Mangal Vidhan

Mangal Vidhan

विधान की प्रारंभिक क्रिया

विधान की प्रारंभिक क्रियाएं

अमृतस्नान

ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृत वर्षणि अमृतं स्रावय स्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय सं हं झ्वीं झ्वीं हं सः स्वाहा।

(अंजुलि में जल लेकर शरीर पर छिड़कें)

तिलक मंत्र

ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: अ सि आ उ सा नमः मम/यजमानस्य सर्वांग शुद्धि हेतवः नव तिलकं करोम्यहम् ।

१. शिखा, २. मस्तक, ३. ग्रीवा, ४. हृदय, ५. दोनों भुजायें, ६. पीठ, ७. कान, ८. नाभि, ९. हाथ।

दिग्बंधन मंत्र

ह्रां णमो अरिहंताणं ह्रां पूर्वदिशातः आगत विघ्नान् निवारय निवारय एतान् सर्वान् रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।

( बंद मुट्ठी से पूर्व दिशा में पुष्प क्षेपण करें)

ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं दक्षिण दिशातः आगत विघ्नान् निवारय निवारय एतान् सर्वान् रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।

( बंद मुट्ठी से दक्षिण दिशा में पुष्प क्षेपण करें)

ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं पश्चिम दिशातः आगत विघ्नान् निवारय निवारय एतान् सर्वान् रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।

( बंद मुट्ठी से पश्चिम दिशा में पुष्प क्षेपण करें)

ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं ह्रौं उत्तर दिशातः आगत विघ्नान् निवारय निवारय एतान् सर्वान् रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा ।

( बंद मुट्ठी से उत्तर दिशा में पुष्प क्षेपण करें)

ॐ ह्रः णमो लोए सव्व साहूणं ह्रः सर्व दिशातः आगत विघ्नान् निवारय निवारय एतान् सर्वान् रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।

(बंद मुट्ठी से सभी दिशा में पुष्प क्षेपण करें)

परिचारक मंत्र

नमोऽर्हते सर्वं रक्ष रक्ष हूं नमः स्वाहा।

( सात बार )

रक्षा मंत्र

ॐ हूं क्षूं फट् किरिटिं किरिटिं घातय घातय परविघ्नान् स्फोटय स्फोटय सहस्र– खण्डान् कुरु कुरु परमुद्रां छिन्द छिन्द परमंत्रान् भिन्द भिन्द क्ष: क्ष: हूं फट् स्वाहा।

(तीन बार पढ़कर पात्रों पर पुष्प क्षेपण करना।)

शांति मंत्र

ॐ नमोऽर्हते भगवते प्रक्षीणा शेष दोष- कल्मषाय दिव्य तेजो मूर्तये नमः श्री शांतिनाथाय शांतिकराय सर्व विघ्न - प्रणाश नाय सर्व-रोगाप मृत्यु विनाशनाय सर्व- सर्वपरकृच्छुद्रोप द्रव विनाशनाय सर्व- क्षाम डामर विनाशनाय सर्वारिष्ट शांतिकराय ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा नमः सर्व शांतिं तुष्टिं पुष्टिं च कुरु कुरु स्वाहा ।

( सात बार मंत्र को पढ़कर पात्रों पर पुष्प क्षेपण करना)

भूमि शुद्धि मंत्र

नु विशोधयामि भूभागं जिनधर्ममहोत्सवे ।

कलधौतोज्ज्वलस्थूल कलशापूर्ण वारिणा । ।

ॐ ह्रीं नमः सर्वज्ञाय सर्व लोक नाथाय धर्म तीर्थनाथाय श्रीशांतिनाथाय परम पवित्रेभ्यः शुद्धेभ्यः नमः पवित्र जलेन भूमि शुद्धिं करोमि स्वाहा ।

पात्र शुद्धि

शोधये सर्व पात्राणि, पूजार्था नपि वारिभिः ।

समाहितो यथाम्नायं, करोमि सकली क्रियाम्॥

ॐ ह्रीं अ सि आ उ सा पवित्रतर - जलेन पात्र - शुद्धिं करोमि ।

(पूजा के सभी बर्तन मंत्रित जल के छींटे लगाकर शुद्ध करें )

द्रव्य शुद्धि मंत्र

ॐ ह्रीं अर्हं झौं झौं वं मं हं सं तं पं झ्वीं क्ष्वीं हं सः अ सि आ उ सा समस्त तीर्थ – पवित्र - जलेन शुद्ध - पात्र - निक्षिप्त-पूजा - द्रव्याणि शोधयामि स्वाहा।

( पूजा द्रव्य को मंत्रित जल से शुद्ध करें )

👉सकली कारण -अंगन्यास विधि👈

मंगलाष्टक के बाद शरीर की रक्षा और तद् दिशाओं से आनेवाले विघ्नों की निवृत्ति के लिए नीचे लिखे अनुसार अंगन्यास किया जावे। दोनों हाथों के अंगष्ठ से लेकर कनिष्ठिका पर्यन्त पाँचो अंगुलियों में क्रम से अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी की स्थापना की जावे। जप या हवन में बैठनेवाले महाशय सर्वप्रथम दोनों हाथों के अंगूठों को बराबरी से मिलाकर सामने करें।

ह्रां णमो अरिहंताणं हां अंगुष्ठाभ्यां नमः ।

इस मंत्र का उच्चारण कर उन अंगुष्ठों पर शिर झुकावें। फिर दोनों हाथों की तर्जनियों (अंगूठों के पास की अंगुलियों) को बराबरी से मिलाकर सामने करें और -

ॐ ह्वीं णमो सिद्धाणं हीं तर्जनीभ्यां नमः।

इस मंत्र को पढ़कर तर्जनियों पर शिर झुकावें। फिर बीच की दोनों अंगुलियों को मिलाकर सामने करें और

ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं मध्यमाभ्यां नमः ।

यह मंत्र पढ़कर मध्यमाओं पर शिर झुकावें। फिर दोनों अनामिकाओं को मिलाकर सामने करें और

ॐ हौं णमो उवज्झायाणं हौं अनामिकाभ्यां नमः।

यह मंत्र पढ़कर अनामिका पर शिर झुकावें। फिर दोनों कनिष्ठिकाओं को मिलाकर सामने करें और

ॐ हः णमो लोए सव्व साहूणं हः कनिष्ठाभ्यां नमः।

यह मंत्र पढ़कर कनिष्ठिकापर शिर झुकावें। फिर दोनों हथेलियों को बराबर सामने फैलाकर

ॐ ह्रां ह्वीं हूं ह्रौं ह्रः कर तलाभ्यां नमः।

यह मंत्र पढ़कर करतलों (गोदियों) पर शिर झुकावें। फिर

दोनों कर पृष्ठों को बराबर सामने फैलाकर-

ॐ ह्रां ह्वीं हूं हौं ह्रः कर पृष्ठाभ्यां नमः।

यह मंत्र पढकर हथेलियों के ऊपरी भाग पर शिर झुकावें।

अंग शुध्दि (दोनों हाथों से अंग स्पर्श करें )

ॐ ह्रां णमो अरिहंताणं ह्नां शीर्ष रक्ष रक्ष स्वाहा।।

यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ से शिर का स्पर्श करें।

ॐ ह्वीं णमो सिद्धांणं ह्वीं वदनं रक्ष रक्ष स्वाहा।।

यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ से मुख का स्पर्श करें।

ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा॥

यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ से हृदय का स्पर्श करें।

ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं हौं नाभि रक्ष रक्ष स्वाहा।।

यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ से नाभि का स्पर्श करें।

ॐ ह्रः णमो लोए सव्वसाहूणं ह्रः पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा।।

यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ से पैरों को जलसे सिंचन करें।

………….....................

ॐ ह्नां णमोअरिहंताणं ह्नां मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।।

यह मंत्र पढ़कर अपने शरीर पर पुष्प क्षेपन करें।

ॐ ह्वीं णमो सिद्धाणं ह्वीं वस्त्रं रक्ष रक्ष स्वाहा ।।

यह मंत्र पढ़कर अपने वस्त्रों पर पुष्प क्षेपन करें।

ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं पूजाद्रव्यं रक्ष रक्ष स्वाहा ।।

यह मंत्र पढ़कर पूजा की सामग्री पर पुष्प क्षेषपन करें।

ॐ ह्रौं गमो उवज्झायाणं हौं पूजा स्थलं रक्ष रक्ष स्वाहा ॥

यह मंत्र पढ़कर अपने खड़े होने की जगह की ओर देखें।

ॐ ह्रः णमो लोए सव्वसाहणं ह्रः सर्व जगत् रक्ष रक्ष स्वाहा।।

मंत्र पढ़कन चल्लू में जल लेकर सब और सिंचन करें।

ॐ भ्रां भ्रीं भूं भ्रौं भ्रः ॐ ह्रां ह्वीं ह्रूं ह्रौं ह्रः सर्व विघ्न निवारण कुरु कुरु स्वाहा।

दाहिने हाथ मे रक्षा सूत्र बाँधे

ॐ नमोऽर्हते सर्वं रक्ष रक्ष ह्रूं फट् स्वाहा |

यज्ञोपवीत धारण

ॐ नमः परम शान्ताय शान्ति कराय पवित्री करणायाहं रत्नत्रयस्वरूपं यज्ञोपवीतं दधामि मम गात्रं पवित्रं भवतु अर्हं नमः स्वाहा ।

नियम

सप्त व्यसन त्याग,

अष्ट मूल गुण धारण,

अभक्ष्य त्याग,

रात्रि भोजन त्याग,

नशीले पदार्थों का त्याग,

ब्रह्मचर्य पालन,

एकाशन,

पानी सायं ७ बजे तक,

ग्राम से बाहर जाने की छूट नहीं ।

जल शुद्धि

ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पद्म- महापद्म तिगिंछ केसरि— पुण्रीक- महापुण्डरीक - गंगा सिन्धु-रोहिद्रो हितास्या हरिद्धरि कान्ता-सीता सीतोदा नारी - नरकान्ता सुवर्ण रूप्य कूला- रक्ता- रक्तोदा-क्षीराम्भो निधि-जलं सुवर्ण- घटं प्रक्षप्तिं- सर्व गन्ध पुष्पाढ्य- ममोदकं पवित्रं कुरु कुरु झं झं झौं झौं वं वं मं मं हं हं सं सं तं तं पं पं द्रां द्रां द्रीं द्रीं हं सः स्वाहा ।

(पीले सरसों अथवा लवंग से जल शुद्ध करना)

मंगल कलश में सुपाड़ी, हल्दी रखने का मंत्र

ॐ ह्रीं अर्हं असि आ उ सा नमः मंगल कलशे पूंगादि फलानि प्रभृति वस्तूनि प्रक्षिपामीति स्वाहा ।

मंगल कलश के ऊपर श्री फल रखने का मंत्र

ॐ क्षां क्षीं क्षं क्षं क्षैक्षों क्षौं क्षः नमोऽर्हते भगवते श्रीमते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।

मंगल कलश स्थापना

ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादि ब्रह्मणो मतेऽस्मिन् विधीयमाने कर्मणि वीर निर्वाण संवत्सरे..... मासे. पक्षे. तिथौ..... वासरे प्रशस्त लग्ने नवरत्न गंध पुष्पाक्षत बीजपूरादि शोभितं...कार्यस्य निर्विघ्न-सम्पन्नार्थ - मंगल कलश स्थापनं करोमि श्रीं भ्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा ।

( मंडल के ईशान कोण में कलश स्थापित करें )

मंगल दीपक स्थापना

रुचिरदीप्तिकरं शुभदीपकं सकललोकसुखाकरमुज्ज्वलम् ।

तिमिरजालहरं प्रकरं सदा किल धरामि सुमंगलकं मुदा । ।

ॐ ह्रीं अज्ञानतिमिरहरं दीपकं स्थापयामि ।

विनय पाठ

इह विधि ठाड़ो होय के,प्रथम पढ़े जो पाठ । 

धन्य जिनेश्वर देव तुम, नाशे कर्म जु आठ॥ १ ॥ 

  1. भावार्थ - इह विधि अर्थात् पूजन के लिए खड़े होने की जो विधि आगम में वर्णित है, उस विधि से विनय पूर्वक खड़े होकर जिनेन्द्र भगवान के प्रति विनय प्रकट करने के लिये सर्व प्रथम विनय पाठ पढ़ता हूँ । हे जिनेन्द्र भगवन् ! आप आठ कर्मों का नाश कर धन्य हो गये हैं।

अनन्त चतुष्टय के धनी, तुम ही हो सिरताज ।

मुक्ति-वधू के कन्त तुम, तीन भुवन के राज ॥ २ ॥ 

भावार्थ - हे भगवन् ! आप अनन्तसुख, अनन्तदर्शन, अनन्तज्ञान और अनन्त वीर्य रूप अनन्त चतुष्टय के स्वामी हैं। तीनों लोकों में सर्व श्रेष्ठ हैं, मोक्ष रूपी वधू के स्वामी (पति) एवं तीनों लोकों के राजा हैं।

 तिहुँ जग की पीड़ा-हरन, भव- दधि शोषण-हार । 

ज्ञायक हो तुम विश्व के, शिव-सुख के करतार ॥ ३ ॥

 भावार्थ - हे जिनेन्द्र भगवन् आप तीनों लोकों के जीवों के दुःखों को नष्ट करने वाले हैं, संसार रूपी समुद्र को सुखा देने वाले हैं, विश्व को जानने वाले और मोक्ष सुख के करने वाले हैं।

हरता अघ अँधियार के, करता धर्म-प्रकाश ।

 थिरता पद दातार हो, धरता निज-गुण रास ॥४॥ 

भावार्थ - हे नाथ आप पापों के अंधकार को नाश करने वाले हैं, धर्म रूपी प्रकाश के करने वाले हैं, स्थिर - पद अर्थात् मोक्ष - पद

(सिद्धपद) के देने वाले और आप अपने ही आत्मा में व्याप्त अनंत गुणों की राशि के स्वामी हैं। 

धर्मामृत उर जलधि सों ज्ञान - भानु तुम रूप । 

तुमरे चरण-सरोज को, नावत तिहुँजग भूप ॥५॥ 

भावार्थ- हे भगवन्! आपका हृदय धर्म रूपी अमृत से भरे बादलों के समान है, आपका स्वरूप ज्ञान के सूर्य के समान हैं, आपके चरण रूपी कमलों में तीनों लोकों के राजा नमन करते हैं ।

मैं वंदौं जिनदेव को, कर अति निर्मल भाव । 

कर्म-बंध के छेदने, और न कछू उपाव ॥६॥ 

भावार्थ- हे जिनेन्द्र भगवन्! मैं आपकी अत्यन्त निर्मल भावों से वन्दना करता हूँ क्योंकि कर्मों के बन्ध को नष्ट करने के लिए आप ही समर्थ हैं। आपकी पूजा वन्दना के अलावा कर्मबन्ध नष्ट करने का और कोई दूसरा उपाय नहीं है।

 भवि-जन को भव - कूप तैं, तुमही काढ़न-हार । -

दीन-दयाल अनाथ-पति, आतम-गुण- भंडार ॥ ७ ॥

 भावार्थ - हे जिनेन्द्र भगवन्! भव्य जीवों को भव रूपी कुए से निकालने में आप ही समर्थ हैं (या आप ही निकलने वाले हो) दीन-गरीबों पर दया करने वाले हैं, अनाथों के नाथ हैं, और आप अपने स्वाभाविक आत्म गुणों के भण्डार हैं।

चिदानंद निर्मल कियो, धोय कर्म-रज- मैल | ।

सरल करी या जगत् में भवि-जन को शिव-गैल ॥ ८ ॥ 

भावार्थ - हे भगवन्! आपने अशुद्ध आत्मा के साथ लगी कर्म रूपी धूल को धोकर निर्मल आत्म द्रव्य बनाकर, अनंतसुख प्राप्त कर, संसार में भव्य जीवों के लिए मोक्ष का मार्ग सरल व सुगम कर दिया है ।

तुम पद - पंकज पूज-तैं,विघ्न- रोग टर जाय |

शत्रु मित्रता को धरैं, विष निरविषता थाय ॥९॥

 भावार्थ- हे जिनेन्द्र देव! आपके चरण-रूपी कमलों की पूजा से सभी विघ्न एवं सभी रोग नष्ट हो जाते हैं, शत्रु भी मित्रता धारण कर लेते हैं, और विष भी निर्विष हो जाता है।

चक्री खग-धर इंद्रपद, मिलै आप - तैं आप। 

अनुक्रम- कर शिवपद लहैं, नेम सकल हनि पाप ॥ १० ॥

 भावार्थ- हे जिनेन्द्र ! आपकी पूजा से चक्रवर्ती, विद्याधर और इन्द्र का पद अपने आप प्राप्त हो जाता है। नियम से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और परम्परा से (क्रम-क्रम से) मोक्षपद भी प्राप्त हो जाता है ।

तुम बिन मैं व्याकुल भयो, जैसे जल-बिन मीन ।

जन्म-जरा मेरी हरो,करो मोहि स्वाधीन ॥ ११ ॥ 

भावार्थ - हे जिनेन्द्र भगवन्! मैं आपके बिना अत्यन्त दुःखी हुआ हूँ, यह ठीक वैसे ही जैसे पानी के बिना मछली दुःखी होती है। मेरे जन्म, जरा और मृत्यु रूपी रोग को नाश कर मुझे आत्मिक सुख प्रदान कर स्वाधीन बनाने की कृपा करें।

पतित बहुत पावन किये, गिनती कौन करेव ।

अंजनसे तारे प्रभू, जय जय जय जिनदेव ॥ १२ ॥ 

भावार्थ - हे जिनेन्द्र भगवन्! आपने बहुत से पापियों को पवित्र किया है, जिनकी गिनती कोई नहीं कर सकता। अंजन चोर के समान अज्ञानी को भी आपने पार लगा दिया, हे जिनेन्द्र भगवन् ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो । 

थकी नाव भव - दधि विषै, तुम प्रभु पार करेव ।

खेवटिया तुम हो प्रभु, जय जय जय जिनदेव ॥ १३ ॥

 भावार्थ - हे जिनेन्द्र भगवन् ! संसार रूपी समुद्र में मेरी नाव भटकतेभटकते थक गई है, अब आप ही पार कीजिए क्योंकि आप ही उत्तम खेवटिया हैं । हे जिनेन्द्र भगवन! आपकी जय हो, जय हो, जय हो । 

राग-सहित जग में रुल्यो, मिले सरागी देव । 

वीतराग भेट्यो अबै, मेटो राग कुटेव ॥१४॥ 

भावार्थ- हे जिनेन्द्र भगवन् ! आज तक मैं संसार में राग-सहित होकर रोताविलखता फिर रहा हूँ। अभी तक मुझे सभी सरागी देव ही मिले, अब मुझे आप जैसे वीतरागी देव मिले हैं अर्थात् वीतरागी देव से भेंट हुई है। हे भगवन् ! आप मेरे भीतर पड़ी राग की बुरी हठ का समूल नाश कीजिए।

कित निगोद कित नारकी,कित तिर्यंच अजान । 

आज धन्य मानुष भयो, पायो जिनवर थान ॥ १५ ॥

 भावार्थ- हे जिनेन्द्र भगवन् ! मैंने कितनी पर्याय निगोद की, कितनी पर्याय नारकी की कितनी पर्याय तिर्यंच की अज्ञानावस्था में व्यतीत की, आज यह मनुष्य पर्याय धन्य हो गई, क्योंकि मैंने जिनेन्द्र भगवान की शरण प्राप्तकर ली है। 

तुम को पूजैं सुर-पति, अहि- पति नर-पति देव ।

धन्य भाग्य मेरो भयो, करन लग्यो तुम सेव ॥ १६ ॥ 

भावार्थ- हे जिनेन्द्र भगवन् ! आपकी पूजा इन्द्र, नागेन्द्र, चक्रवर्ती आदि करते हैं और उसी प्रकार आपकी सेवा पूजा करने से मेरा भाग्य भी धन्य हो गया है ।

अशरण के तुम शरण हो, निराधार आधार ।

मैं डूबत भव- सिंधु में, खेउ लगाओ पार ॥१७॥ 

भावार्थ- हे जिनेन्द्र देव ! आप अशरण को शरण देने वाले हैं। जिनके जीवन का कोई आधार नहीं है, उन्हें आधार देने वाले है । हे भगवन् ! मैं भव-रूपी समुद्र में डूब रहा हूँ। आप मेरी नाव खेकर (चलाकर) पार लगा दीजिए।

इन्द्रादिक गण-पति थके, कर विनती भगवान् । 

अपनो विरद निहारि कैं,कीजै आप- समान ॥१८ ॥

 भावार्थ - हे जिनेन्द्र भगवन् ! आपकी स्तुति, विनती करते-करते गणधर, और इन्द्र आदि भी थक गये हैं, तब मैं कैसे आपकी विनती कर सकता हूँ आप अपने यश को देखकर मुझे अपने समान बना लीजिए।

तुमरी नेक सु-दृष्टि तैं, जग उतरत है पार |

 हा हा डूबो जात हों, नेक निहार निकार ॥१९॥

 भावार्थ- हे नाथ! आपकी एक अच्छी दृष्टि से ही जीव संसार समुद्र पार हो जाता है। हाय, हाय मैं संसार समुद्र में डूब रहा हूँ, एक बार सुदृष्टि से निहार कर (देखकर) मुझे निकाल लीजिए।

जो मैं कह हूँ और सों,तो न मिटै उर - भार । 

मेरी तो तो - सों, बनी, तातैं करहुँ पुकार ॥ २० ॥

 भावार्थ- हे भगवन्! यदि मैं अपने अन्तर्मन की वेदना किसी और से कहूँ तो वह वेदना मिटने वाली नहीं है, मेरी बिगड़ी तो आप ही बना सकते हैं अतः मैं आप से ही अपने दुःखों को मिटाने की पुकार कर रहा हूँ । 

वंदों पाँचों परम गुरु, सुर- गुरु वंदत जास ।

विघन - हरन मंगल करन, पूरन परम- प्रकाश ॥ २१ ॥

 भावार्थ - गणधर भी जिनकी वंदना करते हैं उन पाँचों परमेष्ठी (पंच परमगुरु) की वंदना करता हूँ। आप पूर्ण उत्कृष्ठ आत्मज्योति (ज्ञान ज्योति) से प्रकाशित हैं, आप विघ्नों का नाश करने वाले, और मंगल के करने वाले हैं।

चौबीसों जिनपद नमों, नमों शारदा - माय ।

शिवमग साधक साधु नमि, रच्यो पाठ सुखदाय ॥ २२ ॥ 

भावार्थ- चौबीसों तीर्थंकरों को नमन करता हैं, जिनवाणी माता को नमन करता हूँ और मोक्षमार्ग की साधना करने वाले सर्व साधु को नमन कर सुख को देने वाले इस पाठ की रचना की है। -

मंगल मूर्ति परम पद, पंच धरों‌ नित ध्यान |

हरो अमंगल विश्व का,मंगल-मय भगवान ॥ २३ ॥

 भावार्थ - परमपद को धारण करने वाले पंच परमेष्ठी मंगल स्वरूप हैं ( मंगल की मूर्ति हैं) मैं इनका सदा ध्यान करता हूँ । हे मंगलमय भगवान् ! आप संसार के सभी अमंगलों का नाश कर दीजिए ।

मंगल जिनवर पद नमों,मंगल अर्हत देव । 

मंगलकारी सिद्ध पद, सो वन्दों स्वयमेव ॥ २४ ॥

भावार्थ - हे जिनेन्द्र भगवन् ! आपके मंगलकारी चरणों को नमन करता हूँ। अर्हन्त भगवान् मंगलकारी हैं, सिद्ध भगवान (सिद्धपद) मंगलकारी हैं अत: मैं इनकी अपने मंगल के लिए वन्दना करता हूँ । 

मंगल आचार्य मुनि, मंगल गुरु उवझाय |

सर्व साधु मंगल करो, वन्दों मन-वच-काय ॥ २५ ॥ 

भावार्थ-दिगम्बर आचार्य मंगल स्वरूप हैं, उपाध्याय गुरु मंगल स्वरूप है एवं सभी साधु मंगल के करने वाले हैं, मै इनकी मन-वचन-काय से वन्दना करता हूँ ।

मंगल सरस्वती मात का, मंगल जिनवर धर्म ।

मंगल मय मंगल करो, हरो असाता कर्म ॥ २६ ॥ 

भावार्थ- जिनवाणी माता मंगल स्वरूप हैं, जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कहा गया धर्म मंगलकारी है । हे मंगलमय जिनेन्द्र भगवन् ! मेरे असाता कर्म का क्षय करके मुझे मंगलमय कीजिए।

या विधि मंगल से सदा, जग में मंगल होत ।

मंगल नाथूराम यह,भव सागर दृढ़ पोत ॥२७॥

 भावार्थ - इस प्रकार मंगल करने से संसार में मंगल होता है। श्री नाथूराम जी कवि‌ कहते हैं कि यह मंगल पाठ विनय पाठ भव रूपी समुद्र को पार करने के लिए मजबूत नाव के समान है

नित्य पूजा पीठिका

ॐ जय जय जय ! नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु।
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।१।।

ॐ ह्रीं अनादि-मूल-मंत्रेभ्यो नमः।

(पुष्पांजलिं क्षिपेत्)

चत्तारि मंगलं-अरिहंत मंगलं, सिद्ध मंगलं, साहू मंगलं, केवलि-पण्णत्तो धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा-अरिहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि-अरिहंत सरणं पव्वज्जामि, सिद्ध सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि।।
ॐ नमोऽर्हते स्वाहा। (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)

(यहाँ पुष्पांजलि क्षेपण करना)


अपवित्र: पवित्रो वा सुस्थितो दु:स्थितोऽपि वा।
ध्यायेत्पंच-नमस्कारं,सर्व पापै: प्रमुच्यते।।१।।

अपवित्र: पवित्रो वा, सर्वा वस्थां गतोऽपि वा।
य: स्मरेत्परमात्मानं, स बाह्याभ्यंतरे शुचि:।।२।।

अपराजित-मंत्रोऽयं, सर्व-विघ्न-विनाशन:।
मंगलेषु च सर्वेषु, प्रथमं मंगलं मत:।।३।।

एसो पंच-णमोयारो ,सव्व-पावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं होइ मंगलं।।४।।

अर्ह मित्य क्षरं ब्रह्म-वाचकम् परमेष्ठिन:।
सिद्धचक्रस्य सद्बीजं, सर्वत: प्रणमाम्यहं।।५।।

कर्माष्टक-विनिर्मुक्तं, मोक्ष-लक्ष्मी-निकेतनं।
सम्यक्त्वादि-गुणोपेतं सिद्धचक्रं नमाम्यहं।।६।।

विघ्नौघा: प्रलयं यान्ति शाकिनी-भूत-पन्नगा:।
विषं निर्विषतां याति स्तूयमाने जिनेश्वरे।।७।।

(पुष्पांजलिं क्षिपेत्)

पंचकल्याणक अर्घ्य

उदक-चंदन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीप-सुधूप-फलार्घकै।
धवल-मंगल-गान-रवाकुले जिनगृहे कल्याणमहं यजे।।१।।
ॐ ह्रीं श्री भगवतो गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंचकल्याणकेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१।।

पंचपरमेष्ठी का अर्घ

उदक-चंदन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीप-सुधूप-फलार्घकै।
धवल-मंगल-गान-रवाकुले जिनगृहे जिननाथमहं यजे।।२।।
ॐ ह्रीं अरिहंत सिद्धाचार्योपाध्याय सर्व साधुभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२।।

108 सहस्र का अर्घ
उदक-चंदन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीप-सुधूप-फलार्घकै।
धवल-मंगल-गान-रवाकुले जिनगृहे जिननाममहं यजे।।३।।
ॐ ह्रीं श्री भगवज्जिन सहस्र नामेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३।।

स्वस्ति मंगल

श्रीमज्जिनेंद्रमभिवंद्य जगत्त्रयेशं,
स्याद्वाद-नायक-मनंत-चतुष्टयार्हम्।
श्रीमूलसंघ-सुदृशां सुकृतैकहेतु-
र्जैनेन्द्र-यज्ञ-विधि-रेष मयाऽभ्यधायि।।१।।

स्वस्ति त्रिलोकगुरवे जिन-पुंगवाय,
स्वस्ति स्वभाव-महिमोदय-सुस्थिताय।
स्वस्ति-प्रकाश-सहजोज्र्जित-दृङ्मयाय,
स्वस्ति प्रसन्न-ललिताद्भुत-वैभवाय।।२।।

स्वस्त्युच्छलद्विमल-बोध-सुधा-प्लवाय,
स्वस्ति स्वभाव-परभाव-विभासकाय।
स्वस्ति त्रिलोक-विततैक-चिदुद्गमाय,
स्वस्ति-त्रिकाल-सकलायत-विस्तृताय।।३।।

द्रव्यस्य शुद्धिमधिगम्य यथानुरूपं,
भावस्य शुद्धिमधिकामधिगंतुकाम:।
आलंबनानि विविधान्यवलंव्य वल्गन्,
भूतार्थ-यज्ञ-पुरुषस्य करोमि यज्ञं।।४।।

अर्हत्पुराणपुरुषोत्तमपावनानि,
वस्तून्यनूनमखिलान्ययमेक एव।
अस्मिन् ज्वलद्विमल-केवल-बोधवह्नौ,
पुण्यं समग्रमहमेकमना जुहोमि।।५।।

ॐ ह्रीं विधियज्ञप्रतिज्ञानाय जिनप्रतिमाग्रे पुष्पांजलिं क्षिपेत्।

स्वस्ति-मंगल

(यहाँ पर प्रत्येक भगवान् के नाम के पश्चात् पुष्पांजलि क्षेपण करें।)
श्री वृषभो नः स्वस्ति, स्वस्ति श्री अजितः।

श्री संभवः स्वस्ति, स्वस्ति श्री अभिनंदनः।

श्रीसुमतिः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीपद्मप्रभः।

श्री सुपार्श्व: स्वस्ति, स्वस्तिश्री चन्द्रप्रभः।

श्री पुष्पदंत: स्वस्ति, स्वस्ति श्री शीतलः।

श्री श्रेयान्स: स्वस्ति, स्वस्ति श्री वासुपूज्यः।

श्री विमलः स्वस्ति, स्वस्ति श्री अनंतः।

श्री धर्मः स्वस्ति, स्वस्ति श्री शांतिः।

श्री कुन्थु: स्वस्ति, स्वस्तिश्री अरनाथः।

श्री मल्लिः स्वस्ति, स्वस्तिश्री मुनिसुव्रतः।

श्री नमिः स्वस्ति, स्वस्ति श्री नेमिनाथः।

श्री पार्श्व: स्वस्ति, स्वस्ति श्री वर्धमानः।
इति जिनेन्द्र स्वस्ति मंगल विधानं पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।

परमर्षयो स्वस्ति मंगल पाठ
(यहाँ से प्रत्येक श्लोक के अंत में पुष्पांजलि क्षेपण करना चाहिए)।


नित्याप्रकंपाद्भुत्-केवलौघा: स्पुरन्मन:पर्यय-शुद्धबोधा:।
दिव्यावधिज्ञान-बल प्रबोधा: स्वस्ति क्रियासु: परमर्षयो न:।।१।।

कोष्ठस्थ-धान्योपममेकबीजं संभिन्नसंश्रोतृ-पदानुसारि।
चतुर्विधं बुद्धिबलं दधाना: स्वस्ति क्रियासु: परमर्षयो न:।।२।।

संस्पर्शनं संश्रवणं च दूरादास्वादन-घ्राण-विलोकनानि।
दिव्यान् मतिज्ञानबलाद्वहंत: स्वस्ति क्रियासु: परमर्षयो न:।।३।।

प्रज्ञाप्रधाना: श्रमणा समृद्धा: प्रत्येकबुद्धा दशसर्वपूर्वै:।
प्रवादिनोऽष्टांगनिमित्तविज्ञा: स्वस्ति क्रियासु: परमर्षयो न:।।४।।

जंघावलि-श्रेणि-फलांबु-तंतु-प्रसून-बीजांकुर-चारणाह्वा:।
नभोऽङ्गण-स्वैर-विहारिणश्च स्वस्ति क्रियासु: परमर्षयो न:।।५।।

अणिम्नि दक्षा: कुशला महिम्नि लघिम्नि शक्ता: कृतिनो: गरिम्णि।
मनो-वपुर्वाग्बलिनश्च नित्यं, स्वस्ति क्रियासु: परमर्षयो न:।।६।।

सकामरूपित्व-वशित्वमैश्यं प्राकाम्यमन्तद्र्धिमथाप्तिमाप्ता:।
तथा प्रतीघातगुणप्रधाना: स्वस्ति क्रियासु: परमर्षयो न:।।७।।

दीप्तं च तप्तं च तथा महोघ्रं घोरं तपो घोरपराक्रमस्था:।
ब्रह्मापरं घोरगुणाश्चरंत: स्वस्ति क्रियासु: परमर्षयो न:।।८।।

आमर्ष-सर्वौषधयस्तथाशीर्विषं विषा दृष्टिविषं विषाश्च।
सखिल्ल-विड्जल्ल-मलौषधीशा: स्वस्ति क्रियासु: परमर्षयो न:।।९।।

क्षीरं स्रवंतोऽत्र घृतं स्रवंतो मधुस्रवंतोऽप्यमृतं स्रवंत:।
अक्षीणसंवास-महानसाश्च स्वस्ति क्रियासु: परमर्षयो न:।।१०।।

।।इति परमर्षि स्वस्ति मंगल विधानं।।

सिद्ध भक्ति ( प्राकृत )

असरीरा जीवघणा उवजुत्ता दंसणे य णाणे य।

सायार-मणायारा लक्खण-मेयं तु सिद्धाणं ॥ १ ॥

मूलोत्तर- पयडीणं बंधोदय-सत्त-कम्म उम्मुक्का।

मंगल भूदा सिद्धा अट्ठ- गुणातीद-संसारा ॥२॥

अट्ठविय - कम्म - वियला सीदीभूदा णिरजणा णिच्चा ।

अट्ठ- गुणा किद किच्चा लोयग्गणिवासिणो सिद्धा ||३||

सिद्धा णट्ठट्ठमला विसुद्ध - बुद्धी य लद्धि - सब्भावा ।

तिहुअणसिर - सेहरया पसियंतु भडारया सव्वे ॥ ४ ॥

गमणा गमण-विमुक्के विहडिय - कम्म- पयडि - संघादा।

सासय - सुह - संपत्ते ते सिद्धा वंदिमो णिच्च ॥५॥

जयमंगल - भूदाणं विमलाणं णाण-दंसणमयाणं।

तइलोय-सेहराणं णमो सया सव्व - सिद्धाणं ॥ ६ ॥

सम्मत्त - णाण-दंसण-वीरिय- सुहुमं तहेव अवगहणं ।

अगुरु-लघु-अव्वावाहं अट्ठ गुणा होंति सिद्धाणं ॥७॥

तव - सिद्धे णय - सिद्धे संजम - सिद्धे चरित - सिद्धे य

णामाम्मि दंसणम्मि य सिद्धे सिरसा णमस्सामि ॥ ८ ॥

इच्छामि भंते! सिद्ध-भत्ति काओसग्गो कओ तस्सालोचेउं सम्मणाण-सम्मदंसण-सम्मचरित्त - जुत्ताणं अट्ठविह-कम्मविप्प-मुक्काणं अट्ठ-गुण-संपण्णाणं उड्ढ - लोय-मत्थयम्मि पर्याट्ठियाणं तवसिद्धाणं णयसिद्धाणं संजमसिद्धाणं चरित्तसिद्धाणं अतीदाणागदवट्टमाण-कालत्तयसिद्धाणं सव्वसिद्धाणं सया णिच्चकालंअच्चेमि पूज्जेमि वंदामि णमस्सामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाओ सुगइगमणं समाहि-मरणं जिणगुण - सम्पत्ती होउ मज्झं ।