कोसमा का सूरज
सूत्रधार :- महापुरुषों के जीवन की कोई घटना सामान्य नहीं होती। यूँ कहें- हर घटना उनके संपर्क में आने से विशेष हो जाती है, घटना ही क्या उनके संपर्क में आने वाले लोग, स्थान, परिवेश तक विशेष हो जाता है। अथवा यूँ भी कह सकते हैं - संस्कारित, पुण्यवान गृह - कुटुंब में ही ऐसी विमल-ज्योत उज्ज्वलित हो सकती है, जिस पर आज सारा विश्व गर्व करता है। जी हाँ, आप समझ गये होंगे उस विमल ज्योत का रहस्य, तो परम पूज्य वात्सल्य रत्नकर आचार्य श्री 108 विमल सागर जी महाराज ही ऐसी ज्योति के रूप में हमें प्राप्त हुए थे जो आज प्रत्यक्ष न होने पर भी अपने अनेक शिष्यों और भक्तों के नयनों व हृदयों में समाविष्ट हो चुके हैं।
अब आपको ले चलते हैं उनके अमित इतिहास की ओर... सर्वप्रथम आपको ज्ञात करा दें कि उनकी दादी के संस्कारों से परिचित करवाते हैं जिनका कालांतर में पू. आ. श्री विमल सागर जी के चारित्र पर प्रभाव पड़ा था। ग्राम कोसमा से तीन कि.मी. दूर ग्राम तखातन की ओर चलें। जहाँ श्री ठाकुरदास दिवाकर जी यानि विमल सागर जी महाराज के गृहस्थिक दादाजी व श्रीमती शीलाजी यानि उनकी गृहस्थिक दादी जो अपनी युवावस्था में थे। दादाजी - 19 वर्ष व दादीजी 15 वर्ष की थी, जब उनका विवाह हुआ, विवाहोरान्त नववधु शीलाजी ने जैसे ही गृह प्रवेश किया तो -
दृश्य. - 1 (कुछ महिलायें उन्हें (नववधु) लेकर गृह प्रवेश करती हैं व बैठने का आग्रह करके नववधु के साथ बैठ जाती है।)
एक महिला - बड़ी पुण्यवान हो बहिन, जो सेठ साब की पुत्रवधू बनी हो, ये तुम्हें बहू की तरह नहीं, बेटी की तरह रखेंगे।
दूसरी - आय हाय, राज करोगी राज, न पैसों की कमी है, न घर में कोई कमी है, न वर में कोई कमी है।
तीसरी - अरे, बतियाती ही रहोगी कि बहू को भोजन भी कराओगी ?
सब एक साथ - हाँ, हाँ चलो बहुरानी को भोजन करायेंगे।
(हाथ पकड़कर) चलो ना बहिन।
(नववधु सिर नीचा किये मौन ही बैठी है)
एक महिला - क्या हुआ, तबीयत खराब है या संकोच करती हो?
दूसरी - हमारी ओर देखो तो सही।
इतने में सास का प्रवेश -
सास - क्या बात है मेरी बहू को क्यों परेशान कर रही हो?
एक महिला - परेशान हम नहीं, ये हमें कर रही है। अब आप ही पूछिये किये हमारे साथ भोजन के लिये क्यों नहीं चल रही?
सास (बेहद प्यार से) - बहू, क्या बात है मुझसे तो कहो।
नववधु (सकुचाकर) - माँ, मेरा नियम है कि बिना जिनदर्शन के आहार ग्रहण नहीं करूंगी।
(सब महिलायें आपस में एक - दूसरे को संकेत कर रहा है, अब क्या होगा क्योंकि गाँव में जिनमंदिर नहीं है)
सास (धीरे से) - अब मैं मंदिर कहाँ से लाऊँ?
परोक्षेप
सूत्रकार - तो आपने देखी बहुरानी की प्रतिज्ञा और परिवार की चिंता, सब अपने - अपने तरीके से उपाय खोज रहे हैं, पहला दिन तो निराहार निकल गया, दूसरा दिन -
दृश्य - 2
सूत्रकार - (इसरे दिन ससुरजी दलाल में खड़े होकर बहू को समझा रहे हैं, क्या समझा रहे हैं - स्वयं देख लीजिए)
ससुरजी - बेटी शीलरानी, यहाँ तो आओ।
नववधु - हाँ, पिताजी, आई (पाद - चरण स्पर्श करती है)
ससुरजी - बेटी शीलरानी, मंदिर नहीं है तो धीरे - धीरे वह भी बनवा देंगे। अभी भगवान पार्श्वनाथ की तस्वीर के दर्शन करो को, इसी के समक्ष भावपूजा कर लो ताकि तुम्हारी ननदें
(की आवाज गूंजने लगती है) - ले लो प्रतिमा जी ले लो - 2
एक महिला - तुम लोगों ने सुना?
सब महिलाएँ - (खुश होकर) - हाँ, हाँ, पर यह क्या बेसा है, देखें चलकर देखते हैं।
सुना 1 - सच है, जहाँ चाह वहाँ राह होती है।
एक महिला - अब तो बहू को दर्शन करके आहार करना सकते हैं।
सेठजी - (गाड़ी वाले को रोकते हुए) - रुक - 2 गाड़ी वाले। (गाड़ी वाला रुक जाता है)
सेठजी - भाई काहे की प्रतिमा है?
गाड़ीवाला - जी, तीर्थंकर पार्श्वनाथ की।
सेठजी - पाषाण निर्मित?
गाड़ीवाला - हाँ, हाँ, पाषाण निर्मित।
सेठजी - बतलाना, भला! (हाथ में लेकर देखते हैं मूर्ति पर पेड़ श्वेत वस्त्र को म्योते हैं और) - वाह - वाह क्या कलकृति है, मेरा रोमन मुग्ध हो गया। (इतने में घर की महिलायें, पड़ोसन आदि - 2 लोग चारों तरफ से आकर सेठजी को घेर लेती हैं)
सब - सेठजी, हमें भी दिखलाना, (सब हाथ में ले - लेकर देखते हैं और मूर्ति की भरी प्रशंसा करते हैं) वाह, कितनी सुंदर है ये प्रतिमा।
सब - नाम तिहार वर्णहारा, कब तेरा दर्शन लेग़ा। तेरी प्रतिमा इतनी सुंदर, तू कितना सुंदर होगा ।। सेठजी - नेरेन्द्र, फणीन्द्र - - (फिर कुछ सोचकर) अरे, मैं तो ये ही भूल गया कि ये मंदिर नहीं, रास्ता है। (गाड़ी वाले से) - भैया, इसकी न्योछावर क्या लीजियेगा?
गाड़ीवाला - जी, ग्यारह रुपए नकदी। (सुनते ही सबकी आँखें खिंच गईं, आपस में खुसर - फुसर प्रारंभ - 11 रुपये, इतनी महंगी?)
सूत्रकार - सत्य है, इस समय के वर्ष सन् 1870 के, लगभग
रुपए आज के 10,000 रुपयों के बराबर अवश्य रहे होंगे।
सेठजी - कोई बात नहीं, बहू रानी के लिये ये भी कुछ नहीं है।
(श्रीमती को संकेत करते हुये) सुनती हो जी, अभी तिजोरी से 11/- ले आओ।
सेठानी - जी, अभी लाई।
(तुरंत जाकर एक थाली में 11/- व तिलक ले आती है)
सेठानी - वाह-वाह, अच्छा कार्य किया (सामग्री हाथ में लेते हुए) (सेठजी गाड़ी वाले को तिलक लगाकर, 11/- रु. की राशि ससम्मान भेंट करते हैं, सब ताली बजाते हैं)
सेठजी - आओ बहू, अब हम सब मिलकर प्रतिमा का लघु पंचकल्याणक करते हैं।
(परोक्षेप)
सूत्रकार - (दर्शन कर बहू ने भोजन किया, सारा परिवार बहुत प्रसन्न हुआ, तो आपने देखा दादी के संस्कार, अब चलते हैं- माता-पिता के संस्कारों की ओर)
दृश्य - 3
सूत्रकार (2) - अब चलते हैं भारत के उत्तर प्रदेश, एटा जिले के अन्तर्गत एक पुण्यशाली गांव कोसमा की ओर जहाँ एक धार्मिक दंपति श्रीमान बिहारीलाल व पत्नी - श्रीमती कटोरीबाई जी आनंद जीवन यापन कर रहे हैं।
कटोरीबाई - अहो नगर श्रेष्ठी जी! फाल्गुन माह में सोनागिरिजी के मेले में नहीं चलियेगा? मेरा मन वहाँ के मूलनायक भगवान चंद्रप्रभु की पूजा के लिए व्याकुल हो रहा है।
बिहारीलाल - मेले में पहुँचना और प्रभु का अभिषेक करना हमारी परंपरा रही है, कभी किसी कारण से न पहुँच पाये हों, तो अलग बात है अन्यथा हम लोग तो हर साल सपरिवार जाते रहे हैं।
कटोरीबाई - हाँ, जबसे मैं इस परिवार में आई हूँ, बराबर देख रही हूँ।
बिहारीलाल - तो इस बार कुछ विशेष कारण है क्या? (सुनते ही कटोरीबाईजी की दृष्टि लज्जा के कारण नीची हो गई, वह कुछ न कह सकी) बिहारीलाल (सांत्वना दिलाते हुए) - हाँ भाई, समझ गया। जिस नये मेहमान का आगमन आपकी कुक्षि में हो चुका है, उसके शुभ के लिये है यह यात्रा। (कटोरी जी अब भी नीचे ही देख रही हैं और इस उत्तर को सुनकर तो वे शीघ्रता से चली जाती हैं।
बिहारीलाल - सुनो तो क्या हुआ?
कटोरी जी - मुझे बहुत सारा कार्य करना है। फिर मेला जाने की तैयारी भी तो करनी है। (बिहारी लाल जी भी पीछे-चलते जाते हैं।)
पर्दाक्षेप सूत्रकार - तो आपने देखा- सुना होगा 'ललना के गुण पलना में दिखते हैं', पर यहाँ तो ललना के गुण गर्भ में ही दिखने लगे हैं। आखिर माँ कटोरी के गर्भ में तीर्थक्षेत्रों से विशेष प्रीति रखने वाले गुरुवर विमल सागर जी विराजमान हो चुके हैं।)
दृश्य - 4 सूत्रकार - (दंपत्ति अपने पूज्य माता-पिता के पास यात्रा की अनुमति लेने पहुँचते हैं। बिहारीलालजी के पिता श्री ठाकुरदास जी व बहिन श्रीमती दुर्गा जी आपके समक्ष बैठे हैं।) तभी-
बिहारीलाल व कटोरीजी - (पैर छूकर) पिता श्री, बुआ श्री हम दोनों सोनागिरि जी की यात्रा पर जाना चाहते हैं, आप हमें अनुमति प्रदान करें।
पिता व बुआ - सहर्ष अनुमति है। भावसहित वंदना कीजिए। (पर्दा गिरता है)
सूत्रकार - (अनुमति पाकर दंपत्ति सेनागिरि यात्रा पर निकल पड़ता है और भावसहित वंदना करते हुए चंद्रप्रभु मंदिर में पहुँचे)-
कटोरी जी (हाथ जोड़कर) - हे प्रभु! मेरा शिशु समाज में श्रेष्ठतम बने।
बिहारी जी - (हँसते हुए) अरे, भगवान तो सब जानते हैं, नहीं भी कहोगी तो भी जान लेंगे।
कटोरी जी - (भोलेपन से) - तो मेरी मनोभावना पूर्ण होगी ना?
(बिहारीलाल जी मुसकाकर) - अब आगे भी चलना है या नहीं?
कटोरीजी - चलिये।
(दोनों बोलते तो हाल के बाद शांतिनाथ के मंदिर (भट्टारकों के मंदिर) में विराजित भट्टारक जी के समक्ष रुक गये)
दोनों - प्रणाम भट्टारक जी।
भट्टारक जी - धर्मवृद्धि करो। (हाथ उठाकर)
बिहारीलालजी - बस, आपका आशीर्वाद मिलता रहे तो हम नित्य ही धर्म वृद्धि करते रहें।
भट्टारक जी (कटोरी जी से) - बेटी! आप लोग पुण्यशाली हैं। आपके यहाँ होनहार बालक का जन्म होगा। आपके जो प्रभु वंदना के भाव जगे हैं, वे उसी पुनीतात्मा का प्रभाव है, जो अभी आपके गर्भ में स्थित है।
बिहारीलाल जी (खुश होकर व हाथ जोड़कर) - बाबांजी! संकल्प ले रहा हूँ कि शिशु का मुण्डन संस्कार भगवान चंद्रप्रभु मंदिर के पावन-परिसर में ही कराऊँगा।
(कटोरी जी यह बात सुनकर मुसकुरा जाती हैं) (भट्टारक जी से)
कटोरी जी - आपने तो मेरे मन की ही बात कह दी है। बाबांजी! ऐसा आशीर्वाद दें कि हमारी संतान हमसे भी बढ़कर धर्मात्मा निकले।
भट्टारक जी (मुसकाकर तथा पिछ्ठी से दोनों को आशीष देते हुए) - आशीर्वाद है।
पर्दाक्षेप
सूत्रकार - आपने देखा कि पूज्य आचार्य गुरुवर श्री विमल सागर जी गुरुवर का सोनागिरि से संबंध कितना पुराना है, गर्भ से ही उन्होंने सोनागिरि-वंदना आरंभ कर दी थी, जय बोलिये --- की)
दृश्य - 5
सूत्रकार - (आसोज कृ. 7 वि.सं. 1973 (ईस्वी सन् 1916) को भारतवर्ष के इस महान संत ने जन्म लिया। परिवार ही क्या पूरे गांव में खुशियों की लहर दौड़ गई, लेकिन कहा जाता है कि कभी-कभी खुशियों को भी नजर लग जाती है, शिशु मात्र 6 माह का ही हुआ था और कटोरी जी उसे छोड़कर स्वर्गवासी हो गई। (शिशु के सिर से मां का साया हट गया, सारा परिवार दुखित मुद्रा में बैठा चर्चा कर रहा है, बच्चा पलने में झूल रहा है, उसे देखकर-)
ठाकुरदास जी (फूट-फूटकर रोते हुए) - ये कैसा कर्म उदय में आया है। बिन माँ के बालक का क्या होगा ?
दुर्गा जी (बुआ - सिसकती हुई) - फागुन का महीना ये कैसा रंग दे गया है ?
लाल जी - (बुआ का पुत्र - उम्र 15 वर्ष) - क्या दुभगिय को इसकी मासूम सूरत पर नहीं दया नहीं आई ?
बिहारीजी - यही माह तो था जब गत वर्ष हम दोनों सोनागिरि जी गये थे। हमें क्या पता था कि कटोरीजी इतनी जल्दी साथ छोड़ जाएंगी।
ठाकुरदास जी - इस नादान शिशु के भाग्य में न जाने कितने दुख लिखे हैं ? न जाने इसका भवितव्य क्या है? जिसका वर्तमान दुखी है उसके भविष्य से क्या आशा की जाये ? ठीक से इसे खिला ही नहीं पाई और माता चली गई ! छह माह का हो गया, नामकरण तक नहीं हो पाया ! मैं तो कल शीघ्र ही ज्योतिषी से इसकी जन्म कुंडली बनवाकर नाम रखवाऊँगा।
(पर्दाक्षेप)
सूत्रकार - (दादाजी की चिंता स्वाभाविक थी, अतः वे कुछ ही दिनों बाद एक ज्योतिषी के पास पहुँच जाते हैं।)
ज्योतिषी जी (सेठजी को ओर देखकर) - आइए, आइए सेठ साब, कहिये क्या सेवा करें आपकी ?
सेठजी - पोते की कुंडली बनवानी है। ये वो कागज़, इसमें जन्म-समय, स्थान, तिथि, सब लिख दी है।
ज्योतिषी - (हिसाब लगाते हुए) (पत्रा देखकर) - जैन साहब! चिंता न कीजिए यह बच्चा महान भाग्यशाली है, साधु - संत बनेगा। राशि को देखते हुए इसका नाम 'न' अक्षर से बनता है।
दादाजी - (भोलेपन व सहजता में) - हमारे तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ, नमिनाथ का नाम श्री 'न' से बनता है जैसे - नमिनाथ, नेमिनाथ।
ज्योतिषी - ठीक है, आप चाहें तो नेमीचंद नाम रख सकते हैं।
पर्दाक्षेप - (1)
सूत्रकार - (बालक का नाम - नेमीचंद रखा गया है, तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ के नाम पर। कोई उन्हें प्यार से उन्हें नेमी, कोई निम्मा तो कोई नेमा भी कहने लगा। धीरे-धीरे समय बदला, नेमीचंद जी स्कूल जाने लगे और शाला के सबसे शांत और कुशाग्र विद्यार्थी के रूप में उभरकर आए। पिता, बुआ बाबा और बड़े भाई (बुआ के पुत्र) का लाडला नेमीचंद धार्मिक संस्कारों के बीच गुलाब सी महक प्राप्त करता जा रहा था। अब आपके सामने दृश्य है - पिता द्वारा पुत्र को दी गई अविस्मरणीय शिक्षा का) - दृश्य - 6
(नेमी कहीं से खेलते - खेलते थककर आये और धम्म से एक तख्त पर बैठ गये, जिस पर चीटियाँ चल रही थी)
नेमीचंद - ओहो, आज तो बहुत खेल लिया, अब थकान लग रही है।
बिहारीलाल जी - (चीटियों को देखकर बचाते हुए नेमी के समीप बैठकर) - बेटा नेमी! तुम हिंसक हो या अहिंसक?
नेमी - पिताजी, मैं तो अहिंसक हूँ।
बिहारीलाल जी - तो बताओ, जिसे अहिंसा पालन की भावना होती है, वह कैसे चलता है, कैसे बैठता है, कैसे उठता है, बतला सकते हो?
नेमी - जी, नहीं।
बिहारीलाल जी - बड़ा सहज है।
नेमी - कैसे?
बिहारीलाल जी - सदा देखकर चलना, देखकर बैठना और देखकर उठना। अब देखो, जहाँ तुम बैठे हो, वहीं समीप से कितनी चीटियाँ रेंग रही हैं।
नेमी - (देखकर) ओह पिताजी, मैंने तो देखा ही नहीं था।
बिहारीलाल जी - इसका मतलब है कि यदि तुमने पहले देख लिया होता तो न बैठते। बिना देखे बैठने से, जीव हिंसा तो होती ही है, कभी-कभी बैठने वाले को भी परेशानी हो जाती है। मानो चीटियाँ तुम्हें काट देतीं तो परेशान होते कि नहीं?
नेमी - जी, होते। हो सकता था कि वे मर भी जातीं, तब दोहरा संताप होता।
बिहारीलाल जी - बेटा, इसीलिए कहा है - देख-भाल चल। हम और तुम तो आदमी हैं, कभी कुत्ते की ओर ध्यान देना, वह भी बैठने के पूर्व जमीन साफ करता है या साफ जमीन देखकर बैठता है।
(पर्दा गिरता है)
सूत्रकार - (पिता तो कहकर चले गये पर नेमीचंद के मन में पिता के शब्द बार-बार गूंज रहे हैं - कुत्ता भी जमीन साफ करके बैठता है। इस समय तो उन्हें इसका विशेष रहस्य समझ नहीं आया पर बाद में पचास साल बाद उन्होंने स्वीकारा था जब वे भारत में सर्वश्रेष्ठ आचार्य की स्थिति में विचरण कर रहे थे कि, पिता की वह शिक्षा ही मेरे साये हुए अंतस में वैराग्य जगा गई थी। इसके बाद सन् 1930 में (फिरोजाबाद में विराजमान) पूज्य आचार्य श्री शांतिसागर जी के दर्शन हेतु मात्र 14 वर्ष की आयु में नेमीचंद जी ने पैदल - पैदल 20 km. का रास्ता तय किया था और उन्हीं से जैनेंद्र के संस्कार भी प्राप्त किये थे। 15 वर्ष की आयु में उन्हें अग्र अध्ययन हेतु मोरेना विश्व-विद्यालय भेजा गया, जहाँ उन्हें शिक्षागुरु पं. मक्खनलाल जी एवं पं. नन्हेलाल जी, शिवमुखलाल जी, नाथूलाल जी कटारिया, ह्रदयलाल जी का सानिध्य प्राप्त हुआ।)
दृश्य - 7
(16 वर्षीय नेमीजी को कोई खेल पसंद नहीं था, वे तो धर्म-ध्यान में रूचि रखते थे। एक दिन) -
श्यामासुंदर लाल (मित्र) - नेमा, नेमा, चलो ना, सब खेल रहे हैं, हम भी खेलते हैं।
नेमी - लेकिन मुझे गृहकार्य करना है।
दूसरा मित्र - चलो किताब के कीड़े नहीं बनना चाहिए।
सब मित्र (एक साथ) - (हाथ पकड़कर) आज तो हम जबरस्ती ले जाएँगे।
नेमी (मुसककर) - हाँ, हाँ, छोड़ो तो सही मैं स्वतः आपके साथ चलता हूँ। लेकिन, कबड्डी के अलावा कुछ नहीं खेलूंगा। (कबड्डी मैदान में खेल प्रारंभ होता है)
नेमी - कबड्डी-डू... बोलते हुए (इसी पारी के खिलाड़ियों की तरफ दौड़ते हैं और उनके पकड़ लेने पर खेल से पीछा छुड़ाने के लिए उनकी पकड़ में आ जाते और आउट होकर चले जाते) सीधे मंदिर में और दर्शन कर जाप में बैठ जाते।
अन्य मित्र - तुझसे खेलना नहीं आता, इतनी जल्दी आउट हो गया?
नेमी - (मुसकाकर) अच्छा ही हुआ।
मित्र - क्या कहा? आउट ही होना है तो कबड्डी क्यों खेलते हो?
नेमी - देखो, अब मैं जाकर जाप करूँगा, भगवान के दर्शन करूँगा, खेलने में क्या रखा है?
मित्र - समझ नहीं आती आपकी बात - चलो, छोड़ो ये बताओ, कबड्डी खेलते नहीं बनती तो क्यों खेलते हो?
नेमी - इसमें 3 फायदे हैं -
कबड्डी में इच्छा से आउट होने और मंदिर जी आने का मौका मिलता है।
'तू-तू' शब्दों के उच्चारण और श्रवण से बचने का मौका मिल जाता है।
जो दल संगठित होकर मुझे पकड़ता है, उनमें संगठन के प्रति विश्वास बढ़ाने का अवसर मिलता है।
पर्दा गिरता है
सूत्रकार - (नेमीचंद जी को खेल पसंद नहीं था पर इसका मतलब ये नहीं कि वे खेलना नहीं जानते थे, राष्ट्रीय खेल - कबड्डी में उनकी गहरी पैठ थी साथ ही घुड़सवारी, गिल्ली डंडा, लंबी दौड़, छोटी दौड़ और लंबी कूद में प्रवीण थे।)
दृश्य - 8
सूत्रकार - (नेमीचंद जी एक साहसी छात्र थे - देखें उनका अपूर्व साहस) - (मित्रों में वार्ता हो रही है) -
पहला - भैया, रात में इस पीपल के पास न जाना, इसमें भूत रहते हैं।
नेमी जी - तो इसमें डरने की क्या बात है?
दूसरा - अरे, भूतों से तो दुनिया डरती है, क्या तुम नहीं डरते?
नेमी - नहीं, मैं किसी से नहीं डरता। (मित्र - प्रणाम है तुम्हें, (सब चले जाते हैं)
श्यामासुंदर - मैं भी नहीं डरता।
नेमी - तो चलो, आज रात उन्हें देख आएँ।
श्यामासुंदर - पर कैसे? छात्रावास के दरवाजे तो 9 बजे रात्रि से ही बन्द कर दिये जाते हैं।
नेमी - दरवाजों से क्या लेना-देना? अपने कक्ष की पिछली खिड़की धर्मशाला के छत पर खुलती है। समझ गये?
श्यामासुंदर - हाँ समझ गये। खिड़की से कूदकर छत पर और छत से चढ़कर पीपल पर। किसी को पता ही न चलेगा।
नेमी - तो कब चलें?
श्यामासुंदर - तुम्ही बताओ?
नेमी - आज | आज रात्रि साढ़े दस बजे। तबतक सभी सहपाठी सो जायेंगे।
श्यामासुंदर - और कोई जाग गया तो?
नेमी - उसे भी साथ ले लेंगे।
सूत्रकार - (वे दोनों मित्र रात भर (12 बजे तक) वृक्ष पर बैठे पर भूत तो क्या भूत की आवाज तक नहीं आई, तब) -
नेमीजी - अरे श्याम भैया, लगता है तुम्हें देखकर भूत डर गये हैं अतः तुम नीचे जाकर प्रतीक्षा करो, मैं एक दो घंटे यहाँ बैठकर प्रतीक्षा
करूँगा। शायद मुझे अकेला देखकर आ जाये।
श्यामासुंदर - ठीक है, मगर 2 घंटे बाद भी न आये तो तुम नीचे आ जाना, मैं अकेला ऊपर रहूँगा।
नेमी - ठीक है।
सूत्रकार - (2 घंटे बाद वायदे के अनुसार दो घंटे श्याम जी पीपल पर बैठे और नेमीजी नीचे। परन्तु भूत नहीं आये, इसके बाद भी लड़कों का भय दूर हो गया, पर दूसरी बात सामने आ गई कि स्टेशन के पीछे एकान्त में अवस्थित 'खाकीबाबा की बकिया' में भूत रहते हैं, नेमी ने वहाँ भी तीन बार आधी रात में जाकर तथा सकुशल वापिस आकर सबको भयमुक्त कर दिया।)
पर्दाक्षेप
दृश्य - 9
(दो विद्यार्थी मित्रों के साथ सड़क से गुजरते हुए देखा - एक जटाधारी साधु दरी बिछाये बैठा है, लोग उसे नमन कर आटा या पैसा व्यय करते आ रहे हैं)
नेमी - अरे ये क्या कर रहा है?
सहपाठी - भैया, ये तपस्वी लगता है।
नेमी - कैसा तपस्वी? स्वस्थ आओ पास चलकर देखें।
सहपाठी - हाँ, हाँ चलो।
नेमी - (जाप करते हुए तपस्वी की दाढ़ी को पास से देखकर) - हे भगवान, ये कैसा धर्म है, इसकी जटाओं में तो भिण्डी के बराबर दो मछलियाँ रखी हुई हैं।
सहपाठी - हाँ भैया, कैसा धर्म है ये!
नेमी (तीव्रस्वर में तपस्वी से) - आप जाप दे रहे हैं और जटाओं में मछलियाँ तड़प रही हैं, यह कैसी भक्ति है? इन्हें अभी पानी में छोड़िये।
तपस्वी - अरे बच्चे! तुझे भ्रम हो गया है, ये मछलियाँ नहीं, जल सेम हैं।
नेमी (जमीन से छोटी लकड़ी उठाकर व साधु की जटाओं से मछलियाँ निकालकर दिखाते हुए) - ये क्या हैं?
तपस्वी - (हाथ जोड़कर) - भैयाजी माफ करो, अब कभी भी ऐसी गलती नहीं करूँगा। इन्हें अभी ले जाकर पानी में छोड़ देता हूँ।
(पर्दाक्षेप)
सूत्रकार - (आपने देखी नेमीचंद जी की अहिंसा, करुणा और दूसरों को दी गई शिक्षा का प्रभाव। अब चलते हैं उस ओर जहाँ वे साईकिल से कपड़े का व्यापार करने लगे हैं। व्यापार करते 2 वर्ष बीत गए। मन में आया) - दृश्य - 10
साईकिल पकड़े नेमीचंद जी - क्यों न मैं साईकिल से सम्मेद शिखर जी की यात्रा करूँ।
कही से आते हुए बिहारीलाल - बेटा, साईकिल लिये तैयार खड़े हो, क्या बात है, कहीं जाना है क्या?
नेमी - पिताजी, मैं साईकिल से सम्मेद शिखर की यात्रा पर जाना चाहता हूँ।
बात सुनकर दुर्गाजी बुआ (अंदर से आती हुई) - सम्मेद शिखर वो भी साईकिल से? पता है 600 कि.मी. से भी अधिक दूरी है!
नेमी - पता है, लेकिन आप लोगों का आशीर्वाद रहा तो अवश्य सफल रहूँगा।
लालजी - मुझे तो बात समझ में नहीं आती। तुम्हारी बिना ब्रेक की गाड़ी और इतनी लंबी यात्रा का विचार!
नेमी - अब आप सभी, मुझे विदाई दें ताकि शीघ्र यात्रा आरंभ करूँ। (पैर छूकर)
पिता व बुआ - ठीक है बेटा, अच्छी तरह से वंदना करके आओ।
(नेमी जी दिन भर साईकिल चलाते, रात्रि किसी उपयुक्त स्थान पर विश्राम करते। सुबह स्नान, ध्यान, भोजन के बाद पुनः साइकिल यात्रा प्रारंभ होती। कहते हैं न कि साहस करने वाले की हार नहीं होती, शिखर जी आ गया और जीत गए नेमीजी, तलहटी स्थित धर्मशाला में कमरा लेकर कुछ विश्राम किया और रात्रि 2:00 बजे)
नेमी (घड़ी देखकर तुरंत उठते हुए) - दो बज गए, अभी से चलना शुरू करना हूँ, पहाड़ों के ओड़, तिरछे रास्ते हैं फिर तीन वंदनाएँ करना ही है।
(हाथ में पूज की थैली लिये, स्नान करके, सफेद कुर्ता-पैजामा पहनकर व हाथ में चावल की थैली लेकर पहाड़ चढ़ते)
व हर टोंक पर अर्ध्य की पंक्तियाँ गुनगुनाते हुए सहस्रार्ध्य व मस्तक नमाते चढ़ाते जा रहे हैं।
सूत्रकार - (इस तरह तीन दिन में तीन वंदनाएँ संपन्न करके फिर घर की ओर अपनी साइकिल से आ रहे हैं।)
दृश्य - 11
सूत्रकार - (अरे ये क्या, शिखर जी के घने जंगलों में साइकिल बिगड़ गई, अब नेमीजी क्या करते हैं, चलिये देखें।) -
नेमीजी - (साइकिल की जाँच करते हुए) - तुझे भी यहीं बिगाड़ना था, अब क्या करूँ? (सिर पर हाथ रखते हुए) शाम होने वाली है और इस घने जंगल में कहाँ दुकान मिलेगी और कहाँ पाना पिंचिस? हे पार्श्वनाथ भगवान कोई उपाय तो बताओ? (कुछ सोचकर) - ठीक है, मैं तो बलवान हूँ, साइकिल को कंधों पर लेकर चल सकता हूँ। (उठाते हुए) - चल भाई, कल तक मैंने तुझ पर सवारी की, अब तू मुझ पर सवारी कर, ठीक है ना। (घड़ी देखते हुए) ओहो! स्वाध्याय का समय हो गया है (साइकिल द्वारा जमीन पर रखते हुए) - चल, तुझे आराम ही करना है तो लेट जा, मैं तो स्वाध्याय (जाप) करूँगा, समय हो गया है (साफ जमीन देखकर कपड़े से मार्जिन कर पद्मासन में बैठकर णमोकार की जाप शुरू कर देते हैं, जाप पूरी होने के बाद आँखें खोलते हैं) - अरे ये क्या, सड़क के उस पार साइकिल दुकान दिख रही है, जहाँ दाढ़ी वाला आदमी काम कर रहा है - लेकिन पहले तो यहाँ कुछ नहीं था! न ये दुकान, न ये बाबा, खैर, जो भी हो, मेरी साइकिल तो सुधर जाए!
नेमी - (साइकिल दुकान के पास साइकिल ले जाकर बाबा से) - बाबाज़ी, ओ बाबाज़ी।
बाबा - (अतिवृद्ध होने के कारण कठिनाई से देख-सुन पा रहा है) - से बेटा, बोल।
नेमी - बाबाज़ी! मेरी साइकिल सुधार देंगे क्या, अभी-अभी बिगड़ी है।
बाबा - (कानों को जोर लगाकर खींचते हुए) - क्या कहा बेटा, खिड़की है, नहीं।
तो, मेरी तो बस साइकिल की दुकान है, खिड़की कहाँ से लाऊँ।
नेमीचंद - (परेशानी में परेशानी बढ़ती देख बड़े जोर से) - ऊँचा सुनते हो क्या है, क्या बोले, पूजा से सुनाओ पूजा मैं सुनूंगा।
बाबा - (सूत्रकार)
नेमी - (उसके कान में जोर से) - मेरी साइकिल सुधारोगे क्या?
बाबा - हाँ, हाँ तो ऐसा बोलो ना बेटा, हम तो तुम्हारी सेवा के लिये ही यहाँ आए हैं।
(साइकिल सुधारना प्रारंभ करता है व कुछ ही मिनट में) -
बाबा - लो बेटा, बन गई सुधर गई साइकिल।
नेमी - (जेब से पैसे निकालकर देते हुए) - लो, इतने पैसों से काम चल जाएगा।
बाबा - (पैसे लेते हुए) क्या बोले बेटा, नाम, हैं, मेरा नाम तो अचानक़चंद है।
नेमी - ओहो, मैं ये कह रहा हूँ और पैसे तो नहीं चाहिए (जोर से)
बाबा - (कान बंद करते हुए) अरे रे, चिल्लाते क्यों हो, क्या मैं ऊँचा सुनता हूँ?
नेमी - तो मैं चलूँ। (इशारे से थी)
बाबा - हाँ बेटा, पुनः दर्शन देना।
(नेमीजी साइकिल उठाकर चला रहे हैं, 1 कि.मी. पर जाकर याद आया)
नेमीजी - (साइकिल चलाते हुए) - ओहो, पंप तो मैं दुकान पर ही छोड़ आया। (साइकिल पुनः वहीं लौटते हुए) - फिर से दुकान पर चलता हूँ पंप लेने के लिये।
नेमीजी - (दुकान पर पहुँचकर आश्चर्य से) - ऐ, यहाँ न तो दुकान है, न वो दाढ़ी वाला बाबा! ये मेरे साथ क्या हो रहा है (यहाँ-वहाँ घूमकर) लेकिन मेरा पंप तो यहीं रखा है (आकर साइकिल पर रखते हैं और पुनः साइकिल चलाते हुए घर लौटते हैं) इस बार पिता बिहारी लाल जी उससे विवाह की बात करते हैं पर वे मना कर देते हैं। इसके बाद अनेक जगह शिक्षण कार्य व अनेक संतों की सेवा करते हुए वे आचार्य वीरसागर जी के दर्शनार्थ नाँवा
पहुँचे और उनसे ब्रह्मचर्य तथा सप्तम प्रतिमा के व्रत प्राप्त किये। पुनः एक लंबे समय के बाद जब वे घर लौटे तो लालजी से पता चला कि, पिताजी व बुआजी स्वर्गलोक सिधार चुके हैं। उन्हें दुख तो हुआ पर आत्मकसुख भी कि वे तीनों समाधिपूर्वक मरण को प्राप्त हुए हैं। घर में अब उन्हें बिल्कुल अच्छा न लगा, पुनः सम्मेद शिखर आदि तीर्थों की यात्रा पर निकल पड़े।
दृश्य - 12 यात्रा चलते-चलते वे एक दिन फिरोजाबाद गये जहाँ अपने बाल सखा पं. मुरारीलाल जी से मिलने के घर पर दस्तक देते हैं।
नेमी - (दरवाजे पर दस्तक देते हुए) - मुरारीलाल उठो, सुबह 5 बजे क्या अभी तक सो रहे हो।
मुरारी - आवाज जानी-पहचानी लगती है (तुरंत दरवाजा खोलकर) अरे नेमी तू, (दोनों गले मिलते हैं।)
नेमी - मैं अभी फिरोजाबाद के चंद्रप्रभु के दर्शनार्थ जा रहा हूँ।
मुरारी - ठीक है जाइए, पर भोजन हमारे यहाँ करना होगा।
नेमी - भोजन का आश्वासन नहीं दे सकता क्योंकि मेरा संकल्प है कि मंदिर से लौटते वक्त जिसका प्रथम आमंत्रण होगा, वहीं भोजन करूँगा।
(पर्दा गिरता है)
दृश्य - 13 (पूजा के बाद बाहर आकर) -
नेमी - अरे, अभी तो कोई आमंत्रण देने नहीं आया, तो इसका मतलब है कि मुरारी का ही पहला आमंत्रण मानकर उनके यहाँ चलूँ।
(मुरारी के घर आकर) -
मुरारी - आओ-आओ मित्र, मुझे पता था आप मेरे स्नेह को नहीं ठुकराएँगे। आज तो आप कृष्ण की तरह सुदामा के पास आए हो।
नेमी - अरे भाई, क्या बातों से ही पेट भरने का इरादा है?
मुरारी - नहीं भाई, आओ। (दोनों भोजन करके एक तख्त पे बैठे हैं।)
(तभी एक महिला का प्रवेश) -
मुरारी - नेमी, ये दीदी जी हैं।
दीदी - प्रणाम पंडित जी।
नेमी पंडितजी - (हाथ जोड़ते हैं।)
नेमी - दीदी! ये तो बताइए आपके साथ 2-4 दिन पूर्व कोई घटना हुई थी?
दीदी - क्या घटना? (आश्चर्य से)
नेमी - किसी महिला ने आपकी साड़ी का पल्ला काट लिया था?
दीदी - (और आश्चर्य से) - हाँ, पर आपको कैसे मालूम?
नेमी - बस आपको देखकर मालूम हो गया। और कुछ समय पहले आपके बच्चे की मृत्यु हो गई थी?
दीदी - हाँ हो गई थी (आंसू बहाते हुए)
(इतने में वहाँ एक महिला आती है जिसे देखते ही)
नेमीचंद जी (धीरे से) - देखो दीदी, पल्ला इसी महिला ने काटा था।
दीदी व मुरारी - हाँ, पर आप इतना सब कैसे जानते हैं? धन्य है आपकी ज्योतिष विद्या!
(पर्दा गिरता है)
दृश्य - 14
(ने. जी अपने हाथों से भोजन बना रहे हैं इतने में-)
एक ब्रह्मचारी जी आते हैं, जी हैं। जिन्हें देखकर -
पं. नेमी - आइए भैयाजी, भोजन तैयार हो गया है, भोजन करके ही पधारियेगा।
ब्रह्मचारी जी - जी पंडितजी, मैं तो यही सोच रहा था कि भोजन करके ही जाऊँगा और वो भी आपके हाथों से बना हुआ मिल जाए तो आनंद ही दूसरा होगा।
नेमी पंडित जी - हाँ, हाँ, बैठिए, (आसन देकर थाली लगाते हैं) (भोजन करके ब्र.-जी प्रस्थान करते हैं) इतने में -
नेमीचंद (दरवाजा खेलकर) - माँ, बाद में दूंगा, अभी मैं शुद्ध वस्त्र पहने हुए हूँ, भोजन बना लूँ, कर लूँ बस, फिर तुरंत दवाई देता हूँ।
अम्पा - नहीं, नहीं, पंडित जी, मैं बच्चे को अब और परेशान नहीं देख सकती।
नेमी - तो ठहरो अभी लाया दे- (अंदर जाकर चूल्हे से राख की पुड़िया बनाकर लौटते हैं) - ये ले जाओ। गर्म पानी के साथ खिला देना, बच्चा ठीक हो जाएगा।
अम्पा - (पैर छूने का प्रयास करती हुई) पंडित जी धन्य है आपकी करुणा।
नेमी - (पीछे हटते हुए) अरे रे! छूना नहीं, गोले में हैं।
(पर्दाक्षेप)
सूत्रकार - (हा देखा आपने पं. नेमीचंद जी की करुणा, ज्ञान-भक्ति। बड़ी श्रद्धा से बच्चे को वह दवा खिलाती है, बच्चा स्वस्थ हो जाता है, महिला बड़ी खुशी के साथ पुनः पंडित जी के पास आती है) -
महिला - पंडितजी, प्रणाम, चमत्कार हो गया।
पंडितजी - क्या हुआ अम्पा!
पंडित अम्पा - एक बार ही दवा पुड़िया खिलाई और बच्चा ठीक हो गया, मुझे 2-3 पुड़िया और दे दीजिए, कहीं सनकभी फिर से तबीयत बिगड़ गई तो काम आएगी।
पंडितजी - (मुस्कराते हुए) अब दूसरी दवा दूंगा, वो नहीं।
अम्पा - नहीं मुझे तो वही चाहिए।
पंडित जी - (धीरे से) - अब इसे कौन समझाये कि वह दवा नहीं राख थी जो इसकी श्रद्धा से दवा का काम कर गई।
(पर्दाक्षेप)
सूत्रकार - आपने देखी हमारे वात्सल्य रत्नाकर गुरुदेव के जीवन की कुछ घटनाएँ, इन्होंने क्षुल्लक दीक्षा, छेलक दीक्षा व
नेमी - अब तो पुनः भोजन बनाना पड़ेगा, कोई बात नहीं, बना लूँगा।
(पुनः भोजन तैयार होता है, तब तक एक ब्र. और आ गए।)
नेमीजी - आइए भैयाजी, भोजन कर लीजिए।
ब्र. - जी पंडित जी, मैं तो इसीलिए आया हूँ।
(भोजन कराते हैं और वात्सल्य से प्रस्थान भी कराते हैं।)
नेमीजी - तीसरी बार भोजन बनाना पड़ेगा, कोई बात नहीं, बना लूँगा! (लेकिन आटे के बर्तन में हाथ डालकर) - अरे, आटा तो समाप्त हो गया (मुस्कुराकर) कोई बात नहीं, अतिथि सत्कार तो हो गया। (गुड़-मूंगफली निकालकर) - अपना काम तो इससे ही चल जाएगा। (गुड़-मूंगफली खाकर, जाप में बैठ जाते हैं।)
(पर्दा गिरता है)
सूत्रकार :- देखा आपने नेमीचंद जी का वात्सल्य, आखिर क्यों न हो, उन्हें आगे चलकर वात्सल्य रत्नाकर जो बनना है।
दृश्य - 15
(पं. जी भोजन अपने हाथ का बना ही पसंद करते थे, एक दिन किसी कार्यवश उन्हें घर आने में देर हो गई, बरसात का मौसम, वे भोजन बनाने के लिए चूल्हा फूँक रहे हैं।)
नेमीजी - (चूला फूँकते-2 परेशान होकर) - लगता है ईंधन गीला हो गया है, तभी तो आग नहीं लग पा रही (और जोर से फूँकते हैं, जैसे-तैसे चूल्हा जलता है) ठीक रहा, अब कम से कम रोटियाँ बना लेंगे और नमक के साथ ही खा लेंगे, सब्जी बनाने की झंझट कौन करे, वैसे ही पेट खाली है।
(इतने में दरवाजे पर दस्तक देती महिला) - पं.जी! पं.जी! जल्दी दरवाजा खोलिये।
पं.जी (रोटी बेलते हुए) - अरे कौन है, अभी जाओ, बाद में आना।
महिला (दरवाजा ठोकते हुए) - पं.जी! दया कीजिए, बच्चा बीमार है, रात भर रोता रहा, कुछ दवा दे दीजिए, आपका भगवान भला करे।
मुनि दीक्षा प. पू. आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी से प्राप्त की। आचार्य पद 1960 में डूँडला नगर में प्राप्त कर वे अपने समय के एक प्रमुख आचार्य तथा वात्सल्य रत्नाकर के नाम से जगतप्रसिद्ध हो गए। आज उन्हीं का समाधि दिवस यानि उनकी पुण्य तिथि पर हम-आप उपस्थित हुए हैं, उन महान गुरु के प्रति समर्पण विनायंजलि अर्पित करने। उनके अनेक महान शिष्य हुए - आचार्य श्री भरत सागर जी, आचार्य श्री विषण सागर जी आदि-2 में आज भी। पूज्य आचार्य श्री विषण सागर महाराज की मुस्कान में आज भी हमें उनकी मुस्कान दिखती है और मन द्रवित हो जाता है - हे वात्सल्य के अंश, तुम कहीं नहीं जाते। और मन यही कहता है - आचार्य विमल सागर चले आओ फिर से (नृत्य करवा सकते हैं ये वाला)