दृश्य १
महेन्द्र : मंत्रीजी सचमुच हमारे राज्य में सबकुछ ठीक से चल रहा है ना?
मंत्री : जय हो महाराज की। आपकी कृपा से सबकुछ अच्छा चल रहा है। सारी प्रजा आनंदसे जीवन व्यतीत कर रही है। धन धान्य संपन्न है सारी नगरी।
महेन्द्र : हम तो निश्चिन्त हुवे। शीघ्र अति शीघ्र तीर्थयात्रा की योजना बनािये मंत्रीजी।
मंत्री : धन्य हो राजन् धन्य हो। आपने चारो पुरुषार्थो को यथासमय स्थान दीया है। यही तो सम्यज्ञानी की पहचान है।
महेन्द्र : ठीक है सभी को सूचना भिजवा दो की शीघ्र ही तीर्थयात्रा की तेैयारी करे।
मंत्री : जो आज्ञा महाराज। लेकिन यह तो बताइये की कीस तीर्थ की वंदना करनी है?
महेन्द्र : मंत्रीजी, भगवान ऋषभदेव की निर्वाणस्थली कैलासगीरी की वंदना करनी है। ऐसे हमारे भाव हो रहे है।
मंत्री : जो आज्ञा महाराज।
द्वारपाल : महाराज की जय हो। महाराज महारानीजी आपके दर्शनार्थ पधारी है। आपसे मिलने की अनुमती चाहती है। आज्ञा हो तो दरबार मे प्रवेरा करने की अनुमती दें?
महेन्द्र : अरे! ये भी कोई पूछने की बात है? जावो ले आवो उन्हे।
द्वारपाल : जो आज्ञा महाराज।
महेन्द्र : आइये महारानी। आज दरबारमे आने का क्या प्रयोजन है?
हृदयवेगा : महाराज आपसे कुछ बात करनी थी।
महेन्द्र : हाँ सुनता हूँ। पर पहले आपको एक खुशखबरी सुनानी है।
हृदयवेगा : खुशखबरी ! तो पहले आपही बताईये महाराज।
महेन्द्र : हम सब कैलासपर्वत की वंदना करने जा रहे है। हैना ख़ुशी की बात?
हृदयवेगा : सच महाराज। हमारा भी मन तीर्थवंदना के लीये आतुर है। आप तो अंतर्यामी हो हमारे मन की बात जान लेते हो। परंतू ....
महेन्द्र : परंतू क्या?
हृदयवेगा : प्राणेश्वर हमारी अंजना सुशिल, विनयवान, धार्मिक और संस्कारी है सर्वगुणसंपन्न है। अब वो युवा विवाह योग्य हो चुकी है। उसका मुख लावण्य, पूनम के चन्द्रमा की तरह है महाराज।
महेन्द्र : हाँ! समझ रहा हूँ मैं। आप क्या कहना चाहती हो। कही आपका इशारा अंजना के विवाह के ओर तो नही?
हृदयवेगा : सही कहा महाराज। हमारी अंजना के लिए शीघ्र ही योग्य वर की खोज करनी पड़ेगी। कहीं ऐसा न हो, ...
महेन्द्र : नहीं! हम हमारे मंत्रियों को वरपुत्र की खोज के लिए भेज देते है।
हृदयवेगा : महाराज हमारी बेटी युवा हो चुकी है। उसके लिए योग्य राजपुत्र की
महेन्द्र : हाँ। मंत्रीजी आपके ख्याल मे कोई योग्य राजपुत्र हो तो बताईये।
मंत्री : कैलासपर्वतपर अष्टनिका पर्व का महा अवसर होने जा रहा है। उस उत्सव मे अनेक देशों के राजे महाराजे भी उपस्थित होने जा रहे है।
हृदयवेगा : तो फिर क्यों न हम भी जाए?
हृदयवेगा : ठीक कहा मंत्रीजी आपने। एक पंथ दो काज। तीर्थवंदनाभी हो जाएगी और राजपुत्री के लिए वर ढूंढने का स्वर्णिम अवसर भी प्राप्त हो जाएगा।
महेन्द्र : वा! क्या खूब सोच है आपकी मंत्रीजी। तो फिर शिघ्रता किजीये यात्रा की तयारी करो शुभ कार्य मे देरी ना हो।
मंत्री : जो आज्ञा महाराज।
महेन्द्र : चलिए महारानी चलते है। ( जय जय आदीश्वर स्वामी.... )
दृश्य 2
हृदयवेगा : महाराज कैलासपर्वत का रम्य वातावरण, प्रथम तीर्थंकर नाभीपुत्र भगवान ऋषभनाथ के दर्शन और मानसरोवर का परीसर देखकर हमारा मन तो प्रफुल्लित हुवा जा रहा है। हमारे पास यहाँका वर्णन करने के लिए तो शब्द ही नही है।
महेन्द्र : महारानी, हा यहाका रमणीय वातावरण सबका मन मोह लेता है। भगवान आदीनाथ का समवशरण हे ही ऐसा जहाँ गाय और सिंह एक घाट पर पानी पिते है। क्यो महारानी आप कुछ सोच रही हैं।
हृदयवेगा : जीट महाराज! हम सोच रहे है, महेन्द्रपूर नरेश को हमारी बात याद है या नही?
महेन्द्र : रानी कैसी बात! कैसे भूल सकता हु मैं? हमने हमारे मंत्रीयोंको राजपुत्र की खोज के लिए भेज दिया है। (मंत्री का प्रवेश) लो मंत्रीजी
मंत्री : प्रणाम स्वीकार कीजिए महाराज।
हृदयवेगा : मंत्रीजी आपको देखकर लगता है के जरूर बात बन गयी है।
मंत्री : हाँ महारानीजी कनकपुराधीश नरेश महाराज हिरण्यगर्भ के राजपुत्र विद्युतप्रभ बहोतही तेजस्वी, कांतिमान और कलापारंगत है। उनकी योग्यता पर कोई संदेह नही। पर महाराज...
महेन्द्र : परंतु क्या मंत्रीजी?
मंत्री : परंतु, महाराज कुमार विद्युतप्रभ के विचार सदैव ही वैराग्यशील रहे है। किसी निमित्त ज्ञानी ने कहा है की वह योवनावस्था मेही संसार त्याग कर वैराग्य प्राप्त कर लेंगे। अतः: अंतः निश्चित ही वे....
महेन्द्र : और कोई राजपुत्र है आपके खयाल मे मंत्रीजी?
मंत्री : हाँ महाराज! आदित्यपुर नरेश प्रह्लाद के पुत्र पवनंजय आपके समकक्ष ही है। और आदित्यपुर का सारा यश, पराक्रम तो महाराज के समकक्षही है और पवनंजय की प्रतिभा कहे तो अनुपम, दिव्यशालीनी है ही महाराज।
महेन्द्र : सुंदर! अतिसुंदर। आदित्यपुर नरेश और कुमार पवनंजय को कौन नही जानता? हमारी अंजना और पवन की जोडी तो बहोतही सुंदर लगेगी। क्यो महारानी आपका क्या खयाल है?
हृदयवेगा : सच महाराज। आपकी बात को कौन टाल सकता है। आपकी वाणी शिरोधार्य। महाराज शीघ्रता किजीये। महाराज प्रह्लाद के पास अपनी बेटी का प्रस्ताव भेजने के लिये
महेन्द्र : हम खुद मिलने जायेंगे महाराज प्रहलाद के पास। आप चिंता मत कीजिए महारानी। चलिए मंत्रीजी चलते है।
दृश्य 3
मंत्री : आपके राजा को सूचित किजिए के राजा महेन्द्रसिंह आपसे मिलने आये है।
द्वारपाल : आप! तो आप किसलिए आये हो?
मंत्री : क्या तुसेही सबकुछ बता दूँ?
द्वारपाल : नहीं! ऐसी बात नही। अभी गया और अभी आया। (जाता है) महाराज की जय हो! महाराज राजा महेन्द्र अपने मंत्री के साथ पधारे है। आपसे मिलने की अनुमती चाहते है। आज्ञा हो तो दरबार मे प्रवेश करने की अनुमती दूँ?
प्रहलाद : अरे! ये भी कोई पुछने की बात है? जल्दी जावो और उन्हे ससम्मान ले आवो।
द्वारपाल : जो आज्ञा महाराज। (प्रवेश...)
प्रहलाद : आइये! पधारिए! जय जिनेन्द्र। सिंहासन पर बिराजियो। सब क्षेम कुशाल मंगल तो है ना?
महेन्द्र : हाँ! क्षेमं सर्व प्रजानाम्।
प्रहलाद : राजन्, आपके इस वक्त आगमन का उद्ेश जान सकता हूँ मै?
महेन्द्र : राजन्। मै आपके पास एक भावना लेकर आया था। परंतु कहिये।
प्रहलाद : परंतु क्या राजन्? मै पराया थोड़ी हूँ? आपकी भावना का आदर ही होगा।
महेन्द्र : राजन्! मेरी भावना ये है की मेरी बेटी अंजना का रिश्ता आपका पुत्र पवनंजय से हो।
प्रहलाद : अरे बा! इतनी प्रसन्नता की बात और, हमे क्यो न स्विकार होगी? हम आपकी इस भावना का स्वागत, करते है। राजकुमारी अंजना को पाकर हम वधू पुत्रवधू बड़े सौभाग्यशाली हो जाएंगे।
महेन्द्र : तो क्या राजन् आपको ये रिश्ता स्विकार है?
प्रहलाद : हाँ! राजन्! आप प्रस्ताव लेकर आए. और हम स्विकार न करे ऐसा कभी हो सकता है? राजकुमारी अंजना को पाकर पवनंजय भी धन्य हो जाएगा।
महेन्द्र : धन्य हो गया मे राजन् धन्य हो गया। आप जैसे समधि और पवनंजय जैसा दामाद पाकर मै धन्य हो गया। आज जीवन की सबसे बड़ी खुषी मिली है मुझे। बड़ी चिंता से मुक्त हो गया हू मै।
प्रहलाद : राजन्! हमारी होनेवाली बहुरानी की एक झलक तो दिखाई जाए।
महेन्द्र : हाँ! ये रही अंजना की तास्विरा।
प्रहलाद : आहाहा। पूनम का चाँद लगती है हमारी बहू अंजना। केनुमती देखो दे।
केनुमती : हा! दिखाईये। वा! तास्विरा इतनी सुंदर लग रही है तो अंजना वास्तव मे कीतनी सुंदर हो सकती है? प्राणनाथ इनका विवाह कबतक संपन्न होगा?
प्रहलाद : अभी राज पुरोहित को बुलवाकर शुभमुहूर्त निकालने की व्यवस्था करवाता हू।
केतुमती : जल्दी किजीए.
प्रहलाद : मंत्रीजी राज पुरोहित को बुलवाने की व्यवस्था की जाय.
मंत्री : जो आज्ञा महाराज। सेवक जाओ और राजपुरोहितजी को ले आओ.
द्वारपाल : जो आज्ञा.
पुरोहित : राजन्! अभिवादन स्वीकार किजीए। हमे बुलाने का क्या प्रयोजन है? हमारे योग्य कोई सेवा हो तो बताईये महाराज.
प्रहलाद : आइये राजपुरोहितजी आइये। पहले आप अपना आसन ग्रहण किजिए। राजपुरोहितजी अपनी अंजना और पवन के विवाह का मुहूर्त निश्चित करना है। कोई अच्छासा शुभमुहूर्त निकालीए.
पुरोहित : अपने पवनंजय का? अभी निकालता हूँ। सुबह का निकालू की शाम का? दोपहर का निकालू या रात मध्यान्ह का? साडेतीन घटीका सबसे अच्छा है। साडेतीन घटीका निकालू या साडेचार?
प्रहलाद : राजपुरोहितजी कोई भी निकालो पर जल्दी निकालो.
पुरोहित : राशी, घटीका, नक्षत्र, पत्र, महाराज बसंतपंचमी का विशेष महूरत है। विवाह के लिए एकदम बढ़ीया है। अतः 3 दिन के बाद विवाह रचाया जाए तो?
प्रहलाद : क्या? तीन दिन के बाद! इतने कम समय मे विवाह की तयारी हो सकती है?
पुरोहित : चिंता न करो महाराज.
केतुमती : हाँ! महाराज चिंता न करो। हम करवा लेंगे सब तयारी। आखिर हम है किस लिए?
प्रहलाद : अच्छा ठीक है। राजपुरोहितजी आपने हमारा दिल खुश कर दिया। मंत्रीजी राजपुरोहितजीका सूवर्णमुदायें देकर सम्मान किजिए।
मंत्री : महाराज राजपुरोहितजी उपस्थित है तो क्यो ना टीके कि की रसम पूरी की जाए तो अच्छा रहेगा।
प्रहलाद : हा! बहोत अच्छा!
मंत्री : सेवक जाओ और राजकुमार पवनंजय को बुलाकर ले आओ। उनका टीका चढ़ने वाला है।
दारपाल : क्या? राजकुमार पवनंजय ही का टीका? अभी जाता हू। राजकुमार पवनंजय का टीका चढ़ेगा और हम कुवारेही रह जायेंगे। भगवान कहीसे हमारे लिये भी अच्छा रिश्ता भेजना। (पवन का प्रवेश)
पवन : प्रणाम पिताजी। प्रणाम माताश्री।
प्रहलाद : आयुष्मान भवः। बेटा पवन ये तुम्हारे होनेवाले ससुरजी है। इन्हे भी प्रणाम कीजीये।
पवन : आपके जैसे श्रेष्ठ जेष्ठों का आशिर्वाद हमारे साथ सदैव रहे।
केनुमती : पवन! देखो तो! हमारी बहुरानी की तस्वीर है। बेटा पवन तुम्हारा टीका चढ़ेगा।
प्रहलाद : चलो चलो विवाह की तयारी करनी है।
दृश्य ४
पवन : हाय अंजना हाय। एकबार तो अपनी झलक दीखादे। क्यो मै इतना बेहाल हुवा जा रहा हू। देखो तो ये तसवीर।
प्रहस्त : पवन क्यो इतने बेहाल हो रहे हो? आज के पहले मैंने तुम्हे इतना बेहाल कभी नही देखा था। क्या बात है?
पवन : कैसे बताऊ मित्र? एक ओर लज्जा और एक ओर सामाजिक मर्यादा।
प्रहस्त : एक सच्चा मित्र अपने मित्र से कुछ नही छुपाता। बताओ।
पवन : अरे! इस तसविर ने तो मेरा मन चुब चुराया है। इसके लिए तो मै इतना बेहाल हो रहा हू।
प्रहस्त : पवन दिखाओ तो! किसका चित्र है यह? जिसके पीछे तू पागल सा हुवा जा रहा है।
पवन : यह अंजना है! देखो। जिसके साथ मेरा 3 दिन बाद विवाह होनेवाला है। लेकिन ये 3 दिन 3 साल जैसे लग रहे है।
प्रहस्त : तुम तो सौभाग्यशाली हो अंजना जैसी सुंदर अर्धांगिनी तुम्हे मिल रही है। मात्र तीन दिन का तो समय है। इतने अधिर क्यो हो रहे हो?
पवन : मित्र कुछ भी करो। मुझे अंजना को देखना है। मै संकल्प करता हू। जबतक मै अंजना को देख न लेता तबतक मेरा अन्नजय का त्याग है।
प्रहस्त : ठीक है। थोड़ा सोचने दो। हां एक उपाय है। पास ही राजा महेन्द्रजी का पडाव है। वही अंजना देखने को मिल सकती है। चोहेतो ववेष बदलकर घुमने के बहाने जाएंगे।
पवन : चलो मित्र! शिघ्रता करो।
दृश्य ५
पवन : (स्वगत) आज तो मुझे विश्व की सारी संपत्ती मिल गयी। विधाता की इतनी सुंदर रचना हो सकती है? मन तो कर रहा है के अभी जाकर अंजना से मिलू। लेकिन नही। यह उचित नही होगा। मै यहीसे देखता हू चुपके-चुपके।
बसंत : आज तो ऐसा लग रहा है। राजकुमारी का चित्त कही और है।
सखी : इसका मन तो कोई चुरा ले गया है।
सखी २ : क्या तुझे पता नही ३ दिन बाद इसका विवाह होने वाला है।
सखी १ : हम सबको छोड़कर यह चली जायेगी। अरी अंजना प्रीतम की प्रीती तो तुझे जीवन भर मीलेगी। अब हमारे साथ तो कुछ बोलो। क्या रूठने का अभ्यास कर रही हो?
अंजना : बाते बनाना तुम्हे खूब आता है। मे तो यह सोच रही थी के तुम सब के बिना मेरा मन कैसे लगेगा?
बसंत : अरे अंजना नारी तो दो कुल की शान होती है।
अंजना : लेकिन जीवन की कैसी विडम्बना है। १२ वर्ष तक लड़की माता पिता के साथ रहती है, सहेलियों के साथ खेलती है। और विवाह के बाद उसे अपरिचित घरमें जाना पड़ता है।
बसंत : यह तो लड़की सौभाग्य की वह सर्वस्व अर्पण करके सारे परिवार को अपना लेती है। लेकिन मैंने तो संकल्प किया है की तुम्हारी छाया बनकर रहूंगी मुझे साथ ले चलने का वादा करो।
अंजना : अच्छा बाबा ले चलूंगी। ज्यादा बाते मत बना। चलो मां इंतजार कर रही होगीगी。
सखी : कितनी सौभाग्यशाली हो तुम सखी अंजना。 पवनंजयजी रूप बे जैसे पति मिले। सुना है पवनजी का रूप देखकर देव भी लज्जित होते है。
सखी : हे ना, बात सही। बोलो २ बोलती क्यो नही?
सखी २ : अजी विधुतप्रभ के मुकाबले पवनंजय कुछ भी नही。
सखी : हां! हां! विधुतप्रभ भी बहुत ही सुंदर था。 अंजना का विवाह तो विधुतप्रभ के साथ ही होना चाहीये था। परंतु...
बसंत : अब सभी चलो समय मत गवाओ। (चली जाती है।)
पवन : मेरी बुराई करनेवाली अंजना की इस सखी का काम तमाम कर देता हू。
प्रहस्त : अरे पवन इससे तो पाप लगेगा। अरे सारी गलती तो अंजना की ही है ना? अब उसने सब चुपचाप सुन लिया। सच लगता है उसके मन मे विधुतप्रभ ही बसा हुवा है।
पवन : मित्र शायद तेरी बात सही है। मै अपनेद कानों से विधुतप्रभ की प्रशंसा सुनती रही। एक शब्द भी नही बोली। इतना गर्व मे इसका बदला लेकर ही रहूंगा। प्रतिशोध अपमान का प्रतिशोध लेकर ही रहूंगा।
प्रहस्त : अभी भी आपका क्रोध शांत नही हुवा। राजकुमार इतना क्रोध कर अच्छा नही। और वह भी अबला नारी पर।
पवन : तुम उसे अबला कहते हो। मुझे बहकाने की चेष्टा न करो। मै उससे विवाह कदापि नही करुंगा।
प्रहस्त : यह प्रश्न कोई साधारण प्रश्न नही। सोचो राजकुमार सोचो। इसपर दो राजवंशों की मर्यादा टीकी है। पिताजी
को क्या उत्तर दोगे। अभी भी सोचो समय है अपने पास।
पवन : मित्र का कहना भी सही है। विवाह तो करुंगा अंजना के साथ ही। प्रतिशोध लेने का अवसर तो मिलेगा। चलो प्रहस्त।
(दृश्य शाही का वरमालातथा विवाह -)
दृश्य ६
अंजना : आज भी नही आये। नही आयेगे। प्रतीक्षा करते-२ थक गयी हू। सचमूच मैने पूर्वमे किसी का दिल दुखाया होगा। किसीका वियोग किया होगा इसीका फल मुझे मिल रहा है। विरह की आग मे जलना पड़ रहा है।
बसंत : चित्त को इतना संतप्त न करो। धैर्य से काम लो सखी।
अंजना : कैसे धैर्य धरूँ २ कैसी शांति रखूँ? उन्हीके चरणोमे मेरी शांति है, मेरा सुख है। उसे कब तक दूर रह सकूंगी?
बसंत : जीना ही होगा राजकुमारीजी। सुख के बाद दुःख यह तो नियती का क्रम ही है।
अंजना : मेरे जीवन मे तो दुःख ही दुःख है। शादी से लेकर अभी तक। अब स्मरण हो रहा है उस अमंगल घटना का। शायद इसी का संकेत होगा।
बसंत : ऐसी कौनसी घटना हुई थी?
अंजना : वरमाला के समय मंगलकलश गिरना, दीपक बुझना, धिक सुनाई देना शायद इसीके प्रतीक होंगे।
बसंत : सखी माता-पिता के उपदेश का स्मरण करो, णमोकार मंत्र का जाप करो। मनको शांती मिलेगी।
दृश्य ७ वे
पवन : प्रणाम पिताजी। क्यो आप चिंतित बैठे हो?
प्रहलाद : लंकाधीश रावण के यहांसे दूत आया है। संदेश लाया है के उन्हे युद्ध मे मदत चाहीये। हमारा कर्तव्य बनता है की हमे मित्र की मदत करनी चाहीये। हम तुरंत ही युद्ध के लिए प्रस्थान करेगें।
पवन : लेकिन पिताजी हमारे होते हुवे आप युद्ध मे जायेगे। नही! ऐसा नही हो सकता युद्ध मे तो हम ही जायेगे। मंत्रीजी युद्ध की तयारी किजीयो।
मंत्री : जो आज्ञा राजकुमारजी।
प्रहलाद : यह तुम क्या कह रहे हो पवन? तुम्हे युद्ध मे भेजू? नही! कदापि नही।
पवन : क्यो पिताजी? आप रणक्षेत्र मे जाये और मै महल मे रहू। क्या उचित है यह?
प्रहलाद : तुम ठीक कह रहे हो, पवन किंतु...
पवन : किंतु क्या पिताजी? आपको मेरे पराक्रम पे संदेह है क्या?
प्रहलाद : नही! संदेह नही। पिता का प्यार मुझे रोक रहा है।
पवन : पिता का प्यार पुत्र को कर्तव्यपालन से जी नही चुराने देता। जो पुत्र कर्तव्यपालन से जी चुराता है वह पुत्र पुत्र नही कहलाता पिताजी।
मंत्री : महाराज, राजकुमार का शौर्य, शक्ती, पराक्रम सराहनीय है। इन्हे अपना पौरूषत्व आजमाने दिजीये। वे
प्रहलाद : हां मंत्रीजी आप बिल्कुल ठीक कह रहे हो। पवनंजय युद्ध मे जाकर विजयश्री प्राप्त कर लेना
पवन : मुझे आशिष देना पिताजी।
प्रहलाद : विजयी भवः।
पवन : मै मां का भी आशिष लेकर आता हू। चलो प्रहस्त, हम युद्ध मे विजयश्री प्राप्त करकेटी आयेंगे। चलो-२ प्रहस्त।
पवन : अरे यह कौन आ रही है?
प्रहस्त : पहचाना नही। पहचानोगेमी कैसे? जिसका मुख सालोंसे नही देखा उसे पहचाना नही तो आश्चर्यही क्या?
पवन : तो क्या?
प्रहस्त : एक वीर पत्नी अपने पति को युद्ध क्षेत्र मे जाते समय मंगल आरती और शुभकामनाओं के साथ विदा देती है। उसी परंपरा को निभाने के लिए राजलक्ष्मी अंजना आ रही है।
पवन : यह इस वक्त सामने क्यो आयी है? ह्टादो इसे यहांसे।
अंजना : प्राणेश्वर यह आपकी दासी श्री चरणोंकी धूल लेने आयी है। मुझे अपना कर्तव्य पूर्ण करने दिजीयो।
पवन : मे इस शब्दजाल मे नही फसनेवाला चली जाओ यहांसे चली जाओ।
अंजना : नारी का स्थान तो पति के चरणो मे ही होता है। अबला क्रोध की नही करुणा की पात्र होती है।
पवन : तू अबला है या अभिमान की पुतली? फिरसे कहता हु चली जाओ यहांसे।
अंजना : नही स्वामी। अभिमान ने मेरे जीवन को अभिन्नक स्पर्श भी नही किया।
प्रहस्त : पवन, ये क्या हो गया है तुम्हे? एक साध्वी पत्नी को सताकर आखिर मिल क्या रहा है?
पवन : तुम्हे पता नही इसने मेरा अपमान किया है?
अंजना : नहीं स्वामी। आपने मुझे गलत समझा है। दासी का रोमरोम आपके अनुराग से पुलकित है।
पवन : वाचाल नारी दूर हट जा।
अंजना : चले गये २ प्रणानाथ, चले गये। पर आपके चरणोंकी ठोकर खाने के बहाने चरणस्पर्श तो मिल गये। पावन हो गयी हू मै। जाओ स्वामी जाओ। जहां भी रहो प्रसन्न रहो। प्यार से न सही, क्रोध से सही पर कभी-२ इस दासी को याद कर लेना स्वामी।
दृश्य ८
पवन : अरे प्रहस्त। कितना सुंदर वातावरण है। ये लताकुंज, नदियोंमें उठनेवाली तरंगे, चंद्रमा की शीतत्य किरणे। कितना सुंदर लग रहा है ना। लेकिन यह आवाज कैसी? है तो किसी पक्षी की मगर करूण।
प्रहस्त : करूणा नही हृदयद्रावक कहो। यह विरह पुकार समझो।
पवन : मै कुछ समझा नही।
प्रहस्त : यह चकवी-है। जो अपने पति वियोग मे...
पवन : अरे इसके रोने का कुछ कारण तो होगा?
प्रहस्त : हां। प्रकृती का यह नियम है रात्री के समय चकवा-चकवी मिल नही पाते।
पवन : अरे पक्षीयों मे भी प्रेम होता है?
प्रहस्त : हे ये भी कोई पूछने की बात है? प्रेम के
तो सभी प्यासे होते है।
पवन : तुम कहना क्या चाहते हो?
प्रहस्त : पवन तुम मनुष्य होकर भी नारी के प्रेम को समझ नही पाये।
पवन : पवन ओ निर्दयी पवन। ये तूने क्या किया? क्या किया तूने? एक रात्री के वियोग मे चकवी की यह दशा है तो उधर मेरी अंजना क्या कर रही होगी? पवन कुछ भी करो पर अभी के अभी जाकर अंजना से मिलो।
प्रहस्त : पवन, क्या सोच रहे हो? याद करो वो दीन जीस दिन तुमने अंजना का हाथ थमाया था। उसी दिन एक झुठे संदेह के पिछे अपने सुखी जीवन मे जहर घोल डाला था।
पवन : बस करो मित्र।
प्रहस्त : बस कैसे करू? एक नारी का दिल दुखाया है तुमने। क्या हुवा होगा वहा अंजना का? सोचो।
पवन : क्या बस करो मित्र। अभी और शर्मिंदा मत करो। चलो हम अभी अंजना से मिलने जायेंगे। और क्षमायाचना भी करेंगे। चलो।
प्रहस्त : लेकिन ये कैसे हो सकता है? हम लोग युद्ध के लिए निकले है। फिरभी तुम्हारी इच्छा होगी तो वेष बदलकर जायेंगे। और शीघ्र ही लौट आयेंगे।
पवन : हां। ठीक है। चलो प्रहस्त।
बसंत : अरे! क्या आप जानते नही, रात्री मे पुरूषोंका यहा आना वर्जित है?
पवन : पुरूषोंका है स्वामी का तो नही ना?
बसंत : अरे! राजकुमार हमे माफ कर दिजीये। मैने आपको पहचाना नही। आईये अंजना। देखो-२ अंजना कौन आया है? राजकुमार पवनंजयजी आये है।
अंजना : क्यो उपहास करती हो सखी? मेरे इतने भाग्य कहां के स्वामी मुझसे मिलने आयेगे?
बसंत : मै झूठ नही बोल रही हू। सचमूच राजकुमारजी आये है।
अंजना : स्वामी! प्रणाम करती हु स्वामी।
प्रहस्त : अरे आप दोनो बोलते क्यो नही? कुछ तो बोलिये।
बसंत : रतिमदन की जोड़ी कितनी सुंदर लग रही है ना? इनका मिलन देखकर मै कितनी आनंदविमोर हो गयी हू। चलो प्रहस्त, हम चलते है।
पवन : अंजना तुम्हे बहुत दुःख सहने पडे। मै क्षमा के भी लायक नही हू।
अंजना : आप यह क्या कह रहे हो स्वामी? मेरे अहोभाग्य आज आपने मुझपर कृषा की।
पवन : अंजना तुम सती हो महादेवी हो।
अंजना : नही स्वामी। ऐसा कहकर मुझे लज्जित न करो। सेवा का सौभाग्य दिजीयो। मेरे ही अश्ुभ कर्मों का उदय था आपका कोई दोष नही।
पवन : धन्य हो अंजना धन्य हो तुम्हारी।
अंजना : नही स्वामी मै कोई देवी नही मानवी तो हू। मानव अपनी दुर्बलता का ही, तो शिकार होता है।
पवन : तुम मुझसे कहना चाहती होना। दे दो मनभरके उलाहने दे दो।
अंजना : मेरा तात्पर्य यह नही था। क्षमा किजिए। परंतु नाथ मेरे मन मे बरसों से एक जिनासा थी। जिसका उत्तर आज तक मुझे ज्ञात नही हुवा। बता ने की
कृपा करेंगे?
पवन : याद करो वो दिन। शादी के 3 दिन पहले तुम्हारा सहलियों के साथ वार्तालाप चल रहा था और एक सखली थी की वो विधुतप्रभ की प्रशंसा कर रही थी। और, तुम थी की चुपचाप सुन रही थी एक ना बोली।
अंजना : अरेरे! मुझे क्या पता था? मेरा उस समय का मौन मुझे इतनी बडी सजा देगा। परंतु भाग्य की लीला भी अगाध है कौन जाने?
पवन : बस उसी दिन से मेरे सर पर संदेह का भूत सवार हो गया था। लेकिन, तुम्हे बहोत कष्ट झेलने पडे क्षमा कर दिजीये। आओ, अतिथ को भूल जाओ वर्तमान सुखद बनायेंगे।
सुबह की बेला हो चुकी है। मुझे शिघ्रतासे लौटना पडेगा। युद्धमे विजयश्री प्राप्त करके शिघ्रतासे लौट आऊंगा।
अंजना : स्वामी अभी-२ तो आये हो। अभी चले जाओगे फिरसे वियोग नही सहा जायेगा नाथ। परंतु नाथ आप मुझसे मिलने आये थे इसपर कोई विश्वास नही करेगा अगर-२ कुछ हो गया तो?
पवन : हां-२ मै सबकुछ समझ गया। ये तो हमारी मुद्रिका। यह सबकुछ प्रमाणित करेगी। हम शिघ्रतासे लौट आयेगे।
अंजना : प्रणाम हो स्वामी।
सुख-दुख दोनो रहते जिसमे जीवन है। -----
दृश्य ९
केतुमती : कौन मदनिका?
मदनिका : महारानीजी।
केतुमती : अरीरी। क्या हुवा?
मदनिका : महारानीजी यह मैने क्या सुना?
केतुमती : क्या सुना?
मदनिका : महारानीजी। मैने सुना...। कैसे कहू? क्या कहू? कहे बिना चैन भी ना तू।
केतुमती : अरे ऐसे क्या सुना जल्दी बताओ मदनिका।
मदनिका : मै अभी-२ पूरा आदित्यपूर घूम आई हू। बापरे! बाप। सबके मुँमे एकही चर्चा चल रही है।
केतुमती : कौनसी चर्चा?
मदनिका : महारानीजी आपकी बहू-२...!
केतुमती : क्या हुआ मेरी बहू अंजना को?
मदनिका : हुआ नही पर अब होनेवाला है।
केतुमती : मदनिका जल्दी बताओ मेरा जी घबरा रहा है।
मदनिका : कोई सुन तो नही रहा। महारानीजी जरा कान तो इधर किजीये।
केतुमती : हा-२ बताओ।
केतुमती : मदनिका! दिमाग तो ठीक है तेरा?
केतुमती : झूठ तो ना बोलू महारानीजी, ये मै नही पूरा आदित्यपुर कह रहा है।
मदनिका : क्या पूरा आदित्यपुर कह रहा है। हं क्या तूने अपने कानोसे सुना है मदनिका?
केतुमती : हां मैने अपने कानोसे सुना और आँखोसे देखा भी है।
मदनिका : मै भी देखना चाहती हू मदनिका। क्या तुम मेरे साथ चलोगी?
मदनिका : हां चलो महारानीजी। चलो-२ जल्दी चलो। अब आयेगा मजा अब सास-बहु के झगडे की मजा देखने। चलो-२ आपभी चलो।
बसंत : तुम्हे क्या हो गया है सखी? क्यो खोयी-२ सी रहती हो? ऐसी अवस्था मे तो तुम्हे प्रसन्न रहना चाहीये।
अंजना : सखी मुझे विचित्र-२ सपने आते है तो मन आशंका से भयभीत हो उठता है।
बसंत : अरे ऐसा न कहो। अब तो सब मंगल ही होनेवाला है। दुःख का समय बीत चुका। आखिर हम है किसलिए। आपको प्रसन्न रखने के लिये हम नाचेंगे, गायेंगे आपका जी बहलायेंगे। आपकी प्रसन्नता मेही हमारी प्रसन्नता है।
केतुमती : और यही प्रसन्नता तो अब रूदन बननेको है!
अंजना : मातेश्वरी! प्रणाम करती हू।
केतुमती : दूर ह्ट ह्ट अपने अपवित्र हाथोंसे मुझे स्पर्श न कर।
अंजना : यह आप क्या कह रही हो इस रोष का कारण?
केतुमती : मुझसे पूछती है?
अंजना : मै कुछ समझी नही मातेश्वरी।
केतुमती : लगाकर वंश मे स्याही न फिर भी समझ पायी बता ये पापिनी तुझको शरम कुछ भी न आयी।
अंजना : कैसा पाप? कैसा कलंक, कैसी शरम?
केतुमती : क्या तू गर्भवती नही है?
अंजना : हू तो मातेश्वरी पर इसमे रोसी क्या बात हुई?
केतुमती : सारा आदीत्यपूर जानता है। मेरे पुत्र ने तेरा मुँह तक नही देखा। तो ये दुराचार नही तो क्या है?
अंजना : आपको मिथ्याभ्रम हुआ है मातोश्री।
केतुमती : बस, अब चुप रहो। कुछ भी न बोलो हे भगवान अब क्या यही दिन देखना बचा था। उठा ले भगवान मुझे इस दुनिया से उठा ले।
अंजना : मातेश्वरी।
केतुमती : मत कह मुझे मातेश्वरी।
अंजना : शांत हुजिये आपा।
केतुमती : मैने उत्तर मांगा है तुमसे।
बसंत : उत्तर मै देती हू महारानीजी।
केतुमती : कौन बसंतमाला! तो तूभी इस बातमे सहायक हो।
बसंत : पहले मेरी बात तो सुनिये।
केतुमती : किसकी बात कर रही तूमा।
बसंत : राजकुमार पवनकी।
केतुमती : झूठ सरासर झूठ।
बसंत : यह सत्य है महारानीजी। और इसका प्रमाण है यह राजकुमार की मुद्रिका।
केतुमती : मुद्रिका तो है पवन की। लेकिन इसका क्या भरोसा? इसने छल से प्राप्त की होगी। नही! यह एक छल है, धोखा है। इसमे मेरे लाल को घसीटा जा रहा है।
अंजना : मातेश्वरी, विश्वास किजिए।
केतुमती : विश्वास? कैसे हो सकता है? पवन यहां आया और मुझे बिना मिलेही चला गया। इसका क्या कारण हो सकता है?
अंजना : लोकोपवाद के भय से मातेश्वरी।
केतुमती : नही! ये सत्य नही है। तेरे पाप पर तो तुझे
पश्चात्ताप करना ही होगा। निर्णय तो तेरे भाग्य का हो ही चुका। तूजे यहां एक पल भी नही रहना है। निकल जा इस घर से।
अंजना : नही मातेश्वरी। राजकुमार आने तक तो रहने दिजीये।
केतुमती : नही! अभी सारथी को बुलाती हू। सारथी ओ सारथी! इसे महेन्द्रनगर के राजउद्यान तक छोडकर चले आओ।
अंजना : नही! मातेश्वरी। मै आपसे दया की भीक मांगीली हू।
केतुमती : चल ह्ट!
अंजना : चल बसंत। अब धर्म ही एक सहारा है। --- देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी ---
दृश्य १०
प्रहस्त : पवन क्या बात है क्यो इतने चिंतित हो?
पवन : रात्रि के अंतिम प्रहर मे मैने एक भयानक स्वप्न देखा। उसने मुझे बेचैन कर दिया है।
प्रहस्त : वाह! स्वप्न भी कभी सच होते है।
पवन : किन्तु मेरा हृदय कह रहा है इस स्वप्न के पिछे सत्यता जरूर है।
प्रहस्त : ऐसा क्या देखा आपने?
पवन : मैने देखा, अंजना काले वस्त्र पहने एक भयानक वनमे बच्चे के साथ रो रही है। और मुझे बुला रही है। अब मै यहां नही रह सकता। जल्दी रावण से विदा लेते है। चलो!
प्रहस्त : ठीक है। हमने अभी-२ युद्ध विजयश्री प्राप्त की है। तो हम महाराज रावण से विदा लेकर प्रस्थान करेंगे। चलो।
दृश्य ११
सारथी : हे स्वामिनी मुझे आपको यहांतक ही छोडने की अनुमती मिली है।
अंजना : पर मार यहां ना हमारा काइ न्हा हा। अगर आप हमे महेन्द्रनगर तक छोड़ दे तो आपकी बड़ी कृपा होगी।
सारथी : ठिक है चलीए।
बसंत : आप जाकर महाराज को समाचार दो अंजना के आने का।
सारथी : महाराज की जय हो-२ महाराज
महेन्द्र : आप कौन हो और किसलिए आये हो?
सारथी : महाराज-२
महेन्द्र : हाँ बोलो-२ घबरावो मत।
सारथी : महाराज-२ महारानी अंजना को व्यभिचार का कलंक लगाकर राज्यसे निकाल दिया है। महाराज! वो आपका आश्रय चाहती है-२।
महेन्द्र : क्या कहा? ऐसी कलंकिनी के लिए हमारे राज्य मे जगा नही है। उसे कह दो कि वो अभी नगर छोड़कर चली जाए।
ह्रदेश्वरी : किसे नगर छोड़ने आज्ञा दी जा रही है महाराज?
महेन्द्र : ऐसी कुलटा, व्यभिचारी, राज्य से निकाली गयी स्त्री के लिए मेरे राज्य मे जगा नही है।
ह्रदेश्वरी : महाराज, आप किसकी बात कर रहे है?
महेन्द्र : आपकी लाडली अंजना की।
ह्रदेश्वरी : क्या हमारी राजकुमारी। नही। बस-२ किजीए महाराज बस किजीए। हमारी अंजना अपने संस्कारोंको कैसे भूल सकती है। वो महाराज जरूर-२ महारानी केतुमती से गलती हुई है। महाराज हमारी अंजना अपने प्राण तो दे सकती है परंतु अपने कुल पर कलंक... नही-२ स्वामी।
महेन्द्र : ये सच है रानी ह्रदेश्वरी।
ह्रदेश्वरी : महाराज सोचिये-२ हमारी पुत्री के बारे मे। इतने विशाल राज्य के आप राजा है। एक बार उससे मिल तो आइये। उसकी बात तो सुनिये। ऐसी-२ अवस्था मे वो कहाँ जायेगी?
महेन्द्र : बस! अब हमने कह दिया सो कह दिया। अब हम कुछ सुनना नही चाहते। (चले जाते है...)
ह्रदेश्वरी : स्वामी-२ विधाता हम नारियों का निर्माण क्यो कराया? उसे इतना विवश क्यो बनाया? हायथ इस अवस्था मे मेरी बेटी मछली की तरह झटपटा रही होगी और मै-२ महेन्द्रपुर की महारानी... हाय-२। सारथी, मुझे मेरी बेटी से मिलना है। तुम तो जानतो हो ना मेरी बेटी कहाँ है? मुझे मेरी बेटी के पास ले चलो।
सारथी : आइये महारानी आइये।
दृश्य १२
अंजना : सखी! सारथी अभी तक क्यो नही आया?
बसंत : माता-पिता के साथ आता ही होगा।
ह्रदेश्वरी : अंजना! बेटी अंजना।
अंजना : मां-२!
ह्रदेश्वरी : ये क्या हो गया? ये क्या किया तूने? बोल बेटी बोल कुछ तो बोल।
अंजना : मै निर्दोष हू मां मै निर्दोष हू।
बसंत : हां मां अंजना पूर्णतः निर्दोष है। कान और आंख के बिच चार अंगुल का फरक होता है।
ह्रदेश्वरी : मै जानती हू। मेरी अंजना निर्दोष है। पर मै क्या करूर? मैने उन्हे समझाने की बहोत कोशिश की। मगर उनके हठ के आगे मेरी एक न चली-२ बेटा।
बसंत : मां जन्मदाता भी इतना निष्ठुर हो सकता है?
अंजना : काश मां मै पिताजी को अपना हृदय चीरकर दिखा पाती मां। काश मै ऐसा कर पाती।
ह्रदेश्वरी : बस कर बेटी बस करो मां के हृदय की पीडा मां ही जान सकती है। बसंत तू तो इसकी
बचपन की सहेली है। मेरी बेटी का साथ मत छोडना। इसके कठिन समय मे तूही इसका सहारा है। इसका साथ मत छोडना।
बसंत : चिन्ता न करो मां। मै इसका साथ नही छोडूंगी।
अंजना : मां जब आपने मुझपर विश्वास कर लिया तो अब-२ मुझे कोई चिन्ता नही मां। मां मुझे आशिर्वाद दो।
ह्रदेश्वरी : आशिर्वाद-२। ये अभागिन मां तुझे क्या आशिर्वाद देगी?
अंजना : चल बसंत चला।
दृश्य १३ पिजरेके पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोए ---
अंजना : अब नही चला जाता बसंत। पूरा बदन कांप रहा है। थोडा सा सहारा।
बसंत : घबरावो नही स्वामिनी। साहस और धैर्य से काम लो।
अंजना : बसंत मै नही जानती थी, मुझे ये दिन भी देखना पडेगा। प्राणनाथ के मिलन के बाद भी संकटों का पीछा नही छुटा। इसप्रकार ठोकरे खानी पड रही है। (नीचे गिरती है।)
बसंत : अरेरे। ठोकर लग गयी। खून भी निकल रहा है। तो यहाँ बैठो मै पटटी बांध देती हू।
अंजना : बसंत, तू इस ठोकर का इलाज तो कर देगी पर मुझे रोना तो उस ठोकर से आ रहा है जो मेरे पैर नही हृदय पर लगी है।
बसंत : ओ अब समझी। अपनी पिता की बात कर रही है शायद।
अंजना : हां नारीके दो ही तो स्थान होते है संसारमे
बचपन की सहेली है। मेरी बेटी का साथ मत छोडना। इसके कठिन समय मे तूही इसका सहारा है। इसका साथ मत छोडना।
बसंत : चिन्ता न करो मां। मै इसका साथ नही छोडूंगी।
अंजना : मां जब आपने मुझपर विश्वास कर लिया तो अब-२ मुझे कोई चिन्ता नही मां। मां मुझे आशिर्वाद दो।
ह्रदेश्वरी : आशिर्वाद-२। ये अभागिन मां तुझे क्या आशिर्वाद देगी?
अंजना : चल बसंत चला।
दृश्य १३ पिजरेके पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोए ---
अंजना : अब नही चला जाता बसंत। पूरा बदन कांप रहा है। थोडा सा सहारा।
बसंत : घबरावो नही स्वामिनी। साहस और धैर्य से काम लो।
अंजना : बसंत मै नही जानती थी, मुझे ये दिन भी देखना पडेगा। प्राणनाथ के मिलन के बाद भी संकटों का पीछा नही छुटा। इसप्रकार ठोकरे खानी पड रही है। (नीचे गिरती है।)
बसंत : अरेरे। ठोकर लग गयी। खून भी निकल रहा है। तो यहाँ बैठो मै पटटी बांध देती हू।
अंजना : बसंत, तू इस ठोकर का इलाज तो कर देगी पर मुझे रोना तो उस ठोकर से आ रहा है जो मेरे पैर नही हृदय पर लगी है।
बसंत : ओ अब समझी। अपनी पिता की बात कर रही है शायद।
अंजना : हां नारीके दो ही तो स्थान होते है संसारमे
एक पिहर और एक ससुराल । का सास-ससुर ने मुझे कलंकिनी समझा पर कोई बात नही लेकिन जन्मदाता म पिता ने भी मेरे शिल पर संदेह किया।
बसंत : ये सब समय का फेर है राजकुमारी। जब इन्सान का समय बदलता है तो तन के कपडे भी दुश्मन बन जाते है।
अंजना : बसंत जब माता पिता, सास-ससुर, भाग्य कोई साथ न देता हो तो तू... तू भी चली जा।
बसंत : क्या नही अंजना। सास ससुर, माता पिता भाग्य कोई साथ न देता हो पर मै साथ रंणूगी। मै अपने कर्तव्य से नही हटूंगी। और अब तो मेरे उपर दो की जिम्मेदारी है एक तुम्हारी और एक तुम्हारे गर्भ मे पल रहे उस शिशु की।
अंजना : तू नही मानेगी ना। पर बसंत ऐसे जीवन से तो मरना अच्छा है। फिर किस लिए जिऊ मै?
(अरे मन कैसा है....)
बसंत : कोई ठीक ही कह रहा है। अंजना अभी सबकुछ शेष है रानी। राजकुमार आयेंगे तो क्या बितेगी उनपर? कुछ अंदाजा है तुम्हें। तुम्हारे जीवन से एक नही दो प्राणो का जीवन बंधा हुवा है। तुम्हारा जीवन न रहने पर क्या उनके जीवन मे जीवन रह सकेगा? ... बोलो उत्तर दो।
अंजना : ऐसा मत कहो बसंत। मै जीऊंगी। उनके लिए मुझे जीनाही होगा। मेरा तन और मन साहस दे चुका है। पर बसंत अब नही चला जाता।
बसंत : ऐसा मत कहो। मेरा सहारा लो। अरे नजदीकही शेर और हाथी की आवाज सुनायी दे रही है। हम अपनी सुरक्षा नही कर पायेंगे। चलो जल्दी चलो。
अंजना : वाह रे कर्म! कैसे कर्म किये है मैने पूर्वमे। फल भी मुझेही भुगतना होगा। मैही भोगूंगी पर रो-रो के नही हसके। ताकी फिरसे ऐसे कर्म फिर ना बंधे। मुझे सावधान रहनाही होगा। जैन दर्शन मे प्रव्य की स्वतंत्रता तो यही बताती है ना! स्वयं कीये जो कर्म शुभाशुभ फल निश्चय ही वे देते। मैही भोगूंगी。
बसंत : वा! यही सती नारी की पहचान है。
दृश्य १४
पवन : सारा राजमहल ढूंढ आया। आखिर अंजना है किधर? और कोई दिखाई भी नही देता। कौन? मदनिका। इधर आओ तो।
मदनिका : आज्ञा किजीए महाराज।
पवन : वापस क्यो लौट रही थी? मुझे देखकर? तुम्हारी स्वामिनी महेन्द्रनगर गयी है?
मदनिका : नही ... नही
पवन : तो फिर कहां गयी है?
मदनिका : (चुप)
पवन : अरे तुम चुप क्यो हो? तुम रो क्यो रही हो? कहां गयी अंजना?
मदनिका : महाराज अब बहू रानी यहां...
पवन : जल्दी बताओ। कहां गई वह?
मदनिका : महाराज उसे तो महारानीने घर से बाहर निकाल दिया है।
पवन : क्यो? क्या किया था उसने?
मदनिका : इसलिए की उसपर व्यभिचार का कलंक लगा था。
पवन : हे भगवान! ये क्या हो गया मेरे पिछे? कहां गयी होगी मेरी अंजना? कहां गयी?
केतुमती : पवन ओ पवन! अच्छा तो तुम यहां हो. और मै तुझे पूरे राजमहलमे ढूंढ रही थी। अभी-२ युदध मे विजयश्री प्राप्त करके आये हो। आओ बिश्राम करो मेरे लाल।
पवन : बिश्राम! बिश्राम तो तुमने छिन लिया है मां! ऐसा करके कौनसे जनम का बदला लिया है मां तुमने?
केतुमती : ऐसा क्या किया बेटा मैने?
पवन : क्या तुमने अंजनाको घरसे नही निकाला मां?
केतुमती : हा पर क्या व्यभिचारिणी बहू को घर मे रखना उचित था?
पवन : नही मां! वह निर्दोष थी।
केतुमती : तू नही जानता था पवन।
पवन : सबकुछ जानता हू मै।
केतुमती : तुझे नही पता बेटा।
पवन : क्या पता नही मां?
केतुमती : मगर बेटा...
पवन : ऐसा करके मेरे सुखी जिवन मे जहर घोल डाला मां तुमने। मेरा जिवन बरबादी मे बदल डाला मां।
केतुमती : भूल हो गई बेटा! जो बात हो गयी वो अब लौट के तो नही आ सकती। अब किया भी क्या जा सकता है?
पवन : ठीक है। अगर अंजना नही मिली तो समझ लेना बहू के साथ बेटा भी गया मां।
केतुमती : पवन-२ कहां हो मेरे लाल? आओ। मुझे छोडके मत जाओ। हे भगवान ये सब क्या हो रहा है। ये मैने क्या कर डाला। अपने ही हाथो से अपना घर उजाड डाला। हाय! मुझे क्या हो गया था। अंजना! कहां हो तुम? आओ। मुझे क्षमा करो बेटा। हे भगवान! मैने अपने पुत्र और बहू दोनो से हाथ धो डाला।
दृश्य १५
अंजना : बसंत मै अपने पापोंका फल भुगतरही हू। लेकीन तू मेरे साथ जंगलमे बीनाकारण भटक रही है।
बसंत : स्वामिनी, जीस दिन मै आपका लहलहता संसार देखूंगी तो समझूंगी के आज मेरा कर्तव्य पूर्ण हुवा।
अंजना : कितना बिशाल हृदय पाया है तूने बसंत! अन्यथा सब स्वार्थी संसार है।
बसंत : ऐसा तभी होता है, जब विवेक अंधा बनता है।
अंजना : मगर तुम इसकी अपवाद हो बहन। अभिमान तो छु भी नही सकता आपको।
बसंत : ऐसा न कहो राजकुमारी।
अंजना : मुझे अब केवल अभागिन अंजना कहो।
बसंत : कौन कहता है तुम्हे अभागिन? तुम्हारा शिल, धैर्य समस्त नारी जाती का पथदर्शन करता रहे। चलो अब यहां रहना उचित नही होगा।
अंजना : पर अब कौन सहारा देगा हमे?
बसंत : है ऐसा क्यो कह रही हो? वो देखो वहा एक गुफा दिखाई दे रही है। वह हमे निश्चित ही सहारा देगी। चलो। अरे अंजना बाहर एक
मुनिराज दिखाई दे रहे है।
अंजना : ओह हमारा भाग्य! नमोस्तु भगवान।
मुनि : आशिर्वाद है बेटी।
अंजना : भगवान मेरे मन मे एक प्रश्न है जिसका समाधान आपके सिवाय कोई और नही कर सकेगा स्वामी।
मुनि : कहो क्या प्रश्न है आपका?
अंजना : मेरे गर्भ मे ऐसा कोनसा जीव आया है, जो विपत्ती पर विपत्ती आ रही है? मेरे स्वामी मेरे से किन कारण से नाराज थे? उनका मिलना हुआ और फिर वियोग। ऐसा कोन कर्म मैने किया है पूज्यवर?
मुनि : सुनो बेटी! तुम पूर्वभव मे राजा की पटरानी थी। अपने सौत की इर्ष्या से आपने जिनप्रतिमाको मंदिर मे से निकालकर पानी मे रख दी थी। उधर से एक आर्यिका माताजी आहार के लिए निकली। उन्होने जिनप्रतिमा का अनादर देखकर आहार नही किया। अपितु आपको समझाया, संबोधन दिया। फिर आपके समझ मे आया। और आपने जिनप्रतिमाको आदरसे मंदिर मे पधराई। पर उस समय प्रतिमा 22 घडी तक वियोग का फल तुम्हे पति का 22 साथ तक वियोग हुआ।
बसंत : पर मुनिराज इसके गर्भस्थ बालक का क्या?
मुनि : चिन्ता न करो। सभी को अपने अपने पूर्वकृत कर्मोंका फल भोगनाही पडेगा। उसमे कोईभी सहयोग नही दे सकता है। आपके गर्भमे कोई साधारण बालक नही है। वह तो इस भव का मोक्षप्राप्त करनेवाला मोक्षगामी जीव है। और जल्दी ही आपके पती का संयोग होगा। तुम्हारा शिल
पवित्र, निष्कलंक है। सती मेरा आशिष सदैव रहेगा।
(मुनिराज अंतर्ध्यान होते है)
बसंत : अरे कहां गये मुनिराज? कितना सुखद समय था ना। बहोत अच्छा लग रहा था। अरे वो देखो। वह शेर शायद गुफा की तरफ ही आ रहा है।
अंजना : बापरे! हे भगवान! जबतक यह उपसर्ग दूर न होगा तब तक चारो प्रकारके आहार का त्याग है।
(शेर और अष्टापद की लडाई)
बसंत : कितना भयानक दृश्य था ना अंजना। बस बच गये किसी पुण्यसे। अब चलो। तुम अंदर चलो। विश्राम करो। मै तुम्हारे लिए पत्तों की सेज तैयार करती हू।
अंजना : औह।
बसंत : औह। कितने सुंदर बालक को जन्म दिया है तूने अंजना। लो अपने बालक को गोदी मे लो।
अंजना : काश! तेरा जन्म आदित्यपुर या महेन्द्रनगरमे होता तो कितनी खुशिया मनायी जाती पर मै अभागिन क्या दे सकती हू तुझे।
बसंत : नही अंजना इसकी जन्मकी खुशिया तो सारा वन मना रहा है। बिलकुल दुखी मत हो।
दृश्य १६
भनेसुर्य (आश्चर्य व क्रोध से) : है? विमान रुक गया? क्या कारण है इसके रुकने का? किसी शत्रु ने बाधा तो नही डाली है? कौन है वह सामने क्यो नही आता? कही कोई दिखाई भी नही देता। फिर क्या कारण है विमान रुकने का? अरे यह कौंच रोने की आवाज कैसी? अरे
ये स्त्रिया कौन है? इस भयानक वनमे क्यो आई? पुत्रियों तुम लोग कौन हो? और इस भयानक जंगल मे क्यो आयी हो?
बसंत : महाशय आप क्या करेंगे पूछकर? इतना ही समझ लिजिए की कर्मोंकी सताई अभागिन...
प्रतिसूर्य : विपत्ती मे प्रत्येक प्राणी की सहायता करना मनुष्य का कर्तव्य है। और इसी कर्तव्य के नाते मैने तुमसे परिचय मांगा है बेटी।
अंजना : परिचय बताने मे भी घबराहट हो रही है। कही फिर कोई विपत्ती तो...?
प्रतिसूर्य : घबराओ नही पुत्री। अभी संसार मनुष्यता से हीन नही हुआ। दया, मानवता और कर्तव्यनिष्ठा अभी संसार मे विद्यमान है। यदी तुम्हे आपती न हो तो मै तुम लोगो का पूर्ण परिचय प्राप्त करने का इच्छुक हू मुझसे कोई संकोच न करो बेटी।
अंजना : पूज्यवर! अब आपने हमे पुत्री कहकर पुकारा है तो सुनिये। मे हूॅ महेन्द्रपुर के महाराज महेन्द्रराय की पुत्री और यह है मेरी प्यारी सखी बसंता।
प्रतिसूर्य : महाराज महेन्द्रराय की पुत्री! कौन अंजना तू और यहाँ इस भयानक वन मे और इस दशा मे।
अंजना : पर ... आप
प्रतिसूर्य : अंजना? मेरी भान्जी अंजना। मै हू तुम्हारा मामा। हनुरुह द्विप का शासक प्रतिसूर्य। चलो... पुत्री... अपने घर चलो।
बसंत : धन्य हो प्रभो।
अंजना : मामाजी!
बसंत : महाराज! इसपर केतुमती ने कलंक लगाकर
रणक्षेत्रसे अभी लौट नही पाये और इस निर्जन वन मे इस बालक का जन्म हुआ। बस यही हमारी दुःखी गाथा है।
प्रतिसूर्य : समझ गया। चिन्ता न करो पुत्री अब घर चलो। अपना ही घर समझकर सुखपूर्वक रहो।
बसंत : चलिये मामाजी। असाता कर्म अब समाप्त होनेवाला है तभी तो मामाजी का अकस्मात ही आगमन हुआ है।
प्रतिसूर्य : चलो बेटी। विमानमें बैठो। कैसे सुन्दर बालक को जन्म दिया है तुमने। जुगजुग जिओ बेटा। अपने माता पिता का नाम उज्ज्वल करो।
अंजना : चलिए मामाजी।
(विमान जा रहा है।)
अंजना : (चीखकर) ओह! हाय मेरा लाल! बचाओ बचाओ मामाजी।
प्रतिसूर्य : घबराओ नही पुत्री धैर्य से काम लो अभी विमान उतारता हूँ। आश्चर्य महान आश्चर्य चलते विमान मे से गिरा बालक और जिवित? वाह रे भाग्य! जिस शिलापर गिरा उसके खण्ड-२ हो गये और इसे तनिक भी चोट नही आयी। निश्चय ही यह बालक चरमशरीरी है। महापुरुष है। अंजना लो बेटी! यह रहा तेरा लाला।
अंजना : धन्य हो प्रभो।
प्रतिसूर्य : बेटी, यह बालक निश्चितही वज्रशरीरी है।
बसंत : आ मेरे लाल कही नही नजर ना लग जाए।
प्रतिसूर्य : एक बात कहू बेटी? आज से इसका नाम बजरंगी रखता हू।
अंजना : जैसी आपकी इच्छा मामाजी।
बसंत : अब शीघ्र चलिए राजना।
प्रतिसूर्य : चलो बेटी।
दृश्य १७
पवन : अरे अंजना। कहां हो तुम? चली गई-२ मुझे छोडकर। इस भयानक वनमे कहां गयी तुम? कही वन्यप्राणीने उसे खा तो नही लिया? नही-२। अंजना-२। सितारो तुम बताओ क्या अंजना आई थी? चंद्रमा तुम बताओ क्या अंजना यहां से आयी थी? नही-२। पर्वतराज तुम तो बताओ कहां गयी मेरी अंजना? कोई तो बताओ। हँसो-२ सब मुझपर हँसो। कोई नही बताएगा। नही बताएगा ना? अंजना कहां गयी तुम? अंजना-२...।
दृश्य १८
अंजना : अब क्या होगा भगवान! स्वामी का अभी तक कुछ पता नही चला। आपको मेरे कारण कितने कष्ट झेलने पडे। मेरे लिए ना तो इस बजरंगी के लिये तो, आओ स्वामी। आ जाओ नाथ आ जाओ क्या नाम है बजरंगी-३।
बसंत : अंजना क्या तुम बजरंगी की रट लगायी हो?
अंजना : क्या करूं सखी? मेरा मन विवश हो जाता है।
बसंत : मै इसे महाराज की राज्य... राजसभा मे ले गयी थी। राज्यज्योतिषीने क्या बताया सुनोगी?
अंजना : हां हां जल्दी सुनाओ।
बसंत : यही की यह बालक कामदेव का अवतार है, तद्भव मोक्षगामी है, पराक्रमी और तेजस्वी
होगा, विद्धान और परोपकारी भी होगा। और इसका दूसरा नाम हनुमान रखा उन्होने
अंजना : हनुमान !
बसंत : इसका और पिता का जल्दी ही मिलन होगा।
अंजना : काश-२ यह सब सच हो। धन्य हो प्रभो। सहायता करो भगवान।
प्रतिसूर्य : पवन का पता चल गया बेटी। अभी-२ समाचार मिला है। महाराज प्रल्हाद और महेन्द्रजी भी खोजने निकले है।
अंजना : तो फिर हम भी क्यो न चले राजन्।
प्रतिसूर्य : चलो-२। शिघ्रता करो बेटी।
दृश्य १९
पवन : अब कोई नही ला सकता अंजना को। अंजना मै जिंदा नही रह सकता। तू चली गयी ना ! संसार से। मे भी बिदा लेता हू। ठहर-२ अंजना मै आता हू तेरे पास।
प्रहस्त : ठहरो पवन यह क्या कर रहे हो?
केतुमती : मुझे माफ कर-दो बेटा।
प्रहलाद : लौट चलो पवन लौट चलो।
महेन्द्र : हम अंजना को ढुंढ लेंगे।
पवन : छोड दो मुझे। सब दूर हट जाओ। मुझे मेरी अंजना के पास जाने दो।
प्रहस्त : होश मे आओ पवन। अंजना जिवित है
पवन : क्या वह जिवित है? कहां है अंजना?
होगा, विद्धान और परोपकारी भी होगा। और इसका दूसरा नाम हनुमान रखा उन्होने
अंजना : हनुमान !
बसंत : इसका और पिता का जल्दी ही मिलन होगा।
अंजना : काश-२ यह सब सच हो। धन्य हो प्रभो। सहायता करो भगवान।
प्रतिसूर्य : पवन का पता चल गया बेटी। अभी-२ समाचार मिला है। महाराज प्रल्हाद और महेन्द्रजी भी खोजने निकले है।
अंजना : तो फिर हम भी क्यो न चले राजन्।
प्रतिसूर्य : चलो-२। शिघ्रता करो बेटी।
दृश्य १९
पवन : अब कोई नही ला सकता अंजना को। अंजना मै जिंदा नही रह सकता। तू चली गयी ना ! संसार से। मे भी बिदा लेता हू। ठहर-२ अंजना मै आता हू तेरे पास।
प्रहस्त : ठहरो पवन यह क्या कर रहे हो?
केतुमती : मुझे माफ कर-दो बेटा।
प्रहलाद : लौट चलो पवन लौट चलो।
महेन्द्र : हम अंजना को ढुंढ लेंगे।
पवन : छोड दो मुझे। सब दूर हट जाओ। मुझे मेरी अंजना के पास जाने दो।
प्रहस्त : होश मे आओ पवन। अंजना जिवित है
पवन : क्या वह जिवित है? कहां है अंजना?
प्रतिसूर्य : आओ आओ अंजना! बेटी!
पवन : तुम सचमुच अंजना हो? और यह रहा पुत्र हनुमान!
अंजना : हां नाथ आपकी अंजना। और यह पुत्र हनुमान!
प्रतिसूर्य : आजका यह सुखद पुनर्मिलन इस सती की शक्ति और धैर्य से ही हुआ है! भारतीय संस्कृती इसे सदैव याद रखेगी। यह नारी का आदर्श होगा!
(सबकी ताली, अंजना को प्रसन)