Kuch Khas

Kuch Khas

गज मोती

नाटक - गज मोती

(परदा खुलते ही)

नाटक का टाइटल सॉँग

सूत्रधार — जैन धर्म के इतिहास में 16 सतीयों का वर्णन आता है।

उन्हीं महान सतीयों में से आज हम मनोवति नाम की सती के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालेंगे,

इस नाटक के जरिये हम आपको यह दिखाना चाहते है कि 'दर्शन प्रतिज्ञा' का कितना महत्व है। जिनेन्द्र देव के नित्य दर्शन करना ये तो जैनियों का प्रथम कर्तव्य है।

तो लिजिये प्रस्तुत होने जा रहा है

'गजमोती' नाटक का प्रथम दृश्य

तो आओ चलते है हस्तिनापुर नगरी में।

इस नगरी से कई तीर्थकरों का जन्म हुआ है, और 700 मुनियों की रक्षा भी विष्णु कुमार मुनि ने इसी नगरी में की थी और इस नगरी की तो इतनी विशेषताएँ है की सभी सुनाने लगे तो नाटक कब दिखायेंगे,

ये नगरी बहुत ही सुन्दर है,

इसकी शोभा तो देखते नही बनती।

इसी नगरी में एक महारथ नाम के सेठ जी रहते है, उनकी एक गुणवान व रूपवान कन्या है, 'मनोवति'। तो चलो सेठ जी के महल में देखते है क्या हो रहा है!

प्रथम दृश्य

( महारथ सेठ का महल )

सेठ महारथ — अरे ओ भाग्यवान्, हो कहाँ, तुम्हे देखने के लिए तो आँखें तरस गई है।

सेठानी महासेना — लो, आ गई बस, अब देखलो जी भर के, लेकिन अब आगे से ध्यान रखना इस तरह की बातें मत किया करना !

सेठ महारथ — क्यों ना करूँ, क्या तुम्हे लगता है हम वृद्ध हो गये है, नहीं २ अभी तो मैं जवान हूँ !

सेठानी महासेना = लो करलो बात, हमारी पुत्री मनोवति विवाह योग्य हो गई है अब हमे उसके विवाह की चिंता करनी चाहिये।

सेठ महारथ — तो आप क्या समझती है मुझे अपनी पुत्री के विवाह की कोई चिंता नही, तुम माँ हो तो क्या, मे उसका पिता हूँ। मैंने तो पुरोहित जी को बुलाकर अपनी मनोवति के लिए योग्य वर ढूँढने के लिए कह भी दिया है।

सेठानी महासेना — बहुत अच्छा हुआ स्वामी आपने मेरे मन की बात पहले ही जान ली बस अब तो ये ही इच्छा है मेरी बेटी का विवाह बड़े ही धूमधाम से करूँ, वैसे भी भगवान की कृपा से अपने घर लक्ष्मी की तो कोई कमी नही है, अपार धन से भरे ये भण्डार है कितना भी लुटाऊगी तो भी कम ना होगा

सेठ महारथ — हाँ देवी, ये सब जिनेन्द्र देव की भक्ति का ही प्रभाव है, और जिसके घर तुम जैसी लक्ष्मी हो वहाँ तो हमेशा लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती है।

(पुरोहीतजी का प्रवेश)

पुरोहितजी — क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ

सेठ महारथ — आईये २ पुरोहित जी हम आप का ही इन्तजार कर रहे थे, आसन ग्रहण किजिये।

पुरोहितजी — धन्यवाद।

सेठ महारथ — अरे रामदास, पुरोहीत जी के लिए जलपान की व्यवस्था किजिये

पुरोहितजी — जलपान तो अब हम बिटियाँ की सगाई पर ही करेगे, ऐसा रिश्ता लाया हूँ, जो लाखो नही, करोडो में एक है !

सेठानी महासेना — तो क्या पुरोहीत जी आपने हमारी मनोवति के लिए योग्यवर ढुठ लिया ?

पुरोहित जी - हां सेठनी जी, बल्लीभीपुर नगर में सोमदत्त नाम के एक बहुत ही धनवान सेठ है उनके गुणवान् और रूपवान सात पुत्र है उनमेसे छः को तो विवाह हो चुका है, उनका सबसे छोटा पुत्र बुधसेन अभी कुँवारे है, उन्हें देखकर ऐसा लगा की ये अपनी बिटिया के लिए सभी प्रकार से योग्य है,।

सेठानी महासेना — तो क्या आपने हमारी मनोवति के बारे में उन्हें बताया है ?

पुरोहित जी — हाँ जब मैने आप सभी के बारे मे बताया, तो वो जानकर बहुत खुश हुए, और सोमदत सेठजी ने तो सगाई का प्रस्ताव भी मेरे साथ भेजा है, अब आपकी क्या राय है ?

सेठ महारथ — इसमे सोचना क्या है, हमारी तरफ से भी उन्हें संदेशा भेज दिया जाय, ये रिश्ता हमे मंजूर है, आप शुभ मुहूर्त देखकर शीघ्र ही यहाँ पधारे, ताकी सगाई की रस्म अदा कर दी जाये !

पुरोहित जी — ठीक है सेठजी, अभी ही संदेशा भिजवाता हूँ, वे शीघ्र ही यहा पधारे ! अब मै जोने की इजाजत चाहता हूँ !

सेठ महारथ — आप सुख पूर्वक पधारे

(परदा बंद)

(दूसरा दृश्य)

(सगाई का दृश्य)

सूत्रधार — आप अभी तक यही बैठे हो, अरे चलो २ महारथ सेठ जी के महल मे जाना है, आज उनकी लाड़ली बेटी की सगाई है,

सारी तैयारियाँ हो चुकी है, वल्लभिपुर के सेठ सोमदत्त जी भी अपने पूरे परिवार के साथ वहा पहुचं चुके है, गीत गाये जा रहे है, बाजे बजाये जा रहे है, मिठाईयाँ बाटी जा रही हैं चलो हम भी धुम मचायेगे,

सगाई का गीत — सगाई नो छे अवसर — आओ २ सेमठीआज

(1) सभी बैठ है

(2) पहल लड़के वाले, लड़की को टिकी करेगें व साड़ी उड़ायेंगे गेहिने पहनाये

(3) बाद में लड़की वाले लड़के को तिलक लगायेगे

सूट का कपड़ा देगें, सभी को गुड़ धणा खिलायेगे

(परदा बंद)

(तीसरा दृश्य)

(मन्दिर का प्रांगण)

सूत्रधार — सगाई का आनन्द तो हम उठा चुके अब हम चलते है, हस्तिनापुर के विशाल जिन मन्दिर में जहाँ जिनधर मुनिराज का संघ आया हुआ है, उनके साथ कई महान तपस्वी आर्यिका माताजी भी पधारे है, मनोवति भी सभी साधू संत के दर्शन करने गई है। चलो हम सभी भी संतो के दर्शन का लाभ उठाये !

मनोवति — वंदामी माताजी

माताजी — आशिर्वाद (धर्मलाभ) (धर्मवृद्धी)

मनोवति — माताजी आपकी अमृतमय वाणी सुनकर मै धन्य हो गई, ओर अपने दर्शन प्रतिज्ञा के बारे में इतना अच्छा समझाया, के मेरे मन मे भी यह विचार आया की मै भी आपसे कुछ व्रत धारण करूँ, कृपा करके मुझे भी कुछ व्रत दे दीजिये

माताजी — बेटी तुम्हे देखकर ही लगता है की तुम बहुत संस्कारी और उत्तम कुल की कन्या हो, मैं तुम्हे अवश्य व्रत दुगी मैं तुम्हे पुष्पांजलि व्रत देती हूँ जिसे तुम दर्शन प्रतिज्ञा सहित अंगीकार करो क्योकी जिन दर्शन बिना ये मानव जीवन एक पशु के समान है, क्या तुम ये व्रत अभी धारण करना चाहती हो।

मनोवति — जी माताजी मैं इस व्रत को अभी ही धारण करूंगी, और मैं यह भी प्रतिज्ञा लेती हूँ की नित्य गजमोती चढ़ाकर प्रभु की पूजा करने के पश्चात ही भोजन ग्रहण करूंगी !

माताजी — दर्शन प्रतिज्ञा तो बराबर है परन्तु गजमोती जैसा कीमती मोती तुझे जीवनभर कहाँ से मिल पायेगा इसका विचार किया है ?

मनोवति — माताजी इसमें विचार क्या करना है जब व्रत धारण कर ही लिया है, तो इसका पालन कैसे है इ करवाना जब तो ऊपरवाले के हाथ मे है, आप तो मुझे व्रत दिजिये जिसका पालन मैं जीवनभर कर सकूँ (मनोवति हाथ जोड़कर बैठी रहती है) (माताजी मनमे कुछ मंत्र बोलते है और मनोवति को आशिर्वाद देते है) माताजी — बेटी इस व्रत और अपने नियम अच्छी तरह पालन करना ! (परदा बंद)

सूत्रधार — व्रत को धारण कर मनोवति अपने घर जाती हैं, आज वो बहुत खुश है मानो उसे कोई अमुल्य रत्न मिल गया हो तो आइये देखते है महारथ सेठजी अपने घर मे क्या कर रहे है

(महारथ सेठ कुर्सी पर बैठे है मनोवति का प्रवेश)

मनोवति — प्रणाम पिताजी !

सेठ महारथ — आयुष्यमान भवों पुत्री,

मनोवति — पिताजी आज मैं आर्यिका माताजी से दर्शन प्रतिज्ञा का व्रत लेकर आई हूँ साथ ही रोज गजमोति चढाकर प्रभु की पूजा करूंगी उसके बाद ही भोजन करूंगी ये भी नियम लिया है, आज मे बहुत खुश हूँ पिताजी

सेठ महारथ — बेटी तुम मेरे पास हो जबतक तो कोई बात नही, अपने यहाँ गजमोति की कोई कमी नही है, पर बेटी विवाह के पश्चात इस नियम का पालन करना बडा मुश्किल हो सकता है।

मनोवति — पिताजी आप चिंतामुत किजिये मेरा पुण્યોदय होगा तो वहाँ भी मुझे गजमोती मिल जायेगे और यदि कोई मुश्किल भी आई तो, लि. हुई प्रतिज्ञा का पालन में अन्तिम साँस तक करूँगी, बस आपतो मुझे आर्शिवाद दिजिये

सेठ महारथ- धन्य हो बेटी, तुम जैसी पुत्री पाकर तो मे धन्य हो गया हुँ ! अरे बातों ही बातों में, मे ये बतानाही भूल गया कि तुम्हारी माँ तुम्हारा इन्तजार कर रही है, और मुझे भी विवाह की बहुत सारी तैयारियाँ करनी है

(पाँचवा दृश्य) (विवाह की रस्म)

शादी की तैयारियाँ चल रही है (music) सूत्रधार — तैयारियाँ तो बहुत ही धुमधाम से चल रही है देखो महल को कितना सजाया गया है ! महल ही नही, सेठजी ने लगता है पूरा हस्तिनापुर नगर ही सजा दिया है, अरे कितने सुन्दर तोरण लगाये है, राहो मे फुल बिछाये, गली २ दीपजलाये है, उनकी लाड़ली बेटी मनोवति की बारात जो आने वाली है, ढोल, नगाड़े, शहनाईयाँ बज रही है, ओर वो शुभ घड़ी आ गई, बारात द्वार पर पहुचने ही वाली है !

(1) एक तरफ कंकु की थाली लिये लड़की वाले खडे है दूसरी तरफ से बाराती नाचते कुदते धमाल मचाते हुए आ रहे है — बारात का गीत — सीताबेतोरण

(2) वरमाला डालना — ढोल ढमकुपाने वरबड़न्द

(3) शादी करवाना — शादी का गीत

(4) बिदाई — गीत - बेटी बसमी लोगे है

सूत्रधार — इसी प्रकार अश्रुभरे नयनों से माता पिता अपनी लाडली मनोवति को विदा करते है, विदाई की ये घड़ी ही ऐसी होती है के सभी की आँखो से आसु बहने लगते है, पर ये होते है सुशी के हाँसु जैसे मौके पर खुषी छलक हीजाती है ! अरे खुषीर्या तो आज सोमदत सेठ के महल में मनाई जा रही है उनके घर पुत्रवधु का आगमन जो हुआ है चलो अब मनोवति के ससुराल चलते है वहाँ की खुशिया मे भी शामील हो जाते है !

(1) नव विवाहीत जोडे को अंगूठी खिलाना

(2) उसके बाद सभी भोजन के लिए बैठते है

सासु हेमक्षी — चलो बेटी अब तुम भी भोजन करलो (मनोवति मौन रहती है) भोजन करने में संकोच नही करना, चलो आज मे अपनी बहुको अपने हाथ से खिलाऊगी,

नजद — क्या माँ आज तो भाभी को भूख नही लगेगी, ओर लगेगी भी तो, भैया के हाथ से खायेगी, आप के हाथो से नही,

हेमक्षी — ठीक है अपनी प्यारी भाभी को तुम ही खिलादो, में ओर मेहमान को देखती हूँ

ननद — क्यो भाभी, हम कोशिश करे के सीधे २

आ भी गये, अपने हाथो से खिलायेये, ओर किसी के हाथो से ये नही खा रहे है ! (हंसती दुई चली जाती है)

बुधसेन — सुनो प्रिये आज भोजन बडा ही स्वादिष्ट बना है, खाओगी तो अंगुलियाँ चटती रह जाओगी, हमने तो खूब मजे से खाया, क्या मेरे हाथो से खाने का इरादा है, चलो हम ही खिला देत है। मेरे हाथो से भी नही खाओगी, अब क्या किया जाय

सोमदत — क्या हुआ बेटा, बहुने भोजन किया की नही, तुम्हारी माँ बता रही थी अभी तक बहुने भोजन नही किया, बेटी मनोवति तुम्हे यहाँ कोई दुःख या कष्ट है क्या, तो मुझे कहो मैं सब दूर कर दूंगा, पर तुम भोजन नही करोगी तो हमे बहुत दुःख होगा ! बेटी कुछ तो बोलो !

बुधसेन — पिताजी लगता है ये अपने मन की बात यहाँ किसी से कहने मे संकोच कर रही है, आप जल्दी ही इसके मायके संदेशा भिजवाईचे, ओर किसी को यहा बुलवाईये।

सोमदत — ठीक है बेटा, मैं अभी ही कुछ करता हूँ ! (परदा बंद)

और गजमोती का बात वह कहने में संकोच कर रही थी, उसकी प्रतिज्ञा थी की गजमोती चढ़ाने के बाद ही भोजन ग्रहण करना! इसी प्रकार दूसरा दिन भी बीत जाता है, सोमदत्त सेठ के घरवाले सभी विंचूर में पड़ जाते है, आखिर क्या बात है मुख से कुछ कहती नही, भोजन ग्रहण करती नही ओर तीसरे दिन मनोवति का भाई वहाँ पहोच जाता है, आगे क्या होता आइये देखते है!

(मनोवति के भाई का प्रवेश) :

भाई — बहन ये मे क्या सुन रहा हूँ, आपने मौन ले लिया, भोजन का त्याग कर दिया है आख़िर ऐसी क्या बात है, की इस खुशी के अवसर पर ये संकट क्यु !

मनोवति — भैया आपको तो पता है की मेने दर्शन प्रतिज्ञा के साथ गजमोती चढ़ाने का भी नियम लिया है, और मुझे यहाँ कही गजमोती दिखाई नहीं दिये, और ये बात मे किसी से कह ना सकी, बस आप मुझे यहाँ से ले जाइये ताकी में गजमोती चढ़ाकर प्रभु की पूजन करके भोजन कर सकू ।

भाई — ठीक है बहना, मैं अभी ही सेठजी से बात करके तुम्हे ले जाने का प्रबन्ध करता हुँ !

भैया — चिंता की कोई बात नही है वो आप से मन की बात कहने में संकोच कर रही है, थोड़े दिन मे सब कुछ ठीक हो जायेगा, यदि आप आज्ञा दे तो मैं बहन को अपने साथ हस्तिनापुर लेजाना चाहता हुँ!

सोमदत — नही कुमार हम ये बात जाने बिना यहाँ से बिदा नही कर सकते, आपको हमे बताना ही होगा, आखिर बात क्या है!

भाई — बात तो इतनीसी है, कि बहनजी ने ऐसी दर्शन प्रतिज्ञा ली है कि गजमोती चढ़ाकर प्रभु की पूजा करने के बाद ही भोजन ग्रहण करेगी, ओर ये बात वो आपसे कह ना सकी इस बात के लिये मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ !

सेठानी — ये तो खुषी की बात है हमारी बहु ने इतनी बड़ी प्रतिज्ञा ली है, इतनीसी बात के लिये बहु को दुःखी होने की क्या जरूरत है, मैं अभी ही गजमोती लेकर आती हुँ, सभी मन्दीर चलते है, भक्ति भाव से पूजा करेगें और बहु को बड़े प्रेमपूर्वक भोजन करवायेगे ! और आदरपूर्वक इसे विदा करेगे चलो मन्दीर चले।

(वल्लभपुर का राजमहल)

सूत्रधार — इसी प्रकार सभी मन्दीर जाते है, गजमोती चढ़ाकर पूजा करते है, और बड़े ही प्यार से बहुराणी को भोजन करवाते है व उसके भाई के साथ हस्तिनापुर जाने के लिये विदा करते है। बहु तो चली गई मायुके, पर जो गजमोती मन्दीर मे चढ़ाये थे, वो गजमोती मन्दीर की मालण ने देखे और विचार करने लगी, कि इतने किमिति मोती किसने चढ़ाये, यदि मे घर ले गई तो मुझ पर चोरी का नाम आयेगा, इतने किमती गजमोती मालण के पास कहाँ से आये, अब मे क्या करु, दैयीरी दैय्या! हाँ राजा की रानी को हार बनाकर पहना देती हूँ इस हार का वो मुझे बहुत बड़ा ईनाम देगी, हाँ ये यही ठीक रहेगा तो आगे देखते है, मालण हार बनाकर महारानी के महल मे पहुचती है!

मालण — (महल मे जाते २ सोचती है) ये हार मे बड़ी रानी को पहनाऊ या छोटी रानी को, बड़ी रानी को पहनाद्गी तो छोटी रानी नाराज हो जायेगी, ओर छोटी रानी मुझको बहुत प्यार करती है वो मुझे ईनाम भी बड़ा देगी, महारानीजी ओ महारानीजी

छोटी रानी — कौन, अरे चंदा तु आज इस वक्त मेरी याद कैसे आई

मालण — महारानीजी आज मैं आपकेलिए बहुत ही किमिति व सुन्दर हार लाई हुँ जिसे आप पहनकर बहुत सुन्दर लगोगी (ओर महारानी को हार पहनादेती है)

सूत्रधार — ये सभी बाते बड़ी रानी सुन लेती है, कहते है ना, के दिवारे के भी कान होते है

छोटी रानी — सचमुच हार तो बहुत खूबसूरत है, पर ये तो बता तु इतने किमती मोती लाई कहाँ से,

मालण — क्या बताऊ रानीजी, आज मन्दीर मे कोई चढाके गया था मैने सोच की इन मोतियो का हार तो हमारी रानी को ही शोभेगा, पर थोड़े मोती कम थे तो मैंने बीच २ में मोगरे की कलीर्यां भी डाल दी इससे ये हार और सुन्दर बन गया, अब चलु महारानी,

छोटी रानी — एसे कैसे चली जायेगी, मेरे साथ मेरे कक्ष मे चल तुझे मे आज बहुत बड़ा इनाम देने वाली हूँ।

(दोनो एक तरफसे जाती है दूसरी तरफ से बड़ी रानी का प्रवेश) सूत्रधार — ये सारी बाते बड़ी रानी सुन लेती है, कहते है ना, कि दिवारे के भी कान होते है।

बड़ी रानी — (गुस्से से) तो ये बात है, किमती गजमोती का हार छोटी रानी के लिये, मेरे लिये नही, ये मेरा घोर अपमान है, मे बडी रानी हुँ बड़ी, इस हार पर पहला अधिकार मेरा है, आने दो महाराज को आज में उनसे बात करके ही रहूँगी (क्रोध मे इधर उधर घुमति है) (महाराज का प्रवेश) महाराज — प्रिये इतनी बेचेनी से यहाँ वहां क्यो घुम रही हो, क्या मेरा इन्तजार कर रही हो, माफ करना आज कुछ ज्यादा ही देर हो गई आने में, आप कुछ बोलती क्यु नही क्या नाराज है हमसे,

बड़ी रानी — नाराज, पहले आप ये बताईये के आपको सिर्फ छोटी रानी ही प्यारी है, में नही !

महाराज — नही ऐसी कोई बात नही है मेरे लिये तो दोनो ही बराबर है।

बड़ी रानी — तो फिर मालण ने सिर्फ छोटी रानी को ही गजमोती का हार क्यु दिया, यह तो मेरा घोर अपमान है,

महाराज — बस इतनी सी बात के लिए इतनी नाराज़गी, हम आपके लिए और भी किमूती गजमोती का हार बनबा देगे, अब तो खुश,

बड़ी रानी — खुश तो मे तब होता, के पहले बड़ी रानी के गले मे हार होता, और बाद मे छोटी रानी के गले मे तो यह बात है。

महाराज — छोटी रानी के गले का हार में देखकर आ रहा हूँ, उस हार मे गजमोती के साथ २ मोगरे की कलियाँ थी लगाई गई है, हम हमारी बड़ी रानी के लिए, सिर्फ़ गजमोती का ही हार बनबायेगे, अरे सारी दुनियां देखती रह छायेगी。

बड़ी रानी — सच स्वामी, अब तो बस मुझे, उस हार का इंतजार रहेगा, चलिये स्वामी आपके भोजन समय बीताजा रहा है !

(परदा बंद)

सूत्रधार — महाराज रातभर विचार करते रहे की हमारे भंडार मे तो गजमोती नही है ये गजमोती हमे कहाँ से मिल सकते है सोचते २- उन्हे विचार आया की क्यो ना नगर के सभी सेठ ओर जवेरीयों को बुलावाकर गजमोती के बारे मे बात की जाये, हाँ यही उचित रहेगा सुबह होते ही महाराज ने, सभी सेठ व जवेरीयों को महल मे पधारने का आंमत्रण दिया, तो आगे देखते है महाराज व सेठजी का वार्तालाप

(दो सेठ व दो जवेरी व महाराज सभी बैठे है बातचीत चल रही है)

महाराज — आप सभी का हमारे महल में स्वागत है, आसन ग्रहण किजिये!

सोमदत सेठ — धन्यवाद महाराज, कहिये महाराज, आपने हमे किसी खास कार्य के लिये याद किया?

महाराज — हाँ, हम आप सभी से पुछना चाहते थे की आप मेसे किसी के पास गजमोती मिल सकता है, हमे एक बहुत ही सुन्दर हार बनवाना है।

जवेरी — क्षमा करे महाराज, मगर इस समय गजमोती मिलना बहुत ही दुर्लभ है।

महाराज — आपजैसे सेठो व जवेरीयो के होते कुछ भी नामुमकिन नही है! हम गजमोती की मुह माँगी किमत देने को तैयार है।

जवेरी — परन्तु महाराज, गजमोती तो अब उत्पन्न ही नही होते,

महाराज — असंभव, यदि उत्पन्न नही होते तो गजमोती कल मन्दीर मे किसने चलाये?

के भंडार में गजमोती है।

जवेरी — लेकिन महाराज यह कैसे पता लगाया जाय की गज मोती किसके भंडार मे है!

महाराज — हो सकता है आप मेसे ही किसी के भंडार मे हो, हम दुगुनी किमत देकर भी लेना चाहते है !

जवेरी — ठीक है महाराज, हम सभी अपने २ रत्न भंडार को अच्छी तरह देख लेते है।

महाराज — लेकिन याद रहे, किसी के भी भंडार मे गज मोती हो, ओर हमे नही मिले, तो हम यहा के राजा है, हम उसके साथ बहुत बुरा सलुक कर सकते है, ये याद रहे, अब आप सभी प्रस्थान कर सकते है

(परदा बंद)

(सोमदत सेठ का घर)

हेमक्षी — स्वामी आप कहाँ चले गये थे, बिना बताये, ओर इस तरह परेशान क्यो दिखाई दे रहे है, आखिर बात क्या है।

सोमदत — आज महाराज ने अपने महल मे बुलाया था !

हेमक्षी — महाराज ने आपको याद किया ये बड़ी अच्छी बात है।

सोमदत — कोई अच्छी बात नही है, हम पर संकट आने वाला है महाराज को गजमोती चाहिए, जो इस नगर में सिर्फ मेरे पास है, यदि महाराज को पता चला की गजमोती मेरे पास है और उन्हे नही दिये तो वो हमे बर्बाद कर सकते है, ओर सारे गजमोती उनको दे देगे तो भी बर्बाद हो जायेगे यही सोचकर परेशान हूँ।

बड़ा पुत्र — लेकिन पिताजी राजा को कैसे पता चलेगा की हमारे पास गजमोती है!

सोमदत — अरे बेटा तू ये बात भुल गया की बुधसेन की पत्नि अभी तो मायके गई पर जब वो वापस आयेगी, दर्शन प्रतिज्ञा के अनुसार वो गजमोती चढ़ाकर ही

हेमक्षी — हे भगवान ऐसी बहु कहाँ से आई हमारे घर में जो आते ही मुसीबते में डाल दिया, अब क्या होगा बेटा।

बड़ा पुत्र — एक रास्ता है माँ, यदि हम बुधसेन को घर से निकाल दे तो उसकी पत्नि भी इस घर मे नही आयेगी, वो तो बडी शीलवती है, पति के बिना वो इस घर में कदम नही रखेगी, बस (।

हेमक्षी — पर बेटा इसमे बुधसेन का क्या दोष है, वो बहु ही गुणवान, संसकी और बड़ा ही प्यारा है, (

बड़ा पुत्र — वो बड़ा ही प्यारा है तो आप उसे रख लीजिये, हम दोनों भाई घर छोड़ कर चले जाते है, हम ये बर्बादी नही देख सकते है !

हेमक्षी — सुना आपने ये क्या कह रहा है,

सोमदत — हाँ, देवी मुझे भी लगता है, अब इसके अलावा, दूसरा कोई रास्ता नही है, मुझे भी अब अपने कलेजे पर पत्थर रखकर यही निर्णय लेना पडेगा —

(परदा बंद)

गाना — देख तेरे संसार की हालत क्या —

सूत्रधार — माता पिता और बडे भाई की आज्ञा का पालन करते हुए, बुधसेन, बीना कुछ पुछे, बीना विचारे, वल्लभपूर नगरी छोड़ कर चले जाते है।

बुधसेन — चलते २ बुधसेन विचार करते रहे है, की मेरे ज्येष्ठ भ्राता सभी धन कमाने में माहिर है और मे अभी तक कुछ कमा कर नही लाता हूँ, शायद मुझे इसलिए घर से निकाल दिया गया है अब मुझे भी विदेश जाकर धन कमाना चाहिये, पर मेरी प्यारी पत्नि को बीना बताये गया, तो वो मेरे बिना रह न सकेगी और प्राण त्याग देगी, अब मे क्या करूँ। एसा करता हूँ पहले मे हस्तिनापुर जाता हूँ पत्नि को सारी बात बताकर फीर ही विदेश जाना उचित है, हाँ यही ठीक रहेगा।

भाई — पिताजी २ मेने अभी जमाई राजा बुधसेन जी को अपने घर की तरफ आते देखा है, लेकिन उनकी हालत कुछ ठीक नही लगती है, और बिना सुचना दिये इस प्रकार अचानक, मुझे कुछ ठीक नही लग रहा है ! समझ मे नही आ रहा हैं।

सेठ महारथ — हो सकता है बेटा वो किसी जरूरी काम से आ रहे हो, उनके आते ही कोई सवाल मत करना, जब वो मनोवति से

(बुधसेन का प्रवेश)

महारथ — पधारो २ जमाई राजा, आपकाों स्वागत है, अरे रामदास कुँवरजी के लिए जरा जलपान की व्यवस्था करो

रामदास — अभी लाया मालिक (पानी लाके देता है)

(घर मे सभी जमाई की मेहमानदारी करने लगते है, कोई पंखा करता है, कोई भोजन परोसता है भोजन करते २ बात करते है)

महारथ — बताईये कुँवरजी, वल्लभपूर मे सभी कैसे है

बुधसेन — सभी कुशल पूर्वक है, आप बताईये आप कैसे है,

महारथ — हम भी मजे मे है, अच्छा तो कुंवरजी अब आप आराम किजिये बड़ा ही लम्बा सफर तय करके आये है! थक चुर्के होगे, चलो बेटा अब हम भी आराम करले

(दोनो के निकलते ही मनोवति का प्रवेश)

मनोवति — प्रणाम स्वामीजी बुधसेन — आओ प्रिये आओ, मैं यहाँ तुमसे ही मिलने आया हूँ मनोवति — वो तो हम समझ ही गई थी, मगर आप हमारे बिना दो दिन भी नही रह सके, ऐसी क्या बात है बुधसेन — आओ मेरे पास बैठो, और ध्यान से सुनो में तुम्हे यह बताने आया हूँ कि, मुझे धन उपार्जन के लिए विदेश जाना है, तुम चिंता ना करो इसलिये में तुम्हे बता कर जाना चाहता हूँ मनोवति — लेकिन स्वामी इतनी जल्दी क्या है हमारे घर में कोई धन की कमी तो नही, बाद में चले जाना बुधसेन — नही प्रिये, मुझे अभी ही जाना होगा, मनोवति — आप कुछ परेशान दिखाई दे रहे है, जरूर कोई बात है, जो मुझसे छुपा रहे हो बुधसेन — क्या कहूँ प्रिये, बात ही कुछ ऐसी है, मेरे ज्येष्ठ भ्राता सभी कमाते है सिर्फ मे ही नही कमाता हूँ, इसी कारण मुझे घर से जाने को कह दिया है, अब मे भी कुछ करना चाहता हूँ। बहुत धन कमाना चाहता प्रिये, तुम थोड़ा समय अपने मायके मे ही रहो में जल्दी ही लौह लाऊंगा और फिर तुम्हे ले जाऊंगा मनोवति — नही स्वामी मैं आप के बीना नही रह सकूगी, मैं भी आप के साथ ही चलूगी जहाँ स्वामी वही में

बुधसेन — नही प्रिये मैं तुम्हे कैसे ले जा सकता हूँ, तुम्हारी ये कोमल काया, इतने कष्ट कैसे उठा पायेगी, ये तमतमाती धुप तुम्हारे रूप को जला देगी।

मनोवति — मुझे इसकी परवाह नही है स्वामी जिस प्रकार सीताजी रामजी के साथ वनवास गई थी उसी प्रकार मे भी आपके साथ सर्दी, गरमी, धुप, छाँव, सुख, दुख मे साथ रहना चाहती हूँ।

बुधसेन — यदि तुम चलना ही चाहती हो तो मेरी एक बात माननी होगी, तुमने जितने भी आभूषण पहने हुए है उसे यही उतारकर रखदो ताकि किसी को ये ना लगे की हम यहाँ कुछ लेने आये थे।

मनोवति — जो आज्ञा स्वामी, मैं अभी ही सारे आभूषण उतार देती हूँ।

बुधसेन — और सुनो प्रिये, हमे अभी, रात के अंधेरे मे ही निकलना होगा, सुबह होने के पश्चात, आपके पिताजी हमे इस तरह यूँ, यहाँ से नही जाने देगे ! आओ चले।

गाना — हम तो चले परदेश — : · ·

(परदा बंद)

सूत्रधार — इसी प्रकार रात्ती के अंधेरे में बुधसेन व मनोवति घर छोड़कर चल जाते है। सुबह जब मनोवति के माता पिता के पता चलता है के जमुई राज, और मनोवति घर मे नही है वे बहुत गिंचित हो जाते है, पूरे घर मे देखते, मन्दीर मे जाते है बगीचे में देखने जात, तालाब, नदी सभी जगह ढूंढते है पर कही पता नही चलता है, माँ का तो रोरोकर बुरा हाल हो गया है, वल्लभपूर से भी समाचार मिल जाते है कि वे वहाँ भी नही पहुचे, तो गये कहाँ चलो देखते है, की वो कहाँ जा रहे है!

गाना — दुःख से नाही घबराओ मेरे साथी, सुख के सब साथी, दुःख मे न कोय (मैना सुन्दरी की कैसेट में है) (स्टेज पर घुमते २ ये सब क्रियाथे करना है जबतक गाना चले)

(1) बहुत प्यास लगती है, कही से पानी लाके देना (2) पाँव में कांट चुभ जाता है काँटा निकालना (3) बहुत थक जाते है पति के पाँव दबाना व पति के पेरो मे ही सो जाना (प्रातःकाल जब आँख खुलती है)

बुधसेन — देवी लगता है हम रत्नपुर पहुच गये है, रात के अंधेरे मे हमे पता नही चला, देवी मैं स्नान करके आता हूँ, फिर काम की तलाश मे निकलता हूँ !

बुधसेन — प्रिये अभी तो तुम्हे इस बगीचे को ही अपना घर समझना होगा ! भगवान की कृपा से सब कुछ ठीक हो जायेगा, तुम चिंता मत करो ! (बुधसेन स्नान करने चला जाता है) (मनोवति वृक्ष के नीचे बैठी बालो को संवाररही है के इचानक बालो मेंसे उसे किमती रत्न मिलता है वह उस रत्न को देखती है इतनेमे बुधसेन आ जाता है)

मनोवति — स्वामी मेरे बालो में भुल से एक रत्न रह गया था, मैं में चाहती हुँ की आप इसे बेंचकर भोजन सामग्री ले आइये, चारदिनो से अन्न तुनक का एक दाना भी पेट में नही गया,

बुधसेन — ठीक हैं देवी में यूं गया ओर यूं आया (मनोवति वृक्ष के नीचे झाड़ू लगाती है बुधसेन आ जाता है)

बुधसेन — लिजिये में सारा सामान ले आया मनोवति — आप थोड़ी देर आराम करले मैं अभी भोजन तैयार कर देती हूँ ! (भोजन बनाती है) लिजिये स्वामी भोजन ग्रहण किजिये बुधसेन — प्रिये आज हम दोनों साथ खायेगे मनोवति — नही स्वामी में बाद मे खा लूँगी, आपको जाने मे देर हो जायेगी !

सूत्रधार — इसी प्रकार तीन चार दिन ओर गुजर जाते है, मनोवति भोजन बनाती है अपने पतिदेव को खिलाती, पर खुद नही खाती है, क्योकि मनोवति के नियम है, जबतक गज मोती चढ़ाकर प्रभु की पुजा ना करले तबतक भोजन नही करना, इस बात का अपने पतिदेव को पता नही लगने देती है, वह तो दिनरात प्रभु का नाम रटती रहती है, और अपनी धर्म भावना को पुष्ट करती है ! कहती है प्रभु प्राण जाये तो जाये, पर मेरी प्रतिज्ञा को आंच न आये, उस महासती के प्रार्थना की आवाज देवलोक तक पहुँचती है, तो चलो देवलोक मे जाकर देखते है, के देव इस महान सती की क्या मदद करते है ! तो अगले दृश्य मे हम देखेगे देव लोक !

देवी — स्वामी क्या आपने उस महान सती की प्रार्थना सुनी, सात दिन से उसने भोजन ग्रहण नही किया पर उसके चेहरे पर अपार शांति व प्रभु के प्रति अटूट विश्वास है, क्या आप उसकी मदद नही करेगे

देव — अरे देवी आप मुझे बोलने का मौका दे तो कुछ कहे !

देवी — क्षमा कीजिये स्वामी, पर मुझसे उसकी हालत देखी नही जा रही है!

देव — तो आप ही बतादिजिये कि उनकी मदद किस तरह कि जाये।

देवी — बगीचे के पीछे एक अदभुत जिनालय की रचना की जाये, और उस देवी को हम रत्न देगे ताकी उसे पता चले की बगीचे के पिछे मन्दीर है

देव — लेकिन देवी, दर्शन प्रतिज्ञा के साथ २ एक और प्रतिज्ञा है उनकी, गजमोती चढाये बीना वो भोजन ग्रहण नही करेगी,

देवी — क्या स्वामी आपने मन्दीर की रचना तो कर दी, पर गजमोती नही दिये, तो बात वही की वही रहजायेगी, और इस महानसती के, भोजन के बिना प्राण छुट जायेगे, इस इस कारण से लोगो की धर्म के प्रति श्रद्धा कम हो जायेगी इसलिए गजमोती भी आप को ही

देव — समझ गया देवी, सबकुछ हो जायेगा, आप चिंता ना करे, अब आप हमारी लीला देखिये।

देवी — आप जैसे स्वामी को पाकर तो मे धन्य हो गई २ (परदा बंद)

सूत्रधार — देवी देवताओं की बात सुन ली हो तो चलो वापस पृथ्वीलोक पर आ जाते है, चलते है उसी बगीचे में जहाँ मनोवती व बुधसेन विश्राम कर रहे है!

(मनोवती जाग्रत होती है ओर झाड़ू निकालते हुए या पानी भरते हुए गुनगुनाती है)

गाना — सुमति का प्यारा कई थारी मरजी रे के चेतन जाग रे — · ·

बुधसेन — (उठकर बैठते हुए) प्रिये आज बहुत ही प्रसन्न दिखाई दे रही हो, क्या प्रसन्नता का कारण जान सकता हूँ।

मनोवति — हाँ स्वामी नाथ, आज मे बहुत प्रसन्न हूँ, रात्री के समय मैने बहुत ही सुन्दर स्वटन देखा, इस बगीचे के पीछे बहुत ही सुन्दर जिनालय है, मेरा मन कहता है ये स्वटन सच है, आप स्नान कर लिए हम अभी ही जिनेन्द्र देव के दर्शन करने जायेगे !

बुधसेन — तो ये बड़ी खुशी की बात है कई दिनों के बाद आज हम जिनेन्द्र देव के दर्शन करेगे, मैं अभी नहाया ! (टॉवल लेके जाना है वापस आना है)

(दर्शन के लिए दोनों निकलते है रास्ते में मनोवती को ठोकर लगती है मनोवती बैठ जाती है)

बुधसेन — क्या ठोकर लग गई, जरा सम्भल कर चलोना, जरा दिखाओ कहाँ लगी, मैं इस पत्थर को बीच मेसे हटा देता हुँ ! वरना किसी और को भी लग जायेगा ! (पत्थर साईड पर रखता है)

मनोवती — स्वामी देखियेना ये चमचमाते मोती, ये तो गजमोती है स्वामी, लगता है प्रभु ने मेरी प्रार्थना सुनली अब मैं इन गजमोती से प्रभु की पुजा रचाऊंगी, खूब भक्ति करुंगी स्वामी

बुधसेन — हाँ हा चलो मन्दिर चले

सूत्रधार(मन्दिर मे जाते है बड़ी भक्ति भाव से पूजा रचते है, गजमोती चढ़ाने के बाद वापस आकर अपने पति बुधसेन के हाथो से पारणा करती है)

मनोवति — स्वामी मैं यह सोच रही हुँ की थोड़े गजमोती आप ले जाईये ओर इन्हे बेचकर कुछ व्यापार सुरु कर दीजीये ! ऐसा मन्दिर आज तक मैंने देखा ही नहीं सम्भवत है ? क्या जिनेन्द्र देव की रत्नमयी प्रतिमा !

यहाँ!! आज आठवां दिन है। सात उपवास करके आठवे दिन अपनी प्रतिज्ञा को निभाने के लिये देवों के आसन हिला दिये, धन्य है ये भक्ति और धन्य है ये दृढ़ता, धन्य है धैर्य और धन्य है वह सती, जिसकी साधना के लिए देवगण आ रहे थे, पुष्पवृष्टि कर रहे थे, जिसकी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए सौधर्म इन्द्र ने स्वयं अपनी दिव्य दृष्टि का प्रयोग किया और अर्धरात्रि में जिनमंदर का निर्माण कर दिया!

बुधसेन — हा देवी मे भी यही सोच रहा था!

मनोवति — तो जाईये शुभ कार्य में विलम्ब कैसा, और जाते समय ओम् नमः सिद्धेश्या अवश्य बोलीजीएगा!

(बुधसेन ओम् नमः सिद्धेश्या बोलते हुए काम के लिये निकल जाते है) (परदा बंद)

सूत्रधार — बुधसेन ने गजमोती बेंचकुर व्यापार शुरू किया, इस व्यापार में दिन दुगुना रात चौगुना फायदा होता गया और वो उन्नत के शिखर पर पहुंच गये, आज बुधसेन की खुशीर का कोई ठिकाना नही था, अपने मेहनत से कमाये हुए रुपयो से एक महल बनवाया, आज पहली बार मनोवति को उस महल मे लेजाने वाले है! क्या आप भी चलेगे महल मे तो चलिये!

मनोवति — बहुत खुबसूरत महल है, इसे देखकर लगता है, किसी राजकुमार ने अपनी रानी के लिए बहुत प्यार से बनवाया है ! पर ये तो बताईये ये महल है किसका

बुधसेन — ये महल है, हमारी प्रिय रानी मनोवति का,

मनोवती — क्या कह रहे हो स्वामी ये महल अब हमारा है, !

बुधसेन — हाँ ! और यहाँ की अब तुम हो महारानी अब तो खुश होना !

मनोवति — एक बात कहूँ स्वामी, इससे भी ब्या्यादा खुशी मुझे तब होती, इस महल की जगह एक विशाल सुन्दर भव्य जिनालय बनवाते !

बुधसेन — ठीक है हम तुम्हारी खुषी के लिए एक भव्य मन्दीर का निर्माण कल से ही सुरु करवा देते है !

मनोवती — स्वामी आप तो जानते है कि ये धन दौलत, सुख सम्पत्ति सब हमे देव शास्त्र गुरु की कृपा से ही मिली है, हम उन्हें कैसे भूल सकते है, धर्म के ही कारण एक दिन हम मोक्ष रूपी लक्ष्मी को भी प्राप्त करेगे !

मनोवति — किसी भी कार्य को जल्दी पूरा करने के लिये भोजन की भी आवश्यकता होती है, तो चलिये पहले "पेट पूजा फिर काम दुजा"

बुधसेन — हाँ देवी भूख तो बड़ी जोर से लगी है, चलिये !

(परदा बंद)

सूत्रधार — थोडे ही समय मे बुधसेन ने मन्दीर निर्माण का कार्य बड़े घोरों शोरों से शुरू करवा दिया ! और उधर वल्लभपुर में सोमदत्त सेठ, जिसने दर्शन प्रतिज्ञा की घोर निंदा की थी, और घर के सभी लोगो ने मिलकर बेकसूर बुधसेन को घर से निकालने का षड़यंत्र रचा था ! उस 56 करोड़ के मालिक की हालत आज दो कोड़ी की भी नही रही, दो वक्त के भोजन के लिए भी उन्हें मजूरी करनी पड़ रही है, फिर भी पेट भर रोटी नही जुटा पा रहे है, जब उन्हें पता चलता है

के रत्नपुर में बहुत बड़े पैमाने पर मन्दीर निर्माण का कार्य चल रहा है, ओर मजुरी भी अच्छी मिल रही है तो सोमदत सेठ अपने पूरे परीवार के साथ वहाँ मजुरी करने पहुच जाते है! « देखो करमो की गति न्यारी कहाँ राजा कहाँ रंक भिखारी » अब हम आपको ले चलते है, रत्नपुर में, जहाँ मन्दीर का कार्य बड़े जोरों से चल रहा है !

(यहाँ सोमदत सेठ के परीवार वालो को मजुरी करते दिखाना है)

(1) तगारी उठाते हुए

(2) एक दुसर को देते हुए

(3)लाईन मे चलते हुए, पसीना पोछते हुए

(4) सात आठ वातो को दिखाना है गाना — साथी हाथ बढ़ाना — · · (और यदि पात्र नही है तो इस दृश्य को नही दिखाते हुए कहानी को अगले दृश्य मे ले चलते है !)

सूत्रधार — और एक दिन बुधसेन की नजर अपने परीवार पर पढ़जाती है। वह अपने परीवार वालो की यह हालत देखकर आस्चर्यमें पड़ जाता है, लेकिन वह किसी से बात नही करता है और सीधा पहुच जाता है अपने महल में !

(मनोवती धार्मिक पुस्तक पढ़ रही है)

बुधसेन — प्रिये कहाँ हो तुम, आज मैं बहुत खुश हूँ, आज मेरे मन को चैन मिल गया, जिन लोगों ने मुझे बेघर कर दिया था आज मैं उनकी वो हालत देखकर आ रहा हूँ, यदि तुम सुनोगी तो तुम्हे भी सुकुन मिलेगा

मनोवती — कहिये स्वामी ऐसी क्या बात है !

बुधसेन — मेरे पिताजी और मेरे भाइयो ने मिलकर मुझे घर से निकाल दिया था, तुम जैसी शीलवती बहु को घर से कदम नही रखने दिया था, आज वही सब लोग मजुरी कर रहे है !

मनोवती — ये आप क्या कह रहे हो, आपके कहने का मतलब है, पिताजी, माताजी, भाई, भाभी याँ सभी वहाँ मजुरी कर रहे है, और आप खुश हो रहे है, आपको तो उन्हे आदर सहित घर ले आना चाहीये !

बुधसेन — नही देवी नही, तुम वो दिन भूल गई, जिस दिन तुम्हारे पति को दर दर की ठोकरें खाने के लिए अकेला छोड़ दिया था, जब मैं उन्हे माथे पर तगारीयाँ उठाते देखता हूँ तो लगता है इनकी यही सजा होनी चाहीये

मनोवती — नहीं स्वामी आप इतने कठोर ना बनिये, हो सकता है, हमारे पूर्वजन्म के कर्मों की वजह से ये कष्ट उठाना पड़ा हो, ये तो सिर्फ निमित्त मात्र है !

बुधसेन — तुम महान हो देवी, तुम ये सब आसानी से भूल सकती हो, मगर आज भी में वो दिन नही भूला, मुझे बार २ याद आता है कि तुम कई २ दिन तक भूखी रही हो, प्यासी रही हो, सर्दी, गर्मी सहती रही हो ! क्या सब भूल जाऊ !

मनोवति — स्वामी, सुख दुख ये तो, नदी के दो किनारे है जो हमेशा साथ २ चलते है इसी का नाम जीवन है। और माता पिता से बढ़कर तो दुनियाँ में कोई नही होता, आज उन्ही की बदौलत हमारा अस्तित्व है, हम उनका कर्ज कभी नही उतार सकते !

बुधसेन — हाँ प्रिये बात तो तुम्हारी सही है किन्तु . . .

मनोवती — सब किन्तु परन्तु छोडीये सबको घर ल आइये, घर तो परिवार से ही बनता है,

बुधसेन — ठीक है देवी तुम यही चाहती हो तो यही सही, हम अभी चलते है और आदर सहीत पूरे परिवार को घर ले आते है !

(परदा बंद)

सूत्रधार — देखा आपने इसे कहते हैं, क्षमावान नारी, अपने साथू और अपने पति के साथ हुए अन्याय को वो, भूल गई ! और बड़े ही प्रेम आदर पूर्वक अपने परीवार को लेने के लिये पहुचजाती है वहाँ, जहाँ उसका पूरा परीवार भूख व गरीबी के दल दल में फँस चुका है, अब वो अपने परिवार से किस प्रकार मिलते है ! और घर ले आते है, चलो देखते है !

(पूरा परीवार एक तरफ बैठा है) (1) कोई रोटी खा रहा है (2) कोई लेटा हुआ है (3) गंदे से कपडे से हवा कररहा है या पेपर से

मनोवती, बुधसेन — प्रणाम पिताजी

सोमदत्त — कौन, अरे बेटा बुधसेन तू, यहाँ कैसे, और ये मेरी बहु है, जीती रहो बेटा, अरे सुनती हो देखो कौन आया है हमसे मिलने, अपना बुधसेन और बहु

मनोवति, बुधसेन — प्रणाम माताजी, आप कैसे हो,

हेमक्षी — बेटा तुझे देखने के लिए ये आँखे कब से तरस रहीं थी, हमे हमारी भुल का बड़ा ही पश्चताप है बेटा, तुम घर से क्या गये, जैसे घर से तो सारी खुषीयाँ ही चली गई, मुझे माफ करदो बेटा !

सोमदत ! — मेरे निमित्त से तुमने सैकड़ो कष्ट सामना किया है मेरे अपराध को क्षमा कर दो

बुधसेन — पिताजी आपका इसमें क्या दोष है, मेरे ही कर्मो का फल मैंने भोगा है

बुधसेन — ये आप क्या कर रहो है माँ संचित क्यो माफी तो हमेशा छोटे माँगा करते है, और आपतो हमारी माँ है,

हेमक्षी — बेटी मनोवती तुम भी हमे माफ करदो, हम तुम्हारे भी गुनाहगार है !

मनोवती — माताजी, आप मन को इतना दुःखी मत किजिये, ये सब तो कर्मो का फल है, और होनी को कौन टाल सकता है ! भैया, भाभी अब आप सभी आँसु पौंछ लीजिये, अब हमारे दुख के दिन गये, और भगवान की असीम कृपा से ये मन्दीर भी तैयार हो गया है, अब हम सब मिलकर, पंच कल्याणक प्रतिष्ठा करेगे, और हाँ, भगवान के माता पिता बनेंगे, माताजी और पिताजी

पुरा परीवार एक साथ बोलता है — और सौधर्म इन्द्र इन्द्राणी बनेगे बुधसेन और मनोवती, और हम सब बनेंगे राजा बोलो जिन शासन देवकी जय आज के आनन्द की जय दर्शन प्रतिष्ठा की जय बोलो महासती मनोवतीकी जय,