
*विशेष बाते*
जिन-प्रतिमा अभिषेक व पूजन की पात्र होती है
क्योंकि जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन, अभिषेक, पूजन आदि से उन के गुणों का स्मरण हो जाता है।
जिनबिम्ब अभिषेक: यह पाँचों कल्याणक-सम्पन्न जिन-प्रतिमा की पुरुषों द्वारा प्रतिदिन की जाने वाली न्हवन की क्रिया है। इस में प्रतिमाजी के आपाद-मस्तक सभी अंगों का प्रासुक जल से न्हवन किया जाता है।
चरणाभिषेक: किन्हीं विशाल प्रतिमाओं के अभिषेक शीश की ऊंचाई तक मचान आदि के बिना संभव नहीं होते, उन के चरणों का न्हवन चरणाभिषेक कहलाता है|
मस्तकाभिषेक: ऊपरोक्त प्रतिमाओं का मस्तकाभिषेक पर्वादि विशेष अवसरों पर किया जाता है; तथा प्रतिमाजी, मंदिरजी व क्षेत्र के अनुरक्षण व विकास के भावों से प्रायः बारह वर्षों के अंतराल से महामस्तकाभिषेक महोत्सव के विशाल आयोजन होते हैं|
पंचामृत-अभिषेक: कहीं कहीं दूध, दही, घी, इक्षुरस आदि से प्रतिमा के न्हवन की परंपरा देखने में आती है|
प्रक्षालन: अचल प्रतिमाओं के पूर्ण अभिषेक में जल की मात्रा अधिक लगने व गंधोदक वेदी जी में फैलने से जीव-उत्पत्ति व हिंसा बचाने के भाव से, उनका केवल गीले छन्नों से प्रक्षालन होता है, तथा प्रतिमाओं की संख्या अधिक होने पर मात्र कुछ प्रतिमाओं का पूर्णाभिषेक व शेष का प्रक्षालन होता है|
शांतिधारा: यह अत्यंत अनूठा पवित्र मंत्राभिषेक है जो स्वयं व पर के पापों के प्रक्षालन कर आत्म-कल्याण व समस्त चराचर की शान्ति के भाव से जिन-प्रतिमाजी पर अखंड जल धारा करने की क्रिया है|
जन्माभिषेक: यह नित्य जिनाभिषेक से भिन्न क्रिया है जो तीर्थंकर के ‘जन्म कल्याणक’ अवसर पर इन्द्रादि द्वारा सम्पन्न की जाती है। जिस मूर्त्ति के पाँचों कल्याणक संस्कार सम्पन्न हो चुके हैं अर्थात् पूर्ण वीतरागी बन गई है, वही जिनेन्द्र-प्रतिमा कहलाती है| उस का पुनः जन्माभिषेक नहीं होता| जन्माभिषेक तो सराग अवस्था की क्रिया है। अत: जिनबिम्ब अभिषेक जन्माभिषेक नहीं है।
वेश-भूषा
जिनेन्द्र प्रभु की अभिषेक-पूजन समस्त आरम्भ-परिग्रहों का त्याग कर, सौधर्म-इंद्र के समान अत्यंत उत्तम भावों से की जाती है, अतः इन्द्र के समान केशरिया अथवा श्वेत, अहिंसात्मक (बिना सिले) धोती-दुपट्टे पहिन कर मुकुट, माला व तिलक-अलंकरणों आदि से सुशोभित होने पर सहज ही वैसे भाव बन जाते हैं| अभिषेक-कर्ता स्नान करके शुद्ध धोती-दुपट्टे पहिनें व सिर ढकें। पेंट, शर्ट, पाजामा आदि तथा दूसरों के उतरे हुए पूजा-वस्त्रों से अथवा अकेली धोती पहिने अभिषेक नहीं करना चाहिए।
अभिषेक-क्रिया-विधि
प्रतिमाजी के समक्ष अभिषेक के संकल्प-रूप अर्घ्य चढ़ा कर, कायोत्सर्ग कर, विनयपूर्वक एक हाथ प्रतिमाजी के नीचे और दूसरा हाथ उन की पीठ पर लगाकर उठावें, ढंके सिर पर प्रतिमाजी को रख, अभिषेक-स्थल की तीन प्रदक्षिणा दे, श्रीकार लिखे थाल पर स्थापित सिंहासन पर पूर्व-मुखी अथवा उत्तर-मुखी कर विराजित करें। यदि प्रतिमाजी का मुख पूर्व की ओर है तो प्रमुख अभिषेक-कर्ता को उत्तर की ओर मुख कर खड़े होना चाहिए, और यदि उत्तर की ओर मुख है तो अभिषेक-कर्ता का मुख पूर्व दिशा की ओर रहना चाहिए। सिंहासन-तल की ऊंचाई पूजक की नाभि से नीचे नहीं, अपितु ऊपर होना चाहिए।
जीवाणि किये गए शुद्ध पानी को प्रासुक करके (गर्म करके अथवा लौंग आदि डाल कर) ही अभिषेक करना चाहिए| प्रतिमाजी से स्पर्श होते ही यह पवित्र गंधोदक बन जाता है जिसे न्हवन-जल भी कहते हैं| अभिषेक उपरांत सावधानी से स्वच्छ सूखे छन्ने से प्रतिमाजी के समस्त अंगों से से समस्त जल कण पौंछें, व दूसरा अर्घ्य चढ़ा कर वेदी में मूल सिंहासन पर स्वस्तिक बना कर पुनः विराजमान करें और तीसरा अर्घ्य भी चढ़ावें| फिर छन्नों को खंगाल कर सूखने डाल दें| फिर विनय पूर्वक इस परम सौभाग्य प्रदायक गंधोदक की कुछ बूँदें बांयी हथेली पर ले, दांये हाथ की मध्यमा व अनामिका उँगलियों से ललाट पर व ऊपरी नेत्र-पटों पर धारण करें|
अन्य दर्शनार्थियों के लिए एक कटोरे में कुछ गंधोदक रख शुद्ध जल युक्त थाली में रखें व शेष अतिरिक्त गंधोदक उत्तम-पुष्पों के पौधों के गमलों में विसर्जित कर दें|
वर्जनाएं:
1. आँखों में, मुख में, अथवा अन्य अंगों में गंधोदक लगाना अविनय है और पापास्रव का कारण है|
2. अभिषेक-पूजन पूर्ण होने तक नाक, कान, मुँह में उँगली न डालें एवं नाभि से नीचे का भाग स्पर्श न करें। खून, पीव आदि निकलने पर, सर्दी- जुकाम, बुखार, चर्मरोग, सफेद दाग, दाद, खुजली एवं चोट-ग्रस्त होने पर अभिषेकादि न करें।
3. पूजन की पुस्तकों में पूजा के स्थापना-मंत्र, द्रव्याष्टक-मंत्र एवं पंच कल्याणकों के मंत्र संक्षेप में दिये होते हैं। कृपया उन मंत्रों को पूरा एवं शुद्ध पढ़ना चाहिए। ‘इत्याशीर्वाद’ के बाद पुष्पांजलि क्षेपण अवश्य करें, यह प्रभु के आशीर्वाद की महान क्रिया है ।
4. जहाँ नौ बार णमोकार मंत्र जपना है, वहाँ प्रत्येक णमोकार मंत्र तीन श्वास में पढ़ना चाहिए।
5. पूजन चाहे जितनी की जाएं, पर जल्दी-जल्दी नहीं गानी चाहिए। जो पूजन, विनती, पाठ, स्तोत्र आदि पढ़ें जावें उनके भावों को जीवन में उतारने पर मनुष्य पर्याय की सार्थकता है |
6. पूजन क्रिया समाप्त होने पर पूजन पुस्तकों के अन्दर फंसे चांवल आदि के कणों को अच्छी तरह झाड़ कर ही पुस्तकों को यथा स्थान सहेज कर रखना चाहिए|
👉 परिणाम - शुद्धि-मन्त्र👈
विधिं विधातुं यजनोत्सवेऽहं,गेहादिमूच्छामपनोदयामि।
अनन्यचित्ता कृतिमादधामि, स्वर्गादि लक्ष्मीमपि हापयामि।।
(यह पढकर पात्रों से गृहस्थी के कार्यों से प्रवृत उत्सवपर्यन्त निवृत्त रहने की प्रतिज्ञा कराई जावे ।)
👉अंगन्यास विधि👈
मंगलाष्टक के बाद शरीर की रक्षा और तद् दिशाओं से आनेवाले विघ्नों की निवृत्ति के लिए नीचे लिखे अनुसार अंगन्यास किया जावे। दोनों हाथों के अंगष्ठ से लेकर कनिष्ठिका पर्यन्त पाँचो अंगुलियों में क्रम से अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी की स्थापना की जावे। जप या हवन में बैठनेवाले महाशय सर्वप्रथम दोनों हाथों के अंगूठों को बराबरी से मिलाकर सामने करें।
ॐ ह्रां णमो अरिहंताणं हां अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
इस मंत्र का उच्चारण कर उन अंगुष्ठों पर शिर झुकावें। फिर दोनों हाथों की तर्जनियों (अंगूठों के पास की अंगुलियों) को बराबरी से मिलाकर सामने करें और -
ॐ ह्वीं णमो सिद्धाणं हीं तर्जनीभ्यां नमः।
इस मंत्र को पढ़कर तर्जनियों पर शिर झुकावें। फिर बीच की दोनों अंगुलियों को मिलाकर सामने करें और
ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं मध्यमाभ्यां नमः ।
यह मंत्र पढ़कर मध्यमाओं पर शिर झुकावें। फिर दोनों अनामिकाओं को मिलाकर सामने करें और
ॐ हौं णमो उवज्झायाणं हौं अनामिकाभ्यां नमः।
यह मंत्र पढ़कर अनामिका पर शिर झुकावें। फिर दोनों कनिष्ठिकाओं को मिलाकर सामने करें और
ॐ हः णमो लोए सव्व साहूणं हः कनिष्ठाभ्यां नमः।
यह मंत्र पढ़कर कनिष्ठिकापर शिर झुकावें। फिर दोनों हथेलियों को बराबर सामने फैलाकर
ॐ ह्रां ह्वीं हूं ह्रौं ह्रः कर तलाभ्यां नमः।
यह मंत्र पढ़कर करतलों (गोदियों) पर शिर झुकावें। फिर
दोनों कर पृष्ठों को बराबर सामने फैलाकर-
ॐ ह्रां ह्वीं हूं हौं ह्रः कर पृष्ठाभ्यां नमः।
यह मंत्र पढकर हथेलियों के ऊपरी भाग पर शिर झुकावें।
ॐ ह्रां णमो अरिहंताणं ह्नां शीर्ष रक्ष रक्ष स्वाहा।।
यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ से शिर का स्पर्श करें।
ॐ ह्वीं णमो सिद्धांणं ह्वीं वदनं रक्ष रक्ष स्वाहा।।
यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ से मुख का स्पर्श करें।
ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा॥
यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ से हृदय का स्पर्श करें।
ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं हौं नाभि रक्ष रक्ष स्वाहा।।
यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ से नाभि का स्पर्श करें।
ॐ ह्रः णमो लोए सव्वसाहूणं ह्रः पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा।।
यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ से पैरों को जलसे सिंचन करें।
ॐ ह्नां णमोअरिहंताणं ह्नां मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।।
यह मंत्र पढ़कर अपने शरीर पर पुष्प क्षेपन करें।
ॐ ह्वीं णमो सिद्धाणं ह्वीं वस्त्रं रक्ष रक्ष स्वाहा ।।
यह मंत्र पढ़कर अपने वस्त्रों पर पुष्प क्षेपन करें।
ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं पूजाद्रव्यं रक्ष रक्ष स्वाहा ।।
यह मंत्र पढ़कर पूजा की सामग्री पर पुष्प क्षेषपन करें।
ॐ ह्रौं गमो उवज्झायाणं हौं पूजा स्थलं रक्ष रक्ष स्वाहा ॥
यह मंत्र पढ़कर अपने खड़े होने की जगह की ओर देखें।
ॐ ह्रः णमो लोए सव्वसाहणं ह्रः सर्व जगत् रक्ष रक्ष स्वाहा।।
मंत्र पढ़कन चल्लू में जल लेकर सब और सिंचन करें।
ॐ भ्रां भ्रीं भूं भ्रौं भ्रः ॐ ह्रां ह्वीं हूं ह्रौं ह्रः सर्व विघ्न निवारण कुरु कुरु स्वाहा।
👉अभिषेक-क्रिया-विधि👈
श्री मज्जिनेन्द्रमभिवंद्य जगत्त्रयेशं।
स्याद्वादनायक मनन्त चतुष्टयार्हम्।।
श्रीमूलसंघ सुदृशां सुकृतैकहेतु-
जैनेन्द्र यज्ञ विधिरेष मयाभ्यधायि।।1।।
मंत्र- ऊँ हृीं भूः स्वाहा प्रस्तावनाय पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
अन्वयार्थ-(जगत्त्रयेशं) तीन लोक के ईश, (स्याद्वादनायकम् अनन्त चतुष्टयार्हम्) स्याद्वाद नीति के नायक और अनन्त चतुष्टय के धनी (श्री मज्जिनेन्द्रम्) श्री-सम्पन्न जिनेन्द्रदेव को (अभिवंद्य) नमस्कार करके (श्रीमूलसंघ सुदृशां सुकृतैक हेतु) मूलसंघ की परम्परा या जैन संघ के सम्यकदृष्टि जीवों के सुकृ पुण्य बंध में एकमात्र कारण भूत (एष जैनेन्द्र-यज्ञ-विधि) यह जिनेन्द देव की पूजा-विधि (अभ्यधायि) कहीं गई है (जाती है)।
अर्थ-तीन लोक के ईश स्याद्वाद नीति के नायक और अनन्त चतुष्टय के धनी श्री सम्पन्न जिनेन्द्र देव को नमस्कार करके मूल संघ के अनुसार सम्यक् दृष्टि जीवों के सुकृत की एकमात्र कारणभूत जिनेन्द्र देव की यह पूजा-विधि कही गई है (जाती है)।
उक्त श्लोक पढ़कर जिनेन्द्र देब के चरणों के अग्रभाग में रखी थाली पर (पुष्पों की वर्षा) अर्पित करें।
निम्नलिखित श्लोक को पढ़कर आभूषण और यज्ञोपवीत धारण करना। :
श्री मन्मन्दर-सुन्दरे शुचि-जलै-धौंतैः सदर्भाक्षतैः,
पीठे मुक्तिवरं निधाय रचित-त्वत्-पाद - पुष्प - स्रजा:।
इन्द्रोऽहं निज - भूषणार्थ - कमिदं यज्ञो-पवीतं दधे,
मुद्रा - कङ्कण - शेखराणपि तथा जैनाभिषेकोत्सवे।।2।।
मंत्र- ॐ हीं नमो परम शांताय शांतिकराय पवित्री कृतायाहं रत्नत्रय स्वरुपं यज्ञोपवीतं-
धारयामि मम गात्रं पवित्रं भवतु हीं नमः स्वाहा॥
निम्नलिखित श्लोक पढ़कर सुगन्धित चंदन से नौ अंगों पर तिलक लगाएं-
सौगंध्य-संगत-मधुव्रत-झंकृतेन।
संवण्र्यमानमिव गंधमनिन्द्यमादौ।।
आरोपयामि विबुधेश्वर-वृन्द-वन्द्य।
पादारविन्दमभिवंद्य जिनोत्तमानाम्।।3।।
मंत्र- ऊँ हृीं परम पवित्राय नमः आगमोक्त नवांगेषु चन्दनानुलेपनं करोमि स्वाहा।
अन्वयार्थ- (विबुधेश्वरवृन्दवन्द्य) विबुधेश्वर:- इन्द्र के वृन्द:- समूह के द्वारा वन्दनीय (जिनोत्तमानां) श्री जिनेन्द्र देवों के (पादारविन्दम्) चरण कमल को (अभिवन्द्य) नमस्कार करे (आदौ) अभिषेक महोत्सव के आदि में (सौगन्ध्यसंगत मधुव्रत झंकृतेन) सुगंधि के कारण आए हुए भ्रमरों के गुंजार के द्वारा (संवण्र्यमानम् इव) मानों जिसकी प्रशंसा की जा रही है (ऐसे) (अनिन्द्यं गन्धं) अनिन्द्य गंध को (अंगों पर) (आरोपयामि) आरोपित करता हूं।
अर्थ- मैं इन्द्र समूह द्वारा वन्दनीय ऐसे श्री जिनेन्द्र देव के चरणकमल को नमस्कार करके अभिषेक महोत्सव के प्रारम्भ में अपनी सुगंधि के कारण आए भ्रमर समूह के मधुर शब्द से प्रशंसित किए गए के समान अनिन्द्य गंध का आरोपण करता हूं। अनामिका अंगुली से नौ अंगों में चन्दन लगाएं।
नौ अंग-
1. मस्तक-मान कषाय की शांति हेतु
2. हृदय- क्रोध कर्षाय की शांति हेतु
3. कंठ- मायाचारी से रहित सरल हित मित प्रिव वचन कंठ से निकलने हेतु।
4. कर्ण- कर्कश वचन भी कर्ण से टकराकर मधुर मिष्ठ लगें।
5. दोनों बाजू में- मेरी शक्ति प्रभुध्यान व भक्ति में लगे इस भावना से।
6. दोनों कलाई- मेरे हथ किसी को गिराने नहीं बल्कि उठाने में कारण बनें और जिनेन्द्र प्रभु की पूजन करते रहें।
7. नाभि- नाभि जो ऊर्जा का संचालन करती है। मेरी ऊर्जा ऊध्र्वगमन करे ताकि ध्यान और साधनामय जीवन बने ऊर्जा के उधोगमन से वासना और ऊध्र्वगमन से साधना होती है।
👉भूमि प्रक्षालन👈
ये सन्ति केचि-दिह दिव्य-कुल-प्रसूता,
नागाः प्रभूत-बल-दर्पयुता भुवोऽधः ।
संरक्षणार्थ-ममृतेन शुभेन तेषां,
प्रक्षालयामि पुरतः स्नपनस्य भूमिम् ।। 4।।
मंत्र- ऊँ हरीं जलेन भूमिशुद्धिं करोमीति स्वाहा।
👉पीठ प्रक्षालन👈
क्षीरार्णवस्य पयसां शुचिभिः प्रवाहैः,
प्रक्षालितं सुरवरै-र्यदनेक-वारम् ।
अत्युय-मुद्यत-दहं जिन-पादपीठं,
प्रक्षालयामि भव-सम्भव-तापहारि।। 5 ।।
मंत्र- ॐ ह्रां ह्रीं हूँ ह्रौं ह्रः नमोऽर्हते भगवते श्री मते पवित्रतर-जलेन पीठ प्रक्षालनं करोमीति स्वाहा।
👉पीठ पर श्रीकार वर्ण लेखन 👈
श्री-शारदा-सुमुख-निर्गत बीजवणं,
श्री-मङ्गलीक-वर-सर्वजनस्य- नित्यम्
श्रीमत् स्वयं क्षयति तस्य विनाश विघ्नं,
श्री कार वर्ण-लिखितं जिन-भद्रपीठे ॥6॥
मंत्र- ॐ ह्रीं अर्ह श्री कार लेखनं करोमीति स्वाहा
👉अग्नि प्रज्वलन क्रिया👈
दुरन्त मोह-सन्तान-कान्तार-दहनक्षमं,
दर्भैःप्रज्वालया म्यग्निज्वाला पल्लविताम्बरम्।।7।।
मंत्र-ॐ ह्रीं अग्निं प्रज्वालयामीति स्वाहा।
👉दक्ष दिक्पालन का आह्वान👈
इन्द्राग्नि-दण्ड-धर-नैऋत्य-पाश-पाणि
वायूत्तरेण शशि-मौलि-फणीन्द्र-चन्द्राः।
आगत्य यूयमहि सानुचराः सचिह्नाः,
स्वं स्वं प्रतीच्छत बलिं जिनपाभिषेके।।8।।
👉दश दिक्पाल के मंत्र👈
ॐ आं क्रौं हीं इन्द्र आगच्छ आगच्छ, इन्द्राय स्वाहा ।।१।।
ॐ आंक्रौं ह्रीं अग्ने आगच्छ आगच्छ, आग्नेय स्वाहा।।२।।
ॐ आं क्रौं हीं यम आगच्छ आगच्छ, यमाय स्वाहा ।।३॥
ॐ आं क्रौं ह्रीं नैऋत्य आगच्छ आगच्छ, नैर्ऋताय स्वाहा॥४॥
ॐ आं क्रौं ह्रीं वरुण आगच्छ आगच्छ, वरुणाय स्वाहा॥५॥
ॐ आं क्रौं ह्रीं पवन आगच्छ आगच्छ, पवनाय स्वाहा॥६॥
ॐ आं क्रौं ह्रीं कुबेर आगच्छ आगच्छ, कुबेराय स्वाहा॥७॥
ॐ आं क्रौं ह्रीं ऐशान आगच्छ आगच्छ, ऐशानाय स्वाहा।।८।।
ॐ आं क्रौं ह्रीं धरणेन्द्र आगच्छ आगच्छ, धरणेन्द्राय स्वाहा॥९॥
ॐ आं क्रौं ह्रीं सोम आगच्छ आगच्छ, सोमाय स्वाहा॥१०॥
नाथ त्रिलोक-हिताय दश-प्रकार-
धर्माम्बु-वृष्टि-परिषिक्त-जगत्त्रयाय।
अर्घ महार्घणु रत्न महार्ण वाय,
तुभ्यं ददामि कुसुमैर् विशदाक्ष तैश्च॥९॥
मंत्र- ॐ ह्रीं इन्द्रादि-दश-दिक्पाल-केभ्यो इदं,अर्घ्यं पाद्यं गंध दीपं धूपं चरुं बलिं स्वस्तिकं अक्षतं यज्ञभागं यजामहे प्रति-गृह्यतां - प्रति-गृह्यता स्वाहा।
👉 क्षेत्रपाल को अर्घ 👈
भो क्षेत्रपाल ! जिनपः प्रतिमांकपाल ,
दंष्ट्राकराल जिनशासनरक्षपाल ।
तैलादिजन्मगुडचन्दनपुष्पधूपै -
भॊगं प्रतीच्छ जगदीश्वर यज्ञकाले ।।
विमलसलिलधारामोदगन्धाक्षतोदघैः,
प्रसवकुलनिवेद्यैर्दीपधूपैः फलौघैः ।
पटहपटुतरौघैः वस्त्रसदभूषणौघैः
जिनपतिपदभक्त्या ब्रह्मणं प्रार्चयामि ।। १० ।।
मंत्र- ॐ आं क्रौं अत्रस्थ विजयभद्र-वीरभद्र-मणिभद्र-भैरवापराजित-पंचक्षेत्रपाला: इदं अर्घ्य पाद्यं गंधं दीपं धूपं चरुं बलिं स्वस्तिकं अक्षत यज्ञभागं च यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतामिति स्वाहा ।
👉भगवान के चरणो में पुष्पांजलि👈
जन्मोत्सवादिसमयेषु यदीयकीर्ति,
सेन्द्राः सुराः प्रमदभारनता स्तुवन्ति।
तस्यागतो जिनपतेः परया विशुद्धया,
पुष्पांजलिं मलयजामुपाक्षिपेऽहम्॥11।।
इति पुष्पांजलिं क्षिपेत ।।
👉 चार कलश स्थापन और कलशों में जलधार देना 👈
सत्पल्लवार्चितमुखान् कलधौतरुप्य -
ताम्रारकूटघटितान् पयसा सुपूर्णान् ।
गतांश्चतुरः समुद्रान् संस्थापयामि,
कलशान जिनवेदिकांते ॥12।।
ॐ ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पद्म महापद्म तिगिच्छ केशरी महापुण्डरीक पुण्डरीक गंगा सिन्धु रोहिद्रोहितास्या हरिद्धरिकान्ता सीता सीतोदा नारी नरकान्ता सुवर्णकूला रूप्यकूला रक्ता रक्तोदा क्षीराम्भोनिधिशुद्धजलं सुवर्णघटं प्रक्षालितं परिपूरित नवरत्नगंधपुष्पाक्षताभ्यर्चितमामोदकं पवित्रं कुरू कुरू झौं झौं वं मं हं सं तं पं द्रां द्रीं असि आउसा नम: स्वाहा ।
2 .ॐ ह्रीं आम्रादि-पल्लव शोभितमुखांश्चतुःकलशान् पीठचतुःकोणेषु स्थापयामि ।
👉 अभिषेक के लिए प्रतिमाजी को अर्ध चढाना 👈
उदकचन्दनतंदुलपुष्पकै श्चरुसुदीपसुधूपफलार्घकैः ।
धवलमंगलगानरवाकुले, जिनगृहे जिननाथमहं यजे ।।13।।
ॐ हीं परमब्रह्मणेऽनन्तानन्तज्ञानशक्तये अष्टादशदोषरहिताय षट्चत्वारिंशद् गुणसहिताय अर्हत्परमेष्टिने अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ निर्वपामिति स्वाहा
👉 बिम्ब स्थापना 👈
यः पांडुकामलशिलागतमादिदेव ,
मस्नापयन् सुरवराः सुरशैलमूर्ध्नि ।
कल्याणमीप्सुरहम क्षततोयपुष्पैः,
संभावयामि पुर एव तदीयबिम्बम् ।।14।।
मंत्र- 1 ॐ लाक्षत-पुष्पाणि-निक्षिप्य श्री वर्णे प्रतिमास्थापनं करोमीति स्वाहा।
2 ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अहँ श्रीवणे प्रतिमास्थापनं करोमि स्वाहा ।
👉 मुद्रिका स्वीकार 👈
प्रत्युप्तनीलकुलिशोत्पलपद्मराग -
नियंत्करप्रकरबध्दसुरेन्द्रचापम् ।
जैनाभिषेकसमयेऽड्गुलिपर्वमूले ,
रत्नाडलीयकमहं विनिवेशयामि ।।15।।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अहँ अ सि आ उ सा नम: मुद्रिकाधारणं ।।
इसके पश्चात् अभिषेक करें।