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पापा के लिखे हुए कोटेशन

पापा के लिखे हुए  कोटेशन

1.मुसीबत सामने हो तो, यहाँ जीना सरल नहीं,

समय विपरीत हो तो, होठों का सीना सरल नहीं।

जहाँ में अमृत को तो, हर कोई पी ही लेता है,

मगर हाथों से अपने, ज़हर का प्याला पीना सरल नहीं।

2 .​समर्पण में कभी कोई, अनूठी आशा नहीं होती,

वतन के वीर प्रेमियों की, कोई परिभाषा नहीं होती।

जो अपनी जान ही माँ भारती के नाम कर बैठे,

उन अमर सपूतों की, कोई निजी अभिलाषा नहीं होती।


3.तेरे दीदार की दिल में, हमेशा तमन्ना रखते हैं,

हम हर एक गुरुवार को, तेरा ही इंतज़ार करते हैं।

तड़प बढ़ती ही जाती है, बड़ी ही दूर है गुरुवार,

मिलन की आस में हम तो, दुआ दिन-रात करते हैं।


4.सुबह से ढलते-ढलते देखो, शाम हो जाती है,

थकी सी शाम फिर निशा की, गोद में सो जाती है।

गँवाकर पाप कर्मों में, सारा जीवन बीत जाता है,

मेहर भगवान की तो, किसी निर्मल दिल पर ही हो पाती है।


5. प्यास पानी से बुझाई भी जा सकती है,

रुख हवाओं का बदली भी जा सकती है।

पर ठहर जाए जो दिल में ये वैराग्य अगर,

फिर तो दुनिया ही नश्वर नज़र आती है।

6.तपा होगा जो आग में,

वही स्वर्ण चोखा होगा।

करे जो वक्त की कीमत,

वही जग में अनोखा होगा।

​समय रहते संभल जाओ,

नहीं तो फिर ये रोना होगा।

गँवा दी सांस जो यूँ ही,

तो बस धोखा ही धोखा होगा।

7. गुलशन को आज लोग खुद वीरान बना रहे हैं,

विषयों में फँसे जीव को भगवान बना रहे हैं।

मासूम बेज़ुबाँ पशुओं का मांस खा-खाकर,

अपने ही इस पेट को कब्रिस्तान बना रहे हैं।

8.हौसला अगर बुलंद हो, तो हर पथ आसान होता है,

वरना डगमगाते कदमों के आगे, बस मौत का पैग़ाम होता है।

जो घबराकर मुश्किलों से, अपना हौसला ही हार जाते हैं,

वो जीते जी इस दुनिया में, अपनी ज़िंदगी हार जाते हैं।

पर जिनके इरादे फौलाद हों और हौसले बुलंद होते हैं,

इतिहास गवाह है वो वीर ही, हर बाज़ी मार जाते हैं।

9.सोना नहीं तपता तो कभी कुंदन नहीं होता,

जो घन नहीं खाता वो कभी अहन नहीं होता।

सोए हुए धारे कभी तूफ़ान नहीं बनते,

जो मौत से डर जाए वो इंसान नहीं होता।

10.आज इंसानों ने इंसानियत का पाठ खो दिया है,

धर्म की आड़ में ही कर्म का मार्ग पकड़ लिया है।

इसी के कोप से प्रकृति ने अपना रुख बदल दिया,

संभल जाओ कि भूला सुबह का अब शाम घर लौट आए।

11.तेरी वाणी में ऐसा ओज हो और इतना दम हो,

कि जिसके सामने हर बम की आवाज़ भी फीकी पड़ जाए।

और तेरे चाहने वालों का कारवाँ इतना बड़ा हो,

कि तुझसे मिलने वालों की हरदम लंबी लाइन लग जाए।

12.सूरज करता नहीं दोस्ती, कभी चाँद-सितारों से

शीतल जल करता नहीं यारी, शोलो और अंगारों से।
सिंह कभी करता नहीं दोस्ती, इन बुज़दिल गीदड़ों-सियारों से,

और सत्य के पुजारी डरते नहीं, कभी मौत के किनारों से!

13. ​"खुशबू सबको यूँ ही हासिल नहीं होती,

ज़िंदगी में खुशियाँ हर पल शामिल नहीं होती।

खुद को ही बनानी पड़ती हैं यहाँ अपनी राहें,

जो बिना सफ़र के मिल जाए, वो मंज़िल नहीं होती।"

14. ​"फूलों सा कमज़ोर मन है,

आयु का तन पर वज़न है।

साँस की चलती ऋचाएँ,

ज़िंदगी मौन हवन है।"

15जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह,

धरती तड़पेगी हमारे लिए जोगन की तरह।

दाग तुझमें है कि मुझमें, ये पता तब होगा,

मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबिन की तरह।"

16."है बहुत अंधियार, अब सूरज निकलना चाहिए,

जैसे भी हो, ये मौसम बदलना चाहिए।

छीनता हो जब कोई अधिकार तुम्हारा, उस घड़ी,

आँखों से आँसू नहीं, शोले निकलना चाहिए।"

17. ​"हर उदास चेहरे को रास्ता दिखाना है,

बिजलियों के साए में आशियाना बना है।

मंदिरों के दीपक तो कोई भी जला देता है,

आंधियों के दर पर हमें एक दिया जलाना है।"

18.​"घरौंदे तुमने देखे हैं पर असली घर नहीं देखा,

हवा देखी है आंधी की, मगर तेवर नहीं देखा।

बड़ी और छोटी चीज़ें जहाँ की, तुम भला क्या जानो,

कुएँ के मेंढक हो जिसने अभी सागर नहीं देखा।"

19. है बहुत कठिनाइयां इंसान के आगे

सब गवारा है मुझे इंसान के आगे

रोशनी बदनाम ना हो जाए इस डर से

रख दिया मैंने दीपक तूफान के आगे

20.दुश्मनी जम के करो ,मगर यह गुंजाइश रहे भविष्य में जब भी मिले ,तो शर्मिंदा न होना पड़े

21.​"सिर्फ अक्षर ज्ञान पाकर कोई विद्वान नहीं होता,

खोखली बातों से कभी कोई निर्माण नहीं होता।

यूँ तो दुनिया में दाताओं की कमी नहीं है,

पर नाम की खातिर जो दिया जाए, वो दान नहीं होता।"

22. ​"सम्यक की साधना को व्यवहार सँवारता है,

मोक्ष की साधना को निश्चय सँवारता है।

पर मत भूलो, कार्य निश्चय का जो होता है,

व्यवहार उसे अपनी गोद में सँवारता है।"

23.​"भगवान को इंद्र ने देखा अपनी दोनों आँखों से,

जो अपने को संतोष नहीं पाया, तो हज़ार आँखों से देखा,

तब संतोष पाया।

अरे मानव! तू कहाँ से लाएगा हज़ार आँखें?

अगर संतोष करना हो तो कर ले इन्हीं आँखों से,

नहीं तो पीछे फिर पछताएगा।"

24.​"एक दिन घूमने निकले, दिल में कुछ अरमान थे,

चारों तरफ झाड़ियाँ, बीच में श्मशान था।

चलते-चलते पैर तले, एक हड्डी टकराई,

उस हड्डी के यह बयान थे—

चलने वाले ज़रा संभल के चल, हम भी तो कभी इंसान थे।"

25.​"इस ज़िन्दगी पर नाज़ करना छोड़ दे ऐ इंसान,

पल भर में मौत इंसान को रवाना कर देती है।"

26.​"माँ तुम्हारा उपकार जो है,

माँ चुका न पाऊँगा कभी।

माँ चाहे जन्म-जन्म लग जाएँ,

माँ मुझको वह वर मिले।

माँ ऐसा अवसर आए,

माँ चरणों में बैठा रहूँ,

जैसे माँ-बेटा का हो प्यार।"

28.​"मैं मरने के बाद एक जुर्म और करूँगा,

लोग पैदल चलेंगे और मैं कंधों पर चलूँगा।"

29.​"न छेड़ो हमें, हम सताए हुए हैं,

जुदाई के नग़मे उठाए हुए हैं।

खिलौना समझकर न हमें तुम सताओ,

खिलौना किसी का बनाए हुए हैं।"

30.​"जो आत्म-चर्चा सुन, झगड़ा किया करते हैं,

शान्ति की बात सुन, अशान्ति जिया करते हैं।

अरे! दूसरों को सुधारने का ठेका लेने वाले,

बनेगा सिद्ध स्वयं, तो दूसरे स्वयं सिद्ध होंगे।"

31.​"इस डाल को छोड़, उस डाल जाना होगा,

पर आज भले ही हँस लो, कल तो मुरझाना होगा।

चार दिन की जवानी पर इतराना कोई अक्लमंदी नहीं,

अंत में इस मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना होगा।"

32.​"ऐ मूढ़ मन! सुन ज़रा, इक बात सुन ले ध्यान से,

आ गया तेरा बुढ़ापा, प्रभु नाम को तू बिसर गया।

सूत का तो ज़िक्र क्या, मूलधन भी खा गया,

कर्म की डिग्री हुई तेरी, कल खिड़की आएगी,

अरे अधम! तेरी ज़िन्दगी नीलाम कर दी जाएगी।"

34."ज़िन्दगी मौहताज़ नहीं मंज़िलों की,

वक्त हर मंज़िल दिखा देता है।

मरता नहीं कोई किसी से जुदा होकर,

वक्त सबको जीना सिखा देता है।"

35."शमा परवाने को, जलना सिखा देती है,

साँझ सूरज को, ढलना सिखा देती है।

गिरने वालों को कोसते क्यों हो तुम,

ठोकर इंसान को, चलना सिखा देती है।"

36.​"गई घड़ी वह तो गई, बची घड़ी जो हाथ,

किस घड़ी से घड़ी में, बन सकती है बात।

घड़ी की कीमत जानो, बड़ी पुण्य से मिली घड़ी,

इसको पहचानो, कहे काका कवि जन।

शुभ घड़ी आ जाती, जन्म-जन्म की बात,

घड़ी भर में बन जाती।"

37. ​"तिमिर को मिटाने के लिए चिराग चाहिए,

कष्टों से सदा लड़ने को वैराग्य चाहिए।

फूलों से तो प्यार यहाँ हर कोई करता है,

कांटों को गले लगाने को अनुराग चाहिए।"

38.​"हरी-भरी पेड़ की पत्तियाँ भी झड़ जाती हैं,

देखते ही देखते बहारें भी उजड़ जाती हैं।

इक धर्म के बिना कुछ भी साथ नहीं जाता,

सब यहीं पड़ा रहता है, जब प्राण पखेरू उठ जाते हैं।"