
श्री नित्यमह पूजा
शंभु छन्द (तर्ज-हे वीर तुम्हारे....)
अरिहंत, सिद्ध, सूरी, पाठक,
साधु और जिनवर चौबीसों।
गणधर जिन पंच बालयतिवर,
जिन आगम गुरु प्रभुवर बीसों।।
माँ जिनवाणी, निर्वाणभूमि,
रत्नत्रय, दशलक्षण प्यारा।
नंदीश्वर पंचमेरू जिनवर,
जिनचैत्य चैत्यालय मनहारा।।
जिनधर्म जिनागम बाहुबली,
सोलहकारण पूजन करता।
इनका आह्वानन करके मैं,
श्री मोक्ष महल का सुख वरता।।1।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्यमह समुच्चय जिनेन्द्र ! अत्र अवतर-अवतर संवौषअ् आह्वाननम्।
ऊँ ह्रीं श्री नित्यमह समुच्चय जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्
ऊँ ह्रीं श्री नित्यमह समुच्चय जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरणम्।
नरेन्द्र छन्द (तजै: माइन-माइन....)
धीर वीर गंभीर प्रभु की,
अर्चा मैं नित करता हूँ।
निर्मल जल की त्रय धारा दे ,
जम्न-जरा-मृत हरता हूँ।।
देव-शास्त्र-गुरु बीस तीर्थंकर,
जिनवाणी गणधर पूजा।
त्रय चौबीसी रत्नत्रय ,
नंदीश्वर दशलक्षण पूजा।।
सोलहकारण बाहुबली,
निर्वाणभूमि वा नवदेवा।
पंच परम परमेष्ठी पद की,
करते उत्तम सेवा।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्य मह समुच्चय जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१।
शीतल चंदन चरण चढ़ाता,
शीतलता मुझको देना।
भव का बन्धन हरने वाले ,
भव की ज्वाला हर लेना।।
देव-शास्त्र-गुरु बीस तीर्थंकर,
जिनवाणी गणधर पूजा।
त्रय चौबीसी रत्नत्रय ,
नंदीश्वर दशलक्षण पूजा।।
सोलहकारण बाहुबली,
निर्वाणभूमि वा नवदेवा।
पंच परम परमेष्ठी पद की,
करते उत्तम सेवा।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्य मह समुच्चय जिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं नि.स्वाहा।२।
धवल मनोहर अक्षत लाया,
अक्षयपद पाने हेतू।
अक्षय पद को देने वाली ,
पूजन है सबका सेतू।।
देव-शास्त्र-गुरु बीस तीर्थंकर,
जिनवाणी गणधर पूजा।
त्रय चौबीसी रत्नत्रय ,
नंदीश्वर दशलक्षण पूजा।।
सोलहकारण बाहुबली,
निर्वाणभूमि वा नवदेवा।
पंच परम परमेष्ठी पद की,
करते उत्तम सेवा।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्य मह समुच्चय जिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् नि. स्वाहा।३।
जल भूमिज बहु पुष्प चढ़ाऊँ ,
भक्ति से जिन गुण गाऊँ।
कामबाण को वश में करके,
मन ही मन मैं हर्षाऊँ।।
देव-शास्त्र-गुरु बीस तीर्थंकर,
जिनवाणी गणधर पूजा।
त्रय चौबीसी रत्नत्रय ,
नंदीश्वर दशलक्षण पूजा।।
सोलहकारण बाहुबली,
निर्वाणभूमि वा नवदेवा।
पंच परम परमेष्ठी पद की,
करते उत्तम सेवा।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्य मह समुच्चय जिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं नि. स्वाहा।४।
पुआ पकौडी रबड़ी घेवर ,
आदिक व्यंजन मैं लाया।
क्षुधा वेदनी के भेदन को ,
प्रभु सन्मुख दौड़ा आया।
देव-शास्त्र-गुरु बीस तीर्थंकर,
जिनवाणी गणधर पूजा।
त्रय चौबीसी रत्नत्रय ,
नंदीश्वर दशलक्षण पूजा।।
सोलहकारण बाहुबली,
निर्वाणभूमि वा नवदेवा।
पंच परम परमेष्ठी पद की,
करते उत्तम सेवा।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्य मह समुच्चय जिनेन्द्राय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा।५।
जगमग दीपों की थाली ले ,
आरती प्रभु की गाऊँगा।
मोहकर्म का नाश मेरा हो,
सम्यक्भाव बनाऊँगा।।
देव-शास्त्र-गुरु बीस तीर्थंकर,
जिनवाणी गणधर पूजा।
त्रय चौबीसी रत्नत्रय ,
नंदीश्वर दशलक्षण पूजा।।
सोलहकारण बाहुबली,
निर्वाणभूमि वा नवदेवा।
पंच परम परमेष्ठी पद की,
करते उत्तम सेवा।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्य मह समुच्चय जिनेन्द्राय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं नि. स्वाहा।६।
धूप धूपायन में खेकर मैं,
अष्टकर्म का हनन करूँ।
प्रभु प्रतिमा के दर्शन करके,
निज स्वभाव का वरण करूँ।
देव-शास्त्र-गुरु बीस तीर्थंकर,
जिनवाणी गणधर पूजा।
त्रय चौबीसी रत्नत्रय ,
नंदीश्वर दशलक्षण पूजा।।
सोलहकारण बाहुबली,
निर्वाणभूमि वा नवदेवा।
पंच परम परमेष्ठी पद की,
करते उत्तम सेवा।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्य मह समुच्चय जिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय धूपं नि. स्वाहा ।७।
ताजे मीठे फल की अर्चा ,
मनवांछित फल देती है।
फल की अर्चा मेरे जीवन के,
संकट हर लेती है।।
देव-शास्त्र-गुरु बीस तीर्थंकर,
जिनवाणी गणधर पूजा।
त्रय चौबीसी रत्नत्रय ,
नंदीश्वर दशलक्षण पूजा।।
सोलहकारण बाहुबली,
निर्वाणभूमि वा नवदेवा।
पंच परम परमेष्ठी पद की,
करते उत्तम सेवा।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्य मह समुच्चय जिनेन्द्राय मोक्षफल-प्राप्तये फलं नि. स्वाहा।८।
नीरादिक आठों द्रव्यों का,
सुन्दर थाल सजाया है।
पद अनर्घ्य की अभिलाषा से ,
भक्तिभाव जगाया है।।
देव-शास्त्र-गुरु बीस तीर्थंकर,
जिनवाणी गणधर पूजा।
त्रय चौबीसी रत्नत्रय ,
नंदीश्वर दशलक्षण पूजा।।
सोलहकारण बाहुबली,
निर्वाणभूमि वा नवदेवा।
पंच परम परमेष्ठी पद की,
करते उत्तम सेवा।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्य मह समुच्चय जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद-प्राप्तये अर्घ्यं नि. स्वाहा ।९।
दोहा
वीतराग भगवान की, पूजा सब सुख खान।
त्रयधारा जल की करूँ, छोडूँ सब अभिमान।
काम सृष्टि का नाश हो, पुष्पवृष्टि के साथ।
पुष्पांजलि क्षेपण करूँ, पूर्ण विनय के साथ।।
जाप्य मंत्र-
ऊँ ह्रीं नित्यमहसमुच्चय जिनेन्द्राय नमः।
(9, 27 यो 108 बार जाप करें)
जयमाला
दोहा
जयमाला की माल से, गूंजे जय-जयकार।
जयमाला हम पढ़ रहे, मिलकर सब नर-नार।।
शंभु छन्द (तर्ज: ये देश है वीर....)
श्री वीतराग सर्वज्ञ हितैषी ,
अरिहंतों को नमन करूँ।
श्री सिद्ध सूरी पाठक साधु ,
जिनचैत्य जिनालय नमन करूँ।।
सब द्वीपों के प्रभुवर न्यारे,
सीमंधर आदिक को ध्याऊँ।
श्री पंचमेरू अरू नंदीश्वर के,
चैत्यालय के गुण गाऊँ।।
दश लक्षण धर्म हृदय धारूँ ,
सोालह कारण भावन भाऊँ।
रत्नत्रय धारण करने के,
सम्यक् साधन को अपनाऊँ।।
चौदह सौ बावन गणधर जी ,
सब ऋद्धि-सिद्धि देने वालैं
प्रभु के पाँचों कल्याणक भी ,
सबका संकट हरने वाले।।2।।
जिनवर के सब जन्म स्थल को,
करता हूँ मैं शत-शत वंदन।
श्रीवस्ती कौशाम्बी काशी,
अयोध्या चंद्रपुरी वंदन।।
काकंदी राजगृही मिथिला,
चंपापुर कुंडलपुर वंदन।
कम्पिलजी सिंहपुरी भद्रिल,
हस्तिनापुर आदि वंदन।।3।।
अतिशय औ सिद्धक्षेत्र जी का,
सुमरण सब पाप तिमिर हरता।
मैं चंपा पावा ऊर्जयंत,
सम्मेदशिखर वंदन करता।।
पावा द्रोणा सोना तंुगी,
कैलाश चूलगिरी ध्याऊँगा।
रेसंदी मुक्ता उदयरत्न ,
कुंथलगिरी को मैं जाऊँगा।।4।।
विपुलाचल पोदनपुर मथुरा ,
तारंगा गजपंथा वंदन।
श्री सिद्धवरकूट कमलदहजी,
गुणावा शत्रुंजय वंदन।।
अहिक्षेत्र अणिंदा वषभदेव ,
जटवाडा पैठण चंवलेश्वर।
कचनेर चाँदखेड़ी पाटन,
जिन्तूर तिजारा गोमटेश्वर।।5।।
कुन्थुगिरी नवग्रह धर्मतीर्थ,
मांडल के चन्दा को वंदन।
श्री महावीरजी पदमपुरा ,
आदिक तीर्थों को भी वंदन।।
जय ऊर्ध्व मध्य औ अधोलोक के,
सब चैत्यालय मनहारी।
निर्वाण सिधारे पूज्य परुष की,
पूजा सब संकटहारी।।6।।
श्री राम हनु सुग्रीव नील ,
महानील कुम्भ शत्बु ज्ञानी।
लवमदनां कुश सागर वरदत्त ,
श्री बाहुबली स्वामी ध्यानी।
गौतम जम्बू सुधर्मा श्री त्रय,
पांडवसुत अनिरूद्ध नमन।
इस ढाईद्वीप से मोक्ष पधारे,
उन गुरुओं को है वंदन।।7।।
श्री पँचबालयति को ध्यायें ,
नवदेवों की शरणा पायें।
सातिशय पुण्य कमाने को ,
मंगलमय पूजा हम गायें।।
जिनगुण के अनुरागी बनकर ,
संसार भ्रमण का नाश करें।
शिवपुर के राजेतिलक हेतु यह,
‘राज‘ प्रभुगण आश करे।।8।।
ऊँ ह्रीं श्री नित्यमह समुच्चय जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा
श्री जिन के आशीष से, प्रगटाऊँ निज ज्ञान।
पूजन-कीर्तन-भन से ‘राज‘ वरे शिव थान।।
।। इत्याशीर्वाद:- शांतये त्रय शांतिधारा ।।
||पुष्पांजलि क्षेपण करें||