Poojan-Abhishek

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श्री ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक

श्री ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक


 श्री ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक

श्री ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक

श्री ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक

इस ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक को ज्येष्ठ के महीने में भगवान ऋषभदेव के मस्तक पर मिट्टी या सोने के कलशे में जल भर के किया जाता है|

-दोहा-

भोगभूमि के अंत में, हुआ आदि अवतार।

आदिब्रह्म आदीश ने, किया जगत उद्धार।।

-शेर छंद-

जय जय प्रभो वृषभेश ने अवतार जब लिया।

इंद्रों ने अयोध्या को स्वर्गसम बना दिया।।

सुरपति ने मेरु पे जिनेन्द्र न्हवन किया था।

क्षीरोदधी का जल परम पवित्र हुआ था।।१।।


पितु नाभिराय के हरष का पार नहीं था।

मरुदेवी का आनंद भी अपार वहीं था।।

सुरपति.।।२।।


कृतयुग की आदि में प्रजा को कर्म सिखाया।

निज ज्ञान से आजीविका साधन भी दिखाया।।

सुरपति.।।३।।


प्रभु भोज्य सामग्री तुम्हारी स्वर्ग से आती।

सब वस्त्र अलंकार शची स्वर्ग से लाती।।

सुरपति.।।४।।

यौवन में प्रभु वृषभेष का विवाह कर दिया।

रानी यशस्वती सुनंदा का वरण किया।।

सुरपति.।।५।।


शत एक पुत्र पुत्रि द्वय के प्रभु पिता बने।

वसुधा कुटुम्ब मानकर वे जगपिता बने।।

सुरपति.।।६।।


चौरासि सहस वर्ष तक साम्राज्य किया था।

नीलांजना के नृत्य से वैराग्य लिया था।।

सुरपति.।।७।।


इक वर्ष के पश्चात् जब आहार हुआ था।

देवों की जयध्वनी से विश्व गूंज रहा था।।

सुरपति.।।८।।


तब हस्तिनापुरी को यह सौभाग्य मिला था।

नृप सोम व श्रेयांस का ही भाग्य खिला था।।

सुरपति.।।९।।


इक सहस वर्ष तक कठोर तप किया प्रभो।

कैलाशपती बन के मोक्ष ले लिया विभो।।

सुरपति.।।१०।।


पांचों ही कल्याणक तुम्हारे देव मानते।

ऋषि मुनि तथा श्रावक भी भक्तिभाव से ध्याते।।

सुरपति.।।११।।


प्रभु दिव्यध्वनि से लोक का उद्धार हुआ था।

जो आ गया शरण में भव से पार हुआ था।।

सुरपति.।।१२।।


जग गंध आदि लेकर प्रभु की शरण गही है।

प्रभु भक्ति ही अभिषेक में निमित्त रही है।।

सुरपति.।।१३।।


इस पूर्णकुम्भ से जिनेन्द्र न्हवन करूँ मैं।

जिनभक्ति का संपूर्ण फल इक साथ वरूँ मैं।।

सुरपति.।।१४।।


जिनवर में ज्येष्ठ प्रभु का ज्येष्ठ मास में न्हवन।

करता है भव्य प्राणियों का आत्म उन्नयन।।

सुरपति.।।१५।।


इस एक ही घट में सहस्र घट की कल्पना।

शुभ ज्येष्ठ में वृषभेश की अभिषेक वंदना।।

सुरपति.।।१६।।


तुम सम गुणों की प्राप्ति हेतु की है अर्चना।

स्वीकार करो ‘चंदनामती’ की वंदना।।

सुरपति.।।१७।।


ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय नम: पूर्णकुम्भेन जलाभिषेकं करोमि नमोऽर्हते स्वाहा।