सती मैनासुंदरी और श्रीपाल का जीवन चरित्र
पात्र परिचय
श्रीपाल: चम्पापुरी के राजकुमार (जो कोढ़ रोग से पीड़ित हैं)
मैनासुंदरी (अंजन सुंदरी): राजा श्रीपाल की धर्मपरायण और पतिव्रता पत्नी
राजा श्रीपाल के माता-पिता: चम्पापुरी के राजा-रानी
अंजन महासती: महान जैन साध्वी (जिन्होंने मैनासुंदरी को व्रत और पूजा की विधि बताई)
अन्य पात्र: दरबारी, सखियाँ और सेवक
नाटक आरंभ
दृश्य 1: राजदरबार और मैनासुंदरी का दृढ़ संकल्प
(दृश्य चम्पापुरी के भव्य दरबार का है। राजा और रानी अपनी पुत्री राजकुमारी मैनासुंदरी के विवाह की चर्चा कर रहे हैं।)
राजा (पिता): पुत्री मैनासुंदरी! अब तुम्हारे विवाह की आयु हो चुकी है। राज्य में कई योग्य राजकुमार और राजा कुमार मौजूद हैं। तुम जिसे भी चुनोगी, हम उसी के साथ तुम्हारा विवाह कर देंगे।
मैनासुंदरी: (हाथ जोड़कर विनम्रता और दृढ़ता के साथ) पिताश्री, इस संसार में हर व्यक्ति अपने-अपने कर्मों का फल भोगता है। जिसे जो वर या भाग्य मिलना है, वह उसके पूर्वकृत कर्मों के अनुसार ही मिलेगा। मेरा भाग्य जिसके साथ भी जुड़ा होगा, वही मेरा सही जीवनसाथी होगा।
रानी (माता): बेटी, ऐसा मत कहो। अच्छे राजकुमार से विवाह करने से जीवन सुखमय होता है।
(तभी दरबार में एक कुष्ठ रोग (कोढ़) से पीड़ित, शरीर से गल चुके और अत्यंत दयनीय अवस्था में एक राजकुमार श्रीपाल का प्रवेश होता है, जिसके साथ कई अन्य साधारण रोगी भी हैं। कर्मयोग के कारण मैनासुंदरी का विवाह इसी राजकुमार श्रीपाल के साथ तय कर दिया जाता है।)
मैनासुंदरी: (बिना किसी झिझक के स्वीकार करते हुए) पिताश्री! यदि मेरे कर्मों में यही लकीर है, तो मैं इन्हें ही अपना पति मानती हूँ। मेरा विश्वास मेरे धर्म और कर्म पर है।
दृश्य 2: अंजन महासती का शरण और श्रीपाल का कायाकल्प
(दृश्य एक शांत उपवन का है जहाँ जैन साध्वी अंजन महासती विराजमान हैं। मैनासुंदरी अपने पति श्रीपाल को लेकर महासती के पास पहुँचती है, जिनका शरीर कोढ़ के कारण अत्यंत कष्ट में है।)
मैनासुंदरी: (आँखों में आंसू और श्रद्धा लिए महासती के चरणों में झुकते हुए) हे माता! मेरे स्वामी इस भयंकर कोढ़ रोग से पीड़ित हैं। इनके शरीर का एक-एक अंग गल रहा है। कृपया मुझ पर कृपा करें और कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मेरे पति इस भयंकर रोग से मुक्त हो सकें और उनका जीवन सुधर जाए।
अंजन महासती: (करुणाभरी दृष्टि से देखते हुए) पुत्री मैनासुंदरी! तुम्हारे मन में अपने पति के प्रति सच्ची निष्ठा और सेवाभाव देखकर मुझे प्रसन्नता हुई है। संसार के डॉक्टर या औषधियाँ केवल शरीर का इलाज करती हैं, लेकिन कर्मों के रोगों को केवल 'अंजन महाव्रत' (जिनपूजा और उपवास) ही मिटा सकता है।
मैनासुंदरी: हे माता! आप मुझे वह व्रत और विधि बताइए। मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करूँगी।
अंजन महासती: तप और जिनेन्द्र भगवान की आराधना का यह व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला है। विधि-विधान से अंजन सुंदरी (अंजन महाव्रत) का पालन करने से तन और मन दोनों पवित्र हो जाते हैं।
दृश्य 3: चमत्कार और श्रीपाल का नया जीवन
(दृश्य कुछ महीनों बाद का है। मैनासुंदरी ने पूर्ण निष्ठा, उपवास और जैन विधि-विधान से 'अंजन महाव्रत' और जिनपूजा संपन्न कर ली है।)
(अचानक तेज और चमकीला प्रकाश प्रकट होता है। श्रीपाल के शरीर का कोढ़ धीरे-धीरे पूरी तरह समाप्त होने लगता है। उनके शरीर के घाव भर जाते हैं और वे अत्यंत रूपवान, स्वस्थ और तेजस्वी राजकुमार के रूप में बदल जाते हैं।)
श्रीपाल: (अपने स्वस्थ और सुंदर शरीर को देखकर अवाक रह जाते हैं और मैनासुंदरी के चरणों में हाथ जोड़ते हैं) हे प्रिये मैनासुंदरी! यह क्या चमत्कार है? मैं तो मृत्यु और भयंकर पीड़ा के आगोश में था, लेकिन तुम्हारी इस धर्म-आराधना और अटूट विश्वास ने मुझे नया जीवन दे दिया है। आज मेरा केवल शरीर ही नहीं, बल्कि मेरी आत्मा भी रोगमुक्त हो गई है।
मैनासुंदरी: (मुस्कुराते हुए) यह मेरा कोई चमत्कार नहीं है स्वामी! यह तो हमारे सच्चे जैन धर्म, पंचपरमेष्ठी की भक्ति और 'अंजन महाव्रत' का प्रभाव है। धर्म ही इस संसार में सबसे बड़ी रक्षा है।
(राज्य में चारों ओर उत्सव मनाया जाता है, और सब लोग मैनासुंदरी के पतिव्रता धर्म और जैन धर्म के प्रभाव की जय-जयकार करते हैं।)
(पर्दा गिरता है।) \rightarrow जय जिनेंद्र \leftarrow