हृदय-परिवर्तन
"डाकू से साधु की ओर"
प्रथम दृश्य :- (एक आदमी अमीर के घर का सेट) एक माँ तथा उसका बेटा लगभग 15 वर्ष का हो गया है। माँ शास्त्र पढ़ रही है। बेटे का प्रवेश।
बेटा :- माँ मुझे भूख लगी है।
माँ :- बेटा पहले मंदिर होकर आओ। फिर तुम्हें भोजन मिलेगा।
बेटा :- मंदिर में क्या रखा है। माँ वहाँ क्या पेट भरता है। तू जल्दी कर मुझे जोरों से भूख लगी है। फिर पिक्चर जाना है।
माँ :- नहीं आज तो मैं तुझे जिनदर्शन के बिना भोजन दूंगी ही नहीं। चल पहले दर्शन करके आ मैं भी चलती हूँ।
बेटा :- नहीं माँ नहीं मैं नहीं जाऊँगा [जबरदस्ती हाथ पकड़कर बेटे को ले जाती हैं।]
2. दृश्य-परिवर्तन
मंदिर जी का दृश्य
माँ :- हे शक्ति के नाथ मेरे बेटे की मति पलट जाय धर्म के प्रति श्रद्धा हो जाय [बेटे की तरफ सम्मुख होकर] बेटा देख दर्शन कर, भगवान की मूर्ति कितनी शांत है। णमोकार मंत्र बोल, चावल चढ़ा, ढोक दे, गंधोदक लगा ले।
बेटा :- माँ मूर्ति तो शुद्ध सोने की है। कितनी कीमती होगी।
माँ :- चल तुझे कीमत से क्या लेना देना। [माँ बेटे को बाहर ले जाती हैं।]
3. दृश्य-परिवर्तन
पाँच वर्ष बीतने पर
बेटा :- माँ जरा 5 हजार रुपये देना।
माँ :- क्यों बेटा क्या काम है।
बेटा :- तुझे काम से क्या मतलब है। मैं कुछ भी करूँ। पैसा मेरा है।
माँ :- बेटा दो हजार से काम चला लो फिर बाद में दे दूंगी।
बेटा :- (गुस्से से) मुझे पूरे 5 हजार चाहिए। एक भी कम नहीं। तुम्हें
कई बार समझा दिया कि मेरे से ज्यादा बहस मत किया कर।
माँ :- [लापरवाही से] ले बेटा तुझे जो करना है सो कर [बेटा रुपये लेकर चला जाता है।]
माँ :- [अकेले बड़बड़ाती है] हे भगवान मैं क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आता लाख समझाने पर भी नहीं मानता, कैसी कुसंगति में फँसा है। हे प्रभु इसका क्या होगा।
[बेटे का प्रवेश - रात्रि का समय - शराब के नशे में लड़खड़ाते आता है।]
माँ :- इतनी रात को इस तरह आना अच्छे घराने के लड़कों की निशानी नहीं हैं। क्यों अपने बाप का नाम बदनाम करने पर तुले हो क्यों अपनी जिंदगी नर्क बना रहे हो। क्यों अपने उत्तम कुल को लजा रहे हो। अब भी वक्त है संभल जाओ।
बेटा :- चुप मैं बड़बड़ सुनने का आदि नहीं है। एक तो रुपया नहीं देती और ऊपर से भाषण झाड़ती है। मेरे बाप के पैसे पर तु पाबन्दी लगाने वाली कौन होती हैं।
माँ :- [गुस्से में] यह तेरे बाप की नहीं, मेरे पति की कमाई है, जब खुद कमाओगे तब मालूम पड़ेगा।
बेटा :- चल हट मेरे सामने से मुझे सोने दो। [बेटा सो जाता है फिर भी माँ हवा करती रहती हैं।]
अगला - दिन
बेटा :- माँ आठ हजार रुपये दे दो।
माँ :- बेटा इस तरह तुम्हें रोज-रोज पैसे देकर मैं बरबाद हो गई हूँ। अब मेरे पास तुझे देने को पैसा नहीं हैं। अब तो तरस खा।
बेटा :- मुझे देने के लिए तेरे पास पैसा नहीं हैं। और दान धर्म में बर्बाद करने को पैसा हैं। देती हैं या नहीं [चाकू निकालता हैं]
माँ :- हे भगवान! इससे तो होते ही मर जाता तो अच्छा होता मुझे क्या पता था कि इसे नौ महीने पेट में रखने का यह अंजाम होगा। ये मेरा बदला लेगा।
NOTES बेटा :- चल हट। नौ महीने पेट में रखा तो क्या अहसान किया है। तू चाहती क्या है। यही न नौ माह का किराया मय ब्याज के चुका दूँगा।
माँ :- देगा कहाँ से। पहले कुछ करके तो बता फिर बड़ी-बड़ी बातें करना.
बेटा :- [खबरदार] आज से कुछ यहाँ मैं जाता हूँ। अभी इसी वक्त तेरा मुंह नहीं देखना चाहता अब तभी आऊँगा जब तेरा कर्ज पूरा कर सकूँगा [बेटे का जाना]
दृश्य - परिवर्तन
[ बेटा अंधेरे में बैठा कुछ सोच रहा है। तभी एक चोर दौड़ता हुआ आकर उससे टकराता है। दोनों में बातचीत होती हैं।]
सत्य :- [बेटे का नाम सत्य है कॉलर पकड़कर] क्यों भाई कहाँ भागे जा रहे हो लगता है कही हाथ साफ करके आ रहे हो। लेकिन घबराओ नहीं आज से मैं भी तुम्हारा साथी हूँ.
1. चोर :- चल हट पहले से ही हम चार हैं। तुझे कहाँ मिलायेंगे.
सत्य :- बड़ी तकलीफ में हूँ। मुझे भी साथ कर लो। कुछ ही दिनों में मालामाल हो जाओगे.
2 चोर :- [आश्चर्य से] अच्छा तो चलो तुम्हें अपने साथियों से मुलाकात करवा देता हूँ! [चोर अपने अड्डे पर सत्य को ले जाता हैं। और अन्य तीन चोरों से परिचय करवाता हैं।]
अन्य तीन चोर :- यार किसको लेकर आया हैं.
1 प्रथम चोर :- साथियों आज से ये हमारा मित्र हैं। सत्य इसका नाम हैं। ये भी हमारी ही तरह काम करेगा। कुशल कारीगर हैं। [सब हँसते हैं]
[पाँचो बात करते हैं। घुलमिल जाते हैं। सभी साथी आपस में विचार करते हैं] ये स्वभाव से तो हमारे काम का आदमी लगता हैं। सत्य आज से हम पाँचे साथी हैं। आओ अगली प्लानिंग बनाये.
सत्य :- वैसे इस मामले में मैं आपको काफी अच्छी सलाह दे सकता हूँ। बहुत बड़े-बड़े रईसों के घर की मैंने देखा हैं। साथियों! कल मैं तुम्हें सेठ धरमचंद के यहाँ ले चलूँगा। बहुत माल हैं। वहाँ चलो अभी तो सब आराम कर लो.
1 चोर :- चलो भाई सत्य उठो, काम की तैयारी करनी हैं.
सत्य :- बहुत जल्दी उठा दिया यार हमें तो काम पर रात को चलना हैं। प्लानिंग मेरे दिमाग में हैं। तुम फिक्र मत करो। अभी सोने दो.
NOTES सो जा उल्लू। हम चोर हैं। हमारा काम रात में होता हैं.
3 चोर :- ठीक हैं हम शाम को चलेंगे सोने दो इसे
[ शाम का वक्त लाईट धीमी हो रही हैं ]
4. चोर-4 :- सत्य उठो हमें काम से चलना हैं। [ सभी चोर पर्दे के पीछे चले जाते हैं और कुछ देर बाद थैलियां भरकर जो आते हैं, सभी चोर बहुत खुश हैं।]
चोर (सब) :- जियो राजा [ सत्य की पीठ थपथपाते हुए ] आज तो तुम्हारी वजह से अच्छा खासा माल हाथ लगा हैं।
सत्य :- यार अभी तो कुछ नहीं मिला हैं। आगे देखना, जहाँ भी मेरा हाथ पड़ जाएगा बिल्कुल सफाया कर दूंगा।
चारों चोर :- [ आपस में ] आज के बाद हम जो भी काम करेंगे सत्य के कहने से ही करेंगे और सत्य को ज्यादा हिस्सा देंगे उसको हम अपना सरदार मान लेते हैं। इससे हमें चोरी डकैती में सफलता ही सफलता मिलेगी। क्यो भाई ठीक हैं न। [ सब एक आवाज में कहते हैं - बिल्कुल ठीक हैं ]
चोर :- हाँ भाई सत्य अब आगे क्या प्लानिंग हैं।
सत्य :- प्लानिंग तो इतनी शानदार हैं दोस्त कि अपनी पाँचों उँगली कल से घी में होगी। कल हम लोग जहाँ चोरी करने जायेंगे। वह जिंदगी की आखरी चोरी होगी। क्योंकि वह इतनी कीमती चीज होगी कि सारी जिन्दगी ऐशो आराम से गुजर जाएगी।
चोर 1 :- कहाँ जल्दी बताओ।
चोर 2 :- भूमिका मत बाँधो। मेरे सरदार फटाफट बताओ कहाँ चलना हैं कल।
सत्य :- बताता हूँ बताता हूँ। ज्यादा अधीर मत बनो। पहले जरा जश्न तो हो जाये हमें अपना टॉनिक ले लेने दो [ शराब पीता हैं ] तुम सब लोग भी पीओ [ सब पीते हैं ]
नशे में :- हाँ तो हम कहाँ थे भाई
तीनों चोर :- हम यहीं तो थे --- ---
सत्य :- तीन दिन से चल रहे हैं। और कहते हो यहीं हैं। आगे बढ़ो। आगे बढ़ो। [ सब लोग खड़े हो जाते हैं चलने लगते हैं ]
सत्य :- अरे कहाँ जा रहे हो भाई।
NOTES सभी चोर :- आपने ही तो कहा था। बढ़ो हम बढ़ गये
सत्य :- ध्यान से सुनो जैसा मैं कहता हूँ। वैसी करना मैं कल सुबह जिन मंदिर जाऊँगा और तुम ठीक रात को 12 बजे
दरवाजा खटखटाना और अंदर आ जाना ताकि मैं सब देख लूँगा।
दृश्य - परिवर्तन
[ पर्दा खुलता हैं। मंदिर का दृश्य ] ब्रह्मचारी जी बैठे हैं लोग दर्शन करते हैं चले जाते हैं। कुछ लोग रुक जाते हैं। ब्रह्मचारी सत्य ध्यान में लीन हैं। लोग आँख खुलने की प्रतीक्षा करते हैं।
कुछ ही देर में सत्य आँख खोलता हैं।
लोग - 1 :- बोलिये ब्रह्मचारीजी की जय [ सभी सत्य के इर्द-गिर्द बैठ जाते हैं ] कहाँ से आगमन हुआ हैं आपका?
सत्य :- हमारा कोई ठिकाना नहीं होता हम कहाँ से आये हैं। कहाँ जाना हैं। इस आने-जाने की बातों से क्या लेना-देना।
[ ध्यान में लीन ]
लोग - 2 :- आप धन्य हैं। त्यागी जी आपके दर्शन करके हम कृतकृत्य हुए क्योंकि हमारे यहाँ आज तक कोई त्यागी मुनि आते ही नहीं। क्योंकि हम लोग मानते ही नहीं कि पंचम काल में भी मुनि होते हैं। क्या यह संभव हैं?
सत्य :- दोष नहीं महादोष जानते नहीं तुम लोग राजा श्रेणिक मुनि द्वेष से नरक में चला गया। लोगों ध्यान से सुन लो इतनी सी बात में ही तुम्हें समझ में आ जायेगा। दीपक तो जल रहा हैं मगर तेल नहीं हैं। लोग रहते हैं घर में मगर आपस में मैल नहीं हैं। आज धर्म सभाओं में भी पापी गुरु की निंदा करने से चूकते नहीं हैं। लेकिन त्यागी मुनि बनना कोई खेल नहीं हैं।
लोग :- ब्रह्मचारीजी आपकी बात पूरी की पूरी दिमाग में ही नहीं हृदय में बैठ गयी हैं। आज से हम संकल्प लेते हैं कि गुरुओं को गाँव में लायेंगे, उन्हें आहार देंगे। उनकी भक्ति करेंगे। और जीवन सफल करेंगे।
[ ब्रह्मचारी जी के पैर दबाते हैं ]
सत्य :- नहीं-नहीं हमें शारीरिक सुख से क्या प्रयोजन शरीर जड़ हैं। शरीर को दबाने से आत्मा कर्मों से दबती हैं।
लोग :- आप पहुँचे हुए महात्मा हैं। आप हम जैसे अज्ञानियों को कुछ उपदेश देकर उपकार कीजिए।
सत्य :- हम लोगों को दुनियाँ के उपकार से क्या लेना देना हमें तो सिर्फ अपनी आत्मा से प्रयोजन हैं।
(5) लोग :- सत्य है महाराज सत्य हैं। आप त्यागी व्रती लोगों को संसार से क्या प्रयोजन, क्या लेना-देना, आप धन्य हैं। हमारे सौभाग्य हैं जो आपके दर्शन पाए यदि आपके चरण घर पड़ जाए तो घर स्वर्ग सा हो जाए। आप कल सुबह के भोजन का निमंत्रण स्वीकार कर लो तो हमें बड़ी खुशी होगी。
सत्य :- आप लोगों ने त्यागियों का कभी सत्संग नहीं किया है。 इसलिए आप लोग कुछ नहीं जानते कि रात्रि के समय त्यागी को भोजन का निमंत्रण नहीं दिया जाता。 जिसके बीच रात उसकी क्या बात。
(6) लोग :- ठीक हैं त्यागी जी जैसी आपकी इच्छा [ लोग कुछ देर बैठते हैं ]
सत्य :- [ आँखें बंद ] भाइ अब हम स्वाध्याय करना चाहते हैं। एकान्त चाहते हैं। कोई ग्रंथ हो तो दे दो। हम स्वाध्याय करेंगे।
(7) लोग :- [ एक ने ग्रंथ दिया ] ब्रह्मचारी जी स्वाध्याय के बाद आराम करने के लिए घर चलियेगा।
सत्य :- हमें घर से क्या लेना-देना हमारा तो मंदिर ही घर हैं। पत्थर शिला ही बिस्तर हैं। जिसने व्रतों को धारण किया हैं। उसे घर और बिस्तर से क्या प्रयोजन। आप लोग चिन्ता न करें। मेरा जो कुछ भी हैं। सबा यही हैं।
[ सभी लोग चले जाते हैं। सत्य दरवाजा बंद करता हैं घड़ी देखता हैं। कुछ देर बैठता हैं। फिर भगवान के सम्मुख खड़े होकर बोलता हैं ]
सत्य :- भगवान! आज मैं तुझे यहाँ से उठाय उठाने आया हूँ। आज दुनियाँ की कोई ताकत मुझे रोक नहीं सकती आज मैं यहाँ सिर्फ मैं हूँ। देखा तुमने तुम्हारे भक्तों को किस बेवकूफ बनाकर यहाँ आया हूँ सभी मुझे त्यागी समझने लगे गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करने लगे ये घर जाने के लिए लेकिन पहले तो मैं ही तुम्हें ले जाऊँगा। फिर झूठ वेष धारण करके तुम्हारे भोले और मुर्ख भक्तों की भक्ति का नाजायज फायदा उठाऊँगा। फिर एक से एक सेठों के घर भोजन करने जाऊँगा, विश्राम करने सबे घर जाउँगा सबको एक-एक करके साफ करके दुनियाँ का सबसे बड़ा रईस आदमी बन जाऊँगा। हीरे जवाहरात मेरे कदमों में लेते रहेंगे [ खुंखार हँसी हँसता हैं ] तुम तो कुछ छोगे नहीं भगवान। तुम तो हाथ पर हाथ धरकर ध्यानस्थ रहते हो, पर अच्छा हैं। तुम तो कुछ पैसे ही रहना नहीं तो मेरा काम बिगड़ जायेगा समाज के कुछ तुम्हरे भक्तों ने तुम्हें मंदिर में कैद कर रखा हैं। मैं तुम्हें यहाँ से बहुत दूर विदेरा ले जाऊँगा। वहाँ पर तुम्हारी असली कुद्र का पता चलेगा। जब मैं धन ही
धन में नहाउँगा [पहले मूर्ति सरकाने की कोशिश करता हैं] अरे ये तो सरफ ही नहीं रही हैं। तो क्या इसके टुकड़े करना होगा। हाँ यह ठीक रहेगा। [हथौड़ा उठाता हैं] हाथ जोड़ता हैं। भगवान देखो मेरी मदद करो। मैं तुम्हारे और मेरे भले की कह रहा हूँ। हिल जाओ भगवान [पर हिलते नहीं]
सत्य :- [एक टक मूर्ति को देखते हुए] तो आप हिलेंगे नहीं। अब मुझे [हथौड़ी] ही कुछ करना होगा [सत्य की आँखे भगवान की नेत्रों से मिलती है] ओह क्या नेत्र हैं शांत जैसे समुद्र किनारे की शांति का रूप हैं। सारी दुनियाँ से कोई लेना न देना। तटस्थता कैसी हैं तुम्हारी जैसे सारी दुनियाँ की ताकत का भंडार हो। अरे यह क्या मुझे कोई खींच रहा हो [आँखे बंद कर लेता हैं]
आकाशवाणी :- क्या सोच रहे हो वत्स! प्रहार नहीं करोगे। तुम्हारे हाथों को क्या हो गया हैं। आज [सत्य के हाथ से हथौड़ी गिरती हैं] अभी कुछ देर पूर्व तो तुममें बड़ा जोश था। कहाँ खो गये हो तुम।
सत्य :- ये ये मैं क्या सुन रहा हूँ। कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा हूँ। नहीं-2 यह सत्य यह किसी अदृश्य की आवाज हैं। [पसीना पोछता हैं घबरा जाता हैं आँखे बंद कर लेता हैं]
आकाशवाणी :- क्या कारण हैं। कि अपना नियोजित कार्य भी नहीं कर पाये। तुम अपने कार्य में कुशल होने-होने का दावा करते थे ना। अब कहाँ गया तुम्हारा वह अभिमान लगता हैं तुम डर रहे हो। पर डर किस बात का। यहाँ कोई भी तो नहीं हैं। अरे तुम्हारे हाथ पैर क्यों काँप रहे हैं वत्स याद हैं बचपन में तुम एक बार अपनी माँ के साथ यहाँ आये थे। मैं हूँ। एक सम्यग्दृष्टि देव मुझे ज्ञात था तभी से कि तुम आओगे अवश्य विलम्ब से ही सही आज तुम आ ही गये तुम्हें भी अति शीघ्र मार्ग स्वीकार करना हैं। आओ वत्स आमो।
सत्य :- [आकाशवाणी]
लक्ष्य बिना चलना ये चरणों का अभिशाप हैं।
विश्वास दे के छलना ये सबसे बड़ा पाप हैं।
हाँ। धिक्कार हैं मुझे हे प्रभु मैं पापी हूँ। अधम हूँ मुझे इस पाप से बचाओ मेरी रक्षा करो मुझे प्रकाश दिखाओ प्रभु [एक प्रकाश दिखाई देता हैं] मैं यह कैसा पाप कर रहा था। प्रभु लेकिन, अब मैं ऐसा नहीं कर सकता [रोते हुए] इतना बड़ा पाप कल से सभी लोगों का त्यागी
लोगो से विश्वास उठ जायेगा धर्म से विमुख हो जायेंगे जो भगवान की मूरति सन्मार्ग प्रदर्शक हैं। उन्हें मैं चुरा कर ले जाऊँ। नहीं नहीं ऐसा कभी नहीं होगा, जब तक इस तन में प्राण हैं। ऐसा नहीं होने दूंगा
किये तिशनावश संघ भारी, करुणा नहीं रंच विचारी इत्यादिक पाप अनंता, हम कीने श्री भगवंता
हे भगवान मैंने अपनी जिंदगी में कितनों के सिंदूरों को पोंछा हैं। कितने घरों को उजाड़ा हैं। उस पाप का प्रायश्चित कैसे होगा
आकाशवाणी :- वत्स अधीर मत होजो। धैर्य रखो तुमने जो छद्म से यह वेश धारण किया हैं। उसे सही वेश बना लो। अतीत के पाप धुल जायेंगे
सत्य :- क्या, क्या यह सत्य हैं तो फिर मैं ऐसा ही करूँगा हे मित्र तुम मेरे आदर्श हो। एक बार मुझे अपना रूप दिखा दो, मुझे तुमसे मिलने की तीव्र जिज्ञासा हो रही हैं। अब मुझसे तुम आँख-मिचोली मत खेलो मित्र मैं आज से संकल्पित हूँ, कि मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा आओ आओ मेरे देवता -- -- -- --
[ देव का प्रकट होना ] [ अदृश्य हो जाता हैं ]
देखता हैं 12 बजे दरवाजा खटखट होता हैं
सत्य :- कौन? अच्छा आ गए हे प्रभो मुझे शक्ति दो मैं उन्हें भी आपके मार्ग पर ला सकूँ
आकाशवाणी :- तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी [ दरवाजा खुलता ]
चोरों का प्रवेश :- चारों के हाथ में हथौड़ी हैं। [ एक ही आवाज में ] कहाँ हैं सत्य अपना वो खजाना जल्दी बताओ अब देर न करो। हम पूरी तैयारी से आये हैं
सत्य :- चलो मैं तुम्हें वही ले चलता हूँ देखो [ मूर्ति के पास ले जाता हैं ] यह वही हैं [ चारों हथौड़ा लेकर खड़े हो जाते हैं ] चारों के हाथ थाम लेता हैं रुको, पहले इसे निहारों एक-2 अंग को [ चारों एक रुख देखते हैं अंत में नेत्र की ओर देखते हैं ] चारों ही जड़ हो जाते हैं धीरे-2 चारों के हाथ से कुल्हाड़ी गिरती हैं। आँखें चारों की बंद हैं
सत्य :- मित्र क्या डर रहे हो किसका ध्यान कर रहे हो चार बज चुके हैं। अब लोगों के जगने का समय हो चुका। अब तुम्हारा काम नहीं हो सकेगा। चोरों आँखें खोलते हैं। सबके आंखों में आँसू हैं
NOTES चोर :- भाई सत्य यह काम नहीं कर सकेंगे
हमने कितना बड़ा पाप किया है। भगवान की शांत मुद्रा देखकर बस अब तो ऐसा ही लगता हैं कि पूर्व में किये पापों का प्रायश्चित कैसे करें। सत्य माफ करो। आज से हम अपना मार्ग छोड़ना चाहते हैं। प्रभु जैसा ही शांति का मार्ग खोजना चाहते हैं।
सत्य :- मैं भी तुम्हारे भावों को प्रणाम करता हूँ। आज से हम पाँचो मोक्ष मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। ठीक है।
( पाँचों के द्वारा भजन ) अरिहंत देव स्वामी
[ सब आपस में संकल्प के लिए कायोत्सर्ग करते हैं ]
दृश्य - परिवर्तन
प्रातः का समय
( लोगों का आना आश्चर्य से आपस में बातचीत करना कि एक से पाँच कैसे हो गये लेकिन समाधान नहीं हो पाया।)
(4) लोग :- ब्रह्मचारी जी आज तो हम आपका प्रवचन जरूर सुनेंगे।
सत्य :- ठीक हैं आप लोग जिद् करते हैं, तो अब सुनाना ही पड़ेगा। प्रवचन को बैठ जाता हैं। सत्य उसकी माँ, शेष लोग व चारों चोर थे।
सत्य :- ओम नमः सिद्धेभ्यः मैंने शांतिनाथ प्रभु के दर्शन करके असत्य से सत्य का मार्ग पाया हैं। अब मैं ज्यादा कुछ बोलना नहीं चाहता। मैं सद्गुरु की खोज में जाना चाहता हूँ। अतिशीघ्र आत्मा कल्याण करना चाहता हूँ। शांतिनाथ भगवान की जय
( माँ भी वही थी - वह सत्य पहचान लेती हैं )
माँ :- बेटा तू मेरा लाड़ला बेटा कहाँ या इतने दिन अब तू उतना महान बन गया। बेटा अब तू घर चल इस तरह मैं तुझे इतनी छोटी उम्र में घर नहीं छोड़ने दूंगी। चल बेटा चल अब तो मेरा कहना मान ले।
सत्य :- (माँ के चरण छूते हुए) माँ आपके ही संस्कारों का फल हैं जो मैं तुम जैसी माँ को पाकर। अब मोह मत करो। आशीष दो मैं अपने पथ पर सफल हो सकूँ।
माँ :- बेटा कुछ दिन तो रुक जाओ। मेरे लाल फिर चले जाना मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी।
सत्य :- नहीं माँ जीवन का मौलिक समय बरबाद मत होने दो, एक-एक क्षण कीमती हैं। तुझे जाने दो माँ।
( चरण छूकर चल पड़ता हैं माँ देखती रह जाती हैं पाँचों चल )
चढ़ते हैं दूर सुंदर वही वन में ------ [ छोटे आचार्यश्री जी की ] गुरु के दर्शन कर आज हम धन्य हो गए जिसकी हमे प्रतीक्षा थी वे सामने हैं। [नमस्कार करके] पाँचो :- गुरुदेव हम भी दीक्षित कीजिए। अपने समान बना लीजिए। संसार के भ्रमण से हम प्रगमित हैं। [ पीछे से आवाज - तथास्तु, पुण्योदर्विसिस्तु ] [ दीक्षा के संस्कार शुरू ] ओम नमः सिद्धेभ्यः :- 2 के कल्याण का मन्त्र उच्चारण। दुपट्टा दूर फेंके देना धीरे-2 पर्दा बंद हो जाना। डाकू से हो गए ये पाँच साधु
हृदय परिवर्तन हो गया शांतिनाथ के दर्शन से, विद्यासागर के दर्शन से बन गए वे पाँचो साधु धन्य है उनके गाव / धन्य है उनका जीवन
************* समाप्ति *************