सच्चे साथी
नियम का फल
पात्र
ब्रह्मचारी भैया
मुनि महाराज
महाराज
रानी
चंद्रकांता (राजकुमारी)
माधुरी (नागिन के वेश में)
सूत्रधार
कुछ श्रद्धालुजन
प्रहरी
मंत्री
सच्चे साथी
सूत्रधार : (मंचन करते समय पर्दा खुलने के पूर्व सूत्रधार निम्नलिखित जानकारी श्रोताओं/दर्शकों को देंगे) बहुत समय पहले की बात है। जयपुर में राजा जिनदत्त राज्य करते थे। उनकी रानी जिनमती जैन धर्म में गहरी आस्था रखती थी पर राजा जिनदत्त को जैन धर्म में कोई विशेष रुचि नहीं थी। एक दिन नगर में कोई दिगंबर साधु आए। महारानी जिनमती आग्रह करके राजा जिनदत्त को भी मुनि महाराज के पास ले गई। महाराज ने जिनदत्त को दो नियम दिलवाए जिनका पालन करने से उनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। उन्हें मोक्ष की सीढ़ी दिखाई देने लगी। कौन से थे वो दो नियम, जिनका पालन करने से राजा का हृदय परिवर्तित हो गया, यही देखेंगे हम इस नाटक 'नियम का फल' में।
रानी : महाराज, आपने सुना है, नगर में कोई साधु आए हैं?
महाराज : रानीजी, साधुओं का तो काम ही है नगर-नगर घूमना। इसमें आश्चर्य की क्या बात है? रानी : नहीं महाराज! वो कोई ऐसे-वैसे साधु नहीं हैं, वो दिगंबर जैन साधु हैं।
महाराज : रानीजी, सब साधु एक जैसे होते हैं। नगर-नगर होकर घूमने से कोई साधु महान नहीं बन जाता। मुझे तो आपका इस तरह उनकी बड़ाई करना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। मैं तो सोचता हूँ कि इन साधुओं को नगर में घुसना ही बंद कर दूँ।
रानी : नहीं महाराज, हमारे निर्ग्रंथ साधु अन्य साधुओं से बिल्कुल भिन्न होते हैं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि आप एक
महाराज : बार उनके दर्शन करें और उन्हें आहार भी दें।
रानी : महाराज, आप भी अजीब तमाशा करती हैं। मैं और आहार?
रानी : महाराज, आप एक बार मुनि महाराज के पास चलिये तो सही, मुझे पूरा विश्वास है यदि आप एक बार उनके दर्शन करेंगे, उन्हें आहार देंगे तो आपके मन को बड़ी शांति मिलेगी और आपके विचार भी बदल जाएंगे।
महाराज : लेकिन रानीजी, मैंने सुना है कि वे आहार लेने से पहले बहुत सारे नियम दिलवाते हैं और आप जानती हैं, राज्य का कार्यभार संभालते हुए मैं यह सब नहीं कर सकता।
रानी : महाराज, आप एक बार चलिये तो सही। यदि वे आहार के लिए कोई कड़ा नियम लेने को कहेंगे तो आप आहार न दीजियेगा। कोई बंधन तो है नहीं।
महाराज : ये आपने ठीक कहा। चलिये उनके दर्शन करने चलते हैं।
(पर्दा गिरता है)
(महाराज और महारानी दोनों मुनि महाराज का दर्शन करने के लिए चलते हैं। मंच पर अंधेरा फिर जंगल का दृश्य, मुनि महाराज एक ऊँचे आसन पर विराजमान हैं। उनके सामने कुछ लोग बैठे हैं। वहाँ बैठे भक्त लोग ऊँचे स्वर में णमोकार मंत्र बोल रहे हैं। महाराज और महारानीजी का प्रवेश। दोनों मुनि महाराज को प्रणाम कर बैठ जाते हैं) —
रानी : (मुनि महाराज से) प्रभु, दुखों से भरे इस संसार रूपी सागर से पार होने का उपाय बताइये। मुनि : बेटी, इस संसार में मनुष्य न तो कुछ लेकर आता है और न कुछ साथ लेकर जाता है। सब कुछ यहीं पर छोड़कर चला जाता है। बस जिस दिन यह बात उसके मन में
यदि इतनी अच्छी गति में जन्म लेकर भोग विलास में जीवन गँवा दिया तो क्या किया? यही वह गति है जहाँ से मोक्ष प्राप्ति की सीढ़ी लगी हुई है।
महाराज : प्रभु! आपने मेरी आँखें खोल दी। भगवान! मेरी इच्छा आपको आहार देने की है। मुझे क्या करना होगा?
एक व्यक्ति : अरे! महाराज को आहार देना तो बहुत ही सरल है।
मुनि महाराज : राजन्! यदि आप मुझे आहार देना चाहते हैं तो आपको मेरे दो नियम लेने पड़ेंगे।
महाराज : कहिये महाराज। वह कौनसे नियम हैं?
मुनि महाराज : मेरा पहला नियम है कि आपके घर में यदि कोई मेहमान आए तो आप उसका स्वागत करेंगे, भले ही वो आपका शत्रु ही क्यों न हो। दूसरा नियम- आप कभी भी क्रोध नहीं करेंगे। जब भी आपको क्रोध आए, तो आप मेरे नियम को याद करके कुछ क्षण तक रुक जाइएगा।
राजा : अरे महाराज! ये तो बहुत सरल नियम है। इनका पालन करने में हमें कोई परेशानी नहीं होगी।
(रानी की ओर देखकर) रानीजी, आप कल चौके की तैयारी करिये। मैं महाराज को आहार दूंगा।
(लाइट बंद) पुनः: (आहार देने का दृश्य भी दे सकते हैं)
सूत्रधार : राजा जिनदत्त ने भक्तिपूर्वक मुनि महाराज को आहार दिया और उनके द्वारा दिलाए गए नियम का पालन करने लगे। इसी तरह कुछ दिन बीत गए। अचानक एक दिन...
क्या हुआ महाराज! आप इतने परेशान क्यों हैं?
रानीजी! आज मेरे जीवन का अंतिम दिन है।
क्या कह रहे हैं महाराज...! ऐसी अशुभ बातें मुँह से न निकालिये।
नहीं रानीजी! आज प्रात:काल मेरे स्वप्न में एक महापुरुष आए। उन्होंने मुझसे कहा कि राजन् आज रात्रि में ठीक बारह बजे महल के सामने वाली पहाड़ी से एक नागिन महल के अंदर प्रवेश करेगी और तुम्हें डस लेगी। आप तो जानती हैं, सुबह का स्वप्न झूठा नहीं होता।
(रोते हुए) महाराज, अब क्या होगा?
देखिये रानीजी, हिम्मत से काम लीजिये। हम लोगों की केवल एक ही बेटी है। यदि यह बात किसी पड़ोसी राजा को मालूम हो गई तो वह तुरंत हमारे राज्य पर आक्रमण कर देगा। अतः: आप कोई अच्छा सा वर देखकर पुत्री के हाथ पीले करके दामाद को राज्य का उत्तराधिकारी बनाकर बाद में सबको मेरी मृत्यु का समाचार दीजियेगा।
हे भगवान! (रोते हुए) ये क्या हो गया? ये तुम मेरी कैसी परीक्षा ले रहे हो?
(उठकर), महाराज, ऐसा करिये कि जैसे ही नागिन पहाड़ी से निकले, आप उसे तुरंत मरवा डालिये।
रानीजी, आप कैसी बातें कर रही हैं? रानी आप भी तो वहीं थीं जब मुनि महाराज ने कहा था कि किसी भी जीव को मारना पाप है। फिर वो तो मेरा मेहमान है। मैंने नियम भी लिया है कि यदि शत्रु भी मेरे यहाँ आएगा तो मैं उसका
स्वागत करूँगा।
(रानी रो रही है)
राजा : रानीजी, समय बहुत कम है। हिम्मत से काम लीजिये। देखिये, ये बात किसी को पता न चले।
(रानी रोते हुए चली जाती है। राजाजी ताली बजाते हैं)
प्रहरी : आज्ञा दीजिये महाराज।
राजा : मंत्रीजी को तुरंत बुलाइये।
प्रहरी : जो हुक्म महाराज।
मंत्री : महाराज की जय हो, क्या हुक्म है महाराज?
राजा : मंत्रीजी, आज रात्रि में ठीक बारह बजे महल के सामने वाली पहाड़ी से एक नागिन महल में आएगी। आप सारे रास्ते में उसके लिए जगह-जगह दूध के कटोरे रखवा दीजिये। बीन बजवा दीजिये। ध्यान रहे, वो हमारी मेहमान है।
मंत्री : (आश्चर्य से) महाराज, नागिन और मेहमान? ये कैसी मेहमान है?
राजा : मंत्रीजी, आपसे जो कहा जा रहा है उसे करिये। ध्यान रहे उसे रास्ते में कोई छेड़े नहीं, न परेशान करे।
(पर्दा गिरता है)
(मंत्री अजीब सा मुँह बनाकर चला जाता है। (मंच पर दो-तीन कटोरों में दूध रखवा दिया जाए। एक बीन वाला बैठा बीन बजा रहा है। नागिन पहाड़ी से निकलती है। वह पहाड़ी से नीचे उतरकर महल की ओर बढ़ रही है। नागिन दूध पीती है और बीन की आवाज पर झूमती है। नागिन की अंतरात्मा की आवाज...)
५८ १०
माधुरी (नागिन) : हे भगवान! मैं कहाँ आ गई हूँ, मैं किसी गलत जगह पर तो नहीं आ गई हूँ। यहाँ पर मेरा कैसा भव्य स्वागत हो रहा है। यहाँ के राजा को तो मैं डँसने आई हूँ।
(वह पुनः झूमती है। पुनः अंतरात्मा की आवाज...)
माधुरी (नागिन) : इस राजा को तो मैंने सपने में अपने आने का कारण बता दिया था, फिर भी मेरा इतना स्वागत? नहीं नहीं... ऐसे राजा को मैं कदापि नहीं डँस सकती।
(नागिन लौटने लगती है। वह कुछ दूर तक जाती है कि एक आकाशवाणी होती है।)
परदे के पीछे से आती आवाज : ये तू क्या कर रही है...? तुझे राजा को डँसने के लिए भेजा गया है...! तू देवों के सामने कौनसा मुँह लेकर जाएगी...? तू अपने कर्तव्य से विमुख हो रही है...! वो फिर महल की ओर चलती है। पुनः दूध पीती है तथा नाचती है।
माधुरी : नहीं... मैं ऐसे देवता तुल्य राजा को नहीं डस सकती। मैं क्या करूँ? ठीक है, मैं देवताओं को अपना मुँह नहीं दिखा सकती। मैं अपनी जान तो दे सकती हूँ।
(नागिन सिर पटक-पटक कर जान दे देती है। मंत्री दौड़कर अंदर जाता है और राजा के साथ मंच पर आता है)
मंत्री : महाराज गजब हो गया, आपके मेहमान ने सिर पटक-पटक कर जान दे दी।
राजा : अरे नागिन ने अपनी जान दे दी है?
मंत्री : हाँ महाराज।
११
राजा : हे प्रभु...! ये कैसा चमत्कार है...? आज तूने मुझे नया जीवन दिया है। मैं महल में जाकर रानी को खबर देता हूँ।
(मंच पर रानी पुत्री के साथ खड़ी है तथा पुत्री से कह रही है...)
रानी : बेटी, आजसे तू राजकुमारों के वस्त्र पहनेगी, राजकुमारों की तरह बातें करेगी। देख बेटी, किसी को इसकी खबर नहीं होनी चाहिए। चल अब राजकुमार के वस्त्र पहिन ले।
(वह मंच से हटती है और पुनः राजकुमार को लेकर प्रवेश करती है)
रानी : हाँ, अब तू बिल्कुल राजकुमार लग रही है।
(वो उसको प्यार करती है गले लगा लेती है तथा उसका माथा चूमती है। तभी राजा का प्रवेश)
(रानी को इस मुद्रा में देखकर राजा आगबबूला हो जाता है और कहता है...)
राजा : ओफ हो, मेरी पत्नी इतनी कुलटा है? मेरी मृत्यु का समाचार जानकर उसने पर पुरुष से संबंध स्थापित कर लिये!!
(वो क्रोध में आकर तलवार निकालकर मारने की मुद्रा में दौड़ता है कि अंतरात्मा की आवाज...)
परदे के पीछे से आवाज आती है : राजा जिनदत्त...! ये तू क्या कर रहा है...? तूने तो क्रोध न करने का नियम लिया है।
(राजा चौंकता है उसे मुनि महाराज का दिया वचन याद आ जाता है। वह शांत हो जाता है- रानी धीरे-धीरे मंच से जा रही है। राजा महल में)
१२
रानी : (राजा को देखकर) अरे महाराज! आप यहाँ?
राजा : हाँ मैं यहाँ। क्यों मुझे यहाँ नहीं होना चाहिए न? आपको तो बहुत दुःख हो रहा होगा ?
रानी : महाराज, आप ये कैसी बातें कर रहे हैं? आपने तो कहा था...।
राजा : हाँ, मैंने जो कहा था वो नहीं हुआ। इसलिए आपको दुःख हो रहा है कि आपकी मनोकामना अब पूरी नहीं हो पाएगी।
रानी : महाराज, साफ-साफ बताइये। मैं कुछ समझी नहीं।
राजा : अब समझने के लिए रह ही क्या गया है?
रानी : (महाराज के माथे पर हाथ रखकर) महाराज, आपकी तबीयत तो ठीक है?
राजा : हाँ, ठीक है। (हाथ झटककर) आज पहली बार मेरी तबीयत बिल्कुल ठीक है।
रानी : महाराज, आप कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं? मुझसे क्या गलती हुई है?
राजा : वो पर पुरुष कौन था आपके कमरे में? जिसे आपने अपने गले लगा रखा था और जिसका माथा चूम रही थी?
रानी : (आश्चर्य से) मेरे कमरे में पर पुरुष?
राजा : (क्रोध से) ये मेरे सवाल का उत्तर नहीं है रानी! मेरे कमरे में मेरी बेटी के सिवाय और तो कोई नहीं था!
राजा : (हँसकर) मैं पागल नहीं हूँ जो अपनी बेटी को न पह्चानूँ।
रानी : महाराज, आप स्वयं चंद्रकांता से पूछ लीजिये। (बेटी को
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आवाज लगाती है) चंद्रकांताsss बेटी चंद्रकांताsss
चंद्रकांता : (अंदर आकर) क्या है माँ, प्रणाम पिताजी।
राजा : (पुरुष रूप पुत्री को देखकर) ये मेरी पुत्री चंद्रकांता है?
रानी : हाँ महाराज, आप भी इसे देखकर धोखा खा गए न? बिल्कुल राजकुमार जैसी लग रही है आपकी बेटी।
राजा : हे भगवान, अभी मुझसे कितना बड़ा अनर्थ ہو जाता? ये सब मुनि महाराज के दिलाए नियम का फल है। धन्य हैं दिगंबर साधु, जिन्होंने हमें नया जीवन दिया। हमारा घर उजड़ने से बचा लिया। रानीजी, यदि उनके सिर्फ दो नियम पालन से मुझे इतना लाभ मिला तो यदि मैं उन जैसा ही बन जाऊँ तो शायद मेरे जीवन का कल्याण हो जाएगा।
(अपना मुकुट उतारकर रानी को देते हुए...) रानीजी, अब आप मुझे आज्ञा दें। मैं महाराज के पास दीक्षा लेने जा रहा हूँ।
रानी : महाराज! मैं तो कबसे इस दिन की प्रतीक्षा कर रही थी। मैं भी आपके साथ चलूँगी और आर्यिका दीक्षा लूँगी।
चंद्रकांता : पिताजी, मैं भी आपके साथ चलूँगी। मैं भी आर्यिका दीक्षा लेकर तपस्या करूंगी।
रानी : नहीं अभी तेरी उम्र ही कितनी सी है? (राजा की ओर उन्मुख होकर) महाराज! क्यों न हम अपनी बेटी का पहले विवाह कर दें और फिर दामाद को राजतिलक करके फिर तपस्या करने चलें?
राजा : हाँ रानीजी! यह ज्यादा ठीक रहेगा।
(समाप्त)
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