Poojan-Abhishek

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श्री सोलहकारण पूजन -02

श्री सोलहकारण पूजन  -02

श्री सोलहकारण पूजन

सोलह कारण भाय तीर्थंकर जे भये ।

हरषे इन्द्र अपार मेरु पै ले गये ।।

पूजा करि निज धन्य लख्यो बहु चावसौं ।

हमहू षोडश कारन भावैं भावसौं ।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणानि ! अत्र अवतरत अवतरत, संवौषट्, इति आह्वाननम् ।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणानि ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः, इति स्थापनम् ।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणानि ! अत्र मम सन्निहितानि भव भव वषट् इति सन्निधिकरणम् ।

(चौपाई आँचलीबद्ध)

कंचन-झारी निरमल नीर, पूजों जिनवर गुण-गम्भीर ।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।

दरशविशुद्धि भावना भाय, सोलह तीर्थंकर-पद-पाय।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धि-विनयसम्पन्नता-शीलव्रतेष्वनतिचार-अभीक्ष्णज्ञानोपयोग - संवेग-शक्तितस्त्याग-तपः साधुसमाधि-वैयावृत्यकरण-अर्हद्भक्ति-आचार्यभक्ति- बहुश्रुतभक्ति-प्रवचनभक्ति-आवश्यकापरिहाणि-मार्गप्रभावना-प्रवचनवात्सल्येति तीर्थंकरत्व-कारणेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

चन्दन घसौं कपूर मिलाय, पूजौं श्री जिनवर के पाय।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।दरश…।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यः संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

तन्दुल धवल सुगन्ध अनूप, पूजौं जिनवर तिहुँ जग-भूप।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।दरश…।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

फूल सुगन्ध मधुप-गुंजार, पूजौं जिनवर जग-आधार ।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।दरश…।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

सदनेवज बहुविधि पकवान, पूजौं श्रीजिनवर गुणखान।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।

दरशविशुद्धि भावना भाय, सोलह तीर्थंकर पद-पाय।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दीपक-ज्योति तिमिर छयकार, पूजूँ श्रीजिन केवलधार।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।दरश…।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

अगर कपूरगन्ध शुभ खेय, श्री जिनवर आगे महकेय ।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।दरश…।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

श्रीफल आदि बहुत फलसार पूजौं जिन वांछित-दातार।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।दरश…।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

जल फल आठों दरब चढ़ाय, ‘द्यानत’ वरत करों मनलाय।

परम गुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो ।।दरश…।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

(दोहा)

षोडश कारण गुण करै, हरै चतुरगति वास ।

पाप-पुण्य सब नाशके, ज्ञान-भान परकाश ॥

(चौपाई)

दरशविशुद्धि धरे जो कोई, ताको आवागमन न होई।

विनय महाधारै जो प्राणी, शिव-वनिता की सखी बखानी॥

शील सदा दृढ़ जो नर पालै, सो औरन की आपद टालै।

ज्ञानाभ्यास करै मनमाहीं, ताके मोह-महातम नाहीं॥

जो संवेग-भाव विसतारै, सुरग-मुकति-पद आप निहारै।

दान देय मन हरष विशेखै, इह भव जस पर भव सुख देखै॥

जो तप तपै खपै अभिलाषा, चूरै करम-शिखर गुरु भाषा।

साधुसमाधि सदा मन लावै, तिहुँ जग भोग भोगि शिव जावै॥

निश-दिन वैयावृत्य करैया, सो निहचै भव-नीर तिरैया।

जो अरहंत भगति मन आनै, सो जन विषय-कषाय न जानै॥

जो आचारज-भगति करै है, सो निर्मल आचार धरै है।

बहुश्रुतवन्त-भगति जो करई, सो नर संपूरन श्रुत धरई॥

प्रवचन-भगति करै जो ज्ञाता, लहै ज्ञान परमानन्द-दाता।

षट् आवश्यक काल जो साथै, सो ही रत्नत्रय आराधै॥

धरम-प्रभाव करै जे ज्ञानी, तिन शिव-मारग रीति पिछानी।

वत्सल अंग सदा जो ध्यावै, सो तीर्थंकर पदवी पावै॥

(दोहा)

एही सोलह भावना, सहित धरै व्रत जोय।

देव-इन्द्र-नर-वंद्य-पद, ‘द्यानत’ शिव-पद होय॥

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यो जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

सुन्दर षोडशकारण भावना निर्मल चित्त सुधारक धारे |

कर्म अनेक हने अति दुर्द्धर जन्म जरा भय मृत्यु निवारे ||

दुःख दरिद्र विपत्ति हरे भव-सागर को पार उतारे |

ज्ञान कहे यही षोडशकारण, कर्म निवारण, सिद्ध सु धारें ||

इत्याशीर्वाद (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)

सोलह कारण पूजन के सोलह अर्घ 

प्रत्येक भावना के अर्घ्य (सवैया तेईसा)

दर्शन शुद्ध न होवत जो लग, तो लग जीव मिथ्याती कहावे |

काल अनंत फिरे भव में, महादुःखनको कहुं पार न पावे ||

दोष पचीस रहित गुण-अम्बुधि, सम्यग्दरशन शुद्ध ठरावे |

ज्ञान कहे नर सोहि बड़ो, मिथ्यात्व तजे जिन-मारग ध्यावे ||

ॐ ह्रीं दर्शन विशुद्धि भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |1|

 

देव तथा गुरूराय तथा, तप संयम शील व्रतादिक-धारी |

पापके हारक कामके छारक, शल्य-निवारक कर्म-निवारी ||

धर्म के धीर कषायके भेदक, पंच प्रकार संसार के तारी |

ज्ञान कहे विनयो सुखकारक, भाव धरो मन राखो विचारी ||

ॐ ह्रीं विनयसम्पन्नता भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |2|

 

शील सदा सुखकारक है, अतिचार-विवर्जित निर्मल कीजे |

दानव देव करें तसु सेव, विषानल भूत पिशाच पतीजे ||

शील बड़ो जग में हथियार, जू शीलको उपमा काहे की दीजे |

ज्ञान कहे नहिं शील बराबर, तातें सदा दृढ़ शील धरीजे ||

ॐ ह्रीं निरतिचार शीलव्रत भावनयै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |3|

 

ज्ञान सदा जिनराज को भाषित, आलस छोड़ पढ़े जो पढ़ावे |

द्वादश दोउ अनेकहुँ भेद, सुनाम मती श्रुति पंचम पावे ||

चारहुँ भेद निरन्तर भाषित, ज्ञान अभीक्षण शुद्ध कहावे |

ज्ञान कहे श्रुत भेद अनेक जु, लोकालोक हि प्रगट दिखावे ||

ॐ ह्रीं अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग भावनयै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |4|

 

भ्रात न तात न पुत्र कलत्र न, संगम दुर्जन ये सब खोटो |

मन्दिर सुन्दर, काय सखा सबको, हमको इमि अंतर मोटो ||

भाउ के भाव धरी मन भेदन, नाहिं संवेग पदारथ छोटो |

ज्ञान कहे शिव-साधन को जैसो, साह को काम करे जु बणोटो ||

ॐ ह्रीं संवेग भावनयै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |5|

 

पात्र चतुर्विध देख अनूपम, दान चतुर्विध भावसुं दीजे |

शक्ति-समान अभ्यागत को, अति आदर से प्रणिपत्य करीजे ||

देवत जे नर दान सुपात्रहिं, तास अनेकहिं कारण सीझें |

बोलत ज्ञान देहि शुभ दान जु, भोग सुभूमि महासुख लीजे ||

ॐ ह्रीं शक्तितस्त्याग भावनयै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |6|

 

कर्म कठोर गिरावन को निज, शक्ति-समान उपोषण कीजे |

बारह भेद तपे तप सुन्दर, पाप जलांजलि काहे न दीजे ||

भाव धरी तप घोर करी, नर जन्म सदा फल काहे न लीजे |

ज्ञान कहे तप जे नर भावत, ताके अनेकहिं पातक छीजे ||

ॐ ह्रीं शक्तितस्तप भावनयै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |7|

 

साधुसमाधि करो नर भावक, पुण्य बड़ो उपजे अघ छीजे |

साधु की संगति धर्मको कारण, भक्ति करे परमारथ सीजे ||

साधुसमाधि करे भव छूटत, कीर्ति-छटा त्रैलोक में गाजे |

ज्ञान कहे यह साधु बड़ो, गिरिश्रृंग गुफा बिच जाय विराजे ||

ॐ ह्रीं साधुसमाधि भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |8|

 

कर्म के योग व्यथा उदये, मुनि पुंगव कुन्त सुभेषज कीजे |

पित्त-कफानिल (वात) साँस, भगन्दर, ताप को शूल महागद छीजे ||

भोजन साथ बनाय के औषध, पथ्य कुपथ्य विचार के दीजे |

ज्ञान कहे नित वैय्यावृत्य करे तस देव पतीजे ||

ॐ ह्रीं वैयावृत्यकरण भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |9|

 

देव सदा अरिहन्त भजो जई, दोष अठारा किये अति दूरा |

पाप पखाल भये अति निर्मल, कर्म कठोर किए चकचूरा ||

दिव्य-अनन्त-चतुष्टय शोभित, घोर मिथ्यान्ध-निवारण सूरा |

ज्ञान कहे जिनराज अराधो, निरन्तर जे गुण-मन्दिर पूरा ||

ॐ ह्रीं अर्हद् भक्ति भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |10|

 

देवत ही उपदेश अनेक सु, आप सदा परमारथ-धारी |

देश विदेश विहार करें, दश धर्म धरें भव-पार- उतारी ||

ऐसे अचारज भाव धरी भज, सो शिव चाहत कर्म निवारी |

ज्ञान कहे गुरू-भक्ति करो नर, देखत ही मनमांहि विचारी ||

ॐ ह्रीं आचार्य भक्ति भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |11|

 

आगम छन्द पुराण पढ़ावत, साहित तर्क वितर्क बखाने |

काव्य कथा नव नाटक पूजन, ज्योतिष वैद्यक शास्त्र प्रमाने ||

ऐसे बहुश्रुत साधु मुनीश्वर, जो मन में दोउ भाव न आने |

बोलत ज्ञान धरी मन सान जु, भाग्य विशेष तें ज्ञानहि साने ||

ॐ ह्रीं बहुश्रुतिभक्ति भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |12|

 

द्वादश अंग उपांग सदागम, ताकी निरंतर भक्ति करावे |

वेद अनूपम चार कहे तस, अर्थ भले मन मांहि ठरावे ||

पढ़ बहुभाव लिखो निज अक्षर, भक्ति करी बड़ि पूज रचावे |

ज्ञान कहे जिन आगम-भक्ति, करे सद्-बुद्धि बहुश्रुत पावे ||

ॐ ह्रीं प्रवचनभक्ति भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |13|

 

भाव धरे समता सब जीवसु, स्तोत्र पढ़े मुख से मनहारी |

कायोत्सर्ग करे मन प्रीतसु, वंदन देव-तणों भव तारी ||

ध्यान धरी मद दूर करी, दोउ बेर करे पड़कम्मन भारी |

ज्ञान कहे मुनि सो धनवन्त जु, दर्शन ज्ञान चरित्र उघारी ||

ॐ ह्रीं आवश्यकापरिहाणि भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |14|

 

जिन-पूजा रचे परमारथसूं जिन आगे नृत्य महोत्सव ठाणे |

गावत गीत बजावत ढोल, मृदंगके नाद सुधांग बखाणे ||

संग प्रतिष्ठा रचे जल-जातरा, सद् गुरू को साहमो कर आणे |

ज्ञान कहे जिन मार्ग-प्रभावन, भाग्य-विशेषसु जानहिं जाणे ||

ॐ ह्रीं मार्गप्रभावना भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |15|

 

गौरव भाव धरो मन से मुनि-पुंगव को नित वत्सल कीजे |

शीलके धारक भव्य के तारक, तासु निरंतर स्नेह धरीजे ||

धेनु यथा निजबालक को, अपने जिय छोड़ि न और पतीजे |

ज्ञान कहे भवि लोक सुनो, जिन वत्सल भाव धरे अघ छीजे ||

ॐ ह्रीं प्रवचन-वात्सल्य भावनायै नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |16|

 

जाप्य मंत्र :-

ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयै नमः, ॐ ह्रीं विनयसम्पन्नतायै नमः, ॐ ह्रीं शीलव्रताय नमः,

ॐ ह्रीं अभीक्ष्णज्ञानोपयोगाय नमः, ॐ ह्रीं संवेगाय नमः, ॐ ह्रीं शक्तितस्त्यागाय नमः,

ॐ ह्रीं शक्तितस्तपसे नमः, ॐ ह्रीं साधुसमाध्यै नमः, ॐ ह्रीं वैयावृत्यकरणाय नमः,

ॐ ह्रीं अर्हद् भक्त्यै नमः, ॐ ह्रीं आचार्यभक्त्यै नमः, ॐ ह्रीं बहुश्रुतभक्त्यै नमः,

ॐ ह्रीं प्रवचनभक्त्यै नमः, ॐ ह्रीं आवश्यकापरिहाण्यै नमः, ॐ ह्रीं मार्गप्रभावनायै नमः,

ॐ ह्रीं प्रवचनवात्सल्यै नमः