शील का रामाधार
सूत्रधार : चतुर्थ काल की कथा है, जिस समय महेन्द्र नगर राज्य का भार राजा महेन्द्र के हाथ में था। उनकी एक सती शिरोमणि शीलवती नामक पुत्री उत्पन्न हुई थी। जब वह यौवन अवस्था में आई तो माता-पिता को शादी करने की इच्छा हुई। सो यहाँ पर दिखाते हैं। राजा महेन्द्र का राज दरबार लगा हुआ है। राज दरबार में महाराजा, चार मंत्री, द्वारपाल, सेनापति आदि सभी विराजमान हैं। (नर्तकी नृत्य कर रही है) (पर्दा उठता है)
द्वारपाल : महाराज की जय हो। (तीन बार बोलना)
महेन्द्र राजा : कहो द्वारपाल क्या बात है?
द्वारपाल : महारानी जी राजदरबार मे पधारने की आज्ञा माँगती हैं।
महेन्द्र राजा : महारानी जी को शीघ्र ही सम्मान सहित अन्दर भेज दिया जावे।
द्वारपाल : जैसी आज्ञा महाराज की। (द्वारपाल का जाना) (महारानी का प्रवेश)
महेन्द्र राजा : आइये महारानी जी पधारिये। (महारानी का बाई ओर सिंहासन पर बैठना) कहिये कैसे आना हुआ?
रानी हृदयवेगा : महाराज! आप तो राज दरबार में आकर नर्तकी के नृत्य में मग्न हो जाते हो। कोई चिन्ता भी है।
महेन्द्र राजा : महारानी जी किस बात की चिन्ता होनी चाहिए। राज्य का कार्य सकुश चल रहा है। कोई भी मेरे राज्य में दुःखी नहीं है। सब जगह मंगल ही मंगल है।
रानी हृदयवेगा : यह सब तो ठीक है, परन्तु अन्जना!
राजा महेन्द्र : क्या हुआ अन्जना को? स्वस्थ तो है?
रानी हृदयवेगा : वह तो सदैव निरोग ही रही है। फिर भी अन्जना की चिन्ता होनी चाहिए।
राजा महेन्द्र : साफ-साफ कहो महारानी जी किस बात की चिन्ता होनी चाहिए?
रानी हृदयवेगा : अब हमारी अन्जना यौवन अवस्था में आ गई है। उसके लिए सुयोग्य वर तलाश करके शादी कर देनी चाहिए। यह ही चिन्ता का विषय है।
राजा महेन्द्र : (हँस कर) इस विषय को लेकर हमारी महारानी जी चिन्ता कर रही हैं। मंत्री जी हमारी अन्जना बेटी के लिए कोई योग्य वर बताओ।
मंत्री नं. 1 : महाराज जी! रावण का बेटा मेघनाथ एवं इन्द्रजीत में से किसी एक से अन्जना की जोड़ी ठीक रहेगी।
मंत्री नं. 2 : नहीं महाराज, यह ठीक इसलिए नहीं है कि इन दोनों में विरोधाभास है। अगर इन दोनों का युद्ध हो गया तो एक से मित्रता एवं एक से दुश्मनी होनी स्वाभाविक है।
मंत्री नं. 3 : महाराज, हिरण्य राजा के राजकुमार के साथ अन्जना की जोड़ी ठीक रहेगी। वह बलशाली एवं सुन्दर भी है।
मंत्री नं. 4 : महाराज! वह राजकुमार बल, गुण, कुल में किसी प्रकार से कम नहीं है, परन्तु वह यौवन अवस्था में ही संसार से विरक्त होकर दिगम्बरत्व मुनि दीक्षा को धारण करेगा। इसलिए महाराज आदित्य नगर के राजा प्रह्लाद का पुत्र पवन कुमार ही सब तरह से अन्जना पुत्री के लिए योग्य होगा।
राजा महेन्द्र : महारानी जी एवं मंत्री गणों आप सब की क्या राय है?
मंत्री : (सभी एक साथ बोलते हैं) ठीक है, महाराज जी।
राजा महेन्द्र : महारानी हृदयवेगा जी, आपकी क्या राय है?
महारानी हृदयवेगा : ठीक है महाराज, शीघ्र ही लग्न भेज दिया जावे।
राजा महेन्द्र : इतनी शीघ्रता क्या है? पहले हम बसन्त ऋतु की बेला में आदिनाथ भगवान् की वन्दना करने के लिए कैलाश पर्वत पर जायेंगे।
रानी हृदयवेगा : ठीक है महाराज, जैसे आपकी इच्छा।
राजा महेन्द्र : मंत्री जी कैलाश पर्वत जाने की पूर्ण तैयारी की जावे।
मंत्री नं. 1 : ठीक है महाराज जी, सभी तैयारियाँ शीघ्र हो रही हैं। (सभी का जाना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : राजा महेन्द्र अपनी रानी हृदयवेगा, पुत्री अंजना, मंत्रीगण आदि के साथ कैलाश पर्वत पर, पहुँच जाते हैं। वहाँ पर राजा प्रहलाद भी अपने सम्पूर्ण परिवार एवं दल-बल के साथ पहुँच जाते हैं। दोनों पक्षों के राजाओं की बातचीत होती है। पंडित जी को बुलाकर शादी का मुहूर्त निकाला जाता है। राजा महेन्द्र ने अपनी पुत्री अंजना की फोटो राजा प्रहलाद को दे दी थी। राजा प्रहलाद ने वह फोटो पवन को दे दी थी। पवन उस फोटो को देखकर क्या विचार करते हैं। वह फोटो अपने मित्र प्रह्रस्त को बतलाते हैं। दोनों क्या विचार करते हैं। सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (कैलाश पर्वत का दृश्य)
पवन : (प्रहस्त से) हे मित्र, जैसा इस सुन्दरी का चित्र है। क्या ऐसी ही सुन्दर होवेगी या कुछ दाल में काला नजर आता है?
प्रहस्त : हे मित्र! अगर तुमको कुछ शंका उत्पन्न होती है तो जाकर के स्वयं अपनी आँखों से देख सकते हो।
पवन : ठीक है। हम दोनों अपना वेश बदलकर यहाँ से चलते हैं। किसी को कुछ पता नहीं चलना चाहिए।
प्रहस्त : ठीक है मित्र। जैसी आपकी इच्छा हो वैसे किया जावेगा। परन्तु तीन दिन के बाद तो अंजना तुम्हारी ही होवेगी। इतनी जल्दी क्या है?
पवन : उसके देखने को तो यह आँखें तड़प रही हैं। हृदय बेचैन है। तीन दिन तो बहुत दूर है। अब पल भर नहीं रहा जाता।
प्रहस्त : ठीक है मित्र, अब हम वेश बदलकर चलते हैं। (दोनों का अंजना को देखने के लिए जाना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : कैलाश पर्वत के एक ओर यहाँ पर अंजना अपनी सहेलियों के साथ बैठी बातचीत कर रही थी। उधर पवन एवं प्रहस्त उनकी बातों को गुप्त रूप से सुन रहे थे। वह दृश्य दिखाया जावेगा। (पर्दा उठता है) (अंजना उपवन का दृश्य)
सखी नं. 1 : हे सखि अंजना! पवन जैसा सुन्दर एवं हर प्रकार से योग्य वर आपको प्राप्त हुआ है। जैसे राम को सीता प्राप्त हुई थी। अब तो तीन दिन के बाद पवन की बाहों में आकर हमें मत भूल जाना।
सखी नं. 2 : (हँसते एवं अंजना को छेड़ते हुए) हे अंजना! क्या यह पवन मनुष्य में मनुष्य है, जो तू उसको दिल दे बैठती है। वह हिरण्य राजा का पुत्र कुछ कम था क्या? जो तूने पवन को दिल...
दे दिया है, और अब उसे अनुराग कर रही है। (अंजना का अपनी सहेलियों सहित हँसते हुए चले जाना)
पवन : (क्रोध से) देखा अन्जना को उसे अपने सौन्दर्य पर कितना अभिमान है। मैं भी क्षत्रिय का पुत्र नहीं हूँ, जो उसको ऐसा सबक सिखाऊँगा। हे सूरज, तुम्हें साक्षी कह करके प्रण करता हूँ कि शादी करने के बाद 22 वर्ष तक उसका मुँह नहीं देखूँगा।
प्रहस्त : नहीं दोस्त, ऐसा प्रण नहीं करना चाहिए। क्योंकि सखियों के बीच ऐसी हँसी मजाक होती रहती है।
पवन : अब मैंने जो प्रण किया है। वह अटल है। अब हम चलते हैं। (दोनों का जाना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : अन्जना एवं पवन की शादी हो जाती है। पवन, अन्जना के महल में नहीं जाता है। यह बात जंगल में लगी आग के समान अल्प काल में सम्पूर्ण राज्य में फैल जाती है। उधर धीरे-धीरे समय व्यतीत होता जा रहा है। 22 वर्ष का समय गुजरने वाला ही था कि रावण का अपना दूत राजा प्रहलाद के राज दरबार में आता है। सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (प्रहलाद का राज्य दरबार का दृश्य। नृत्य चल रहा है।)
द्वारपाल : महाराज की जय हो। (तीन बार बोलना)
राजा प्रहलाद : द्वारपाल क्या बात है?
द्वारपाल : महाराज! लंका से महाराज रावण ने अपना दूत भेजा है। आज्ञा हो तो राज दरबार में भेज दिया जावे।
राजा प्रहलाद : दूत को सम्मान सहित अन्दर भेज दिया जावे।
दूत : (प्रवेश करके) महाराज की जय हो। (तीन बार बोलना)
राजा प्रहलाद : कहो दूत, महाराज रावण ने किस कार्य के लिए आपको यहाँ पर भेजा है?
दूत : महाराज, वरुण ने लंका पर चढ़ाई कर दी है। सो महाराज ने आपको सहायता के लिए बुलाया है।
राजा प्रहलाद : ठीक है। दूत जाओ और अपने महाराज से कह दो कि हम शीघ्र ही सेना सहित उनकी सहायता को आ रहे हैं। (दूत का जाना) मंत्री जी, पवन को बुलाकर लाओ। (मंत्री का जाना, सेनापति जी युद्ध के लिए सेना को शीघ्र प्रस्थान किया जावे)
सेनापति : जैसी आज्ञा महाराज की। (सेनापति का जाना पवन एवं मंत्री का प्रवेश)
राजा प्रहलाद : बेटा पवन। रावण ने हमें अपनी सहायता के लिए बुलाया है, क्योंकि राजा वरुण ने लंका पर आक्रमण कर दिया है। आप यहाँ पर राज्य कार्य सम्भालना।
पवन कुमार : नहीं पिताजी। मैं रावण की सहायता के लिए प्रस्थान करूँगा। आप यहाँ पर रहकर राज्य के कार्य को देखिएग।
राजा प्रहलाद : जैसी आपकी इच्छा। (सेनापति का प्रवेश करना)
सेनापति : महाराज युद्ध के हेतु सब सेना तैयार हो चुकी है। आज्ञा हो तो कूच किया जाये।
पवन : सेनापति जी, सेना को कूच का आदेश दिया जाये। हम चलने को तैयार हैं। (पवन, सेनापति एवं मंत्री आदि का युद्ध के हेतु प्रस्थान करना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : पवन रावण की सहायता के लिए प्रस्थान करता है। रास्ते में मान सरोवर तट पर विश्राम केलिए डेरा डाला। जब वह आराम कर रहे थे कि उन्हें चकवा-चकवी का विलाप सुनकर क्या प्रतिक्रिया होती है, सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (मान सरोवर का दृश्य)
पवन : मित्र प्रहस्त, यह किस जानवर का विलाप है और क्यों कर रहे हैं?
प्रहस्त : मित्र, यह चकवा एवं चकवी का विलाप है। क्योकि वह रात में एक दूसरे से नहीं मिलते हैं। इसलिए रात्रि के वियोग के कारण वह रो रहे हैं।
पवन : (आश्चर्य एवं पछतावा करते हुए) बस एक रात का ही वियोग, दोनों को खाये जाता है। चकवा-चकवी का यह रूदन आकाश हिलाये जाता है। सुन सका न फिर वह और अधिक इन पशु-पक्षी का नाता है, खुद बोल उठा तू इससे भी गया बीता पवन दिखता है। अब भी पाषाण पिघल जल्दी जब ये इतने अकुलाये हैं। उसका क्या होगा शादी से ही जिंस पर संकट छाये हैं। इक रोज नहीं दो रोज नहीं, जो कहे भूल कर आये हैं। उस बेचारी ने इसी तरह से बाईस वर्ष बितायें हैं। उसका मन क्या होता होगा, जय पाकर के जो हारी है। होकर के शादीशुदा जो अब तक रही कुंवारी है। आकाश टूट जाये मुझ पर गिर पड़े बज वो पापी हूँ। धरती माँ आत्म साध कर लो, अब मैं इतना अपराधी हूँ। हे प्रभु ! उस दिन अंजना बेबस थी। मैंने उसका गलत अर्थ लगाकर उसका परत्याग कर दिया। मुझ जैसा कोई अधम एवं पापी नहीं होगा। हे मित्र, अब आप यह सेवा संभालो तुम यहाँ पर रहना। जब तक मैं लौटकर नहीं आऊँगा, तब तक सेना का कूच नहीं होना चाहिए। मैं गुप्त रूप से जाऊंगा। किसी को इसका पता नहीं लगना चाहिए।
प्रहस्त : ठीक है मित्र, जैसे आपकी इच्छा हो। वैसे ही कीजियेगा। (पर्दा का जाना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : पवन, गुप्त रूप से प्रस्थान करके अंजना के महल की ओर आते हैं। उसकी सखी देख लेती है। सो क्या प्रतिक्रिया होती है। सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (अंजना के महल का सीन)
सखी नं. 1 : (पवन को दूर से देखते हुए) सखी अंजना अब तेरे दिन बदल गये हैं। जो आपके स्वामी पवन महल की ओर आ रहे हैं।
अंजना : (रोते हुए) हाँ दासी अब तो तुझे भी मेरे साथ मजाक करने की इच्छा हो गई है। वह तो लंका में गये हुए हैं। बाकी कुछ नहीं रहना चाहिए। (पवन का प्रवेश करना)
पवन : हे प्यारी अन्जना, मजाक नहीं हकीकत है। मैं तेरा पति पवन तेरे सामने खड़ा हूँ। मैं अपराधी हूँ।
अंजना : (हाथ जोड़कर) हे प्राणनाथ! हमसे कैसा अपराध हुआ था। किस कारण से आप 22 वर्ष मेरे पास नहीं आये थे। अब आपको किस कारण से अनुराग है।
पवन : हे प्राण प्रिय अन्जना ! आप को याद हो कि शादी के 3 दिन पहले की घटना है। जब आप अन्जना उपवन में अपनी सहेलियों के साथ हँसी-मजाक कर रही थी। उस समय मैं अपने मित्र प्रहस्त के साथ छिप कर तुम्हें देखने आया था। उस समय तुम्हारी सखी के द्वारा मेरा अपमान हुआ था। उस बात को सुन कर तुम चुपके से हँसी थीं और चली गई थीं। उस बात को लेकर मैंने 22 वर्ष न मिलने का प्रण किया था। आज एक चकवा-चकवी के वियोग ने मेरे अन्तरंग को झंझोड़ा और आप केपास आने को मजबूर कर दिया। मैं आप का अपराधी हूँ।
अन्जना : हे प्राणनाथ उस समय मेरी बहुत बड़ी मजबूरी थी। था संग की सखियों का कहना, अन्जना तुझे झेपाऊँगी। मेरा कहना था कुछ भी हो, मैं झेप न किंचित पाऊँगी। हो वीर पति की पत्नी, मैं सहती कैसे उस ताने को। बस इसी शर्त के कारण मैं हँस दी थी, झेप मिटाने को। तथा फिर मैंने उस सखी को बहुत डाँटा था। फिर भी स्वामी उस गलती को माफ कर देते।
पवन : बस अन्जना, अब आप चुप करो। मेरे से यह नादानी हो गई है। आज की रात्रि को ही सुहाग्रात समझो। उठो सोलह श्रृंगार करो।
अन्जना : ठीक है प्राणनाथ! अब भी मैंने आप को प्राप्त कर लिया है। समझो सब कुछ मिल गया है। (अंजना का सोलह श्रृंगार करना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : पवन एवं अंजना का संयोग हुआ। प्रातःकाल जब पवन चलने लगता है तब अंजना क्या कहती है। सो यहाँ पर दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (अंजना के महल का सीन)
पवन : हे प्राण प्रिय ! अब मैं रावण की सहायता के लिए जाता हूँ।
अन्जना : प्राणनाथ! आप अपने शुभ आगमन का समाचार अपने माता-पिता को बताते जाओ।
पवन : (सोचते हुए) नहीं ! प्रिय। मैं कारण समझ गया हूँ। उस नौबत के आने से पहले मैं बहुत शीघ्र आ जाऊँगा। कुछ भी हो महलों में पता नहीं लगना चाहिए। फिर भी मैं आप को अपनी मुद्रिका देता हूँ। जरूरत पड़े तो इसको दिखा देना। (अंजना को मुद्रिका देते हुए)
अन्जना : ठीक है प्राणनाथ! जैसे आपकी आज्ञा हो। मुझे शिरोधार्य है। (पवन जाता है) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : एक दिन रानी केतुमती मन में विचार करती है कि अपनी बहू अंजना के महल में गये बहुत समय हो गया है। जाकर देखूँ कि वह किस दशा में है। महारानी अपनी दासी के साथ अंजना के महल में जाती है। सो क्या होता है। सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (अंजना के महल का सीन) (महारानी केतुमती का प्रवेश करना, अंजना का उठ कर पैर छूना)
महारानी केतुमती : (बहु अंजना को देखकर क्रोध भरे स्वर में) हे अन्जना सच-सच बता दे। यह गर्भ कैसा है। यह पाप कहाँ से लाई है। हमारा कुल कलंकित करने को आई। अभी मैं तुमको देश निकाला देती हूँ।
अन्जना : (रोते हुए) तुम चाहो कैसा कह दो माताजी, हमारी झोली निर्दोष है। लंका जाने से पहले वह इन महलों में आये थे। यहाँ पर कुछ समय ठहरे थे। मैंने उनकी सेवा की थी। आप उनके आने तक इस महल में रहने दो। अगर मैं दोषी हुई तो आप देश निकाले की बात कहती हो, फिर आप मुझे चाहे सूली दे देना जी।
केतुमती : बस-बस इसका क्या सबूत है, जो पवन यहाँ पर आया था किसने देखा था, वह तो युद्ध में गये छः माह हो गये थे। सब बात झूठ है。
अन्जना : (पवन की मुद्रिका दिखाते हुए) हे माता जी यह सबूत के तौर पर अपनी मुद्रिका देकर गये थे। (सखी की ओर इशारा करके) इस सखी ने भी यहाँ पर आते हुए देखा है। उन्होंने मुझसे यह भी कहा था कि तुम चिन्ता मत करना। मैं शीघ्र ही आ जाऊँगा。
रानी केतुमती : अंजना और इस सखी की मिली भगत है। यह सब सबूत जुटा लेना। तुम जैसी मक्कारों के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। (दासी की ओर इशारा करके) दासी जाओ। सारथी को बुला कर लाओ।
दासी : जैसी आज्ञा महारानी जी की। (दासी का जाना। फिर दासी का सारथी के साथ प्रवेश करना)
केतुमती सारथी : जाओं सारथी, इस अंजना एवं उसकी सखी को काले रथ में बैठाकर जंगल में छोड आओ।
सारथी : जैसी आज्ञा (अंजना, सखी और सारथी का जाना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : काले वस्त्र, काले रथ पर बैठ कर अपनी सखी के साथ जाती है। इधर राजा प्रहलाद महाराज महेन्द्र के पास दूत पत्र लेकर जाता है। सारथी उसको जंगल में न छोड़कर उसके माता-पिता के राजमहल के बाहर छोड़कर जाता है। अब हम आपको ले चलते हैं कि महाराजा महेन्द्र के राजदरबार में वहाँ पर महारानी हृदयवेगा बैठी हुई है। मंत्रीगण, सेनापति, सभासद आदि बैठे हैं। (पर्दा उठता है) (राजा महेन्द्र के राज दरबार का दृश्य) (अंजना अपनी सखी के साथ प्रवेश करती है)
अन्जना : हे माता एवं पिता जी, मेरे ऊपर झूठा दोषारोपण लगाया गया है। मैं हर प्रकार से सताई गई हूँ। मुझे आप शरण दे दो।
रानी हृदयवेगा : (पत्र दिखाते हुए) तेरे पापों का विवरण राजा प्रहलाद ने लिख कर दिया हैं। फिर भी तुझे मुँह दिखाते शर्म नहीं आती है।
अन्जना : झूठ, सब झूठ है। पिताजी आप यहाँ के राजा और मेरे पिता हैं। आप का कर्त्तव्य है कि सच क्या है? उसे जानकर निर्णय लेना चाहिए।
राजा महेन्द्र : (क्रोध स्वर में) कुकर्म करते हुए तुझे शर्म नहीं आई। जाओं जल्दी से मेरी आँखों के सामने से दूर हो जाओ। इस राज्य में चोरों को शरण मिल सकती है, परन्तु तुम जैसी कुल कलंकित को नहीं। महल तो दूर, मेरे राज्य की सीमा से दूर चली जा। (सभासदों से) जो भी मेरे राज्य में इसको शरण देगा, उसको मृत्यु दण्ड दिया जायेगा।
अन्जना : ठीक है, मैं जाती हूँ। निर्दोष पर दोष लगाते हैं। जिस दिन इसका निराकरण हो जावेगा, उस दिन स्वयं ही अपने कृत पर पछताओगे। (अंजना का अपनी सखी के साथ जाना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : वहाँ से भी अन्जना चलती है। चलते-चलते वह एक वन में पहुँच जाती है। उस समय उसकी क्या दशा हुई थी। बस एक उस समय उसका संयम ही सहारा था। उन्होंने एक गुफा देखी और उस गुफा के बाहर मुनिराज जी विराजमान थे।
(पर्दा उठता है)
अंजना : (मुनिराज की ओर देखकर) नमस्कार करके। (जंगल का सीन) गुरुदेव जी मैंने ऐसे जो पूर्व भव में क्या अशुभ कर्म किये थे, जिसके कारण 22 वर्ष तक पति का वियोग। उसके बाद पति का मिलन हुआ तो कलंकित करके घर से निकाला गया।
मुनिराज : हे बेटी! तू पूर्व भव में पटरानी थी। परन्तु तू जैन धर्म की विरोधी थी। एकबार तूने वीतराग रथ को रुकवाने का पुरुषार्थ किया था। 22 घड़ी तक तूने जिनेन्द्र भगवान् की प्रतिमा को उठाकर छिपवाया था। उसका फल 22 वर्ष तक पति का वियोग। रथ को रुकवाने का फल कलंक लगना। परन्तु बेटी तेरे गर्भ से चरमशरीरी बलवान पुत्र होगा। पुनः पति से तेरा मिलन होगा। (मुनिराज का जाना)
अंजना : (पश्चाताप करते हुए) हे भगवान! यह मेरे ही पूर्व भवों का किया हुआ फल है। इसमें किसी का दोष नहीं है। अब मैं इस गुफा में रह कर अपना समय व्यतीत करूँगी।
सखी : ठीक है। अब हम इस गुफा को ही अपना घर बनायेंगे। यहाँ के पेड़-पौधों के फलों को खाकर ही हम अपना जीवन निर्वाह करेंगे। (दोनों का गुफा के अन्दर प्रवेश करने को जाना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : अब कुछ समय के बाद अंजना के कौख से एक अद्भुत तेजस्वी चरम शरीरी बालक का जन्म हुआ। नाम रखा गया था हनुमान। इस तरह बालक द्वौज के चन्द्रमा की भाँति बड़ा होता गया। एक दिन अंजना सखी के साथ बालक को बाहर खिला रही थी कि उस समय एक अद्भुत दृश्य होता है। सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (जंगल का सीन)
प्रतिसूर्य राजा : (अचानक विमान का रुकना एवं आश्चर्य होना) है। यह क्या हुआ है। जो मेरा विमान अचानक रुक गया है। नीचे चलकर देखते हैं। क्या माया है। किस कारण से मेरी पराजय हुई है। कोई देव शक्ति है। या कोई चमत्कार है। (विमान को नीचे उतारकर राजा और रानी ने अंजना को देखा और पहचान लिया) हे अंजना तू यहाँ वन में कैसे आई है और क्यों कर आई है। (रोते हुए) हे अंजना, मुझे साफ-साफ बता दो कि यह तेरे पर कैसी आपत्ति आई है। किसने तुझको कुदृष्टि से देखा है। मैं उसकी आँखों को फोड़ डालूँगा। और उसको मौत के घाट उतार दूंगा। अब तू मेरे साथ चल।
अंजना : हे मामा जी! इस बात को मत छेड़ो। यह सब मेरे ही पूर्व पाप कर्मों का फल है। यह मानव की कमजोरी है। जो दूसरों के ऊपर दोषारोपण करता है। अगर आपने इस बारे में कोई बात पूछी तो मैं तुम्हारे साथ में भी नहीं जाऊँगा। आप इस घाव में नमक का काम नहीं करना।
प्रतिसूर्य : अंजना बेटी, मुझे सौगंध है। मैं आपसे इस विषय में कभी भी नहीं पूछूँगा। उठ चलो शीघ्र ही तुम मेरे घर को चलो। तुम निर्दोष हो। मैं तुझको अपनी जान से भी बढ़ कर रखूँगा। (राजा एवं रानी ने बजरंगबली हनुमान को उठा कर प्यार किया और अंजना एवं उसकी सखी को साथ लेकर जाते हैं।) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : राजा प्रतिसूर्य अंजना को अपने घर लेकर जाते हैं तो रास्ते में अंजना की गोद से बालक हनुमान गिर जाते हैं। उनके गिरते ही शिला चकनाचूर हो जाती है। हनुमान जी अँगूठा चूस रहे हैं। इधर अंजना, सखी, हनुमान के साथ अपने मामा के घर सुख से रह रही है। उधर
सूत्रधार : पवन विजय प्राप्त करके लौटते हैं। तो आदित्यपुर में प्रवेश करके माता एवं पिता के पास जाते हैं। तो क्या होता है। सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) राजा प्रहलाद का राज दरबार, रानी कनक केतु भी बैठी हुई है। (नृत्य चल रहा है)
द्वारपाल : महाराज की जय हो (तीन बार बोलना)
राजा प्रहलाद : क्या बात है, द्वारपाल?
द्वारपाल : महाराज! राजकुमार पवन विजय प्राप्त करके राज दरबार में पधार रहे हैं।
राजा प्रहलाद : बड़ी खुशी की बात है। शीघ्र राज दरबार में आने दिया जावे। (पवन कुमार अपने मित्र प्रहस्थ के साथ राज दरबार में प्रवेश करते हैं) फिर उसने अपने माता-पिता के चरण छूना।
पवन : माता एवं पिता जी आप यह बताइयेगा कि मेरी पत्नी अंजना कहाँ है। कुछ बोलो तो सही। (माता एवं पिता के आँखों में आँसू देखकर) हे माता! यह आपने बहुत बड़ा अनर्थ किया मेरे आने तक तो आप तसल्ली कर लेती। उस महासती को दुःख देकर तुझे क्या मिल गया। जहाँ पर अंजना गई अब वहाँ पर मैं भी जा रहा हूँ! (पवन का जाना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : पवन, अंजना का पता लगने के लिए वह पहले महेन्द्र नगर को जाता है। जब वहाँ के द्वारपाल से पता चला कि यहाँ पर आई थी, परन्तु यहाँ पर राजाज्ञाानुसार उसको किसी ने शरण नहीं दी थी। अब वह अंजना को ढूँढने के लिए जंगल में जाता है। सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (जंगल का सीन)
पवन : (रोते हुए) हे अन्जना तुम कहाँ हो, जरा बोल तो दो। यह पवन कुमार कह रहा है। हे जंगलों के वृक्षों तुमने कहीं महेन्द्र कुमारी अन्जना को देखा है। आह! उस अन्जना पर मेरे माता-पिता ने कलंक लगाकर घर से निकाल दिया। आह! अन्जना तुम कौन से वन में छिपी हुई हो या कोई हिंसक जानवर तुमको खा गया है। या कोई दुष्ट उठाकर ले गया। हे जंगलों के पशु-पक्षियों तुमने मेरी प्राण प्यारी अंजना को देखा है। मेरी अंजना नहीं मिली तो मैं भी वनों में घूम-घूम कर अपने प्राणों को दे अूँगा। अब मैं अंजना के बिना एक पल नहीं रह सकता हूँ।
टुकड़े बना दो जिस्म के तो मुझे मंजूर है।
छेद दो तीरों से अन्जना तो मुझे मंजूर है।
वक्त पर काम मैं आया नहीं तेरे।
आग में गर फेंक दो तो मुझे मंजूर है।
कुछ पता चलता नहीं, तुम कौन से पर्दे में हो।
कोई बतलाता नहीं किस दुष्ट के पंजे में हो।।
'हे वृक्षों अगर तुमने मेरी अन्जना का पता नहीं बताया तो मैं तुम सब को उखाड़ कर फेंक दूँगा। ब्रह्मांड को आग लगा दूँगा। तीन लोक में प्रलय मचा दूँगा। हे अन्जने तुम कहाँ हो? अब हमने भी प्रण कर लिया सुन इसमें फर्क न आयेगा।
हो सात समुन्द्र पार पवन जाकर के पता लगायेगा।।
तू जहाँ कहीं भी हो मत घबड़ा अब तेरे साथ पवन होगा।
वरना वह चिता बनाऊगा जिसमें तन स्वयं हवन होगा।
आकाशवाणी : हे पवन ! अन्जना अपने पुत्र हनुमान एवं सखी के साथ हनुद्वीप में अपने मामा प्रति सूर्य के घर पर रह रही है। (पवन अब हनुद्वीप की ओर रवाना होता है) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : जब राजा महेन्द्र को मालूम हुआ कि पवन का अन्जना के वियोग में बुरा हाल हो रहा है सो उन्होंने भी जगह-जगह अपने दूत भेज दिये थे। पवन का पता लगाने के लिए दूत हनुद्वीप भी आया था। सब बातें सुनकर अन्जना की क्या प्रतिक्रिया होती है? सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (अन्जना के महल का दृश्य)
अन्जना : (सखी से) हे सखी, तुमने मेरे लिए कितना दुःख पाया है। अब नाथ मिले तो जाऊँगी। वरना वहीं मर जाऊँगी। आज से इस बालक की तुम माँ हुई और आज से यह तेरा बेटा है। मैंने तो केवल इसको जन्म दिया है। वास्तविक में तुम ही इसकी माँ हो। (प्रतिसूर्य का प्रवेश करना) मामा जी, जो आप से दूत कह गया है। वह मुझे सब मालूम हो गया है। अब आप साथ चलो या आज्ञा दो, मेरा कर्त्तव्य यह नहीं कहता है कि जब मेरे प्राणनाथ वनों में हों तो मैं महलों में आराम करूं।
प्रतिसूर्य : (कुछ सोचकर) हे प्रिय बेटी अन्जना, तुम यहीं पर रहो। मैं पता लगाने अभी जाता हूँ। यह जल, नभ, थल, पाताल कहीं भी हो, मैं उसको खोज कर लाऊँगा। तुम यहीं पर रहो। (प्रतिसूर्य का जाना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : इधर पवन मिलने की इच्छा से हनुद्वीप की ओर बढ़ रहे हैं। उधर प्रतिसूर्य पवन को खोजने के लिए उत्सुकता से जा रहे हैं। रास्ते में दोनों की क्या प्रतिक्रिया होती है? सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (हनुद्वीप के बाहर जंगल का दृश्य) दोनों का आपस में टकराना।
पवन : हे भाई आप कौन हो, रास्ते में भीड़ भी नहीं है। आपको रास्ता भी नहीं दिखता है। आप क्यों टकराये हो, हे भाई तुम दाई ओर अपनी दौड़ को लगा। मेरे जीवन में गम एवं अंधेरे हैं मुझे कहीं पर भी मेरी प्राण प्यारी अन्जना नहीं दिख रही है।
प्रतिसूर्य : (अन्जना का नाम सुनकर रुका एवं बोला) हे पवन मैं तेरा मामा प्रतिसूर्य हूँ। हनुद्वीप में मेरे घर पर तुम्हारी प्राण प्यारी अन्जना पुत्र हनुमान सहित सकुशल है। चलो अब मैं तुमको तुम्हारी प्रिया से मिला देता हूँ। (दोनों का जाना) (पर्दा गिरता है)
सूत्रधार : दोनों हनुद्वीप में पहुँच कर पवन, अन्जना से मिलते हैं। इधर राजा महेन्द्र एवं प्रहलाद भी सब परिवार सहित पहुँच जाते हैं वहाँ पर क्या होता है, सो दिखाते हैं। (पर्दा उठता है) (हनुद्वीप में प्रतिसूर्य का राजमहल का दृश्य)
रानी हृदयवेगा : (अन्जना को छाती से लगाकर) बेटी हमने तेरा कहा नहीं माना था। हमने तुम को कठोर शब्द कहे थे। हमें क्षमा कर देना जी।
रानी केतुसती : बहू अन्जना ! मेरे से ही सबसे बड़ी भूल हुई है, जो तुझ पर हमने झूठा कलंक लगाकर वन-वन भटकना पड़ा था। और मेरे ही कारण से ही तुझ को जगह-जगह अपशब्द सहन करने पड़े थे। और तुम दोनों ही धन्य हो। तुम दोनों ही धन्य हो। जिन्होंने इतने घोर कष्ट सहन करने पड़े।
अन्जना : हे प्राणनाथ, मैंने इस संसार की लीला को देख लिया है। यह जीव अनादि काल से पर पदार्थों में मोह करके सदैव अनित्य की ओर दौड़ लगा रहा है। कभी उसने नित्य की ओर
पवन : ध्यान नहीं दिया है। अपने खजाने को ढूंढना तो बहुत दूर रहा। उसके पास भी नहीं गया है। इसलिए मैं अब नित्य की खोज करके अपने घर में आने का पुरुषार्थ करूँगा। तप के द्वारा स्त्रीलिंग छेद करूँगी। इसलिए मैं अब आर्यािका के व्रत को धारण करूँगी।
अंजना : हे प्रिय, यह यौवनारथ यह रूप जो इतना सुन्दर है, जिस पर सभी मोहित हो जाते हैं। यह सम्पदा जिसके लिए सारा जगत् मर मिटता है। उसके लिए चौबीस घन्टा अपना पुरुषार्थ करता है तो भी उसे नहीं मिलते हैं। तुम्हें यह यौवनपना रूप लावण्य, सम्पदा, सभी मिली है। तुम उसे क्यों त्याग कर रही हो। यह बार-बार नहीं मिलते हैं।
पवन : हे प्राणनाथ! क्योंकि यह जवानी हमेशा बनी रहने वाली नहीं है, वह सुन्दरता कुछ भी नहीं है। हाड़, माँस, खून के ऊपर यह मक्खी के टांग के बराबर पतली चमड़ी चढ़ी है। उसे क्यों इतनी सुन्दर मान रहे हैं अन्दर तो मल-मूत्र से भरी है। यह सम्पदा मेरे किस काम की है। यह तो पुण्य की दासी है। जब पुण्य का उदय होता है तो सम्पदा बहुत मिल जाती है। पाप का उदय हो तो नहीं मिलती है। यह सब क्षणिक है। विनश्वर है। अतः मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है। भले यह बारम्बार नहीं मिलती है। मुझे तो अविनाशी वस्तु चाहिए। जिसे मैं पाना चाहती हूँ।
अंजना : हे प्राणेश्वरी अंजना वन में तू कैसे कठिन तपस्या को करेगी। वहाँ पर तो कंकड़-काँटे हैं। तेरे पैर छिल जावेंगे। वहाँ भयंकर गर्मी में तेरा शरीर तप जायेगा। कहाँ तुम ऐसे राजमहलों में पली है। और कहाँ ऐसे भयंकर जंगल में कठिन तपस्या करने को तैयार हुई हो। तुम तप करने की जिद को छोड दो।
पवन : हे प्राणनाथ! मुझे आज सहज ही आत्म कल्याण का सुख प्राप्त हुआ है। संयम को धारण करने का एवं अपनी मनुष्य पर्याय को सफल करने का और अनन्त संसार का अभाव करने का, फिर मैं क्यों ऐसे सहज प्राप्त हुए अवसर को छोडूँ ? ऐसा कौन मूर्ख प्राणी होगा जिसको बहुत ही ज्यादा प्यास लगी हुई हो और वह कुएँ के किनारे पहुँच जाये, फिर पानी न पिये। मैं अब क्षणिक वस्तु को पसन्द नहीं करती। मैं तो अब अविनाशवर वस्तु को पसन्द करती हूँ। मैं आत्म ध्यान करूँगी। आत्म हित करूँगी। आप मुझे शीघ्र वन जाने की आज्ञा दो, क्योंकि मैं अपने परिणामों से आर्यिका के व्रत ग्रहण कर चुकी हूँ।
अंजना : ठीक है प्रिय! अगर तेरा ऐसा ही विचार है तो मैं तेरे से पहले मुनिव्रत को धारण कर निर्वाण पद को प्राप्त करूँगा और यह राज्य का राजतिलक हनुमान को देते हैं। (हनुमान का राजतिलक करना) पवन एवं अंजना ने मुनिव्रत एवं आर्यिका के व्रत को धारण करने के लिए वस्त्रआभूषण उतारना।
|| इति शुभम् समाप्तम् ||