दृश्य - 1: धार्मिक चर्चा
इन्द्र - हे प्रभो! हमें विदेह क्षेत्र में तीर्थंकरों के दर्शनों के लिये चलना चाहिये.
सौधर्मेन्द्र - हाँ, विदेह में सीमंधर आदि बीस तीर्थंकर साक्षात विराजमान हैं.
इन्द्र - हाँ, महाराज! उन महाकल्याणकारी तीर्थंकर भगवंतों के दर्शन से हमारा जीवन पावन ही जाएगा.
सौधर्मेन्द्र - हाँ, इन्द्र! उनके दर्शन मात्र से ही हमारा रोम-रोम पुलकित हो जायेगा, चलो हमें शीघ्र ही उनके दर्शन को चलना है.
(माईक चालू करनी - वॉइस बजाना)
(इस धर्म चर्चा का दौर चल रहा है कि अचानक चारों ओर से एक अद्भुत प्रकाश छा जाता है। देव दुंदुभि एवं वाद्यंत्र बजने लगते हैं। सिंहासन कंपायमान होने लगता है।)
सौधर्मेन्द्र - अरे, ये मेरा सिंहासन क्यों कंपायमान हो रहा है, और ये वाद्यंत्र का अपने आप बजना और दिव्य प्रकाश का उदयमय होना किस कारण से हो रहा है, चलो मैं अपना अवधिज्ञान लगा के देखता हूँ.
(अवधिज्ञान से जानना)
सौधर्मेन्द्र - अहो! बड़ी खुशी की बात है कि भरतक्षेत्र में काशी वाराणसी नगरी में भव्य जीवों को विकसित करने वाले तेईसवें तीर्थंकर का अवतार हो चुका है.
(सिंहासन से उतरकर) इस तेईसवें तीर्थंकर को मेरा नमस्कार... नमस्कार... !
इन्द्र! तीर्थंकर का जन्मोत्सव मनाने के लिये ऐरावत हाथी तैयार करो। हमें शीघ्र ही भरत क्षेत्र की ओर प्रस्थान करेंगे.
दृश्य - 2
(स्वर्ग से ऐरावत हाथी पर सौधर्म इन्द्र आदि इन्द्रों का आगमन होता है, और नगरी में आकर सौधर्म इन्द्र बाल तीर्थंकर को बधाई देते हैं, और शची इन्द्राणी को आदेश देते हैं।)
सौधर्म इन्द्र - राजन्, इस पावन अवसर पर आपको खूब-खूब बड़ाई हो, (और शची इन्द्राणी को आदेश देते हुए) हे देवी, तू प्रस्तुतिगृह जाकर बाल तीर्थंकर को लेकर आओ, मेरे नेत्र इनके दर्शन के लिए तरस रहे हैं, ध्यान रहे माता को कोई कष्ट न हो.
(शची इन्द्राणी महल में जाकर ओट्याप्रेमपूर्वक पार्श्वकुमार तथा वामादेवी के दर्शन करना) तीन प्रदक्षिणा मिलाकर
(इन्द्राणी (शची)) - हे माता! आप मंगलरूप हैं, पुण्यवान हैं, मक्षनदेवी (मरुदेवी) की और तीन लोक का कल्याण करने वाली हैं। धन्य है माता! तु धन्य हैं! आज तीर्थंकर जैसे बालक को जन्म देकर आप महापावन हो गई हैं.
(और इन्द्राणी माता को मोहिमयी निंद में सुलाकर बाल तीर्थंकर अंगाई माता रूपी प्रस्त्भा (सुवर्णप्रभा) रखकर बाल तीर्थंकर को लेकर सौधर्म इन्द्र के पास आती है।)
सौधर्म इन्द्र - शची इन्द्राणी का स्वागत.
(और शची इन्द्राणी बाल तीर्थंकर को सौधर्म इन्द्र के हाथ में देते हैं, अपने हाथ में बाल तीर्थंकर आते ही उनके रूप को निहारने के लिए विक्रिया रिद्धी से अपने हजार आँख बनाकर तीर्थंकर के दर्शन करते हैं, फिर भी उनको उन्हें तृप्ति नहीं मिलती।)
सौधर्म इन्द्र - हे प्रभो! आप तीन लोक को जानने वाले, तीन ज्ञान के धारी हो, आपके चरण कमलों में मेरा सादर नमन हो.
(और तीर्थंकर को ऐरावत हाथी पर बिठाकर पाडुकशिला को और प्रस्थान कराते हैं।)
दृश्य - 3: पाडुकशिला
दृश्य - 4
[पारस कुमार द्वारा अपनी बाल सेना के साथ वन कीड़ा करने के लिए नगर से बाहर जाना। वहाँ जाकर अपने दोस्तों के साथ आँख मिचोली खेलते। फिर घूमते-घूमते खेलते एक महिपाल तापस वृक्ष पर पंचाग्नी तप कर रहा था। वहाँ पहुँचे और नजदीक जाकर बिना नमस्कार किये खड़े हो गये। वह देखकर महिपाल तापस बिना सोचे क्रोध करने लगा। और कहने लगा मैं कुलीन हूँ। उच्च कुले में उत्पन्न हुआ हूँ। तपो वृद्ध हूँ, तप के द्वारा बड़ा हूँ। और इसके माता का पिता भी हूँ। फिर भी अज्ञानी राजकुमार मुझे बिना नमस्कार किये यहाँ खड़ा है।]
कमठ का उपसर्ग - दृश्य-5
कमठ - बुझती हुई अग्नि में लकड़ी डालकर टपन करता हुआ
पार्श्वकुमार - हे भंते, आप क्या कर रहे हो.
कमठ - दिखता नहीं अंधे हो, में पंचाग्नी तप तप रहा हूँ.
पार्श्वकुमार - यह तपस्या नहीं, जीवों की हिंसा का साधन है.
कमठ - कमठ बालक मुझे सिखा रहा है, जानता नहीं, में 700 तपस्वीयों का गुरु हूँ.
सुभम - में गुरु हूँ, तपस्वी हूँ, ये समझकर इस कुतप से पापाश्रय कर रहे हैं, इस अज्ञान तपे से इस लोक में, परलोक में दुःख प्राप्त होगा.
कमठ - अरे, में प्रभु हूँ, तू मेरा क्या कर सकता है, इस प्रकार की अवज्ञा मेरे तप का महत्त्व जाने बिना तू ऐसा क्यों बक रहा है। पंचाग्नी के मध्य में बैठना, वायु भक्षण का बीवीस रहना, ऊपर भुजा उठाकर चीर काल तक एक ही पैर पर खड़ा रहना और उपवास कर अपने आप गीरे हुए पत्ते आदि से पारणा करना इस प्रकार शरीर को शतोपीड करनेवाला तपस्या का बहुत ही कठिन है। इस तपस्या से बढ़कर विश्व में दूसरा तपशरण नहीं हो सकता.
सुभम - हसने क्षुर, न तो आपको में गुरु मानता हूँ, न में आपका तिरस्कार करता हूँ, किन्तु जो पंच परमेष्ठी को छोड़कर मिथ्यात्व एवं कोधादिताः कषायों से सहित: होकर जीवों की हिंसा में मन, वचन, काय और कृतकारित अनुमोदना से प्रवृत्त करते हैं, और इस तरह के अनास से कहे हुए आगम का आश्रय मिलकर निर्वाण की प्राप्ति करते हुए मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं जो उन की तरह, इस्टा लाभ भेदन कर धो प्राप्त करने में समामु है, लाभ प्राप्ति को इतिहास धान के छिलके को धुटने के समान है.
ज्ञानहीन मनुष्य का कार्यारम्भ प्राप्ति दुःख का कारण है। यह में आपस भारी स्नेह होने के कारण कह रहा हूँ.
कमठ - नागनागिनी भरी हुई लकड़ी इंधन में डालते हुए.
पार्श्व - अरे, अरे, ये क्या कर रहे हो, ओ आप कर रहे हो, जो अधर्म है.
कमठ - नहीं, ये ही धर्म है.
पार्श्व - ये, पाप है.
कमठ - नहीं, यही पुण्य है, कमकन वृद्ध पीता बालक मुझे समझा ने आया है, क्या पाप है, क्यों पुण्य है, क्या धर्म है, क्या अधर्म है, मुझे जानता नहीं में तुम्हारी मां का पिता हूँ.
पार्श्व - आप जीव हिंसा कर रहे हों.
कमठ - जीव हिंसा, क्या है जीवों, बता बता कहाँ है जीव हिंसा.
पार्श्व - ये देखो, इस तरह जीवों की हिंसा हो रही है.
(णमोकार मंत्र सुनाते हुए)
(नागनागिनी नृत्य)
दृश्य - 6 (राजसभा का दृश्य)
माता - हे, स्वामी, में आपसे कुछ कहना चाहती हूँ.
पिता - बोलो, प्राणप्रिये, क्या बात है.
माता - हे स्वामी! अब मेरा बाल छोटा सा बाल नहीं रहा, अब वह युवावस्था को प्राप्त हो चुका है, इसलिए मैं चाहती हूँ की सुसंस्काररी कन्या देखकर राजकुमार का विवाह कर दिया जाय.
पिता - हाँ, प्रिय, सोच तो मैं भी रही हूँ, पार्श्व अब युवावस्था को प्राप्त कर चुका है, अब उसका विवाह कर दिया जाय.
(पार्श्वकुमार का आगमन)
दरवान - महाराज, युवराज पार्श्वकुमार पधार रहे हैं.
पुत्र - जय जिनेन्द्र पिताजी.
पिताजी - जय जिनेन्द्र, आओ पुत्र आओ, विराजो.
पुत्र - जी पिताजी.
पिता - पुत्र, हम आपसे कुछ कहना चाहते हैं.
पुत्र - कहो, पिताजी क्या कहना चाहते हैं.
पिता - हम देख रहे हैं, अब आप युवावस्था की ओर अग्रसर हो चुके हो, अब सुकन्या देखकर आपका विवाह कर दिया जाये.
पुत्र - क्या पिताजी.
पिताजी - हाँ पुत्र अब आप पूरी तरह युवावस्था को प्राप्त कर चुके हो.
पुत्र - क्या कर रहे हो पिताजी.
माता - हाँ, हाँ, पुत्र अब आप की उम्र हो चुकी है, इसलिये योग्य कन्या देखकर आपका विवाह करवाना चाहते हैं.
पुत्र - पिताजी, माताजी, हमें इस विषय में कोई विचार नहीं करना, क्योंकि मुझे विवाह नहीं करना.
माता - क्यो पुत्र क्यो? विवाह से क्यो इन्कार?
पुत्र - माता, में देखता हूँ कि विवाह से संसार में कोई सुख नहीं है.
पिता - सुन पुत्र इतिहास के पन्ने पलटकर देखे तो पिता भगवान आदिनाथ ने क्या विवाह नहीं किया था? उन्होंने भी विवाह किया था, उन्होंने भी तो संसार के भोगों को भोगा था तो फिर आप क्यें इन्कार कर रहे हो.
पुत्र - पिता श्री वह भगवान् आदिनाथ की व्यवस्था थी। उनके प्रिय मार्ग को बनाया था। उन्हें मार्ग जिरापण करना था। उन्हें मार्ग बनाकर उस पर चलना था। मगर मुझे तो बना हुआ मार्ग सीधा है, इसलिये मैं विवाह नहि करुंगा। जिस तरह आदिनाथ भगवानने मुक्ति भूमी को प्राप्त किया था, उसी मुक्ति भूमी को प्राप्त करने हेतु में दिशा की भव्य याणा को निष्क्रमता हूँ.
माता - हाँ, पुत्र हम आपको मना नहीं करते, परंतु भगवान आदिनाथ ने भी तो संसार के भोगों को भोगा था, अंत में आत्मक्ल्याण हेतु दिशा ली थी, आप भी ऐसा कर सकते हैं.
पुत्र - नहि, मे तो बनेश्वरी दिशा के लिए वन की ओर जा रहा हूँ.
माता - नहीं, नहीं मेरे लाल यह नही हो सकता, यह नहीं ही सकता, आप मुझे छोड़कर नहीं जा सकते। मेरे स्वामी उसे रोको, उसे रोको, मेरे जिगर के टुकड़े मुझको छोड़कर आप नहीं जा सकते। मेरे लाल आपने अभीतक जमीन पर पैर तक नहीं रखा, नंगे पैर आप कैसे चल पायेंगे। कडी धूप में यह आपका कोमल सा चेहरा मुरझा जायेगा। मत जाओ मेरे बेटे! आप मत जाऔ। स्वामी उसे रोको, कोई उसे रोको, कोई उन्हें समझाओ, उन्हें मत जाने दो.
दृश्य - 7
(विमान रुक जाता है)
कमठ - अरे, ये किसकी इतनी हिम्मत हुई जो मेरे विमान को रोक गया। अभी देखता हूँ ये कौन नादान है, अरे... हो... ये तो वही है, जिसने पहिले भी मेरे पंचाग्नी तप को नष्ट कर दिया है, आज देखता हूँ कौन मेरे प्रकोप से इसे बचाता है। हा..... हा..... हा.....
(उपसर्ग)
धरणेन्द्र पद्मावती नृत्य करते हुए पार्श्वनाथ को बचाते हुए.
धरणेन्द्र - अरे, घोर अनर्थ, जिन्होंने हमारा जीव बचाया आज उन्हीं पर उपसर्ग हो रहा है, हमें जाना चाहिये.
पद्मावती - हाँ हाँ स्वामी हमें जाना चाहिये, हमें उनका उपसर्ग दूर करना चाहिये.
(नृत्य करते हुए)