Poojan-Abhishek

Poojan-Abhishek

पंचामृत अभिषेक

पंचामृत अभिषेक

👉1.जल की धारा 👈

दुरावनम्र-सुरनाथ-किरीट-कोटि-

संलग्न-रत्न-किरण-च्छवि-धुसराध्रिम ।

प्रस्वेद-ताप-मल-मुक्तमपि-प्रकृष्टै-

र्भक्तया जलै-र्जिनपर्ति बहुधाभिषेच्चे ।।1।। 

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हं सं सं तं तं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय ॐ नमो 

अर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतरजलेन जिनाभिषेचयामी स्वाहा ।

और

ॐ ह्रीं श्रीमन्तं भगवन्तं कृपाल सन्तं वृषभादि वर्धमानांत-चतुर्विंशति तीर्थंकर परमदेवं आध्यानाम आध्ये जम्बुदीपे भरतक्षेत्रे आर्यखंडे देशे.... नाम नगरे एतद .... जिन चैत्यालये वीर निर्वाणसंवत ....

मासोत्तममासे .... मासे....पक्षे........ तिथौ ......... वासरे प्रशस्त ग्रहलग्न होरायं मुनि-आर्यिका-श्रावक-श्रविकानाम सकलकर्म-क्षयार्थं जलेनाभिषेकं करोमि स्वाहा ।

👉2.शर्करा रसाभिषेक👈

 मुक्त्यंगनानर्म-विकीर्य-माणैः,पिष्टार्थ-कर्पूर-रजो-विलासैः।

 माधुर्य धुयै-र्वर शर्करोधै- भक्त्याजिनस्य संस्नपनंकरोमि।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हं सं सं तं तं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय ॐ नमो 

अर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतरजलेन जिनाभिषेचयामी स्वाहा ।

अर्घ- संसार महा दुख सागर में, प्रभु गोते खाते आया हूं।

  अब आत्म स्वाद को पाने को,इक्षुरस की धारा देता हूं।

उदक चन्दन तंदुल पुष्पकैश्चरु ,सुदीप सुधूप फलार्घकैः। 

धवल मंगल गान रवा कुले,जिन गृहे जिन नाथ महं यजे।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य शर्कर अभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

👉3. इक्षु रस धारा👈

भक्त्या ललाट-तटदेश-निवेशि-तोच्चैः,

र्हस्तैःच्युता सुर-वरा सुर-मर्त्य-नाथैः।

तत्काल-पीलित-महेक्षु रसस्य धारा,

सद्यः पुनातु जिनबिम्ब-गतैव युष्मान्।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हं सं सं तं तं पं पं झं झं इवीं इवींक्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर इक्षु रसेनाभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में, प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब आत्म स्वाद को पाने को, इक्षुरस की धारा देता हूं।

उदक- चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथ महं-यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य इक्षु रसाभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

👉4. आम्र रसाभिषेक👈

सुपक्वैः कनकच्छायैः, सामोदै-र्मोदकारिभिः।

सहकार-रसैःस्नानं, कुर्मःशर्मैकः सद्यनः ॥

मंत्र- ॐ हीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हं सं सं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर आम्र रसेनाभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में ,प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब आत्म स्वाद को पाने को, आम्ररस की धारा देता हूं।

उदक- चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले,जिनगृहे जिननाथ महं-यजे ॥

मंत्र- ॐ हीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य आम्र रसाभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

👉5. नालिके रस👈

नालि-केर जलैः स्वच्छैः, शीतैः पूतै-र्मनोहरैः।

स्नान क्रियां कृतार्थस्य, विदधे विश्व दर्शिन:।।

मंत्र- ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हं सं सं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर नालिके रसेनाभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में ,प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब आत्म स्वाद को पाने को, नालिकेर रस की धारा देता हूं।

उदक- चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथमहं-यज॥

ॐ हीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य नालिके रसाभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

👉6. दाडिम रस👈

श्वास-कासादि-रोगाणां, नाशकै: दाडिमैः फलैः।

तद् रसै-रभिषिञ्चामि,धर्म-चक्रस्य नायकम्।21॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हं सं सं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर दाडिम रसेनाभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में ,प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब आत्म स्वाद को पाने को,दाडिम रस की धारा देता हूं।

उदक- चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथमहं-यजे ॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य दाडिम रसाभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

👉7. मौसम्बी रस👈

सुमिष्टैःहाट-कच्छायैः,मातुलिंग रसै-वरैः।

स्पनं तीर्थनाथस्य,विभूत्या महत्या मया।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर मौसम्बी रसेनाभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में,प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब आत्म स्वाद को पाने को, मौसम्बीरस की धारा देता हूं।

उदक चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीप सुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथ महं-यजे ॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य मौसम्बी रसाभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

👉8. नारंगी रस👈

अन्त र्बाह्म-समा-वर्णे, उज्ज्वलैश्चित्त हारिभिः।

नारिङ्गरसैस्तीर्थेश, स्नप यामि विमुक्तये।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं झ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर नारंगी रसेनाभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में,प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब आत्म स्वाद को पाने को, नारंगी रस की धारा देता हूं।

उदक चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले,जिनगृहे जिननाथ महं-यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य नारंगी रसाभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाह।

👉9. अनानास रस👈

विचित्रैः सुन्दरा कारैःनयनाल्हाद-दायकैः।

अनानस फलैः जैनं बिम्बर्चामि सिद्धये॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्ते भगवते श्रीमते पवित्रतर अनानास रसेनाभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में,प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब आत्मस्वाद को पाने को,अनानास रस की धारा देता हूँ।।

उदक चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथ महं-यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्रीजिनेन्द्रस्य अनानास रसाभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहः

👉10.सेव फल रस👈

मिष्टाम्ल - स्वाद संयुक्तै काश्मीर देश संभवैः।

सेव फल-रसै:रम्यै जिनार्चा परि पूजयेI।

ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर सेव फला रसेनाभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में,प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब आत्मस्वाद को पाने को, सेवफल रस की धारा देता हूँ॥

उदक चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथ महं-यजे॥

ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्रीजिनेन्द्रस्य सेव फलभिषेकान्तअर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहः।

👉11.केला रस👈

रंभारामात्समाहतैः काचन-च्छवि=धारकै:

रंभा फलै-जिनेन्द्रस्य महा स्रपन-मारभे रंभार सेन ।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं झ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हंते भगवते श्रीमते पवित्रतर केला फलाभिषिंचेयामि नमःस्वाहा

संसार महा दुख सागर में,प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब आत्मस्वाद को पाने को,अनानास रस की धारा देता हूँ।।

उदक चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथ महं-यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्रीजिनेन्द्रस्य केलाभिषेकान्त अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा

👉12. रसाभिषेक👈

द्राक्षा खर्ज रचो चेक्षु प्राचीना मल कोद्धवैः ।

राजा-दनाम्र-पूगोत्थै स्नापयामि जिनं रसैः ॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह ....... रसामभिषेकयामि स्वाहा।

संसार महा दुख सागर में, प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब आत्मस्वाद को पाने को, अनानास रस की धारा देता हूँ॥

उदक चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथ महं-यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्रीजिनेन्द्रस्य रसभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा

👉13. घृत अभिषेक👈

उत्कृष्ट वर्ण-नव-हेम-रसाभि राम-देह-,

प्रभा-वलय-सङ्गम-लुप्त-दीप्तिम्।

धारां घृतस्य शुभ-गन्ध-गुणानु-मेयां,

वन्देऽर्हतां सुरभि-संस्नप-नोप-युक्ताम्।।

ॐ हीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर घृता अभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में, प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब सार भूत को पाने को इस घृत की धारा देता हूँ।

उदक चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथ महं-यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य घृता अभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

👉14. दुग्ध धारा👈

सम्पूर्ण शारद - शशांक मरीचि जाल स्यन्दै,

रिवात्म यशसा मिव सुप्रवाहैः।

क्षीरै र्जिना:शुचि तरै रभिषिच्य मानाः,

सम्पाद यन्तु मम चित्त समी हितानि॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर दुग्धा अभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में, प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब क्षीर मलाई सम होने को इस दुग्ध की धारा देता हूँ।

उदक चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथ महं-यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य दुग्धा अभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

👉15.दधि धारा👈

दुग्धाब्धि-वीचि-चय-संचित फेन राशि,

पाण्डुत्व कांति मवधीर-यता-मतीव।

दध्नां-गता जिनपतेःप्रतिमा सुधारा,

सम्पद्यतां-सपदि वांछित सिद्धयेवः॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर दधि अभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में,प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब क्षीर मलाई सम होने को इस दधि की धारा देता हूँ।

उदक- चन्दन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीपसुधूप-फलार्घकैः।

धवल-मंगल-गान-रवा-कुले, जिनगृहे जिननाथ महं-यजे ॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य दधि अभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

👉16. सर्वोषधि धारा👈

संस्नापितस्य घृत दुग्ध दधीक्षु-वाहैः,

सर्वाभि रौषधिभि रर्हत उज्जवलाभिः ।

उद्धर्तित तस्य विदधाम्यभिषेक मेला,

कालेय कुंकुम रसोत्कट वारि पूरैः॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर सर्वोषधि अभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में, प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब राग रोग मिटाने को सर्वोषधि की धारा देता हूँ।

उदक चन्दन तंदुल पुष्पकै श्चरुसुदीप सुधूप फलार्घकैः ।

धवल मंगल गान रवा कुले, जिन गृहे जिन नाथ महं यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य सर्वोषधि अभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा

👉17. चतुः र्कोण कलश👈

इष्टै-र्मनोरथ शतैरिव भव्य पुंसां,

पूर्णै सुवर्ण कलशै निखिला-वसानैः।

संसार सागर विलंघन हेतु सेतुः,

माप्ला-वये त्रि-भुवनैक पतिं जिनेन्द्रम्॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर चतुः र्कोण कलश अभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में, प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब घाति कर्म विनाशन को, चतु कलशों की धारा देता हूँ।

उदक चन्दन तंदुल पुष्पकैश्चरु सुदीप सुधूप फलार्ध्यकैः ।

धवल मंगल गान रवा कुले, जिन गृहे जिन नाथ महं यजे।।

ॐ हीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्रीजिनेन्द्रस्य चतुः र्कोण कलशा अभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा

👉18. चंदनादि लेपनं👈

संशुद्ध शुद्धया परया विशुद्धया,

कर्पूर सम्मिश्रित चन्दनेन।

जिनस्य देवा सुर पूजि तस्य,

विलेपनं चारु करोमि भक्त्या।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर चंदना अभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में प्रभु गोते खाते आया हूँ।

संसार ताप विनाशन को, प्रभु चंदन लेपन करता हूँ।

उदक चन्दन तंदुल पुष्पकैश्चरु सुदीप सुधूप फलार्ध्यकैः।

धवल मंगल गान रवा कुले, जिन गृहे जिन नाथ महं यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य चंदना अभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा॥

👉19. पुष्प वृष्टि👈

वसन्तिका जाति सुरेश वृन्दै,

वधूक वृन्दै रपि चम्प काघैः।

पुष्पै रनेकै - रलिभि-र्हताग्रैः,

श्री मज्जिनेद्रांघ्रियुंग यजेऽहं॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर पुष्प वृष्टि अभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब काम बाण विनाशन को इन पुष्पों की वृष्टि करता हूँ।

उदक चन्दन तंदुल पुष्प कैश्चरु सुदीप सुधूप फलार्ध्यकैः।

धवल मंगल गान रवा कुले, जिन गृहे जिन नाथ महं यजे।।

ॐ ह्रीं सुमनः सुख प्रदाय पुष्प वृष्टिं करोमि स्वाहा।

👉20. मंगल आरती👈

दध्युज्जव लाक्षत मनोहर पुष्प दीपैः,

पात्रा र्पितं प्रति दिनं महता दरेण।

त्रैलोक्य मंगल सुखा लय काम दाह,

मारार्तिकं तव विभो रव तार यामि॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य मंगल आरती अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

संसार महा दुख सागर में प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब मिथ्या तम विनाशन को इस दीप की आरती करता हूँ।

उदक चन्दन तंदुल पुष्पकैश्चरु सुदीप सुधूप फलार्ध्यकैः।

धवल मंगल गान रवा कुले, जिन गृहे जिन नाथ महं यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य मंगल आरती अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा।

👉21.पुर्णसुगन्धित कलशाभिषेक👈

द्रव्यैरनल्प घन सार चतुःसमाढ्यै,

रामोद वासित समस्त दिगं तरालैः।

मिश्रीकृतेन पयसा जिन पुंग वानां,

त्रैलोक्य पावन महं स्रपनं करोमि

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हंसंसं तं तं पं पं झं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतर पूर्ण सुगंधि अभिषिंचेयामि नमःस्वाहा।

संसार महा दुख सागर में प्रभु गोते खाते आया हूँ।

अब उत्तम तन को पाने को इस गंध की धारा देता हूँ।

उदक चन्दन तंदुल पुष्प कैश्चरु सुदीप सुधूप फलार्घकैः।

धवल मंगल गान रवा कुले, जिन गृहे जिन नाथ महं यजे॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री जिनेन्द्रस्य पूर्ण सुगंधि अभिषेकान्ते अर्ध्यं निर्वपामीति स्वाहा