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सच्चा साथी धर्म
पात्र
सासू माँ
बहू (धर्मवीर की माँ)
धर्मवीर के पिता
धर्मवीर
धर्मवीर की पत्नी
ब्रह्मचारीजी
डॉक्टर
एक वृद्ध व्यक्ति
एक व्यक्ति
दूसरा व्यक्ति
बच्चे
रामदीन
प्रवचन के कई श्रोतागण
दो महिलाएँ
सच्चे साथी
सूत्रधार : नाटक को देखने के लिए हम लोगों को यहाँ से दूर कौशाम्बी नगरी के पास प्रभाषगिरि गाँव चलना होगा। छोटा सा गाँव है। विभिन्न धर्म को मानने वाले लोग यहाँ रहते हैं। यहाँ एक बहुत ही सुंदर जैन मंदिर है। यह वही स्थान है जहाँ छठे तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभ के चार कल्याणक हुए हैं लेकिन अब धर्म के प्रति यहाँ के लोगों की आस्था बहुत ही कम है।
एक दिन गाँव में एक जैन ब्रह्मचारी आए। प्राकृतिक सौंदर्य से संपन्न यमुना तट पर बसा छोटी आबादी वाला यह क्षेत्र ब्रह्मचारीजी के मन को भा गया। लोगों के मन में धर्म भावना जागृत करने के लिए वह कुछ दिन के लिए वहीं रुक गए और जन-जन को धर्म का उपदेश देना शुरू कर दिया। उनके उपदेशों का लोगों पर कुछ प्रभाव पड़ा या नहीं, लोगों में धर्म की भावना जागृत हुई या नहीं, यही सब देखेंगे हम लोग इस नाटक में, जिसका नाम है- 'सच्चा साथी धर्म'।
(धर्म सभा लगी हुई है। ब्रह्मचारीजी उपदेश दे रहे हैं)
ब्रह्मचारीजी : हे भव्य जीवों!
जैसा कि आप जानते हैं, गतियाँ चार प्रकार की होती हैं:- नरक गति, तिर्यंच गति, देव गति और मनुष्य गति। इस संसार में सभी जीव अपने अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार विभिन्न गतियों में जन्म लेते हैं। सभी गतियों में श्रेष्ठ मनुष्य गति है क्योंकि मनुष्य गति में रहकर मनुष्य अच्छे कर्म करके धर्म मार्ग को अपनाकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है। अतः आप सभी को चाहिए कि प्रतिदिन अपने जीवन का कुछ समय धर्म कार्य अर्थात् भगवान की पूजा-भक्ति में अवश्य लगाएँ तथा उन नियमों का जो शास्त्र में बताए गए हैं; जैसे रात्रि भोजन त्याग, अभक्ष्य का त्याग,
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सच्चे साथी
पानी छानकर पीना आदि; का पालन अवश्य करें!
एक व्यक्ति : (खड़े होकर) भैयाजी! हमें पानी छानकर क्यों पीना चाहिए?
ब्रह्मचारीजी : बैठो! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है。 समझाता हूँ। पानी में अनेक छोटे-छोटे सूक्ष्म जीव होते हैं। जब हम पानी छानकर पीते हैं या अन्य कार्यों में लाते हैं तो वे हमारे पेट के अंदर नहीं जाने पाते इससे रोग नहीं उत्पन्न होने पाते। पानी छानने से जीवों की हिंसा से बचा जाता है। पर जीवानी को जल के स्रोत में ही पहुँचाना चाहिए! इससे अहिंसा धर्म का पालन होता है।
दूसरा व्यक्ति : महाराज! रात्रि में भोजन क्यों नहीं करना चाहिए?
ब्रह्मचारीजी : बेटा! दिन में भोजन करने से भोजन जल्दी पच जाता है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे छोटे-छोटे जीव होते हैं जो कि दिन में यहाँ-वहाँ छिपे रहते हैं पर रात्रि में बाहर निकल जाते हैं और भोजन-पानी में भी गिरते-मरते रहते हैं। कभी-कभी तो वे इतने जहरीले होते हैं कि लोगों की मृत्यु तक हो जाती है। बीमार तो पड़ते ही हैं। अतः दिन में भोजन करने से उनकी हिंसा से भी बचा जा सकता है! यह जैनों का मुख्य अहिंसा धर्म भी है। इसके अलावा आज तो विज्ञान ने भी इस बात को सिद्ध कर दिया है कि भोजन सोने से चार घंटे पूर्व ही कर लेना चाहिए। इससे भोजन अच्छी तरह से पच जाता है। दिन में भोजन कर लेने से रात्रि का समय स्वाध्याय करने, भगवान की भक्ति करने के लिए मिल जाता है। महिलाओं को भी देर रात तक रसोई में नहीं रहना पड़ता।
सच्चे साथी
तीसरा व्यक्ति : भैयाजी! आपने तो बहुत अच्छी बातें बताई हैं। आज से हम लोग नियम लेते हैं कि रात्रि में भोजन नहीं करेंगे तथा पानी छानकर पिएँगे।
(सूत्रधार : ब्रह्मचारी भैया के प्रभावशाली वचन सुनकर जैन धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्म के लोग भी प्रभावित हुए और उनकी धर्मसभाओं में आने लगे।)
(धर्मसभा समाप्त होने पर भी बैठे रहने पर)
ब्रह्मचारीजी : क्यों भाई? तुम घर نہیں गए? क्या नाम है तुम्हारा?
धर्मवीर : महाराज, मेरा नाम धर्मवीर है। मैं यहाँ के सेठ अमीरचंद का पुत्र हूँ। आपका उपदेश मुझे बहुत अच्छा लगा।
ब्रह्मचारीजी : लेकिन मैं तुम्हें आज पहली बार देख रहा हूँ। मंदिर में भी तुम्हें पहले कभी कहीं नहीं देखा।
धर्मवीर : भैयाजी! मैं कभी मंदिर नहीं जाता हूँ। समय ही नहीं मिलता।
ब्रह्मचारीजी : समय? तुम पूजा दर्शन के लिए समय की बात करते हो। इसके लिए तो प्रातःकाल का समय ही उपयुक्त है। उस समय मनुष्य व्यापारादि क्रियाओं में फँसी रहते हैं? हम सभी क्रियाएँ प्रतिदिन करते हैं। मात्र मंदिर जाने के लिए ही समय का रोना रोते हैं। भगवान का दर्शन-पूजन करने से मन शांत, भाव निर्मल और परिवार संस्कारित होते हैं। अच्छा अब घर जाओ। अब प्रतिदिन यहाँ आया करो।
धर्मवीर : जो आज्ञा भैयाजी! (वंदना कहकर चला जाता है।) लाइट ऑफ—सेट बदलना
सच्चे साथी
सूत्रधार : ब्रह्मचारीजी के उपदेशों का धर्मवीर पर बहुत ही प्रभाव पड़ा। अब उसका अधिकांश समय उनके पास ही बीतने लगा। वह उनके आश्रम की सफाई करता, उनके लिए भोजन की व्यवस्था बनाता, उनकी सेवा करता। ब्रह्मचारीजी भी धर्मवीर से बहुत स्नेह करते थे।
दूसरा दृश्य
(घर का कमरा, एक तख्त पर दादीजी बैठी हैं। वह कुछ पढ़ रही हैं।)
सासूजी :
भावना दिन रात मेरी, सब सुखी संसार हो। सत्य संयम, शील का व्यवहार हर घर द्वार हो॥ धर्म का प्रचार हो, अरु देश का उद्धार हो। मेरा प्यारा देश भारत, एक चमन गुलजार हो॥ रोशनी से ज्ञान की संसार में प्रकाश हो। धर्म के प्रचार से हिंसा का जग से नाश हो॥ शांति अरु आनंद का हर एक घर में वास हो। वीर वाणी पर सभी संसार में विश्वास हो॥ भावना दिन रात मेरी.......
(धर्मवीर की माँ का प्रवेश)
धर्मवीर की माँ : (सास के पैर छूकर) प्रणाम सासूजी।
सासूजी : जुग-जुग जियो बहू, मंदिरजी हो आई?
बहू : कहाँ सासूजी, काम से समय ही नहीं मिलता।
सासूजी : बहू, तुम सब काम करती हो। थोड़ा समय निकालकर मंदिर भी हो आया करो। मंदिर जाने से मनुष्य के जन्म-जन्म के पाप कट जाते हैं।
बहू : अरे सासूजी! अभी तो बहुत उमर पड़ी है। बच्चों की शादी-ब्याह कर लूँ, फिर आराम से धर्म कार्य करूँगी।
सच्चे साथी
सासूजी : अरे बहू! धर्म कार्य करने के लिए कोई उम्र नहीं होती। मुझे देख रही हो, मैंने भी सोचा था बुढ़ापे में पूजा-पाठ करूँगी। लेकिन अब शरीर काम ही नहीं करता।
(बच्चों का प्रवेश)
बच्चे : दादी माँ हम आ गए। दादी माँ हम आ गए।
सासूजी (दादी) : आओ बच्चो, बैठो। (बच्चों को प्यार करती है।)
बहू : माँ जी, आपने बच्चों को लाड़-प्यार कर कर के बिगाड़ दिया है। हर समय खेलना, घर के कामकाज और पढ़ाई में इनका मन ही नहीं लगता।
सासूजी (दादी) : अरे बहू! समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। अच्छा बच्चो बताओ तुम लोग मंदिर गए थे?
सभी बच्चे : (एक साथ) जी भूल गए दादी माँ। (किताब से उलट-पुलट करते हुए) ये कौनसी किताब है दादी माँ?
दादी माँ : बच्चो यह धर्म की पुस्तक है। अच्छा बच्चो जाओ, अपनी पढ़ाई करो। हाँ, कल से मंदिर जरूर जाना। मंदिर जाओगे तो धर्म की बहुत अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाऊँगी।
बच्चे : अच्छा दादी माँ! (कहते हुए चले जाते हैं।) (सास और बहू मंच पर बैठी हैं। धर्मवीर के पिता का प्रवेश।)
धर्मवीर की माँ : धर्मवीर दुकान से नहीं आया? धर्मवीर के पिता : अरी भाग्यवान! वह दुकान गया ही कब था?
धर्मवीर की माँ : तो फिर 10 बजे से निकला शाम होने को आई अभी
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अहिंसा की महिमा
तक कहाँ है?
धर्मवीर के पिता : अरे आजकल वह अक्सर दुकान से गायब रहता है। दिन भर यार-दोस्तों के साथ घूमता रहता है।
धर्मवीर की माँ : देखो जी, मेरे बेटे पर झूठी तोहमत मत लगाओ। वह फालतू घूमने वाला नहीं है। आजकल मंदिर में कोई ब्रह्मचारीजी आएं हैं। उन्हीं के पास गया होगा। रात में खाना भी नहीं खाता। देव दर्शन के बिना मुँह में पानी भी नहीं डालता। कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गया है। पिता : अरे भाई, सिर्फ मंदिर में बैठने से तो दुकान चलने वाली नहीं है। यह सब भी तो देखना पड़ता है। मैं तो कहता हूँ उसकी शादी कर दो। जब सिर पर जिम्मेदारी पड़ेगी तो सब समझ में आ जाएगा। चम्पापुर के सेठ करोड़ीमलजी कबसे मेरे पीछे पड़े हैं।
सासूजी : चम्पापुर के सेठ करोड़ीमलजी! अरे बेटा, वो तो बड़े अच्छे लोग हैं। उनकी कन्या भी बहुत सुशील है। मैं भी पर पोते की आस लगाए बैठी हूँ।
माँँ : सासूजी, अभी इतनी जल्दी ही क्या है? अभी तो उसकी खेलने की उम्र है।
सासूजी : (धर्मवीर के पिता की ओर इशारा करते हुए) बहू, जब मैंने इसकी शादी की थी तो यह कितना बड़ा था? तुम्हें तो अच्छी तरह से पता है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।
पिता : लेकिन इन्हें तो अपना बेटा छोटा ही नजर आता है।
माता : देखियेजी, जरा सी बात को आप बढ़ा-चढ़ाकर कुछ
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सच्चे साथी
ज्यादा ही बना देते हैं। अभी धर्मवीर आएगा तो पूछ लीजिएगा। मुझे क्या है, मैं भी आराम करूँगी।
(धर्मवीर का प्रवेश)
धर्मवीर : प्रणाम दादी माँ, प्रणाम पिताजी, प्रणाम माताजी।
पिता : कहाँ थे अभी तक? आज दुकान पर भी नहीं आए?
धर्मवीर : पिताजी, मंदिर गया था। ब्रह्मचारीजी का प्रवचन हो रहा था। इतना प्रभावशाली प्रवचन था कि समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला।
माता : बेटा, तूने कुछ खाया की नहीं, अब तो रात्रि भी हो गई है।
पिता : तुम चुप रहो जी। पहले मुझे बात कर लेने दो। सुनो धर्मवीर, मैंने फैसला कर लिया है कि अगले महीने तुम्हारा विवाह कर दूँ। चम्पापुर के सेठ करोड़ीमल की बेटी बहुत सुशील कन्या है।
धर्मवीर : पिताजी, इतनी जल्दी भी क्या है? अभी तो मैं ब्रह्मचारीजी से कुछ धर्मज्ञान की बातें सीख रहा हूँ।
पिता : बहुत हो चुका धर्म ध्यान। अब मैं थक चुका हूँ। तुम्हारे भाई-बहन अभी बहुत छोटे हैं। अब तुम व्यापार और घर-गृहस्थी में मन लगाओ। (दृश्य परिवर्तन)
सूत्रधार : (परदे के पीछे से आवाज) धर्मवीर पिता के वचन सुनकर ऊहापोह की स्थिति में फँस गया। उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे क्या नहीं। वह सीधा ब्रह्मचारीजी के पास पहुँचा।
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सच्चे साथी
(आश्रम में)
धर्मवीर : भैयाजी! वंदना!
महाराज : धर्मवृद्धि! कहो धर्मवीर, क्या बात है? अभी थोड़ी देर पहले ही तो तुम यहाँ से गए हो। इतनी जल्दी वापस कैसे आना हुआ?
धर्मवीर :- भैयाजी! बात ये है कि....... ब्रह्मचारीजी : हाँ हाँ कहो, संकोच मत करो। धर्मवीर : भैयाजी!, मेरे माता-पिता मेरा विवाह करना चाहते हैं।
ब्रह्मचारीजी : धर्मवीर, ये तो बहुत अच्छी बात है। इसमें परेशान होने वाली क्या बात है? जीवन में चार पुरुषार्थ होते हैं- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। मनुष्य को चारों पुरुषार्थों का पालन करना चाहिए। तुम प्रसन्नतापूर्वक विवाह करो। लेकिन धर्म को कभी मत छोड़ना। धर्म वह नैया है जो तुम्हें इस संसार सागर से पार लगा देगी।
(यहाँ विवाह का दृश्य भी दिखा सकते हैं) सूत्रधार : (परदे के पीछे से) धर्मवीर का विवाह शुभ मुहूर्त में चम्पापुर के सेठ धनीराम की इकलौती पुत्री माधवी के साथ बड़े धूमधाम से संपन्न हो गया। माधवी बहुत ही सुंदर और गुणवान थी। धर्मवीर पत्नीप्रेम में सब कुछ भूल गया। उसका अधिकांश समय घेर में ही बीतता था। काफी दिन हो गए, वह भैयाजी के पास भी नहीं गया। एक दिन... (मंच पर ब्रह्मचारीजी बैठे हैं। कुछ भक्त लोग बैठे हैं।)
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सच्चे साथी
ब्रह्मचारीजी का प्रवचन हो रहा है।)
ब्रह्मचारीजी : धर्मप्रेमी सज्जनों, ये मनुष्य शरीर बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है। चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद ये मनुष्य शरीर मिलता है। यदि मनुष्य शरीर पाकर भोग विलास में जीवन बिता दिया तो समझो जीवन व्यर्थ हो गया। प्रत्येक गृहस्थ को चाहिए कि गृहस्थी में रहते हुए 6 मुख्य नियमों (देव दर्शन, गुरु भक्ति, स्वाध्याय, संयम, तप और दान) इनका अवश्य पालन करे। (चारों ओर देखते हुए) अरे रामदीन!
रामदीन : जी भैयाजी!
ब्रह्मचारीजी : रामदीन, आजकल धर्मवीर नहीं आता? जबसे उसका विवाह हुआ है उसे देखा ही नहीं।
रामदीन : भैयाजी, अब आप उसे भूल ही जाइये। अब वो नहीं आएगा।
ब्रह्मचारीजी : क्यों? ऐसी क्या बात हो गई? उससे कहना मैंने उसे याद किया है।
रामदीन : कहने को तो मैं कहूँगा भैयाजी! लेकिन उसका आना मुश्किल है। जबसे उसका विवाह हुआ है, बस घर में ही रहता है। हम लोगों के साथ कहीं घूमने-फिरने भी नहीं जाता। ब्रह्मचारीजी : ठीक है तुम कह देना, आगे उसकी मर्जी। (दृश्य परिवर्तन)
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सच्चे साथी
(घर का दृश्य) (दादी और माताजी बैठी हैं। धर्मवीर की बहू का प्रवेश। वो सास और दादीजी के पैर छूकर आशीर्वाद लेती है।)
धर्मवीर की बहू : प्रणाम दादी माँ, प्रणाम सासूजी।
दादी माँ : कितनी सुंदर है मेरी बहू। बेटा, धर्मवीर कहाँ है?
बहू : जी वो... वो...।
धर्मवीर की माँ : अरे सासूजी, यहीं कहीं होगा। जबसे बहू आई है, ज्यादातर घर में ही रहता है। दादीजी : मैंने तो पहले ही कहा था, शादी हो जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा।
धर्मवीर का प्रवेश : माधवी... माधवी...।
माताजी : आ गए बेटा, आओ बैठो। (दादी और माताजी एक-दूसरे से बात करती हुई निकल जाती हैं।)
माधवी : आप कहाँ चले गए थे?
धर्मवीर : अरे अभी मुश्किल से आधा घंटा हुआ है और तुम परेशान हो गई
माधवी : देखियेंजी, आपके बिना मेरा मन बिल्कुल भी नहीं लगता।
धर्मवीर : अरे मेरा मन ही कहाँ लगता है, लेकिन थोड़ा दुकान में समय तो देना ही पड़ेगा।
माधवी : मैं कुछ नहीं जानती। आपके बिना मेरा मन घर में बिल्कुल नहीं लगता।
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सच्चे साथी
धर्मवीर : क्या घर के लोग तुम्हें अच्छे नहीं लगते?
माधवी : ये आप कैसी बातें करते हैं? घर के सभी लोग बहुत अच्छे हैं। दादीजी, माताजी, बाबूजी, सभी लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं। परंतु आपके बिना मुझे सूना-सूना सा लगता है। धर्मवीर : अच्छा चलो, कहीं घूमकर आते हैं। (दोनों मिलकर चले जाते हैं।) (दृश्य परिवर्तन) (धर्मवीर और माधवी मार्ग में घूम रहे हैं। तभी राह चलते रामदीन धर्मवीर को भैयाजी का संदेश देता है। सुनकर धर्मवीर सन्न रह जाता है। उसे भैयाजी के उपदेश याद आने लगे। वह माधवी को घर छोड़कर सीधे भैयाजी के पास पहुँचा।)
(आश्रम का दृश्य) (ब्रह्मचारीजी बैठे कोई पुस्तक पढ़ रहे हैं। धर्मवीर का प्रवेश। वह वंदना भैयाजी! कहकर उनके कदमों में बैठ जाता है।)
धर्मवीर : क्षमा करें भैयाजी! इधर व्यस्त रहने के कारण मैं आपके पास आ नहीं पाया। ब्रह्मचारीजी : मैं भी सोच रहा था कि धर्मवीर आजकल क्यों नहीं आ रहा है? इसीलिए बुलवाना पड़ा।
धर्मवीर : क्या करूँ भैयाजी! एकाध बार मैंने आने को सोचा पर माधवी की बातों से फुर्सत ही नहीं मिलती। वह मुझसे
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दिशा दी है। लगता है इसी खुशी और प्रेम का नाम ही जीवन है।
ब्रह्मचारीजी : धर्मवीर, तुम ठीक कह रहे हो। लेकिन आगे की कुछ सोची है? तुम्हारे साथ क्या जाएगा? मात्र तुम्हारा धर्म। भाई-बंधू, माता-पिता, पत्नी ये सब जब तक जीवन है बस तब तक के ही साथी हैं। उसके आगे का सफर तुम्हें अकेले ही तय करना है।
धर्मवीर : अगले जन्म की तो मैं नहीं जानता भैयाजी! लेकिन इस जन्म में तो मेरे घर वाले मेरे सच्चे साथी हैं। मेरी खुशी उनकी खुशी है। मेरा गम उनका गम है। मुझे यदि कुछ हो जाए तो वो मेरे बिना रोकर अपनी जान दे देंगे।
ब्रह्मचारीजी : धर्मवीर, यही तुम्हारी भूल है। जब तक शरीर है तब तक नाता है। मनुष्य को अपने कर्म का फल स्वयं को ही भोगना पड़ता है। यदि तुमने कोई पाप किया है तो उसका फल तुम्हें ही भोगना होगा। यदि आज तुम्हें कुछ हो जाए तो सब दुःखी अवश्य होंगे लेकिन तुम्हारे साथ कोई मरेगा नहीं।
धर्मवीर : भैयाजी!, ये आपका भ्रम है। मेरे घर वाले तो मुझे इतना प्यार करते हैं कि वो मेरे बिना जिन्दा ही नहीं रह सकते।
ब्रह्मचारीजी : तुम्हें अपने घर वालों पर इतना भरोसा है?
धर्मवीर : भैयाजी! इससे भी ज्यादा।
ब्रह्मचारीजी : अच्छा, मेरी बात सुनो। मैं तुम्हें एक औषधि देता हूँ। इसे तुम घर जाकर अपने शरीर पर मल लेना। इसको
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सच्चे साथी
मलने पर तुम्हारी सारी इन्द्रियाँ निर्जीव सी हो जाएँगी। लेकिन तुम्हें सब कुछ सुनाई देता रहेगा। बस तुम चुपचाप पड़े रहना। (भैयाजी कुछ और भी समझाते हैं जो सबको सुनाई नहीं देता।) धर्मवीर : ठीक है भैयाजी! आप जैसा कहते हैं मैं वैसा ही करूँगा। लेकिन आपके हाथ निराशा ही लगेगी। (ब्रह्मचारीजी चले गए।) धर्मवीर : (जाते-जाते) लगता है भैयाजी को मेरे घर वालों पर भरोसा नहीं है।
(संगीत)
(घर का दृश्य)
सूत्रधार : धर्मवीर घर जाकर प्रेमपूर्वक भोजन करता है तथा अपने कमरे में जाकर बदन पर औषधि लगाता है। औषधि लगाते ही वह अचेत-सा हो जाता है।
माधवी : (हाथ में पान लेकर) अजी कहाँ हैं आप? अच्छा तो जनाब इतनी जल्दी सो भी गए। (उठाकर) उठिये, पान खा लीजिए। (पति को अचेत देखकर वह चिल्ला उठती है) माँ जी, देखिये। इन्हें क्या हो गया है?
माताजी : (आकर) क्या हुआ बहू? (पुत्र के ऊपर झुककर) बेटा धर्मवीर, आँखें खोलो। बेटा- (वह भी चिल्ला उठती है) सासूजी।
दादी : क्या हुआं? (वह भी चिल्लाने लगती है।) पिता : अरे क्यों हल्ला मचा रखा है? क्यो बात हो गई? (पुत्र
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सच्चे साथी
को बुलाओ। (सब लोग शांत रहते हैं)
एक व्यक्ति : जी बुला रहा हूँ।
डॉक्टर : अरे-अरे भीड़ हटाइये। हमें देखने दीजिये। (डॉक्टर नाड़ी देखता है, चेकअप करता है तथा मुँह लटकाकर खड़ा हो जाता है और कहता है-) अब कुछ नहीं हो सकता। ये सब कैसे हुआ?
माताजी : डॉक्टर साहब, अच्छा भला था मेरा लाल। खाना खाया और लेट गया। बोलो बहू, तुमसे कुछ कहा था?
बहू : नहीं माताजी, प्रेम से खाना खाया और लेट गए। मैं पान देने आई तो देखा अचेत पड़े थे। डॉक्टर : अब कुछ नहीं हो सकता। (कहकर चले जाते हैं।) (सब लोग रोने लगते हैं। पास-पड़ोस के लोग इकट्ठा हो जाते हैं।)
एक व्यक्ति : बड़ा भला लड़का था, पता नहीं क्या हुआ? खूब पूजा-पाठ किया करता था।
दूसरा व्यक्ति : अरे भैया, कलियुग है। होम करते हुए हाथ जलता है।
वृद्ध व्यक्ति : अरे भैया, यह सब कैसे हो गया? पिता : अरे चाचा, हम लुट गए, बर्बाद हो गए। वृद्ध व्यक्ति : धैर्य रखो भैया, जो होना था वो तो हो गया। अब आगे की सोचो। बाल-बच्चों का घर है। (सब दहाड़ मारकर रोते हैं।)
माता : अरे कोई ब्रह्मचारीजी को तो बुलाओ।
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सच्चे साथी
(एक आदमी दौड़कर जाता है।) (ब्रह्मचारीजी का प्रवेश) माता : अरे ब्रह्मचारीजी! अपने धर्मवीर को बचा लीजिये। आप तो बड़े ज्ञानी हैं। (सब दहाड़ मारकर रोते हैं।) ब्रह्मचारीजी : देखिये, आप लोग शांत हो आइये। धर्मवीर के जीवित होने का अभी भी एक उपाय है。 सब लोग उत्सुकता से : बताइये महाराज, आप जो भी कहेंगे, हम करने को तैयार हैं। पिता : भैयाजी! आप मेरी पूरी सम्पत्ति ले लीजिये। लेकिन मेरे लाल को ठीक कर दीजिये। ब्रह्मचारीजी : इस चंचल लक्ष्मी को लेकर मैं क्या करूँगा। छوٹی
बहन : भैयाजी, आप मेरे सारे खिलौने ले लीजिये लेकिन मेरे भैया को अच्छा कर दीजिये।
ब्रह्मचारीजी : देखिये, आप लोग शांत हो आइये और एक मिट्टी का सकोरा तथा एक गिलास पानी लाइये। (एक व्यक्ति दौड़कर सकोरा तथा पानी लाता है। ब्रह्मचारीजी सकोरे में पानी डालते हुए कुछ मंत्र पढ़कर फूँकते हैं तथा कहते हैं)
ब्रह्मचारीजी : माताजी, आपकी उम्र क्या है?
माता : यही कोई 50 वर्ष।
ब्रह्मचारीजी : ऐसा करिए, आप ये पानी पी लीजिये। मैंने इसको मंत्रित कर दिया है। इसको पीने से आप मर जाएँगी तथा आपका बेटा जीवित हो जाएगा।
माता : महाराज कोई और उपाय नहीं है? वो क्या है कि... वो क्या है कि... अभी मेरी गृहस्थी बहुत कच्ची है। बेटे-
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सच्चे साथी
बेटी का ब्याह करना है। यह सब कौन संभालेगा? अभी छोटी ही है। पूरी जिन्दगी तो भैयाजी बच्चों पालने में लगा दी। अब थोड़ा सुख का दिन आया तो... (कुछ सोचते हुए)... जो होना था वो तो हो गया, मैं दूसरे बच्चों को देखकर संतोष कर लूँगी।
ब्रह्मचारीजी : ठीक है, पिताजी को दे दीजिये। वे ही पी लेंगे।
माता : अरे भैयाजी! इनको कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगी?
पिता : भैयाजी! इस समय मेरा व्यापार बहुत फैला हुआ है, लाखों का लेन-देन है। बड़ी मेहनत से इतना सब किया है। मुझे कुछ हो गया तो बरसों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। बच्चे अभी छोटे हैं। कुछ भी संभाल नहीं पाएँगे, ये तो दुनिया का मेला है। जो आता है उसे जाना पड़ता है। कोई आगे कोई पीछे। अब संतोष तो करना ही पड़ेगा।
ब्रह्मचारीजी : तो उसकी दादी को ही बुला दो। वे तो अस्सी वर्ष पार कर चुकी हैं।
दादीजी : नहीं भैयाजी! अभी तो भरा-पूरा परिवार छोड़कर मैं न मरना चाहती। ब्रह्मचारीजी : तो उसकी पत्नी को ही बुला लीजिये।
पत्नी : जी भैयाजी! कहिए!! क्या आज्ञा है?
ब्रह्मचारीजी : बेटा तुम्हारा पति तो तुमसे बहुत प्यार करता था।
पत्नी : जी भैयाजी, बहुत स्नेह करते थे।
ब्रह्मचारीजी : तो आप ही इसे पी लीजिए।
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सच्चे साथी
पत्नी : भैयाजी! जब कोई मरने को तैयार नहीं है तो मैं ही क्यों मरूँ? मेरी अभी उम्र ही क्या है? मैं तो दूसरी शादी भी कर लूँगी। (ब्रह्मचारीजी ने मुस्कुराकर धर्मवीर को एक औषधि सुंघा दी। धर्मवीर उठकर बैठ गया।)
धर्मवीर : भैयाजी, आपने मेरी आँखें खोल दीं।
ब्रह्मचारीजी : देखा धर्मवीर, ये तुम्हारे अपने हैं。 तुम्हारी इन्हें कितनी चिंता है? ये तो तुम सुन ही चुके हो。 मैंने क्या कहा था कि सच्चा साथी केवल धर्म है。 यह मैं सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए कह रहा हूँ。 कि धर्म के प्रति आस्थावान बनो。 सांसारिक सुख में इतना न रम जाओ कि धर्म को ही भूल जाओ。 थोड़ा समय धर्मध्यान में अवश्य लगाओ。 धर्म-ध्यान करने से मन शांत, भाव निर्मल और परिवार संस्कारित होते हैं。 यह भव भी सुधरता है तथा अगला भव भी सुधरता है。
धर्मवीर : भैयाजी, मैं आपके साथ चलूँगा。 अब मैं घर में नहीं रहना चाहता。 घर से मेरा मोहभंग हो चुका है。
ब्रह्मचारीजी : नहीं धर्मवीर, अभी तुम्हें बहुत काम करने हैं。 आपके परिवार को तुम्हारी बहुत जरूरत है。 गृहस्थी में रहते हुए धर्म का पालन करो。
सब लोग : भैयाजी! की जय, जैन धर्म की जय。
(समाप्त)
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