प्रायश्चित (चंदनबाला का जीवन चरित्र - संपूर्ण नाटक)
पात्र परिचय
राजा दधिवाहन: चंपापुर नगरी के राजा
रानी धर्मधरणी: चंपापुर की महारानी
चंदनबाला (चंदना): राजा दधिवाहन और रानी धर्मधरणी की पुत्री (बाद में जैन साध्वी)
सेनापति (कौशाम्बी): शतानीक राजा का सेनापति
शतानीक: कौशाम्बी नगर का राजा
विद्याधर: जंगल में मिलने वाला दुष्ट व्यक्ति
वृद्धा (वैश्या): कौशाम्बी की एक महिला जो चंदना को बहलाकर ले जाती है
सेठ वृषभदास: कौशाम्बी नगर के दयालु सेठ (महावीर के भक्त)
सेठानी: सेठ वृषभदास की पत्नी
भगवान महावीर: जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर
अन्य पात्र: प्रहरी, सखियाँ, दासी, नाई, लुहार और कथावाचक/साक्षी
नाटक आरंभ
(भूमिका)
चंपापुर नगरी का राजा दधिवाहन, जिसकी रानी धर्मधरणी के अति सुंदर होने के कारण राजा दधिवाहन को चाल में फंसाकर कौशाम्बी नगर के राजा शतानीक का सेनापति रानी धर्मधरणी को छल-बल से वन में ले गया। तब रानी ने अपने प्राण छोड़ दिये पर शील को नहीं छोड़ा। इधर बेटी चंदनबाला भी अकेली रह जाती है।
(पहला दृश्य)
(राजा दधिवाहन व रानी धर्मधरणी सिंहासन पर बैठे हैं।)
सेनापति (प्रहरी से) : प्रहरी! महाराज से कहो शतानीक राजा का सेनापति आपसे मिलना चाहता है।
प्रहरी : महाराज की जय हो। महाराज शतानीक राजा का सेनापति आपसे अतिशीघ्र मिलना चाहता है।
महाराज : उन्हें शीघ्रता से अंदर भेज दीजिये।
सेनापति : महाराज दधिवाहन की जय हो। महाराज, एक बहुत ही अशुभ समाचार है कि पड़ोसी राजा ने आपके राज्य पर हमला कर दिया है।
महाराज : सेनापतिजी, आप ये क्या कह रहे हो? जल्दी से युद्ध में चलने की तैयारी करो।
(राजा अपनी सेना के साथ युद्ध करने के लिए जाता है और इधर महारानी से आकर सेनापति कहता है)
सेनापति : महारानीजी, गजब हो गया। युद्धस्थल पर महाराज की मृत्यु हो गई है। यह सुनकर हमें बड़ा दुःख है।
महारानी : हे भगवान! यह क्या हो गया? (रोती है, फिर संभलकर पूछती है...) सेनापति! क्या यह सच है कि महाराज का निधन हो गया है?
सेनापति : बेटी तुमने ये क्या है विचारा? मुँह करती हो क्यों मेरा काला? मैं तो रक्षक हूँ बेटी तुम्हारा साथ आया हूँ बनकर सहारा नींद ने मुझ पे जादू था डारा सो गया सारे दिन का था हारा कोई आया है दुश्मन तुम्हारा? तेरी माता को जिसने है मारा
चंदना : हाय माता! तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गई! छोड़ गई माता, हाय! मुझे अकेला छोड़ गई। तोड़ गई माता, हाय! मुझसे नाता तोड़ गई।
(चंदनबाला का पुनः राजमहल में जाना)
(दूसरा दृश्य)
(इस प्रकार से माँ तो बेटी को छोड़कर चली गई, पिता के द्वारा दी गईं पुस्तकों को राजमहल में अकेली पढ़ती है।)
(चंदनबाला का सिंहासन पर बैठना और दो सखियों का चर्चा करना)
पहली सखी : अरे राजकुमारी, क्या पढ़ रही हो?
राजकुमारी : बस पिताजी के द्वारा दी हुई कुछ पुस्तकों को पढ़ रही हूँ।
दूसरी सखी : (हँसते हुए कहना) वाह राजकुमारी! वाह! लगता है तुम भी साहसी बन जाओगी।
पहली सखी : नहीं-नहीं, हमारी राजकुमारी साहसी नहीं बनेगी। इसको तो बहुत बड़े राजघराने में ब्याह कराएँगे और हाँ, अभी तो हमारी राजकुमारी शादी के योग्य भी कहाँ हुई है ? अभी तो उसके खेलने-कूदने के दिन हैं। चलो राजकुमारी, कुछ देर के लिए बाग में झूला झूलेंगे।
सखियों का गाना : हो झूले-झूले ये चंदन बाला झूले चंदन बाला झूले सखियाँ झुलावे। राजमहल में झूले, बाग-बगीचा में झूले। हो झूले…. हाँ, देखो देखो ये कुशलगढ़ वाले देखो आओ-आओ तुम सब मिलकर के आओ सब मिलकर के आओ पलना झुलाओ हो झूले…. गाओ-गाओ झूले का गाना गाओ नाचो-नाचो तुम सब मिलकर नाचो
(गाना समाप्त होते ही बादल छाना, बिजली की आवाज, शाम होने का समय)
चंदनबाला : अरे सखी, देखो। आकाश में कैसे काले-काले बादल छाए हैं ? लगता है पानी बहुत तेजी से बरसेंगे। बिजलियाँ चमक रही हैं। घना अंधकार है। बहुत डर लग रहा है।
पहली सखी : चलूँ, अंधकार से डर लग रहा है। भाग जाऊँ।
दूसरी सखी : अरे! अब तो मैं भाग चलूँ। मेरी सखी भी भाग गई।
(तीसरा दृश्य)
(इतने में विद्याधर का चंदनबाला के ऊपर दृष्टि पड़ना)
विद्याधर : अरे! इतनी सुंदर युवती तो मैंने आज तक नहीं देखी। इस सुंदर कन्या का अपहरण करना चाहिए। अनेक पत्नियां होने के बावजूद भी मैं जब तक इस कन्या का अपहरण नहीं कर लूँ, तब तक मेरा सारा वैभव तुच्छ है। मेरे पास धन की कोई कमी नहीं है। जमीन-जायदाद की कोई कमी नहीं है। सारा सुख होने के बावजूद भी जब तक यह कन्या का अपहरण नहीं कर लूँ, चैन की साँस नहीं लूँगा। कितनी सुंदर कन्या है? आहा...ऽऽ हा...ऽऽ हा...ऽऽ (हँसना)
चंदनबाला : अरे जल्दी भागूँ, ये तो कोई पापी मनुष्य प्रतीत होता है। भागूँ...ऽऽ
(विद्याधर चंदनबाला को पकड़ने जाता है।)
चंदनबाला : दुष्ट! छोड़ दे मुझे। हे पापी नराधम! छोड़ दे मुझे। तुझे मालूम नहीं मैं राजा चेटक की पुत्री हूँ। तुझे कठोर दंड दिया जाएगा। तुझे प्रभु कभी माफ नहीं करेगा।
विद्याधर : सुनो! रूप की रानी। तुम यहीं रुकना। यहाँ भयानक जंगल है। मैं तुम्हारे लिए अभी महल की व्यवस्था करके आता हूँ।
चंदना : क्या कहा? रूप की रानी? अरे पापी! तू मुझे अंगुली भी लगाएगा तो तेरा शरीर जलकर भस्म हो जाएगा।
विद्याधर : ठीक है, मैं चलूँ। यहाँ तो कोई गाँव भी नजर नहीं आता। आसपास में कोई व्यक्ति भी नजर नहीं आ रहा है। यहाँ से भागकर कहाँ जाओगी? मैं अभी जाकर वापस लौटता हूँ।
(विद्याधर का जाना)
चंदनबाला : अच्छा हुआ, पापी चला गया। भगवान! ये पापी वापस कभी नहीं आए। यह दुष्ट पापी आए इससे पहले ही मैं यहाँ से दूर चली जाना चाहती हूँ।
(एक वृक्ष के नीचे बैठना और उदासी से सिर पर हाथ रखकर बोलना) - हे भगवान! भूख-प्यास से मेरा बुरा हाल हो गया है। कोई नजर भी नहीं आ रहा है। कोई गाँव भी नहीं दिख रहा है। चलो, कुछ आगे चलकर देखूँ। कोई दिख जाए अथवा कोई सहारा मिल जाए तो मुझे दुष्ट पापी से छुटकारा मिल जाए।
(इसी बीच एक वृद्धा माँ (वैश्या) का आना)
वृद्धा : क्यों बेटी? इस जंगल में तुम कहाँ से आई हो? ऐसी बुरी हालत किसने की है तुम्हारी? तुम्हारा गाँव कौनसा है? तुम्हारा नाम क्या है? बोलो बेटी, बोलो?
चंदना : माँ! मुझे यह बता यह कौनसा नगर है ? यहाँ कोई धर्मशाला है या नहीं।
वृद्धा : बेटी, ये कौशाम्बी नगर है। अत्यंत सुंदर है। क्या तुम्हें नहीं मालूम है? फिर तुम मुझे माँ कह रही हो। तुम्हें धर्मशाला की क्या जरूरत है ? चल बेटी चल, मेरे साथ चल!
(चंदना वृद्धा के साथ चलती है। वृद्धा का पूरा परिचय पूछना, चंदन का बताना)
चंदना : माँ, मैं राजा चेटक की पुत्री हूँ। चेतना की बहन हूँ। माँ...! मेरी कथा बहुत बड़ी है। मेरे जीवन में कई मोड़ आ चुके हैं। मैं बहुत दुःखी हूँ। मेरा नाम चंदना है।
(चंदनबाला का वृद्धा के घर पहुँचना)
वृद्धा : देख बेटी, यह तेरे रहने का कमरा है। यहाँ सब सुविधा है। किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है। आराम से रहो बेटी चंदना।
(कुछ दिनों तक चंदना का वहाँ रहना, फिर वृद्धा का कहना)
वृद्धा : देखो चंदनबाला, मैं अब तुमसे कुछ छिपाना नहीं चाहती हूँ। मैं गणिका हूँ। अब मैं तुझे जो कराऊँगी वह करना पड़ेगा। तुझे नाचना पड़ेगा व गाना पड़ेगा। यदि तू मेरा कहना नहीं मानेगी तो मैं तुझे रूप के बाजार में बेच दूँगी। क्योंकि तुम रूप की रानी हो चंदना। सुन लिया कान खुलकर?
चंदना : नहीं माँ, नहीं। मैं ऐसा काम नहीं कर सकती हूँ। चाहे मेरे प्राण निकल जाएँ, नारी का शील ही धर्म है। उसकी वही सुंदरता है। ऐसा पाप कार्य मैं नहीं करूँगी। माँ...ऽ मुझे क्षमा करो।
वैश्या : मेरी बात मान ले चुड़ैला। तेरी ये धर्म और आदर्श की बातें मेरे सामने नहीं चलेगी। अब तुझे मेरे हाथों से कोई नहीं बचा सकता है। तू मुझे जिन्दगी भर याद करती रहेगी।
चंदना : नहीं माँ, नहीं। मैं ऐसा कार्य नहीं कर सकती हूँ। तेरे हाथ जोड़ती हूँ माँ। तेरे पाँव पड़ती हूँ। ऐसा गंदा कार्य मैं नहीं करूँगी। माँ के अवतार को क्यों बदनाम करती हो? माँ...! मैं हाथ जोड़ती हूँ।
गाना : सुन सुन मैया तेरे हाथ जोड़ती हूँ. हाथ जोड़ती हूँ तेरे पाँव पड़ती हूँ. सुन मैया... 왜 बेचे तू रूप के हाट? क्यों बेचे तू वैश्या बाजार? सुन मैया...
(चौथा दृश्य)
वैश्या : (चंदना को रूप के हाट में बेचना) सुनो सुनो, इस सुंदरी की कीमत २०० स्वर्ण मुद्रा है.
(चार-पाँच लोग उसकी कीमत लगाते हैं।)
(कौशाम्बी नगर का सेठ वृषभदास देखकर सोचते हैं- ऐसी सुंदर व पवित्र कन्या मैंने आज तक नहीं देखी। ये कोई भले घर की लड़की संकट में पड़ी हुई लगती है। इसको इस जगह से उद्धार कराना चाहिए।)
सेठ : सुनो, माँ जी! इसकी कीमत क्या लोगी? वैश्या : पाँच हजार स्वर्ण मुद्राएँ। यदि खरीदी करना है तो जल्दी करो। समय बर्बाद मत करो। ऐसी रूप की रानी नहीं मिलने वाली है तुझे। सेठजी : मैं तुझे सात हजार स्वर्ण मुद्रा देता हूँ, पर तू जल्दी इसे छोड़ दे।
वैश्या : तो आओ, धन दो और इसे जल्दी ले जाओ।
सेठजी : आओ बेटी आओ, मेरे साथ आओ। बेटी तुम्हारा नाम क्या है? तुम इस पापी के हाथ कैसे पड़ गईं? बताओ बेटी।
चंदना : क्या, आपने मुझे बेटी कहा?
सेठजी : हाँ, आज से तुम मेरी पुत्री के समान हो। अब बताओ तुम्हारा नाम क्या है?
चंदना : पिताजी, मेरा नाम चंदना है। मेरी कहानी लंबी है। फिर कभी बताऊँगी।
(चंदना सोचती है इस भद्र पुरुष ने इतनी सारी स्वर्ण मुद्रा देकर क्यों खरीदा है?)
सेठ : क्या सोच रही हो? अब तुम्हारे बुरे दिन समाप्त हो गए हैं।
चंदना : सच पिताजी?
सेठजी : बेटी, मैं महात्मा महावीर का परम भक्त हूँ। जो महावीर सत्य-अहिंसा आदि का उपदेश देते हैं।
(चर्चा करते हुए सेठ वृषभदास का चंदना को अपने महल में ले जाना)
(पाँचवाँ दृश्य)
सेठ : सेठानी देखो, आपके कोई संतान नहीं है। मैं आपका मन बहलाने के लिए एक पुत्री लाया हूँ।
सेठानी : सेठजी, क्या कहा? पुत्री? घर में दास-दासियों की क्या कमी थी जो एक और उठाकर ले आए ?
सेठ : दासी नहीं, इसे बेटी बनाकर लाया हूँ।
(चंदनबाला के दिन सुख से व्यतीत होने लगे। एक दिन सेठजी कहीं से लौटकर आए।)
सेठ : बेटी चंदना, जाओ जरा किसी दासी को बुलाओ। मेरे पैर काफी दर्द कर रहे हैं। पैर धोना है।
(तब दासी का चुपके से देखना)
चंदना : पिताजी, उसमें दासी को क्यों बुलाना? मैं भी आपकी ही पुत्री हूँ। मैं अभी जल लेकर आती हूँ।
(जल का लाना व पैर धोना और पैर के ऊपर चंदना के बाल गिरना)
सेठजी का चंदन बाला के बाल सहराना : वाह! क्या सुंदर बाल हैं बेटी तेरे? कितने काले और घने बाल हैं ?
(सेठ की गोदी में बालों का गिरना। दासी का देखना और सेठानी से जाकर बात कहना)
दासी : सेठानीजी, चंदनबाला सेठजी की पुत्री नहीं है। मैंने अपने आँखों से देखा है कि सेठजी चंदना के बालों की प्रशंसा कर रहे थे। छिः...… छिः...… राम-राम...
सेठानी : दुष्टा, दूर हट जा। क्या मैं अपने पति को नहीं जानती? वे धर्मात्मा और परम पवित्र हैं। मेरे कान बहरे क्यों नहीं हो गए मेरे पति की निंदा सुनने से पहले।
दासी : मुझे क्या मालूम तुम इतना गुस्सा करोगी। मैं तो तुम्हारे भलै की कहती हूँ। क्या आँखों देखी बात भी कभी झूठी हो सकती है? यदि आपको विश्वास न हो तो स्वयं ही चलकर देख लीजिए।
(तभी सेठानी के मन में शंका होने लगी। कहीं चंदनबाला से सेठजी विवाह न कर लें। इसे घर से निकाल देना चाहिए।)
(एक दिन सेठ वृषभदास को व्यापार के लिए बाहर जाना पड़ा)
सेठ : मैं व्यापारिक कार्य के लिए कुछ दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ। तुम बेटी चंदना का पूरी तरह ख्याल रखना।
सेठानी : अच्छा सेठजी।
(सेठजी चले जाते हैं।)
सेठानी : बड़ी पुत्री बनती है तू! सेठ की पुत्री नहीं मेरे भवन में मेरी सौत बनकर आई है। सौत...ऽ सौत...ऽ सौत...ऽ
चंदन : (कान पर हाथ रखते हुए) नहीं-नहीं माँ! आप ये क्या कह रही हो? माँ...! माँ...! तुम विश्वास करो। सेठजी मेरे पिता तुल्य हैं। आप मेरी माँ की ममता हो (पैर पकड़कर)
गाना - मैं तेरी छोटी सी बेटी, समझ ना मुझको सौतन। सेट तेरे हैं तेरे ही रहेंगे, बेटी बने न सौतन।।
सेठानी : मैं कैसे विश्वास करूँ कि सेठ तुझे बेटी बनाकर लाएँ हैं? अरे मैंने अपनी आँखों से देखा है। कि सेठजी तेरे इसी बालों को सहला रहे थे। अब देख, मैं इन्हीं बालों को इसी वक्त कटवा देती हूँ नाई को बुलाकर। दासीऽऽ... ओ दासीऽऽ...
दासी : क्या है सेठानीजी? अभी आई...! क्या हो गया?
सेठानी : हुआ क्या? तेरी बात बिल्कुल सत्य है। जा, अभी नाई को बुलाकर ला।
दासी : जी सेठानी, अभी बुलाकर लाई।
सेठानी : नाई, इसके बाल जल्दी से काट दो।
नाई : कितने सुंदर बाल हैं ? मैं ऐसे बाल नहीं काट सकता हूँ।
सेठानी : क्या कहा तूने? मेरी आज्ञा का पालन कर।
नाई : जी सेठानीजी।
चंदना : माँ, तुम मुझे क्या समझती हो? तुम ये क्या कर रही हो? मैं पिताजी के धार्मिक स्वभाव के कारण यहाँ रुक गई। मैं महाराजा चेटक की पुत्री और महारानी चेतना की बहन हूँ।
सेठानी : झूठी बातें मत बना। महाराज की पुत्री होती तो रूप के हाट में वैश्य के हाथ नहीं बिकती। दासी जाओ, चंदना को तलघर में ले जाकर बेड़ियों से बाँध दो।
(चंदना के बाल कट चुके हैं। सेठानी ने दासियों के साथ चंदनबाला को बेड़ियों से बाँधकर तलघर में डाल दिया। साथ ही पास में खाने के लिए एक बर्तन में उड़द की दाल छिलके वाली और पानी रख दिया है।)
चंदना : मेरे दुर्भाग्य का अभी भी अंत नहीं है। हे प्रभु! मैं प्रतिज्ञा करती हूँ जब तक यह उपसर्ग नहीं टलेगा, मैं अन्न जल ग्रहण नहीं करूँगी।
(तभी सेठ वृषभदास का यात्रा से पुनः लौटना और देखते हैं कि घर में अजीब सा वातावरण छाया है। दासियाँ बहुत भयभीत हैं।)
सेठ : क्या हो गया इस घर को? कैसी खामोशी छाई है? दासी, सेठानी कहाँ है?
दासी : सेठानी मंदिर गई हैं।
सेठजी : चंदनबाला कहाँ गई है?
दासी : मुझे नहीं पता सेठजी। मैं तो घर का काम कर रही थी।
सेठजी (दूसरी दासी से) : तू बता दासी, चंदना कहाँ है? नहीं तो सभी को नौकरी से निकाल दूंगा।
दासी (घबराकर) : तलघर की ओर इशारा करती है। सेठजी, चंदना को तो सेठानी ने तीन दिन से कुछ खाने-पीने को नहीं दिया। और उसे तलघर में बंद कर दिया है।
(सेठजी वहाँ पहुँचते हैं जहाँ चंदना थी) : बेटी, तू चिंता मत कर। मैं लुहार को बुलाकर तेरी बेड़ियाँ कटवा दूँगा।
(सेठजी लुहार को बुलाने चले जाते हैं। तभी मार्ग में मुनि महावीर आहार के लिए आ रहे थे। महावीर की प्रतिज्ञा थी कि मैं ऐसी कुमारी के हाथ से आहार लूँगा जिसके हाथ-पैरों में बेड़ियाँ हो, आँखों में आँसू हो, शरीर पर एक वस्त्र धारण किये हो तथा जिसके पास उड़द की दाल छिलके वाली और पानी रखा हो, जिसका सिर मुंडा हुआ हो।)
चंदना : अरे! महावीर की जय जयकार सुनाई दे रही है। लगता है महावीर इसी ओर आ रहे हैं। मैं भाग्यवान हूँ, जो प्रभु के दर्शन कर रही हूँ। यदि मैं इनको आहार देती हूँ तो मेरे जनम-जनम के पाप कट जाएँगे। परंतु मैं आहार कैसे दे सकती हूँ? (उड़द के छिलके और पानी को देखते हुए)
(तभी मुनि महावीर तलघर के समीप आते हैं। तब चंदना बोलती है) : हे स्वामी, नमोस्तु! नमोस्तु! नमोस्तु! अत्र, अत्र! तिष्ठ! तिष्ठ! आहार जल शुद्ध है।
जैसे ही महावीर नजदीक आते हैं, तब चंदना के चेहरे पर कुछ मुस्कान आ जाती है। पुनः महावीर लौटने लगते हैं। चंदना के मुख से जोर से सिसकी निकलती है, और जोर-जोर से रोने लगी।
गाना - आओ मेरे द्वार वीर प्रभु वीर प्रभु महावीर प्रभु। दुखियारी चंदन बाला को आज बँधा दो धीर प्रभुजी-२।। हाथों बेड़ी पैरों बेड़ी, खाने को मिलती काली दाल प्रभु! आओ मेरे द्वार...
(जैसे ही चंदना के आँखों में आँसू की लहर आती है, महावीर के पैर वहीं थम जाते हैं। लौट आते हैं। चंदना का आहार देना। सारे बंधन अपने आप खुलना। कई तरह का आहार देना)
पुनः गाना -
महावीर आज मेरी कुटिया में आए हैं।
चलते-फिरते तीरथ पाए हैं महावीर ।।
तभी सेठ लुहार को लेकर पहुँचते हैं। देखते हैं कि प्रभु महावीर मेरे आँगन में आहार कर रहे हैं।
सेठजी : अरे बेटी! मैं यह क्या देख रहा हूँ ? मैं धन्य हो गया बेटी। पावन हो गया। प्रभु मेरे द्वार पधारे हैं। धन्य हो बेटी, धन्य हो।
(महावीर का आहार करके लौटना)
सेठजी : बेटी चंदना, घर चलो।
चंदना : नहीं पिताजी! अब मैं घर नहीं। मैं महावीर की शरण में जाकर दीक्षा धारण करूँगी।
सेठानी : बेटी! मुझे माफ कर दो। मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है। मुझे माफ कर दो।
चंदना : माँ! तुम तो मेरी माँ हो। बस, मैंने प्रतिज्ञा की है कि अब मैं दीक्षा धारण कर मोक्ष मार्ग पर चल स्वयं की आतम का कल्याण करूँगी।
!!बोलो महावीर स्वामी की जय!!