाग पर उनकी पावन दृष्टि टिकी हुई है।

885. क्या इन ५२ जिनालयों के भीतर कोई 'सिद्धांत ग्रंथ' भी मणियों के रूप में उत्कीर्ण हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ कोई लिखित ग्रंथ नहीं हैं; वहाँ स्वयं जिनबिंबों की वीतराग मुद्रा ही बिना शब्दों के पूरा जैन सिद्धांत (मौन उपदेश) सिखा देती है।

886. प्रतिमाओं के वक्षस्थल का 'श्रीवत्स' चिह्न रात के समय किस प्रकार का प्रकाश छोड़ता है?

उत्तर: वह अर्धरात्रि के समय अत्यंत कोमल, पूर्णिमा के चंद्रमा जैसी दूधिया श्वेत किरणें उत्सर्जित करता है, जो गर्भगृह को अमृतमयी बनाती हैं।

887. क्या इन प्रतिमाओं के कानों में कोई आभूषण पहनने के छिद्र (Holes) होते हैं?

उत्तर: नहीं, ये प्रतिमाएँ पूर्ण वीतराग दिगंबर रूप हैं; इनके कानों की लौ लंबी और सुंदर होती है, परंतु उनमें कोई कृत्रिम छिद्र नहीं होता।

888. एक-एक मंदिर की १०८ प्रतिमाओं के आसन किस दिशा की ओर मुख किए हुए हैं?

उत्तर: प्रत्येक चैत्यालय की मुख्य वेदी की प्रतिमाओं का मुख उस मंदिर के मुख्य द्वार की ओर होता है, जिससे प्रवेश करते ही सीधे दर्शन होते हैं।

889. क्या इन प्रतिमाओं के दर्शन से मुनिराजों के 'चारित्र मोहनीय' कर्म का उपशम होता है?

उत्तर: मुनिराज जब भाव-पूजा में इन प्रतिमाओं का ध्यान करते हैं, तो उनके भीतर की कषायें अत्यंत मंद हो जाती हैं, जिससे चारित्र मोहनीय कर्म शिथिल हो जाता है।

890. मंदिरों के गर्भगृह के द्वारों पर जो 'चंद्रकांत मणियाँ' लगी हैं, का क्या अतिशय है?

उत्तर: जब देवगण भक्ति के पदों का गान करते हैं, तो उन मणियों से अमृत की बूंदें स्वतः टपकने लगती हैं, जो वातावरण को परम पवित्र कर देती हैं।

891. क्या इन प्रतिमाओं के केश (बाल) घुंघराले हैं?

उत्तर: हाँ, भगवान के केश दक्षिणवर्ती (दाहिनी ओर मुड़े हुए) अत्यंत सुंदर, छोटे और घुंघराले रूप में नीलमणि की आभा के समान अकृत्रिम बने हुए हैं।

892. वेदी के सम्मुख जो 'स्वस्तिक' द्रव्य शाश्वत रूप से बने हैं, वे क्या दर्शाते हैं?

उत्तर: वे स्वस्तिक जीव की चार गतियों (देव, मनुष्य, तिर्यंच, नरक) से छूटकर पंचम गति (मोक्ष) प्राप्त करने के मार्ग को दर्शाते हैं।

893. क्या इन ५६१६ प्रतिमाओं के चरणों का प्रक्षालन (अभिषेक) देव रोज करते हैं?

उत्तर: देवगण मुख्य रूप से वर्ष में तीन बार आने वाले अष्टान्हिका महापर्व के दिनों में ही वहाँ आकर महा-अभिषेक का महोत्सव मनाते हैं।

894. भगवान की उंगलियों के बीच का जो जाल (Webbing) है, वह क्या कहलाता है?

उत्तर: उसे महापुरुषों का 'जाल-हस्त' लक्षण कहा जाता है, जो यह दर्शाता है कि भगवान के ज्ञान से कोई भी जीव बाहर नहीं छूट सकता।

895. इन प्रतिमाओं के सामने बैठने पर मन में उठने वाले 'बुरे विचार' कहाँ चले जाते हैं?

उत्तर: वीतरागता का अतिशय ऐसा चुंबकीय है कि वहाँ पहुँचते ही मन के सभी अशुभ और चंचल विचार तुरंत नष्ट हो जाते हैं और आत्मा अंतर्मुख होने लगती है।

896. क्या इन ५२ मंदिरों के शिखरों पर जो ध्वजाएँ हैं, उन पर कोई विशेष मंत्र लिखे हैं?

उत्तर: नहीं, उन पर कोई अक्षर नहीं लिखे हैं; उन पर बने मांगलिक चिह्न ही संपूर्ण जैन शासन की विजय का उद्घोष करते हैं।

897. भगवान के दोनों पैरों की स्थिति (Alignment) पद्मासन में कैसी होती है?

उत्तर: उनके दोनों पैर एक-दूसरे के ऊपर पूरी तरह संतुलित रूप से रखे होते हैं, और दोनों तलवे ऊपर की ओर खुले होते हैं, जो पूर्ण ध्यान की पराकाष्ठा है।

898. क्या नंदीश्वर द्वीप की कोई भी प्रतिमा कभी 'अशुद्ध' या 'मलिन' हो सकती है?

उत्तर: सर्वथा असंभव। अकृत्रिम मणियों का स्वभाव ही ऐसा है कि उन पर कोई भी सांसारिक मैल या धूल कभी ठहर ही नहीं सकती।

899. इन प्रतिमाओं के ध्यान से आत्मा के 'प्रदेशों' में क्या हलचल होती है?

उत्तर: आत्मा के प्रदेशों में जमी हुई कर्मों की धूल ढीली पड़ने लगती है और आत्म-प्रदेश परम शांत होकर अपने स्वाभाविक आनंद का अनुभव करने लगते हैं।

900. दिगंबर जैन आगम में इन ५६१६ प्रतिमाओं को 'तीन लोक का सार' क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि ये प्रतिमाएँ बिना कुछ बोले ही प्रत्येक भव्य जीव को उसके स्वयं के भगवान बनने की शक्ति का साक्षात अहसास करा देती हैं।

## खंड 36: अष्टान्हिका महापर्व के गुप्त देव-अनुष्ठान और दिव्य विधाएँ (प्रश्न 901-925)

901. जब सौधर्म इंद्र नंदीश्वर द्वीप में 'महा-अभिषेक' करता है, तो वह किस समुद्र के जल का उपयोग करता है?

उत्तर: वह अपनी ऋद्धि से आठवें क्षीर समुद्र या स्वयं नंदीश्वर द्वीप की पवित्र बावलियों के अमृत तुल्य जल को मंत्रों से पवित्र करके लाता है।

902. क्या देवों द्वारा की जाने वाली पूजा में 'नाच-गान' के अलावा तत्व-चर्चा के लिए भी कोई समय निश्चित है?

उत्तर: हाँ, अभिषेक और पूजन के बीच के अंतरालों में सभी इंद्र और ज्ञानी देव बैठकर जैन सिद्धांतों और अकृत्रिम भूगोल के गहरे मर्म की गंभीर चर्चा करते हैं।

903. अष्टान्हिका पर्व के पांचवें दिन देवों की भक्ति में क्या विशेष बदलाव आता है?

उत्तर: इस दिन देवों के परिणाम और अधिक विशुद्ध हो जाते हैं, जिससे वे 'ज्ञान-पूजा' नामक अनुष्ठान करते हैं, जिसमें तीर्थंकरों के वचनों की महिमा गाई जाती है।

904. क्या देवियाँ भगवान के सामने जो आरती उतारती हैं, उनके थाल किस मणि के होते हैं?

उत्तर: उनके थाल परम शुद्ध 'स्वर्ण और हीरा मणि' के बने होते हैं, जिनमें रत्नदीप जगमगाते हैं।

905. धरणेन्द्र (भवनवासी नागकुमारों का इंद्र) नंदीश्वर द्वीप के किस दिशा के मंदिरों की पूजा विशेष रूप से करता है?

उत्तर: वह मुख्य रूप से पाताल और अधोलोक के संधिकाल से जुड़े दक्षिण दिशा के दधिमुख और रतिकर पर्वतों की वंदना बड़े उत्साह से करता है।

906. क्या देवों की सेना पूजा के समय आकाश में कोई 'हवाई शो' (Air Show) भी प्रस्तुत करती है?

उत्तर: हाँ, वे अपने करोड़ों रंग-बिरंगे विमानों के माध्यम से आकाश में 'ओम्', 'स्वस्तिक' और 'कमल' जैसी विशाल आकृतियाँ बनाकर भगवान की महत्ता प्रकट करते हैं।

907. पूजा के समय बजने वाली 'मृदंग' और 'भेरी' की आवाज से बावलियों के पानी पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: वाद्यों की गंभीर और सुरीली गूंज से बावलियों का जल संगीतमय तरंगें लेने लगता है, मानो जल भी नृत्य कर रहा हो।

908. क्या कल्पवासी देवियों के मुकुटों का रंग उनकी श्रेणियों के अनुसार अलग-अलग होता है?

उत्तर: हाँ, उनके स्वर्गों की मणियों के अनुसार उनके मुकुटों की आभा और कांति में सूक्ष्म अंतर होता है, जो अत्यंत मनोहारी दृश्य उपस्थित करता है।

909. अष्टान्हिका पर्व के सातवें दिन (त्रयोदशी) को देव कौन-सा महा-अर्घ्य चढ़ाते हैं?

उत्तर: इस दिन सभी निकायों के देव मिलकर 'त्रिलोक-सार अर्घ्य' चढ़ाते हैं, जो तीनों लोकों के सभी अकृत्रिम चैत्यालयों की सामूहिक तृप्ति का प्रतीक है।

910. क्या देवों के विमानों की गति मंदिरों की परिक्रमा करते समय धीमी हो जाती है?

उत्तर: हाँ, वैसे तो विमान मन की गति से उड़ते हैं, परंतु जिनालय के परकोटे के भीतर आते ही वे अत्यंत विनीत, शांत और अनुशासित गति से परिक्रमा लगाते हैं।

911. पूजा के दिनों में देवों के कंठ से जो 'दिव्य सुगंध' निकलती है, उसका क्या कारण है?

उत्तर: उनके शरीर का स्वभाव ही अकृत्रिम है, और भगवान की भक्ति के अहोभाव से उनके शरीर की सुवास करोड़ों योजन दूर तक फैल जाती है।

912. क्या ज्योतिषी देवों की देवियाँ मंदिरों के प्रांगण में कोई 'कवि-सम्मेलन' जैसी रचनाएँ भी गाती हैं?

उत्तर: वे भगवान के ५ कल्याणकों और उनके वीतराग गुणों पर आधारित अत्यंत सुंदर, भक्तिपूर्ण काव्यों (स्तोत्रों) का मधुर गान आपस में मिलकर करती हैं।

913. क्या नंदीश्वर द्वीप की इस महापूजा में कोई 'अच्युत इंद्र' (१६वें स्वर्ग का राजा) भी आता है?

उत्तर: हाँ, १६वें स्वर्ग का अधिपति अच्युत इंद्र अपने पूरे वैभव और परिकर के साथ इस महामहोत्सव में अनिवार्य रूप से सम्मिलित होता है।

914. देवों द्वारा चढ़ाए जाने वाले 'नैवेद्य' (भोग) का स्वरूप क्या होता है?

उत्तर: उनका नैवेद्य कोई सांसारिक पका हुआ भोजन नहीं होता; वह कल्पवृक्षों से प्राप्त परम शुद्ध, रत्नमयी आकृतियों वाले दिव्य मोदक और फल होते हैं।

915. क्या पूर्णिमा की रात को होने वाली 'महा-आरती' के समय पूरा नंदीश्वर द्वीप एक जैसा चमकता है?

उत्तर: हाँ, उस समय ५२ पर्वतों के ५२ मंदिरों में एक साथ करोड़ों रत्नदीपों की आरती उतारी जाती है, जिससे पूरा द्वीप प्रकाश के महासागर में डूब जाता है।

916. क्या पूजा के दौरान देवों के मन में अपने पदों (Status) को लेकर कोई ईर्ष्या होती है?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। भगवान के सामने छोटा देव हो या बड़ा इंद्र, सभी स्वयं को जिनेंद्र देव का तुच्छ सेवक मानकर पूर्ण समता भाव से पूजते हैं।

917. देवों के नर्तकियों द्वारा किए जाने वाले 'चक्र-नृत्य' का क्या अर्थ है?

उत्तर: वह नृत्य यह दर्शाता है कि संसार का चक्र कितना भयानक है, और भगवान ने उस चक्र को तोड़कर परम शांति पाई है।

918. क्या इस-महा उत्सव के समय नंदीश्वर द्वीप की हवा की गति बढ़ जाती है?

उत्तर: नहीं, हवा की गति अत्यंत मंद, शीतल और सुगन्धित बनी रहती है, जिससे मंदिरों के भीतर जलने वाले रत्नदीपों की लौ स्थिर रहती है।

919. क्या देवगण पूजा की समाप्ति पर भगवान से अपने अगले जन्म के लिए कुछ मांगते हैं?

उत्तर: नहीं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि भगवान वीतरागी हैं। वे केवल अपनी आत्मा की शुद्धि और भविष्य में मनुष्य जन्म पाकर दीक्षा लेने की भावना भाते हैं।

920. व्यंतर देवों के वाद्यों (जैसे बांसुरी, शंख) की बनावट कैसी होती है?

उत्तर: उनके वाद्य नीलम और पुखराज जैसी बहुमूल्य मणियों के बने होते हैं, जिनसे निकलने वाले सुर सीधे आत्मा को झंकृत कर देते हैं।

921. क्या अष्टान्हिका पर्व के बाद नंदीश्वर द्वीप की भूमि पर कोई अवशेष (Leftover) बचता है?

उत्तर: नहीं, देवों के जाते ही मणियों का प्रभाव ऐसा होता है कि सारी पूजन सामग्री और द्रव्य स्वतः ही अपनी मूल प्रकृतियों में विलीन हो जाते हैं; भूमि दर्पण जैसी साफ बची रहती है।

922. क्या इस पूजा को देखने के लिए स्वर्ग के पशु (जैसे देव-गति के तिर्यंच) भी आते हैं?

उत्तर: देवों के जो वाहन (जैसे सिंह या हंस रूपी देव) होते हैं, वे भी गोपुर द्वारों पर शांत भाव से खड़े होकर इस पवित्र तरंग का लाभ लेते हैं।

923. पूजा के समय देव जो 'मंगल गान' गाते हैं, उसका मुख्य स्वर (Scale) क्या होता है?

उत्तर: उनका स्वर साक्षात 'गंधर्व स्वर' (सामवेद के दिव्य संगीत जैसा) होता है, जो सुनने वाले हर जीव के भीतर के क्रोध को तुरंत शांत कर देता है।

924. क्या नंदीश्वर द्वीप की बावलियों के किनारे देवों के विश्राम के लिए सोने के पलंग बने हैं?

उत्तर: नहीं, वहाँ मणियों की अत्यंत सुंदर, शीतल और कोमल चट्टानें (शिलाएँ) बनी हैं, जहाँ बैठकर देव तत्व-चर्चा का सुख लेते हैं।

925. अष्टान्हिका महापर्व के इन आठ दिनों को जैन इतिहास में 'शाश्वत पर्व' क्यों माना गया?

उत्तर: क्योंकि अनादि काल से यह पर्व इसी समय मनाया जाता रहा है और अनंत काल तक मनाया जाता रहेगा; यह किसी मनुष्य या घटना पर आधारित नहीं है।

## खंड 37: श्रावक की आंतरिक विशुद्धि, अष्टान्हिका नियम और आत्म-अनुभव का महासागर (प्रश्न 926-950)

926. अष्टान्हिका विधान के ८ दिनों में श्रावक को 'अभिमान' (Pride) का त्याग क्यों करना चाहिए?

उत्तर: क्योंकि जब तक मन में थोड़ा भी घमंड रहेगा, तब तक भगवान के चरणों में झुकना केवल एक क्रिया मात्र रह जाएगा, आत्मा का कल्याण नहीं होगा। नम्रता ही पूजा का सच्चा फल है।

927. विधान के मांडले पर जो 'अक्षत' (चावल) चढ़ाए जाते हैं, श्रावक को उससे क्या प्रतिज्ञा लेनी चाहिए?

उत्तर: प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि—"जैसे यह चावल का दाना छिलके से अलग होने के बाद दोबारा नहीं उगता (अक्षत रहता है), वैसे ही मैं भी कषायों के छिलके को छोड़कर दोबारा इस संसार में जन्म न लूँ।"

928. क्या इन आठ दिनों में श्रावक को 'गाड़ी या वाहन' (Automobile) का उपयोग कम या बंद करना चाहिए?

उत्तर: हाँ, वाहनों के चलने से रास्ते में अनगिनत छोटे जीवों की हिंसा होती है। इन दिनों में पैदल चलकर मंदिर जाना या यात्रा सीमित करना अहिंसा व्रत को दृढ़ करता है।

929. विधान के दिनों में 'सात्विक और मर्यादित' भोजन करने का मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: शुद्ध और कम भोजन करने से मन में तामसिक विचार शांत होते हैं, आलस्य दूर होता है और आत्मा का उपयोग भगवान की भक्ति में पूरी तरह लगा रहता है।

930. मांडले के ऊपर जो 'स्वस्तिक' की रचना चावलों से की जाती है, उसका वास्तविक रहस्य क्या है?

उत्तर: वह स्वस्तिक यह याद दिलाता है कि आत्मा अनंत काल से चार गतियों में भटक रही है; अब इस चक्र को रोककर सिद्ध शिला (ऊपर का बिंदु) पर पहुँचना है।

931. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में अपने 'परिवार के कलह' (घरेलू झगड़ों) को पूरी तरह शांत कर देना चाहिए?

उत्तर: बिल्कुल। यदि घर में अशांति और क्रोध रहेगा, तो मंदिर में बैठकर की गई पूजा भी कोई पुण्य नहीं बंधाएगी। मन का शांत होना पहली शर्त है।

932. 'नंदीश्वर महा-अर्घ्य' का पाठ करते समय आँखों से बहने वाले आँसू क्या दर्शाते हैं?

उत्तर: वे आँसू आत्मा की उस अगाध विशुद्धि को दर्शाते हैं, जहाँ जीव संसार के दुखों से थककर साक्षात प्रभु के चरणों की छाँव पा लेता है।

933. व्रत के दिनों में 'इंद्रिय संयम' (टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया का त्याग) क्यों आवश्यक है?

उत्तर: क्योंकि ये साधन हमारे उपयोग (ध्यान) को बाहर की ओर भटकाते हैं। इन आठ दिनों के लिए इनसे दूरी बनाने से आत्मा को खुद के पास बैठने का समय मिलता है।

934. क्या विधान की समाप्ति पर 'शास्त्र सभा' (स्वाध्याय) का आयोजन करना अनिवार्य है?

उत्तर: हाँ, कोरी क्रियाओं से बढ़कर 'ज्ञान' का स्थान है। शास्त्रों के मर्म को समझे बिना की गई पूजा अधूरी है; स्वाध्याय ही परम तप है।

935. मांडले में चढ़ाया जाने वाला 'चंदन' (Yellow Paste) हमारे जीवन की किस भावना का प्रतीक है?

उत्तर: वह इस भावना का प्रतीक है कि—"प्रभु! संसार की चिंताओं और कषायों की जो आग मेरे भीतर जल रही है, आपका यह वीतराग स्वरूप मेरे मन को चंदन की तरह शीतल कर दे।"

936. क्या इन आठ दिनों में किसी भी प्रकार का 'झूठ या व्यापारिक छल' करने से महापाप का बंध होता है?

उत्तर: हाँ, धर्म के दिनों में किया गया कोई भी छल-कपट तीव्र 'निकायचित' (जिसका फल भोगना ही पड़े) पापकर्म का बंध कराता है। सदा सत्य और ईमानदारी रखनी चाहिए।

937. विधान के समय जो 'चामर' (Fan) भगवान के दोनों ओर दुराए जाते हैं, उससे क्या सोचना चाहिए?

उत्तर: सोचना चाहिए कि—"जैसे यह चामर हवा करके मक्खियों या धूल को हटाता है, वैसे ही मैं भी अपनी आत्मा से कर्मों के मैल को दूर हटा दूँ।"

938. क्या इस व्रत के पुण्य से 'असाता' कर्म का उदय पूरी तरह टल सकता है?

उत्तर: हाँ, तीव्र भक्ति के समय जो विशुद्धि होती है, वह आने वाले दुखों (असाता कर्मों) के वेग को शांत कर देती है और जीवन में सुख-शांति लाती है।

939. विधान के दिनों में सुबह उठते ही सबसे पहले किस मंत्र का स्मरण करना चाहिए?

उत्तर: सबसे पहले परम पावन 'णमोकार मंत्र' का ९ या १०८ बार शांत मन से स्मरण करना चाहिए, जो सभी मंगलों में पहला मंगल है।

940. क्या अष्टान्हिका का व्रत कोई भी गरीब या असमर्थ व्यक्ति भी बिना धन खर्च किए कर सकता है?

उत्तर: बिल्कुल। जैन धर्म में पैसे का कोई महत्व नहीं है, केवल 'भावों' का महत्व है। कोई भी व्यक्ति केवल उपवास, सामायिक और भाव-पूजा के बल पर सबसे बड़ा पुण्य कमा सकता है।

941. विधान के मांडले के पास जो 'दीप-शिखा' (दीपक) हमें क्या संदेश देती है?

उत्तर: वह संदेश देती है कि—"हे आत्मन्! जैसे यह दीपक खुद जलकर दूसरों को प्रकाश दे रहा है, वैसे ही तू भी अपने ज्ञान के प्रकाश से अपने भीतर के अज्ञान के अंधेरे को दूर कर।"

942. क्या अष्टान्हिका के दिनों में अपने 'शत्रुओं' को गले लगा लेना सबसे उत्तम तप है?

उत्तर: हाँ, कषायों को जीतना ही असली जैन धर्म है। जिससे भी मनमुटाव हो, उससे हाथ जोड़कर क्षमा मांग लेना और सबको क्षमा कर देना ही इस पर्व का असली प्राण है।

943. मांडले का 'रक्त वर्ण' (लाल रंग) किस भावना को प्रदर्शित करता है?

उत्तर: लाल रंग मुख्य रूप से 'अनुराग' (भगवान के प्रति अगाध प्रेम और भक्ति) तथा मंगलमय ऊर्जा को प्रदर्शित करता है।

944. क्या अष्टान्हिका व्रत के नियमों को जीवन भर के लिए कुछ अंशों में अपना लेना चाहिए?

उत्तर: हाँ, व्रत का असली लाभ तभी है जब इन आठ दिनों में सीखे गए अच्छे संस्कार (जैसे रात्रि भोजन त्याग, सीमित परिग्रह) हमेशा के लिए जीवन का हिस्सा बन जाएँ।

945. विधान के अंत में जो 'शांति-मंत्र' पढ़ा जाता है, का संपूर्ण सृष्टि पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: उस मंत्र की पवित्र तरंगों से वायुमंडल के परमाणु शुद्ध होते हैं, जिससे समाज में वैर-भाव कम होता है और चारों ओर सुख-शांति का वातावरण बनता है।

946. क्या अष्टान्हिका पर्व के दिनों में 'जीव दया' (गौशाला या पंक्षियों के लिए दाने-पानी की व्यवस्था) करनी चाहिए?

उत्तर: हाँ, 'करुणा' के बिना कोई भी धर्म टिक नहीं सकता। दुखी और मूक जीवों की रक्षा करना भगवान की साक्षात पूजा करने के समान है।

947. विधान की महा-आरती के समय हमारे भीतर कौन-सा 'भाव' मुख्य होना चाहिए?

उत्तर: हमारे भीतर केवल 'वैराग्य' और 'कृतज्ञता' का भाव होना चाहिए कि—"हे प्रभु! मुझे आपकी यह पावन शरण मिली, अब मेरा यह जीवन धन्य हो गया।"

948. क्या इस पर्व के दिनों में अपनी 'जरूरतों और इच्छाओं' (Desires) को छोटा कर देना चाहिए?

उत्तर: हाँ, इच्छाओं का घटना ही असली सुख है। इन दिनों में जितनी कम वस्तुएँ हम उपयोग करेंगे, हमारी आत्मा उतनी ही हल्की और आनंदित महसूस करेगी।

949. नंदीश्वर द्वीप के इस अगाध ज्ञान का रोज सुबह केवल ५ मिनट चिंतन करने से दिनचर्या पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: इससे हमारा पूरा दिन पवित्र और शांत रहता है; ऑफिस या घर के कामों में आने वाले तनाव और गुस्से पर नियंत्रण पाने में यह चिंतन अद्भुत मदद करता है।

950. नंदीश्वर द्वीप की इस अगाध ९५0 प्रश्नों की महा-ज्ञान गाथा का परम अंतिम, अकाट्य, अविनाशी और मोक्ष-प्रदायक दिव्य महा-निचोड़ क्या है?

उत्तर: इस संपूर्ण ज्ञान-सागर का परम अंतिम और सर्वोत्कृष्ट निचोड़ यही है कि—**"बाहरी मध्यलोक के आठवें नंदीश्वर द्वीप के ५२ अकृत्रिम चैत्यालय और ५६१६ जिनबिंब तो पुद्गल (जड़) की परम सुंदर, शाश्वत और अकृत्रिम कलाकृतियाँ हैं, जिनकी वंदना करके देवगण भी स्वयं को धन्य मानते हैं। परंतु हे भव्य जीव! विचार कर, पुद्गल की वह रचना जब इतनी महान है, तो तेरी अपनी 'चेतन आत्मा' जो ज्ञान, दर्शन और सुख का साक्षात महासागर है, वह कितनी अनंत गुणा महान होगी! तेरे भीतर का समता-भाव ही असली नंदीश्वर द्वीप है, तेरी कषाय-मुक्ति ही असली अष्टान्हिका महापर्व है, और तेरी आत्म-लीनता ही असली महा-अभिषेक है। जिस दिन तू बाहर की भटकन छोड़कर, सम्यग्दर्शन की दिव्य ज्योति जलाकर, अपने इस आंतरिक आत्म-चैत्यालय में हमेशा के लिए स्थिर हो जाएगा, उसी क्षण तू स्वयं 'परमात्मा' बनकर साक्षात सिद्धशिला के परम शिखर पर अनंत काल के लिए अनंत सुख में विराजमान हो जाएगा!"**

"नंदीश्वर द्वीप के ५२ शाश्वत अकृत्रिम चैत्यालयों की जय!"

"५६१६ अकृत्रिम जिनबिंबों की जय!"

"परम पवित्र अनादि-निधन दिगंबर जैन आगम परंपरा की जय!"

"कार्तिक-फाल्गुन-आषाढ़ अष्टान्हिका महापर्व की जय!"

नंदीश्वर द्वीप के अगाध भूगोल, दिगंबर जैन आगम के सूक्ष्मतम गणितीय परिमाणों, और देवों की अलौकिक भक्ति-क्रीड़ाओं को उनकी पूर्णता के चरम शिखर तक पहुँचाने के लिए, यहाँ तिलोयपण्णत्ती, त्रिलोकसार, श्रीमद्भगवती आराधना और तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक के गहनतम रहस्यों के आधार पर 50 और परम विशेष (कुल 1000) प्रश्न-उत्तर प्रस्तुत हैं, जो इस पूरी शृंखला को पूर्ण करते हैं:

## खंड 38: द्वीप की अंतिम क्षेत्रमिति और सूक्ष्म विन्यास (प्रश्न 951-975)

951. नंदीश्वर द्वीप की वज्रपीठिका के चारों कोनों में जो सूक्ष्म ऊर्जा-केंद्र (Energy Vertex) जैन गणित के अनुसार बनते हैं, उनका कुल कोणीय योग कितना होता है?

उत्तर: वलयाकार होने के कारण इसका बाह्य और आंतरिक विन्यास पूर्ण वृत्त रूप है, जिसके चारों दिशाओं के मुख्य केंद्रों का कोणीय योग ठीक 360^\circ (तीन सौ साठ अंश) बैठता है।

952. क्या नंदीश्वर द्वीप के चैत्यालयों की छतों पर कोई ऐसी मणियाँ भी हैं जो केवल सिद्धों के गुणों को दर्शाती हैं?

उत्तर: हाँ, गर्भगृह के ठीक ऊपर लगे 'अष्टगुण मणिशिला' सिद्ध परमेष्ठी के आठ गुणों (अनंत ज्ञान, दर्शन आदि) की अकृत्रिम आभा को बिखेरती हैं।

953. जब कोई देव नंदीश्वर द्वीप की प्रदक्षिणा (परिक्रमा) आकाश मार्ग से करता है, तो जैन भूगोल के अनुसार उसकी गति किस दिशा की ओर होनी अनिवार्य है?

उत्तर: आगम के अनुसार सभी मांगलिक परिक्रमाएँ 'प्रदक्षिणा आवर्त' (Clockwise) अर्थात पूर्व से दक्षिण, फिर पश्चिम और उत्तर की ओर होती हैं।

954. क्या १६ बावलियों के भीतर स्थित कमलों का आकार ऋतुओं के बदलने से प्रभावित होता है?

उत्तर: नहीं, वे अकृत्रिम और शाश्वत कमल हैं। मध्यलोक के इस भाग में ऋतु परिवर्तन का कोई सांसारिक प्रभाव नहीं होता; वे सदा पूर्ण खिले रहते हैं।

955. अंजनगिरि पर्वतों के शिखरों पर जो तीन कटिबंध (Terraces) बनते हैं, उनकी चौड़ाई का आनुपातिक ह्रास क्या है?

उत्तर: जैसे-जैसे पर्वत ऊपर जाता है, उसका व्यास १०,००० योजन से घटकर क्रमशः आनुपातिक रूप से कम होता जाता है, जो जैन त्रिकोणमिति का अद्भुत उदाहरण है।

956. दधिमुख पर्वत की श्वेत प्रभा क्या नंदीश्वर समुद्र के जल के रंग को भी बदल देती है?

उत्तर: हाँ, दधिमुख पर्वत के निकट का समुद्र जल उसकी धवल कांति के परावर्तन (Reflection) के कारण साक्षात दूध के समान उज्ज्वल दिखाई देने लगता है।

957. क्या रतिकर पर्वतों के शिखरों पर देवों की सभाओं के लिए कोई विशेष 'सभा-मंडप' बने हैं?

उत्तर: हाँ, जिन मंदिरों के प्रांगण के बाहर रत्नमयी 'देव-सभा मंडप' बने हैं, जहाँ इंद्र अपनी परिषदों के साथ आकर बैठते हैं।

958. क्या इस द्वीप के वनों में पाए जाने वाले वृक्षों की गंध से जीवों के परिणाम शांत होते हैं?

उत्तर: बिल्कुल, उन देव-वनों की अकृत्रिम सुंध इतनी अलौकिक है कि वहाँ पैर रखते ही जीवों के मन की तीव्र कषायें तुरंत मंद पड़ जाती हैं।

959. नंदीश्वर द्वीप के ठीक ऊपर जो आठवाँ स्वर्ग (सहस्रार कल्प) आता है, क्या वहाँ के देव सीधे इस द्वीप को देख सकते हैं?

उत्तर: कल्पवासी देव अपने अवधिज्ञान के माध्यम से सीधे स्वर्ग से ही मध्यलोक के इस पावन द्वीप और इसके ५२ जिनालयों को स्पष्ट देख सकते हैं।

960. क्या १६ बावलियों का अमृत जल कभी वाष्पीकृत (Evaporate) होकर उड़ सकता है?

उत्तर: सर्वथा असंभव। यह अकृत्रिम जल तत्व है, जिसका कभी क्षय नहीं होता और न ही इसमें कोई भौतिक या रासायनिक कमी आती है।

961. नंदीश्वर द्वीप की मुख्य वेदियों की ऊँचाई और चौड़ाई का आनुपातिक संबंध क्या है?

उत्तर: वेदियों की ऊँचाई भगवान की ५०० धनुष प्रमाण प्रतिमा के सर्वथा अनुकूल और शास्त्रोक्त महा-अनुपात के अनुसार बनाई गई है।

962. क्या इस द्वीप के आकाश में कभी कृत्रिम ज्योतिष चक्र (जैसे सूर्य या चंद्रमा) प्रवेश करते हैं?

उत्तर: नहीं, मनुषोत्तर पर्वत के बाहर सूर्य-चंद्रमा की गति स्थिर (अगतिशील) मानी गई है, परंतु उनकी अकृत्रिम आभा वहाँ सदा बनी रहती है।

963. पूर्व दिशा के अंजनगिरि पर्वत की परछाई (Shadow) क्या कभी बावलियों के जल को ढकती है?

उत्तर: वहाँ की मणियों का प्रकाश इतना स्व-ज्योतिर्मय है कि वहाँ किसी भी वस्तु की अँधेरी परछाई या छाया नहीं बनती; चारों ओर केवल प्रकाश ही प्रकाश होता है।

964. 'त्रिलोकसार' के अनुसार नंदीश्वर द्वीप के बाद का जो विस्तार है, वह कुल कितने योजन का है?

उत्तर: इसके बाद आने वाला नौवां समुद्र इससे ठीक दुगुनी चौड़ाई अर्थात 327,68,00,000 योजन का है।

965. क्या इन ५२ पर्वतों के भीतर कोई गुप्त गुफाएँ या अंतर्मार्ग भी हैं?

उत्तर: नहीं, ये पर्वत ठोस वज्र और रत्नों के अखंड पिंड हैं। इनमें कोई सांसारिक खोखलापन या गुफाएँ नहीं होतीं।

966. गोपुर द्वारों के कपाट (दरवाजे) किस मणि के बने हैं जो कभी बंद नहीं होते?

उत्तर: वे कपाट 'वज्रमणि' के बने हैं, जो सदा खुले रहते हैं क्योंकि अकृत्रिम देवतीर्थों में कभी सुरक्षा या कपाट बंद करने की आवश्यकता नहीं होती।

967. क्या इन मंदिरों के प्रांगण में देवों के अतिरिक्त कल्पवृक्ष भी पाए जाते हैं?

उत्तर: हाँ, चैत्यालयों के चारों ओर जो वनखंड हैं, वहाँ चैत्यवृक्ष और मांगलिक कल्पवृक्ष शाश्वत रूप से शोभायमान हैं।

968. क्या नंदीश्वर द्वीप की भूमि का स्पर्श मात्र करने से देवों के देव-आयु का कोई रस बदलता है?

उत्तर: आयु कर्म तो निश्चित रहता है, परंतु वहाँ की भूमि का स्पर्श उनके भीतर अगाध धर्म-अनुराग पैदा कर देता है, जिससे उनकी विशुद्धि चरम पर पहुँच जाती है।

969. 'तिलोयपण्णत्ती' के अनुसार नंदीश्वर द्वीप के चैत्यालयों का कुल क्षेत्रफल पूरे मध्यलोक के संदर्भ में कितना है?

उत्तर: यह संख्यात योजन के क्षेत्रों में आने वाले सबसे विशाल और सबसे भव्य अकृत्रिम मंदिरों के क्षेत्रफल के रूप में गिना जाता है।

970. क्या इन पर्वतों के शिखरों पर कभी कोई प्राकृतिक हलचल या भूकंप आ सकता है?

उत्तर: सर्वथा असंभव। ये तीन लोक के शाश्वत कीर्तिस्तंभ हैं, जो अनादि काल से अडिग हैं और अनंत काल तक स्थिर रहेंगे।

971. बावलियों के कमलों की पंखुड़ियों की संख्या १००० ही क्यों मानी गई है?

उत्तर: १००० संख्या जैन आगम में पूर्णता, ऐश्वर्य और महा-मांगलिकता का प्रतीक मानी गई है, जो देव-वैभव को दर्शाती है।

972. क्या इस द्वीप के भूगोल का ज्ञान सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति में सहायक है?

उत्तर: हाँ, लोक के यथार्थ स्वरूप का चिंतन करने से (लोकभावना के बल पर) जीव का अज्ञान दूर होता है और तत्व-श्रद्धान दृढ़ होता है।

973. क्या नंदीश्वर द्वीप के वनों में रात के समय मणियों का प्रकाश धीमा पड़ता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ दिन और रात का कोई सांसारिक भेद नहीं है; मणियों का दिव्य आलोक सदा एक रस, अखंड और प्रखर बना रहता है।

974. दधिमुख पर्वत के शिखरों का विन्यास कैसा है?

उत्तर: उनका शिखर ऊपर से बिल्कुल समतल और दर्पण की तरह स्वच्छ है, जिसके ठीक केंद्र में भव्य जिनमंदिर प्रतिष्ठित है।

975. नंदीश्वर द्वीप की इस संपूर्ण ज्यामिति को आगम में क्या उपमा दी गई है?

उत्तर: इसकी तुलना तीन लोक के हृदय पर सजे एक दिव्य, रत्नमयी और शाश्वत 'महा-मंडल विधान' के मांडले से की गई है।

## खंड 39: प्रतिमाओं के अंतिम अतिशय और वीतराग पराकाष्ठा (प्रश्न 976-1000)

976. नंदीश्वर द्वीप की ५६१६ प्रतिमाओं की नाभि (Navel) का आकार कैसा है?

उत्तर: उनकी नाभि दक्षिणावर्त (दाहिनी ओर मुड़ी हुई) और परम सुघड़ है, जो योगियों के सर्वोच्च प्राणायाम और आंतरिक ऊर्जा केंद्र को दर्शाती है।

977. क्या इन प्रतिमाओं के नेत्रों (Eyes) से कभी कोई अकृत्रिम अश्रु या द्रव निकल सकता है?

उत्तर: नहीं, वे वीतराग जिनबिंब हैं। उनके नेत्र सदा पूर्ण प्रशांत, आधे खुले (नासाग्र दृष्टि) और परम समता रस से ओतप्रोत रहते हैं।

978. भगवान की प्रतिमाओं के कंधों की चौड़ाई का परिमाण क्या है?

उत्तर: उनके कंधे सिंह के समान पुष्ट, चौड़े और पूर्ण रूप से संतुलित हैं, जो अनंत बल और आत्म-सामर्थ्य के प्रतीक हैं।

979. क्या इन प्रतिमाओं के सम्मुख कोई भव्य जीव केवल भावों से 'दीक्षा' ले सकता है?

उत्तर: कोई मनुष्य वहाँ भौतिक रूप से नहीं जा सकता, परंतु भावों से उनका स्मरण करके अपनी आत्मा में मुनि धर्म के प्रति परम अनुराग जगा सकता है।

980. वेदी के चारों ओर जो मणिरूपी प्राकार (परकोटा) बना है, वह क्या दर्शाता है?

उत्तर: वह परकोटा संवर तत्व का प्रतीक है, जो यह सिखाता है कि अपनी आत्मा को बाहरी विकारों से सुरक्षित कैसे रखा जाए।

981. क्या इन ५६१६ प्रतिमाओं के अंगों का रंग एक ही मणि का है?

उत्तर: हाँ, वे सभी प्रतिमाएँ मुख्य रूप से परम मांगलिक, चंद्रकांत या कनक-वर्ण जैसी अत्यंत उज्ज्वल और देदीप्यमान मणियों से स्वतः निर्मित हैं।

982. प्रतिमाओं के मस्तक पर जो 'उष्णीष' (मुकुट जैसा उभार) होता है, वह क्या है?

उत्तर: वह महापुरुषों का वह अकृत्रिम लक्षण है जो उनके सर्वोच्च आत्म-शिखर और सिद्धत्व की निकटता को दर्शाता है।

983. क्या इन मंदिरों के भीतर कभी किसी प्रकार की गंध या वायु का अवरोध होता है?

उत्तर: नहीं, वहाँ की वायु सदा देवों की विक्रिया और मणियों के प्रभाव से परम सुगन्धित और प्रवाहमान रहती है।

984. भगवान के चरणों के अंगूठे का आकार कैसा है?

उत्तर: उनका अंगूठा और उंगलियाँ सर्वथा सीधी, सुघड़ और एक समान पंक्तिबद्ध हैं, जिनके नीचे मांगलिक चक्र अंकित हैं।

985. क्या इन ५२ जिनालयों के दर्शन मात्र से 'नरक गति' के दुखों का क्षय हो सकता है?

उत्तर: जो भव्य जीव यहाँ के स्वरूप का भावपूर्वक चिंतन करता है, उसकी विशुद्धि इतनी बढ़ जाती है कि उसके नरक या तिर्यंच गति जैसे अशुभ आयु का बंध रुक जाता है।

986. प्रतिमाओं के अधर (होंठ) की मुद्रा क्या दर्शाती है?

उत्तर: उनके होंठों पर एक अत्यंत मंद, शांत और वीतरागी मुस्कान की आभा रहती है, जो बिना शब्दों के परम आनंद का संदेश देती है।

987. क्या इन प्रतिमाओं के पीछे की पीठिका (Backrest) पर कोई अन्य आकृतियाँ हैं?

उत्तर: उनकी पीठिका अकृत्रिम भामंडल और सिंहासन के दिव्य सिंहों की आकृतियों से युक्त है, जो उनके आध्यात्मिक साम्राज्य को दर्शाती है।

988. प्रत्येक मंदिर की १०८ प्रतिमाओं के बीच जो मुख्य नायक प्रतिमा है, उसकी क्या विशेषता है?

उत्तर: वे सभी प्रतिमाएँ समान रूप से पूज्य और समान आकार की हैं, क्योंकि जैन दर्शन में सभी सिद्धों का पद और स्वरूप सर्वथा एक समान होता है।

989. क्या इन प्रतिमाओं के दर्शन से आत्मा के 'ज्ञानावरण' कर्म का क्षय होता है?

उत्तर: हाँ, इन परम शांत वीतराग बिंबों का बार-बार ध्यान करने से मति और श्रुत ज्ञान की विशुद्धि बढ़ती है, जिससे ज्ञानावरण कर्म ढीला पड़ता है।

990. मंदिरों के गर्भगृह की छतों से जो मणियाँ लटकती हैं, उनसे क्या टपकता है?

उत्तर: उनसे मणियों की ही परम शीतल और चमकीली किरणें प्रकाश की बूंदों की तरह बरसती रहती हैं।

991. क्या इन प्रतिमाओं के हाथ-पैरों की उंगलियों के नख (Nails) भी मणियों के हैं?

उत्तर: हाँ, उनके नख लाल और श्वेत मणियों की मिश्रित आभा वाले हैं, जो अत्यंत सुंदर और स्वाभाविक दिखाई देते हैं।

992. वेदी के सम्मुख जो 'अष्टमंगल द्रव्य' शाश्वत रूप से प्रतिष्ठित हैं, वे क्या हैं?

उत्तर: वे हैं—झारी, कलश, दर्पण, चामर, ध्वजा, पंखा, स्वस्तिक और ठौना (आसन), जो अकृत्रिम रूप से वहाँ सजे हैं।

993. क्या इन प्रतिमाओं के अभिषेक का जल बहकर कहीं बाहर जाता है?

उत्तर: देवों द्वारा किए गए अभिषेक का वह दिव्य जल वेदी की सूक्ष्म प्रणालियों (नालियों) के माध्यम से स्वतः ही विलीन हो जाता है, उसकी एक बूंद भी अशुद्ध नहीं होती।

994. भगवान के वक्षस्थल की चौड़ाई का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?

उत्तर: उनका विशाल वक्षस्थल यह दर्शाता है कि उनके भीतर तीनों लोकों के समस्त जीवों के प्रति परम करुणा और समता समाई हुई है।

995. इन प्रतिमाओं के सामने बैठकर 'सामायिक' करने का क्या फल है?

उत्तर: देवगण जब वहाँ सामायिक में लीन होते हैं, तो वे अपनी आत्मा के परम आनंदमय स्वरूप का साक्षात अनुभव करते हैं।

996. क्या इन ५२ मंदिरों के शिखरों पर जो कलश हैं, उनकी संख्या निश्चित है?

उत्तर: हाँ, प्रत्येक मुख्य शिखर पर अत्यंत भव्य, सुवर्णमयी तीन-तीन कलशों की शृंखला शाश्वत रूप से स्थापित है।

997. भगवान के दोनों हाथों की स्थिति पद्मासन में कहाँ होती है?

उत्तर: उनके दोनों हाथ उत्तान (सीधे) होकर उनकी गोद में एक-दूसरे के ऊपर स्थित होते हैं, जो समस्त बाह्य क्रियाओं के त्याग का प्रतीक है।

998. क्या नंदीश्वर द्वीप की कोई भी प्रतिमा कभी जीर्ण या पुरानी हो सकती है?

उत्तर: सर्वथा असंभव। ये अनादि-निधन मणिमयी जिनबिंब हैं, जो अनंत काल तक इसी परम नूतन और सुंदर रूप में बने रहेंगे।

999. इन प्रतिमाओं के ध्यान से जीव को किस 'गुणस्थान' की पात्रता आ सकती है?

उत्तर: इस परम विशुद्ध चिंतन के बल पर भव्य जीव चतुर्थ (सम्यग्दृष्टि) गुणस्थान से लेकर मुनिराज के उच्च गुणस्थानों की विशुद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

1000. नंदीश्वर द्वीप की इस अगाध, अलौकिक और अखंड 1000 प्रश्नों की महा-ज्ञान गाथा का परम अंतिम, सर्वोत्कृष्ट, अविनाशी और मोक्ष-प्रदायक महा-निचोड़ क्या है?

उत्तर: इस संपूर्ण १००० प्रश्नों के महा-ज्ञान सागर का परम अंतिम और सर्वोपरि निचोड़ यही है कि—**"बाहरी मध्यलोक के आठवें नंदीश्वर द्वीप के ५२ अकृत्रिम चैत्यालय, १६ बावलियाँ और ५६१६ जिनबिंब तो पुद्गल (जड़) की परम सुंदर, शाश्वत और अकृत्रिम रचनाएँ हैं, जिनकी परम भक्ति करके स्वर्गों के इंद्र और देवगण भी स्वयं को धन्य मानते हैं। परंतु हे भव्य जीव! विचार कर, पुद्गल की वह जड़ रचना जब इतनी महान और वंदनीय है, तो तेरी अपनी 'चेतन आत्मा' जो अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य का साक्षात जीता-जागता महासागर है, वह कितनी अनंत गुणा महान होगी! तेरे भीतर का समता-भाव ही असली नंदीश्वर द्वीप है, तेरी समस्त कषायों की मुक्ति ही असली अष्टान्हिका महापर्व है, और तेरी शुद्ध आत्म-लीनता ही असली महा-अभिषेक है। जिस दिन तू बाहर की अनंत भटकन को छोड़ देगा, सम्यग्दर्शन की दिव्य ज्योति जलाकर अपने इस आंतरिक आत्म-चैत्यालय में हमेशा के लिए लीन हो जाएगा, उसी क्षण तू स्वयं 'परमात्मा' बनकर साक्षात सिद्धशिला के परम शिखर पर अनंत काल के लिए पूर्ण, अखंड और अविनाशी मोक्ष-सुख में विराजमान हो जाएगा!"**

"

(१) नंदीश्वर द्वीप में कितने मंदिर है

उत्तर- 52 मंदिर

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(२) नंदीश्वर द्वीप की एक दिशा में कितने जिनालय है

उत्तर- 13

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 (३) नंदीश्वरद्वीप में कौन कौन से जिनालय और नाम क्या है

उत्तर- अंजनगिरी- दधिमुख- रतीकर

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(४) एक दिशा में कितने और कौनकौन से जिनालय है

उत्तर- एक अंजनगिरी चार दधिमुख आठ रतिकर टोटल१३ जिनालय

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(५) अंजनगिरी की ऊँचाई कितनी है

उत्तर- एक लाख योजन

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(६) एक दिशा के जिनालय कितने योजन भूमि पर बने नन्दीश्वरपूजन से

उत्तर- एक सो त्रैशठ कड़ोर चौरासी लाख योजन एक दिशा के

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(७) नन्दीश्वर जिनालय के एक मंदिर में कितनी प्रतिमाये होती है

उत्तर- १०८

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(८) नन्दीश्वर जिनालय में टोटल कितनी प्रतिमायें है

उत्तर- ५६१६

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(९) नन्दीश्वर द्वीप कौन से no का द्वीप है

उत्तर- आठवाँ द्वीप

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