Kuch Khas

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भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) और बाहुबली की दीक्षा एवं मोक्ष गाथा

भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) और बाहुबली की दीक्षा एवं मोक्ष गाथा

पात्र परिचय

  • भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ): प्रथम तीर्थंकर (अहिंसा, संयम और सभ्यता के संस्थापक)

  • भगवान बाहुबली: तक्षशिला/पोतनपुर के पराक्रमी राजकुमार (भरत चक्रवर्ती के छोटे भाई)

  • सम्राट भरत: मगध/अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट (बाद में वैराग्य को प्राप्त)

  • देवगण/इन्द्र: स्वर्ग के देवता (जो प्रभु की सेवा में उपस्थित रहते हैं)

  • कथावाचक/साक्षी: कथा के दृश्यों का वर्णन करने वाला

नाटक आरंभ

दृश्य 1: ऋषभदेव का साम्राज्य त्याग और दीक्षा

(दृश्य अयोध्या नगरी के भव्य राजदरबार का है। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) अपने सभी पुत्रों (जिनमें भरत और बाहुबली भी शामिल हैं) को राज्य का दायित्व सौंपने के लिए सभा बुलवाते हैं। उनके चेहरे पर सांसारिक वैभव के प्रति पूर्ण विरक्ति और शांति का भाव है।)

भगवान ऋषभदेव: हे पुत्रों और प्रजायो! मैंने तुम्हें जीने की कला सिखाई—असि (युद्ध/रक्षा), कृषि (खेती), वाणिज्य (व्यापार), विद्या और शिल्प सिखलाकर इस संसार को व्यवस्थित किया। अब मेरे जीवन का असली उद्देश्य अपने भीतर की यात्रा करना और कर्मों के बंधनों को काटना है। मैं इस साम्राज्य का मोह त्यागकर संयम पथ (दीक्षा) ग्रहण करता हूँ।

सम्राट भरत और बाहुबली (एक साथ हाथ जोड़कर, अत्यंत भावुक स्वर में): हे पिताश्री! आपने हमें दुनिया को चलाना सिखाया, धर्म और न्याय का मार्ग दिखाया। यदि आप ही राजपाट छोड़कर संन्यास ले लेंगे, तो हम इस विशाल संसार में कैसे चलेंगे? कृपया हमारे मार्गदर्शन बने रहिए!

भगवान ऋषभदेव: पुत्रो! भौतिक साम्राज्य की सीमाएँ होती हैं, लेकिन आत्मा का साम्राज्य अनंत है। सच्चे सुख की तलाश बाहर नहीं, अपने भीतर करनी पड़ती है। आज से यह राज्य तुम्हारे हाथों में है, और मेरा मार्ग मोक्ष का मार्ग है।

(भगवान ऋषभदेव अपने समस्त आभूषण और राजसी वस्त्र त्यागकर दीक्षा लेते हैं। उनके साथ हजारों राजा और प्रजाजन भी मुनि दीक्षा ग्रहण करते हैं। वे दीक्षा के बाद लंबे समय तक कठोर तपस्या और मौन व्रत में लीन हो जाते हैं।)

दृश्य 2: बाहुबली का मोह त्याग और महान तपस्या

(दृश्य कुछ वर्षों बाद का है। अयोध्या और तक्षशिला के बीच साम्राज्य के अधिकार को लेकर सम्राट भरत और उनके छोटे भाई बाहुबली की सेनाओं के बीच युद्ध की स्थिति बनती है, लेकिन खून-खराबा रोकने के लिए दोनों भाइयों के बीच बिना शस्त्रों का मल्लयुद्ध होता है। बाहुबली युद्ध जीत जाते हैं, लेकिन विजय के तुरंत बाद उन्हें इस नश्वर संसार और अहंकार पर तीव्र ग्लानी होती है।)

भगवान बाहुबली: (अपने उठे हुए हाथों को रोककर, गहरी आत्म-ग्लानी के साथ) छीः! थोड़े से राज्य और ज़मीन के टुकड़े के लिए मैंने अपने ही बड़े भाई के साथ युद्ध किया? यह अहंकार, यह सत्ता का लोभ और यह शरीर—सब कुछ मिट्टी है। इस झूठे साम्राज्य से मुक्ति पाने के लिए मुझे अपनी आत्मा को साधना होगा।

(बाहुबली अपने शरीर के सारे आभूषण और वस्त्र त्यागकर जंगल की ओर प्रस्थान करते हैं और वनों में जाकर 'कायोत्सर्ग' (खड़े रहकर ध्यान करने की मुद्रा) मुद्रा में लीन हो जाते हैं।)

(दृश्य बदलता है: बाहुबली को तपस्या करते हुए महीनों बीत चुके हैं। उनके शरीर की सुधि-बुधि विसृत हो चुकी है। उनके पैरों के चारों ओर सर्पों ने बाउंड्री बना ली है, और शरीर पर वनों की लताएँ (बेलें) लिपट चुकी हैं, फिर भी वे अटल भाव से खड़े हैं।)

दृश्य 3: अहंकार का टूटना और केवलज्ञान की प्राप्ति

(बाहुबली की तपस्या को लंबा समय हो चुका है, लेकिन उनके मन के कोने में अभी भी एक सूक्ष्म अहंकार शेष है कि "मैं मेरे भाई की धरती पर खड़ा हूँ"। इसी वजह से उन्हें केवलज्ञान (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति नहीं हो रही है।)

(तभी उनकी दोनों बहनें—ब्राह्मी और सुंदरी—आकाश मार्ग से या वन में वहाँ पहुँचती हैं और बाहुबली को उनकी यह स्थिति समझाती हैं।)

ब्राह्मी और सुंदरी (हाथ जोड़कर): हे भाई बाहुबली! आप महायोगी बनकर यहां खड़े तो हैं, लेकिन आपके मन में अभी भी यह सूक्ष्म भाव है कि "आप दूसरे की भूमि पर खड़े हैं"। जब तक यह हाथी के मस्तक पर सवार होकर अहंकार का भाव नहीं टूटेगा, तब तक मुक्ति का द्वार नहीं खुलेगा! हाथी से नीचे उतरिए और अपने मन के अभिमान को पूरी तरह त्याग दीजिए।

भगवान बाहुबली: (अपने अंतर्मन में झांकते हुए, अचानक अपनी भूल का अहसास करते हैं) अरे! यह मैं क्या कर रहा हूँ? मैंने सब कुछ छोड़ा, फिर भी मन का यह सूक्ष्म अहंकार नहीं छूटा?

(बाहुबली जैसे ही अपने मन से उस अहंकार और पराई भूमि के विचार को पूरी तरह त्यागते हैं, उसी क्षण उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हो जाती है!)

(मंच पर तेज अलौकिक प्रकाश चमकता है। देवगण स्वर्ग से उतरकर आते हैं और पुष्पों की वर्षा करते हैं।)

देवगण और आकाशवाणी: धन्य हैं भगवान बाहुबली! जिन्होंने काया और मन दोनों के बंधनों को जीत लिया है। आज उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ है! उनकी यह महान तपस्या और अहिंसा का संदेश युगों-युगों तक इस ब्रह्मांड में गूंजता रहेगा।

दृश्य 4: भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) का मोक्ष (निर्वाण)

(दृश्य कैलाश पर्वत का है। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने अपनी लंबी साधना, उपवास और विहार के पश्चात कर्मों के समस्त बंधनों को पूरी तरह काट दिया है।)

भगवान ऋषभदेव: (अंतिम योग साधना में लीन होकर) हे संसार के जीवों! मैंने राग और द्वेष को पूरी तरह भस्म कर दिया है। कर्मों की अंतिम शृंखला भी टूट चुकी है। अब यह आत्मा भौतिक शरीर के बंधन से मुक्त होकर अनंत सुख और शाश्वत शांति (मोक्ष) को प्राप्त हो रही है।

(तेज दिव्य प्रकाश के साथ भगवान ऋषभदेव को अष्ट कर्मों का नाश कर मोक्ष (निर्वाण) की प्राप्ति होती है। समस्त देवी-देवता, मुनिगण और प्रजाजन कैलाश पर्वत पर आकर उनकी वंदना करते हैं और 'जय जिनेंद्र' के जयकारे गूंजते हैं।)

(पर्दा गिरता है।) \rightarrow जय जिनेंद्र \leftarrow