Kuch Khas

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रानी तिलकमति (नाटक)

रानी तिलकमति (नाटक) पेज नं. 1

(नाटक में तीन दृश्य हैं) रानी तिलकमति नगर सेठ की पुत्री है। वह धार्मिक विचारों वाली है पूजा-पाठ व्रत उपवास में विश्वास रखती है। उसकी माँ सौतेली है जो कि हमेशा उसका बुरा सोचती है परन्तु धर्म व पुण्य के प्रभाव से उनको किस प्रकार सुख की प्राप्ति होती है देखिये —

प्रथम - दृश्य

स्टेज पर नगर सेठ उदास सा बैठा रहता है उनकी पत्नी आती है और पूछती है —

सेठानी — नाथ आप, इतने उदास क्यों बैठे हैं आपकी क्या परेशानी है, मुझे बतलाइये?

सेठजी — क्या बताऊँ, बात परेशानी की ही है क्योंकि राजा ने मुझे व्यापार के मामले में देशारटन की आज्ञा दी है और मुझे काफी समय के लिए नगर से बाहर रहना होगा। मुझे तिलकमति और बन्धुमति के विवाह की बहुत चिन्ता है।

सेठानी — आखिर आपको कब प्रस्थान करना होगा?

सेठजी — मुझे आज ही जाना होगा तुम मेरी जाने की तैयारी करो।

(इतने में तिलकमति एवं बन्धुमति प्रवेश करती हैं)

दोनों पुत्रियाँ — प्रणाम माताजी, प्रणाम पिताजी। क्या बात है, आप लोग इतने परेशान क्यों हैं?

सेठजी — मुझे राजा की आज्ञा से देशारटन के लिए बाहर जाना है इसलिए मैं परेशान हूँ। तुम मेरे जाने के पश्चात् अपनी माताजी की आज्ञा का पालन करना और उन्हें तंग नहीं करना।

पुत्रियाँ — जी पिताजी, अन्दर चली जाती हैं।

सेठानी — स्वामी आप परेशान मत होइयें। मैं तिलकमति एवं बन्धुमति का पूरा ध्यान रखूँगी और उनके विवाह के लिए कोशिश करूँगी। भगवान की इच्छा होगी तो आपके लौटने तक उन दोनों के विवाह निश्चित हो जायेंगे। चलिये मैं आपकी यात्रा के लिए तैयारी करती हूँ।

पर्दा गिरता है।

पेज 2 पर जारी

पेज नं. 3

कमरे में सेठानी और उनकी नौकरानी माया दिखायी देती है. नौकरानी झाड़ू लगाती हुई दिखती है —

सेठानी — माया जरा जल्दी-जल्दी सफाई कर मेहमान आने ही होंगे.

नौकरानी — जी मालकिन अभी कर देती हूँ.

सेठानी — माया, इस तिलकमति ने तो मुझे बहुत ही परेशान कर रखा है जितने भी लोग इन दोनों को देखने के लिये आते हैं वे सब तिलकमति को ही पसंद करते हैं बन्धुमति को कोई भी नहीं पसंद करता है. आखिर तिलकमति में ऐसा क्या है बचपन मेरी यह अपनी माता को खा गयी और अब मुझे भी परेशान कर रखा है, मैं क्या करूँ समझ में नहीं आता.

नौकरानी — मालकिन, मैं एक सलाह दूँ.

सेठानी — बता जल्दी बता, तू क्या सलाह देना चाहती है?

नौकरानी — अब जब भी कोई देखने आये तिलकमति को अन्दर ही रखना, उसे आगंतुकों के सामने लाना ही नहीं ताकि आगंतुक अपने आप बन्धुमति को पसंद कर लेंगे.

सेठानी — हाँ यह बात ठीक है, मैं अब ऐसा ही करूँगी.

(इतने में दरवाजे पर खटखट की आवाज आती है)

सेठानी — माया जरा देख, शायद वे लोग आ गये हैं.

नौकरानी — जी मालकिन देखती हूँ.

(सेठानी और नौकरानी दोनों दरवाजे की तरफ जाती है — दो पुरुष एवं एक महिला आते हैं)

सेठानी — आइये आइये सेठजी, पधारिये विराजिये (सभी लोग आसन ग्रहण करते हैं)

आगंतुक सेठजी — क्या बात है ? सेठ जी घर पर नहीं हैं क्या वो दिखायी नहीं दे रहे हैं —

सेठानी — हाँ, जी, — सेठ जी राजा की आज्ञा से देशारटन के लिए गये हैं उनको लौटने में कुछ दिन लग जायेंगे.

(इसके पश्चात् सेठानी नौकरानी को आवाज लगाती है)

सेठानी — माया ओ माया, जरा जलपान वगैरह तो ले आ.

नौकरानी — जी मालकिन अभी लायी (ट्रे में पानी लेकर आती हैं)

सेठानी — माया जरा बेटियों को तो बुलाकर ला.

नौकरानी — ठीक है जी (अन्दर जाकर दोनों पुत्रियों को लेकर लौटती है)

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पुत्रियाँ अतिथिओं को प्रणाम करती हैं.

सेठानी — बैठो बेटियों (दोनों पुत्रियाँ बैठ जाती है)

सेठानी — सेठजी यह तिलकमति है और यह बन्धुमति है.

आगंतुक सेठजी — तिलकमति से पूछते हैं, बेटी तुम्हें क्या-क्या आता है.

तिलकमति — मेरी तो धर्म में ही अधिक रुचि है मैं पूजा-पाठ व्रत आदि में ही अपना समय ज्यादा व्यतीत करती हूँ और बाकी समय में गृह कार्य करती हूँ.

आगंतुक सेठजी -> ठीक है.

सेठानी बीच में ही बोल पड़ती है — मेरी पुत्री बन्धुमति बहुत होशियार है उसे घर के सारे कार्य आते हैं जबकि तिलकमति को कुछ नहीं आता है यह बचपन से ही अभागी है। बचपन में अपनी माँ को खा गयी इसका व्यवहार भी ठीक नहीं है.

(दोनों पुत्रियाँ अन्दर चली जाती है)

आगंतुक लोग आपस में विचार-विमर्श करते हैं.

आगंतुक सेठजी — ठीक है, सेठानी जी, हमें तो तिलकमति ही पसंद है— अगर आपको उसका विवाह करना हो तो हम तैयार हैं.

सेठानी — विवाह तो करना है, परन्तु आप फिर भी एक बार सोच लीजिये। बन्धुमति बहुत होशियार है जिसके घर जायेगी सबको बहुत खुश रखेंगी सेठजी फिर एक बार पुनः सोच लीजिए.

आगंतुक सेठजी — सोच लिया, हमें तो तिलकमति ही पसंद है.

सेठानी — ठीक है जैसा आपका विचार। आप विवाह की तारीख निश्चित करके बता दीजियेये.

आगंतुक सेठजी — अच्छा अब हम चलते हैं और आगे का कार्यक्रम बताते हैं (तीनों आगंतुक चले जाते हैं)

पर्दा गिरता है.

पर्दा खुलने पर — इसके पश्चात् स्टेज पर अंधेरा छा जाता है सेठानी अकेली ही किसी गहन चिन्ता में डूब जाती है और मन में षड्यंत्र रचने लगती है कि किस प्रकार तिलकमति को बन्धुमति के रास्ते से हटाऊँ फिर जोर से बोलती है —

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सेठानी — तिलकमति, बेटी तिलकमति इधर आओं.

तिलकमति — क्या बात है माताजी.

सेठानी — तुम ये कपड़े व जेवर वगैरह पहन लो हम लोग मंदिर चलेंगे घट-शादी के पहले की रस्म है, इसको पूरा कर लेते है.

तिलकमति — ठीक है माताजी, मैं अभी तैयार होकर आती हूँ.

(शीघ्र ही वह कपड़े पहनकर आ जाती है। सेठानी एक थाली में दिया जलाती है और उसके कन्धे पर हाथ रखकर धीरे-धीरे स्टेज पर दो तीन चक्कर लगाती है फिर तिलकमति को एक सूने स्थान पर बैठाकर कहती है)

सेठानी — तिलकमति तुम यहीं बैठना, यहाँ से उठना मत. यहाँ पर जो भी पहला पुरुष आयेगा वही तेरा पति होगा. उसी के गले में तुम वरमाला डालकर उसको पति स्वीकार कर लेना, यहाँ से कहीं जाना नहीं.

तिलकमति — ठीक हैं माताजी, मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगी.

सेठानी — उसको अकेला छोड़कर चली जाती है.

रात्रि में राजा घूमने निकलते है और दूर से दिया जलता हुआ देखते है. मन ही मन कहते हैं, इस रात्रि में इस सुनसान स्थान पर यह दिया कैसे टिमटिमा रहा है चलो चलकर देखते है. धीरे-धीरे वे उस स्थान के नजदीक आते हैं जहाँ तिलकमति बैठी रहती है. नजदीक आकर राजा कहते हैं, अरे यहाँ तो कोई स्त्री बैठी है मालूम नहीं उसे क्या परेशानी है. अंधेरी रात्रि में वह यहाँ क्या कर रही है — चलो चलकर पूछते हैं —

राजा — आप कौन हैं और यहाँ इस अंधेरी रात में अकेली क्यों बैठी हुई हैं? आपको कोई तकलीफ है क्या या किसी भयवश यहाँ बैठी हैं?

तिलकमति — मैं यहाँ के नगर सेठ की पुत्री तिलकमति हूँ. मेरी माताजी मुझे यहाँ बिठाकर गयी हैं और कहकर गयी हैं कि यहाँ जो पुरुष सबसे पहले आयेगा वही तेरा पति होगा, उसी के साथ तुम अपना वैवाहिक जीवन बिताना. आप ही यहाँ सर्वप्रथम आये हैं इसलिये माताजी की आज्ञा के अनुसार आप ही मेरे पति हैं. आप मेरी वरमाला स्वीकार कीजिए वरमाला डालती है.

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राजा — ठीक है, लेकिन मैं तुमसे सिर्फ रात्रि में ही मिल सकता हूँ तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं है.

तिलकमति — जैसी आपकी इच्छा। आप अपना नाम तो बता दीजिए, ताकि मैं माताजी को बता सकूँ कि मेरे स्वामी कौन हैं, आप क्या कार्य करते हैं.

राजा — मेरे काम के बारे में तो मैं आपको बाद में बताऊँगा। आप माताजी को मेरा नाम गोप बता दीजिये.

तिलकमति — ठीक है स्वामी, मैं आपके पैरों का प्रक्षालन करना चाहती हूँ परन्तु मेरे पास तो कुछ भी नहीं है मैं अपने हाथों से आपके पैरों का प्रक्षालन कर सकती हूँ.

राजा — ठीक है.

(तिलकमति राजा के पैरों का प्रक्षालन करती है)

राजा — अब भोर होने को है, पक्षी चहचहाने लगे हैं अब मुझे लौटना होगा। कल मैं तुम्हें फिर रात्रि में यहीं मिलूँगा (राजा चले जाते हैं) तिलकमति भी घर जाने के लिए निकलती है.

इधर सेठानी अपनी नौकरानी से कहती है कि मैं तिलकमति को छोड़ तो आयी हूँ परन्तु सेठजी के आने पर उन्हें क्या जवाब दूँगी माया बता तो —

नौकरानी — सेठानी जी, सेठजी के आते ही आप विलाप शुरू कर दीजिये कि तिलकमति कहीं चली गयी है उसने न जाने किसके साथ विवाह कर लिया है वह बुलया है.

सेठानी — चिल्लाते हुए तिलकमति यह तूने क्या किया तुमने हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी, न जाने कहाँ चली गयी, इससे तो हम बचपन में ही मर जाती लोग तो यही कहेंगे कि सौतेली माँ ने ध्यान नहीं दिया, चिल्लाती है। फिर धीरे से क्यों माया यह ठीक है.

नौकरानी — जी बहुत अच्छा है इससे सेठजी को आप पर बिल्कुल भी शंका नहीं होगी.

(इतने में उन दोनों को तिलकमति आती हुई दिखती है)

नौकरानी — मालकिन वह आ गयी है अब मैं जाती हूँ (अन्दर चली जाती है).

तिलकमति — प्रणाम माताजी.

सेठानी — चीखते हुए, कहाँ मर गयी थी — बेशर्म तुझे तुम्हारा कुछ भी ख्याल नहीं रहा तूने तो हमारे खानदान का नाम मिट्टी में मिला दिया.

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पेज नं. — 6

तिलकमति — नहीं नहीं माताजी ऐसी बात नहीं है आपकी तो मुझे वहाँ रुकने की आज्ञा देकर आयी थी। आपकी आज्ञा-नुसार ही मैंने वहाँ आने वाले प्रथम पुरुष को अपना पति मान लिया है.

सेठानी — कौन है वह, क्या करता है, क्या नाम है, कलमुँही?

तिलकमति — मुझे उनके बारे में और कुछ तो पता नहीं है सिर्फ उनका नाम मालूम है उनका नाम गोप है.

सेठानी — ठीक है ठीक है, कल तुम जब उससे मिलने जाओ तो उससे दो बुहारी लाने को कहना.

तिलकमति — जो आज्ञा आपकी, मैं कल ही उनसे दो बुहारी माँगूगी.

(रात्रि में राजा पुनः तिलकमति से मिलने आता है तब तिलकमति राजा से कहती है)

तिलकमति — हे स्वामी मुझे आपसे कुछ माँगना है.

राजा — बोलो, तुम्हें क्या चाहिए.

तिलकमति — मेरी माताजी ने दो बुहारी मँगवाई है.

राजा — अभी तो मैं तुम्हें बुहारी लाकर नहीं दे सकता हूँ। मैं ये दो जेवर देता हूँ उन्हें तुम अपनी माताजी को दे देना (वे गहने उतारकर देते हैं).

(बाद में राजा चले जाते हैं तिलकमति वह जेवर लेकर घर आती है)

तिलकमति — माताजी प्रणाम। आपके कहे अनुसार मैंने अपने स्वामी से दो बुहारी लाकर देने को कहा था तो उन्होंने ये दो गहने दिये हैं.

सेठानी — गहने देखती है और कहती है कि तिलकमति तुमने तो किसी चोर से शादी कर ली है यह बहुत बुरा हुआ है तुम्हारे पति ने तुम्हें जो गहने दिये हैं वह चोरी के ही है.

तिलकमति — लेकिन माताजी अब मैं क्या कर सकती हूँ आप जैसे भी हो वे मेरे पति हैं कहने हुए अंदर चली जाती है। सेठानी मन ही मन बड़बड़ाती है कि सेठजी के आने पर सब बताऊँगी.

(पर्दा गिरता है)

(तृतीय — दृश्य)

स्टेज पर अंधेरा रहता है। सेठानी अकेली चिन्तामय बैठी रहती है इतने में सेठजी प्रवेश करते हैं.

सेठजी — अरे भाई क्या बात है, यह अंधेरा कैसा। घर के सब लोग कहां है सेठानी जी तुम इस तरह उदास एवं दुःखी क्यों बैठी हुई हो घर में कुछ गलत घटित हो गया है क्या?

सेठानी — हाँ हाँ यही बात है, तिलकमति ने घर की इज्जत की परवाह नहीं करते हुए एक चोर से शादी की है। यह देखो उसे उसके चोर पति ने चोरी के गहने उपहार में दिये हैं लोग तो मुझे ही गलत समझेंगे कि सौतेली माँ ने ध्यान नहीं दिया।

सेठजी — नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता है। मेरी तिलकमति ऐसा कार्य कदापि नहीं कर सकती।

सेठानी — गुस्से से — हाँ हाँ मैं ही गलत कह रही हूँ। मैं ही खराब हूँ विश्वास न हो तो तिलकमति से ही पूछ लीजिए।

सेठजी — बेटी तिलकमति को पुकारते हुए — तिलकमति, बेटी जरा इधर तो आओ।

तिलकमति — जी आयी पिताजी (प्रवेश करती है)

सेठजी — बेटी तुम्हारी माताजी क्या कह रही हैं कि तुमने अपनी मर्जी से किसी चोर से विवाह कर लिया है।

तिलकमति — मैंने अपनी मर्जी से नहीं बल्कि माताजी की आज्ञा मानकर विवाह किया है। मैं नहीं जानती की मेरे पति क्या करते हैं और न ही मैंने उन्हें कभी देखा है क्योंकि वे रात्रि में ही मुझसे मिलने आते हैं। मैं सिर्फ उन्हें पैर छूकर ही पहचान सकती हूँ क्योंकि मैं उनके पैरों का प्रक्षालन करती हूँ। उनके द्वारा दिये गये गहने माताजी के पास हैं।

सेठजी — ठीक है बेटी। सेठानी की ओर मुखातिब होते हुए, लाओ वे गहने मुझे दो मैं राजा के पास उन्हें लेकर जाता हूँ अगर वे चोरी के गहने हैं तो हम नहीं रख सकते।

सेठानी — ठीक है यह गहने लीजिए (सेठजी को गहने दे देती है)। सेठानी वहीं बैठी रहती है पर्दा गिरता है।

एक मिनट बाद पर्दा उठता है — सेठजी का प्रवेश —

सेठजी — अजी सुनती हो, तुम जल्दी से 6-7 लोगों के खाने का इन्तजाम करो राजासा. अपने दरबारियों के साथ हमारे यहाँ भोजन पर आयेंगे। यहीं पर वे तिलकमति के पति के बारे में निर्णय करेंगे।

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सेठानी — जी अच्छा। अन्दर जाती है सेठजी वहीं पर बैठे रहते हैं। इतने में दरवाजे पर किसी के आने की आहट होती है सेठ जी जाकर देखते हैं.

सेठजी — आइये राजासा. पधारिये बैठिये बैठिये (अभिवादन करते हैं। राजा के साथ और भी 3-4 लोग आते हैं बैठते हैं).

सेठजी — बेटी तिलकमति जरा जलपान तो लाओ.

तिलकमति — अन्दर से जी पिताजी.

सेठानी जल लेकर आती है.

राजासा. — सेठजी जरा अपनी बेटी को तो बुलाइये.

सेठजी — जी महाराज, बेटी तिलकमति जरा बाहर आओ.

तिलकमति — जी पिताजी अभी आयी (आकर सबका अभिवादन करती है).

सेठानी — महाराज, यह मेरी बेटी तिलकमति है। यह इसके पति को सिर्फ पाँव छूकर ही पहचान सकती है.

राजाजी — तो ठीक है इसे पहचान करने दीजिए.

सेठजी — तिलकमति की आँखों पर पट्टी बांध देते हैं फिर तिलकमति क्रमानुसार सबके पाँव छूकर देखती है जैसे ही राजा के पैर स्पर्श करती है खड़ी हो जाती है और कहती है यही मेरे पति हैं.

सेठजी — बेटी यह तुम क्या कह रही हो ये तो हमारे महाराज हैं ऐसा नहीं हो सकता कि ये तुम्हारे पति हों.

राजासा. — सेठजी, सुनिये, आपकी बेटी ठीक कह रही हैं और इसने सही पहचाना। मैं ही इसका पति हूँ और सबके सामने इसे अपनी पत्नी स्वीकार करता हूँ.

सेठजी — (नतमस्तक हो) महाराज यह सुनकर तो मैं धन्य हो गया यह मेरी बेटी के पुण्य का प्रताप है और इसकी धर्म में सच्ची आस्था होने से ही आप इसको पति रूप में प्राप्त हुए। (सेठजी काफी प्रसन्न होते हैं)

(इसी समय सेठानी दुःखी होकर कहती है)

सेठानी — बेटी मुझे माफ कर दें। मैंने तो तेरा बुरा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी परन्तु तेरे पुण्यप्रताप के फल से तो तुझे महाराज जैसा वर मिला। मैंने तुझे क्या-क्या नहीं कहा, कैसे-कैसे लांछन लगाये, बेटी मुझे क्षमा कर दें.

पेज नं 9 पर

पेज नं. — 9

तिलकमति — नहीं माँ, नहीं माँ, मुझे शर्मिन्दा न करें। मैंने तो तुम्हारी आज्ञा का पालन किया था और तुम्हारे आशीर्वाद से ही मुझे महाराज जैसे पति मिले।

राजा तिलकमति की तरफ देखकर — चलो रानी हम अपने महल में चलते हैं। तिलकमति व राजा के साथ आये सभी लोग चले जाते हैं।

(जाने के बाद —)

सेठजी — सेठानी जी मैं यह सोच भी नहीं सकता था कि तुम मेरी बेटी के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार करोगी और उसे मेरी नजरों के सामने गिराने की कोशिश करोगी। हटो, दूर हो जाओ मेरे सामने से। अपने व्यवहार से तुमने आज यह सिद्ध कर दिया कि सौतेली माँ सौतेली माँ ही रहती है, यह तो उसकी धर्मसाधना का फल था कि वह राजा के घर पत्नी बनकर गयी वरना तुम्हारी वजह से तो मेरी बेटी दर-दर की ठोकरें खाती।

सेठानी — सेठजी के पैर पकड़ते हुए, स्वामी आप मुझे जो चाहें सजा दे सकते हैं मुझे माफ कर दीजिए रोती है बिलखती है।

(पर्दा गिरता है)

माइकपर अनाउन्समेंट किया जाता है, देखा आपने पुण्य की महिमा कितनी महान हैं। आप भी इसी तरह धर्मसाधना में सच्चे मन से लग जाइये और तिलकमति के समान राजसुख के अधिकारी बनिये।