श्री कुमारपाल का जीवन चरित्र
पात्र परिचय
आचार्य हेमचन्द्र सूरि: महान जैन आचार्य, प्रकांड विद्वान और राजा कुमारपाल के गुरु
राजा कुमारपाल: गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) वंश के प्रतापी सम्राट
मंत्री/दरबारी: सभा के अन्य प्रमुख व्यक्ति
सैनिक: राजदरबार के पहरेदार
नाटक आरंभ
(दृश्य गुजरात के भव्य राजदरबार का है। राजा कुमारपाल अपनी गद्दी पर बैठे हैं। उनके चेहरे पर चिंता और विचार की रेखाएं हैं। तभी आचार्य हेमचन्द्र सूरि का दरबार में प्रवेश होता है। राजा आदरपूर्वक खड़े होकर आचार्य का स्वागत करते हैं और उन्हें उच्च आसन पर बिठाते हैं।)
राजा कुमारपाल: (हाथ जोड़कर) हे गुरुदेव! आपके चरणों में प्रणाम। आज मैं बहुत उलझन में हूँ। मेरे जीवन में अपार वैभव है, शक्ति है, राज्य है, लेकिन फिर भी मेरे मन को सच्ची शांति और संतोष नहीं मिल पा रहा है। ऐसा लगता है जैसे यह सब अधूरा है।
आचार्य हेमचन्द्र सूरि: (शांत एवं मधुर मुस्कान के साथ) राजन कुमारपाल! बाहरी सुख और वैभव शरीर और मन को कुछ समय के लिए बहला सकते हैं, लेकिन सच्ची शांति आत्मा के भीतर धर्म और संयम से ही मिलती है। जिस राज्य में जीव-दया और अहिंसा का पालन न हो, वहाँ का राजा भी अंदर से अनाथ रहता है।
राजा कुमारपाल: गुरुदेव, मैं आपकी बात समझ रहा हूँ। मैंने जैन धर्म के बारे में बहुत सुना है और आपकी वाणी ने मेरे हृदय को झकझोर दिया है। लेकिन मेरे राज्य में चारों तरफ हिंसा, शिकार और मांस-मदिरा का चलन है। इसे बदलना बहुत कठिन है।
आचार्य हेमचन्द्र सूरि: राजन्, कठिन कुछ भी नहीं होता, बस इरादा पक्का होना चाहिए। एक राजा की तलवार से ज्यादा ताकत उसकी न्यायप्रियता और करुणा में होती है। यदि आप अपनी प्रजा की रक्षा करना चाहते हैं, तो सबसे पहले अहिंसा परमो धर्मः को अपने राज्य का कानून बनाइए।
राजा कुमारपाल: (दृढ़ संकल्प के साथ उठते हुए) गुरुदेव! आज से मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मेरे पूरे राज्य में किसी भी मूक जीव की हत्या नहीं होगी। 'अहमदाबाद' और पूरे सोलंकी साम्राज्य में पशु-वध (महामारी/हिंसा) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाता है। मैं जैन धर्म के नियमों को अपने जीवन और शासन का आधार बनाऊँगा।
आचार्य हेमचन्द्र सूरि: (हाथ उठाकर आशीर्वाद देते हुए) कल्याण हो राजन्! जो राजा अपनी तलवार को छोड़कर करुणा और अहिंसा को अपनाता है, उसका यश तीनों लोकों में अमर हो जाता है। आज से तुमने अपनी आत्मा को सच्चे अर्थों में जीत लिया है।
(पर्दा गिरता है।) \rightarrow जय जिनेंद्र \leftarrow