राजा श्रेणिक और भगवान महावीर स्वामी
पात्र परिचय
भगवान महावीर स्वामी: तीर्थंकर भगवान (शांत, करुणा की मूर्ति)
राजा श्रेणिक (बिम्बिसार): मगध के सम्राट (जिज्ञासु, धर्माभिलाषी)
गौतम गणधर (गौतम स्वामी): भगवान महावीर के मुख्य शिष्य
दरबारी/सैनिक: सभा के अन्य लोग
नाटक आरंभ
(दृश्य समवशरण का है। भगवान महावीर स्वामी ऊंचे सिंहासन पर विराजमान हैं। चारों तरफ मुनि, देवी-देवता और भव्य जीव बैठे हैं। मगध के राजा श्रेणिक हाथ में उपहार और विनय भाव लिए अपनी सभा के साथ प्रवेश करते हैं। वे तीन बार परिक्रमा कर भगवान को नमन करते हैं और आदरपूर्वक बैठते हैं।)
राजा श्रेणिक: हे प्रभु! आपके चरणों में बारंबार वंदन। आज आपके पावन दर्शन पाकर मेरा जीवन धन्य हो गया। मेरे मन में जीवों के कर्मों और उनके अगले जन्म को लेकर कुछ प्रश्न हैं, यदि आपकी आज्ञा हो तो अपनी शंका का समाधान चाहूँगा।
भगवान महावीर स्वामी: (शांत मुद्रा में मुस्कुराते हुए) हे राजन् श्रेणिक! पूछिए, तुम्हारे मन में जो भी जिज्ञासा है, उसका समाधान धर्म और कर्म के सत्य से किया जाएगा। जीवों के कर्मों का बंध और उनका फल बहुत ही गहन विषय है।
राजा श्रेणिक: हे प्रभु! मैंने इस संसार में देखा है कि जो व्यक्ति दूसरों पर अत्याचार करते हैं, पाप करते हैं, वे भी कई बार बहुत ऐश्वर्य और सुख भोगते दिखते हैं; और जो पुण्यात्मा, सीधे-सादे और धर्म का पालन करने वाले हैं, वे कई बार भयंकर कष्ट उठाते हैं। ऐसा क्यों होता है? क्या ईश्वर का न्याय ऐसा ही है?
भगवान महावीर स्वामी: हे राजन्! यह संसार किसी की मर्जी से नहीं, बल्कि कर्म के सिद्धांत से चलता है। जैसा बीज बोओगे, वैसा ही फल काटोगे।
जो व्यक्ति आज पाप करके भी सुख भोग रहा है, वह उसके पिछले जन्म के महान पुण्यों का फल है, जो अभी पककर भोग रहा है। उसके वर्तमान पापों का भयानक फल उसे भविष्य में नरक या दुखों के रूप में भोगना पड़ेगा।
इसी प्रकार, जो धर्मात्मा आज दुखी दिख रहा है, वह उसके पिछले जन्म के पापकर्मों का शेषांश है, जो कष्ट के रूप में कट रहा है। उसके वर्तमान धर्म और पुण्यों का मीठा फल उसे आगे चलकर देवलोक या मोक्ष के रूप में मिलेगा। कर्म का हिसाब कभी नहीं चुकता, राजन्!
गौतम स्वामी: (आगे आते हुए) राजा श्रेणिक, भगवान सत्य कह रहे हैं। जीव अपने किए गए हर शुभ और अशुभ कर्म का फल स्वयं ही भोगता है। सुख और दुःख बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि हमारे अपने ही कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) और योग से आते हैं।
राजा श्रेणिक: (हाथ जोड़कर अत्यंत भावुक होते हुए) हे प्रभु! आपका यह उपदेश सुनकर मेरी आंखें खुल गईं। अब मुझे समझ आ गया कि इस संसार में कुछ भी अनियोजित नहीं है। सब कुछ हमारे ही कर्मों का खेल है। हे प्रभु, मुझे अपने शरण में लीजिए और ऐसा मार्ग बताइए जिससे मेरे सारे पापों का क्षय हो सके और मैं इस भव-सागर से तर जाऊँ।
भगवान महावीर स्वामी: राजन्! सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र—यही मोक्ष का मार्ग है। अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है। अपने राज्य में जीवों पर दया करो, न्याय करो और अपने अंदर के विकारों को जीतो। यही असली जिनशासन है।
राजा श्रेणिक: (प्रभु के चरणों में सिर झुकाते हुए) हे भगवान! आज से मैं आपके बताए मार्ग पर ही चलूँगा और अपने जीवन को कल्याणकारी बनाऊँगा। आपका यह ज्ञान मेरे लिए अमृत बन गया है।
(पर्दा गिरता है।)